काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| भैषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ] | खिलस्थानम् | ३६३ |
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ब्राह्मतेज के द्वारा प्रज्वलित, अत्यन्त कान्ति वाले तथा लोकगुरु ब्रह्मर्षि कश्यप से भार्गव (वृद्धजीवक) ने प्रश्न किया।
आबाधकारणं व्याधिर्भेषजं सुखकारणम्। सम्यग्युक्तं तदमृतं स्यात्तदन्यद्विषवद्भवेत् ।।४।।
व्याधि (कष्ट) रोगों का कारण है तथा औषध सुख (स्वास्थ्य) का कारण है। सम्यक् प्रकार से प्रयुक्त की गई ओषधि अमृत के समान तथा अन्यथा प्रयुक्त की हुई विष के समान होती है ।।४।।
भेषजोपक्रमं तस्माद्भगवन्! वक्तुमर्हसि ।
औषधं किमधिष्ठानं कथं चास्योपदिश्यते । औषधज्ञौषधत्वं च भेषजत्वमथापि च ।।५।।
भैषज्यत्वागदत्वं च कषायत्वं तथैव च । यथा च गौण्येन रसा द्रव्ये द्रव्ये व्यवस्थिताः ।।६।।
प्राधान्येन यथा दृष्टो मधुके मधुरो रसः ।
अम्लः कपित्थे, लवणः सैन्धवे, नागरे कटुः ।।७।।
तिक्तस्तिक्तकरोहिण्यां, कषायश्चाभयां प्रति । सत्येवं रसनानात्वे संयोगः सर्व एव हि ।।८।।
कषायत्वेन निर्दिष्टः कुतः किं चात्र कारणम् ।
कति के चौषधगुणा भेदाश्चास्य कति स्मृताः ।।९।।
कति चौषधकालाश्च काले काले च को विधिः ।
कस्यां कस्यामवस्थायां पातव्यं भेषजं न वा ।।१०।।
कथं च पेयं पीतस्य परिहार्यं च किं भवेत् ।
जीर्यमाणस्य किं रूपं किं च जीर्णस्य लक्षणम् ।।११।।
विभज्य वयसस्त्रित्वं कथं मात्रा विधीयते । अधोभागोध्र्वभागानां दोषसंशमनी च या ।।१२।।
जीवनीया च या मात्रा दीपनीया च या स्मृता ।
मात्रा संशोधनी या च स्नेहमात्रा च या भवेत् ।।१३।।
सर्वमेतद्यथातत्त्वं कीर्तयस्व महामुने ! । जातमात्रमुपादाय यावद्वर्षशतं परम् ।।१४।।
इसलिये हे भगवन् ! आप ओषधियों के उपक्रम का व्याख्यान कीजिये । ओषधि का क्या अधिष्ठान होता है ? ओषधि का ज्ञान, ओषधि, भेषज, भैषज्य, अगद तथा कषाय का किस प्रकार उपदेश किया जाता है ? भिन्न २ द्रव्यों में गौणरूप से भिन्न २ रस विद्यमान होते हैं परन्तु प्रधानता के कारण मुलहठी में मधुर रस, कपित्थ (कैथ) में अम्ल रस, सैन्धव में लवण रस, सोंठ में कटुरस, तिक्तरोहिणी में तिक्त रस तथा हरीतकी में कषाय रस माना जाता है । इस प्रकार रसों के नाना प्रकार होने पर भी उनके संयोग अथवा समुदाय को कषायरूप से क्यों कहा गया है—इसका क्या कारण है ? औषध के कितने क्या कौन २ से गुण होते हैं ? इसके भेद कौन २ से होते हैं ? औषध के कितने काल होते हैं ? भिन्न २ काल में औषध सेवन की क्या विधि है ? किस अवस्था में औषध का प्रयोग करना चाहिये तथा किस में नहीं ? ओषधि किस प्रकार पीनी चाहिये ? ओषधि पीने बाद क्या परहेज होना चाहिये ? ओषधि के जीर्ण होते हुए तथा जीर्ण हो जाने के बाद क्या लक्षण होते हैं ? बालक के उत्पन्न होने से लेकर १०० वर्ष तक आयु को तीन भागों में विभक्त करके अधोभाग तथा ऊर्ध्वभाग द्वारा दोषों का संशमन करने वाली, जीवनीया, दीपनीय, संशोधनी तथा स्नेहमात्रा का किस प्रकार विभाग किया जाता है ? इन सबका आप सम्यक् प्रकार से उपदेश कीजिये ॥५-१४॥
इति शुश्रूषमाणाय शिष्याय वदतांवरः । आचचक्षे यथान्यायं भैषज्योपक्रमं प्रति ।।१५।।