भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 728

३६८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् भेषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ]

भोजनों के बीच में, ८. ग्रास के साथ, ९. दो ग्रासों के बीच में, १०. भोजन किये बिना। सुश्रुत उ. अ. ६४ में भी कहा है—अत ऊर्ध्वं दशौषधकालान् वक्ष्यामः। तत्राभक्तं प्राग्भक्तमधोभक्तं मध्ये भक्तमन्तराभक्तं सभक्तं सामुद्गं मुहुर्मुहुः ग्रासं ग्रासान्तरं चेति दशौषधकालाः ॥४३॥

पूर्वं भक्तस्य भैषज्यं न करोति बलक्षयम् ॥४४॥
आमाशयगतान् दोषान्निहन्त्याशु च पच्यते। अन्नसंस्तम्भिते देहे च्छर्द्युद्गारव्यथादयः ॥४५॥
न भवन्ति यतस्तस्माद्देयं दुर्बलीयसे।

१. भोजन से पूर्व ली गई औषध बल का क्षय नहीं करती तथा आमाशयगत दोषों को नष्ट करती है और शीघ्र ही पच जाती है। अन्न के द्वारा शरीर में ओषधि का स्तम्भन किया जाने पर वमन, उद्गार (डकार) तथा व्यथा आदि नहीं होते हैं। इसलिये इसका दुर्बल मनुष्यों में प्रयोग कराना चाहिये। सुश्रुत उ. अ. ६४ में कहा है—प्राग्भक्तं नाम यत् प्राग्भक्तस्योपयुज्यते। शीघ्रं विपाकमुपयाति बलं न हिंस्यादन्नावृतं च मुहुर्वदनान्निरेति। प्राग्भक्तसेवितमथौषधमेतदेव दद्याश्च वृद्धशिशुभीरुकृशाङ्गनाभ्यः ॥४४-४५॥

मध्येभक्तं ह्युभयतो रुद्धमन्नेन भेषजम् ॥४६॥
तदन्तराशये दोषान् सुखेनैव नियच्छति। शमयत्याश्वधो भक्तमुरःकण्ठशिरोगदान् ॥४७॥

२. भोजन के बीच में ली गई ओषधि दोनों ओर से अन्न के द्वारा रुकी होने के कारण शरीर के अन्दर के आशयों (कोष्ठों) में स्थित दोषों को सुखपूर्वक निकाल देती है। ३. भोजन के बाद सेवन की गई औषध छाती, कण्ठ तथा शिर में स्थित दोषों को शीघ्र ही शान्त कर देती है। सुश्रुत उ. अ. ६४ में इन दोनों के गुण निम्न प्रकार कहे हैं—अधो भक्तं नाम–यदधो भक्तस्येति। मध्ये भक्तं नाम–यन्मध्ये भक्तस्य पीयते। पीतं यदन्नमुपयुज्य तदूर्ध्वकाये हन्याद् गदान् बहुविधांश्च बलं ददाति। मध्ये तु पीतमपहन्त्यविसारिभांवाद्ये मध्यदेहमभिभूय भवन्ति रोगाः ॥४६-४७॥

व्यत्यासेन च सामुद्गं दोषे तूर्ध्वमधोगते। मुहुर्मुहुः श्वासकासहिक्कातृट्छर्दिशान्तये ॥४८॥

४. जब दोष ऊर्ध्व तथा अधोमार्ग दोनों में फैले हुए हों तब परस्पर क्षेपण के द्वारा सामुद्ग का प्रयोग करना चाहिये। सुश्रुत उ. अ. ६४ में कहा है—समुद्ग नाम यद्भक्तस्यादावन्ते च पीयते। दोषे द्विधा प्रविस्सृते तु समुद्गसंज्ञमाद्यन्तयोर्यदशनस्य निषेव्यते तु।। अर्थात् जब भोजन के आदि तथा अन्त दोनों समय औषध ली जाती है तब उसे सामुद्ग कहते हैं। ५. श्वास, कास, हिक्का, तृषा तथा छर्दि (वमन) की शान्ति के लिये मुहुर्मुहुः (बारबार) ओषधि का प्रयोग करना चाहिये ॥४८॥

हितं बलाग्निरक्षार्थं सभक्तं दुर्बलात्मनाम्। स्त्रीबालवृद्धललितक्षतक्षीणौषधद्विषाम् ॥४९॥

६. दुर्बल, स्त्री, बालक, वृद्ध, ललित (नाजुक व्यक्ति), क्षत, क्षीण तथा ओषधि से जिसे द्वेष है—ऐसे व्यक्तियों को बल तथा अग्नि की रक्षा के लिये सभक्त (भोजन के साथ) ओषधि का प्रयोग करना चाहिये। सुश्रुत उ. अ. ६४ में कहा है—सभक्तं नाम-यत् सह भक्तेन। पथ्यं सभक्तमबलाऽबलयोर्हि नित्यं तद्द्वेषिणामपि तथा शिशुवृद्धयोश्च ॥ अर्थात् शिशु, वृद्ध तथा दुर्बल व्यक्तियों को जो भोजन के साथ ओषधि का प्रयोग किया जाता है उसे सभक्त कहते हैं ॥४९॥

व्याधौ मन्देऽनले तीक्ष्णे भक्तयोर्मध्य इष्यते।

७. व्याधि के मन्द तथा अग्नि के तीक्ष्ण होने पर दो भोजनों के बीच में ओषधि देनी चाहिये। सुश्रुत उ. अ. ६४ में कहा है—अन्तराभक्तं नाम-यदन्तरा पीयते पूर्वापरयोर्भक्तयोः। हृद्यं मनोबलकरं त्वथ दीपनं च-पथ्यं सदा भवति चान्तराभक्तकं यत् ॥५०॥