भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 729

भैषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ] खिलस्थानम् ३६१

क्षीणक्षीणाल्पशुक्राणां वाजीकरणमौषधम् ।।५०।। ग्रासे विधेयं चूर्णं च यदग्निबलवर्धनम् ।

८. दुर्बल तथा क्षीण और अल्प शुक्र वाले व्यक्तियों में बाजीकरण औषध तथा अग्नि और बल को बढ़ाने वाले चूर्ण का ग्रास के साथ प्रयोग करना चाहिये। सुश्रुत उ. अ. ६४ में कहा है—ग्रासं तु-यत्पिण्डव्यामिश्रम्। ग्रासेषु चूर्णमबलाग्निषु दीपनीयं-वाजीकरणान्यपि तु योजयितुं यतेत ।।५०।।

ग्रासान्तरे च्छर्दनीयं धूमपानं च शस्यते ।।५१।।

९. दो ग्रासों के बीच में छर्दनीय (वमनीय) धूम्रपान का प्रयोग करना चाहिये। सुश्रुत उ. अ. ६४ में कहा है—ग्रासान्तरं तु यद् ग्रासान्तरेषु। ग्रासान्तरेषु वितरेद्वमनीयधूमान् श्वासादिषु प्रथितहृद्गुणांश्च लेहान् ।। इसकी व्याख्या में डल्लण ने लिखा है—‘वमनीयधूमानिति स्नायुचर्मशुरप्रभृतिभिः कृतान्’ । अर्थात् दो ग्रासों के बीच में स्नायु, चर्म, खुर आदियों के द्वारा तैयार किये हुए वमनीय धूमों का प्रयोग करना चाहिये ।।५१।।

अभक्तमौषधं पीतं व्याधिमाशु बलीयसाम् । हन्यात्तद्देवेह बलं बलवद्वर्बलीयसाम् ।।५२।।

१०. बिना भोजन किये हुए प्रयुक्त की हुई ओषधि शीघ्र ही बलवान् व्यक्तियों के रोगों को नष्ट कर देती है। जिस प्रकार बलवान् व्यक्ति दुर्बल मनुष्यों के बलों को नष्ट कर देता है। सुश्रुत उ. अ. ६४ में कहा है—तत्राभक्तं तु यत् केवलमेवौषधमुयुज्यते’ । अर्थात् जो केवल अन्नरहित ओषधि का प्रयोग किया जाता है उसे अभक्त कहते हैं उसके गुण निम्न कहे हैं—वीर्याधिकं भवति भेषजमन्नहीनं हन्यात्तथाऽमयमसंशयमाशु चै। तद्बालवृद्धवनिनामृदवस्तु पीत्वा ग्लानिं परां समुपयान्ति बलक्षयं च ।। अर्थात् केवल अन्न रहित प्रयुक्त की हुई ओषधि अधिक वीर्य वाली होती है तथा शीघ्र ही रोगों को नष्ट कर देती है ।।५२।।

एतानौषधकालांस्तु विभजेद्दशधा दश । क्षीणधात्विन्द्रिये शान्ते क्लान्ते तान्ते बुभुक्षिते ।।५३।। भैषज्यदग्धकोष्ठे च भेषजं नावचारयेत् । क्रुद्धे विषण्णे शोकार्ते रात्रौ जागरिते तथा ।।५४।। विदग्धाजीर्णभक्ते च भेषजं नावचारयेत् । कर्मातिभाराभिहते निरूढे सानुवासिते ।।५५।। उपोषिते विरिक्ते च भेषजं नावचारयेत् । यत्किञ्चिदप्युपात्तान्ने मूच्छिते घर्मतापिते ।।५६।। सद्यः पीतोदके चैव भेषजं नावचारयेत् । अवस्थाविपरीतं च भेषजं नावचारयेत् ।।५७।।

इन दस औषधों के कालों को दस प्रकार से विभक्त करे । कहां २ ओषधि का प्रयोग नहीं करना चाहिये—जिसकी धातु तथा इन्द्रियां क्षीण हो गई हैं, जो शान्त, क्लान्त (थका हुआ), खिन्न तथा भूखा हो, भैषज्य के द्वारा जिसका कोष्ठ दग्ध हो चुका हो, जो क्रुद्ध, दुःखी, एवं शोक से पीड़ित हो तथा जो रात्रि में जागा हुआ हो, जिसका खाया हुआ भोजन विदग्ध हो गया हो, जिसे अजीर्ण हो, अधिक कार्य तथा भार से जो पीड़ित हो, जिसे निरूह एवं अनुवासन दिया हो, जिसने उपवास किया हो, जिसे विरेचन दिया गया हो, जो व्यक्ति जो भी अन्न मिल जाय उसका (अर्थात् प्रत्येक अन्न का) सेवन करता हो, जो मूर्च्छित हो तथा जो गर्मी से पीड़ित हो, जिसने कुछ समय पूर्व ही पानी पिया हो ऐसे व्यक्तियों को तथा अवस्था से विपरीत ओषधि का प्रयोग नहीं करना चाहिये ।।५३-५७।।

ऊनद्वादशवर्षाणां नैकान्तेनावचारयेत् । अवचारितमेकान्तेनाहन्यहनि चौषधम् ।।५८।। असमत्वागतप्राणदोषधातुबलौजसाम् । अत्यन्तसुकुमाराणां कुमाराणां बलायुषी ।।५९।।

१२ वर्ष से कम अवस्था वालों में ओषधि का एकान्त रूप से अर्थात् निरन्तर प्रयोग नहीं करना चाहिये। प्रतिदिन निरन्तर प्रयोग कराई गई ओषधि—जिनके शरीर में प्राण दोष, धातु, बल तथा ओज समरूप में विद्यमान नहीं हैं तथा जो अत्यन्त सुकुमार हैं—ऐसे बालकों के बल और आयु को नष्ट कर देती है ।।५८-५९।।

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