भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 730, कुल 942 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 730

३७० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् भैषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ]

क्षीणातिवृद्धक्रुद्धानां क्षीणधात्विन्द्रियौजसाम् । एकान्तेनौषधं पीतं सूर्यस्तोयमिवाल्पकम् ।। ६० ।।

जो व्यक्ति क्षीण, अत्यन्त वृद्ध एवं क्रुद्ध है, जिसके धातु, इन्द्रियां एवं ओज क्षीण हो चुके हैं—उनमें यदि ओषधि का निरन्तर रूप से प्रयोग किया जायगा तो वह उन्हें उस प्रकार नष्ट कर देती है जिस प्रकार थोड़े जल को सूर्य नष्ट कर देता है ।।

व्याधिदोषबलाग्निभ्यो हीनं तेभ्योऽधिकं च यत् । अजिज्ञासितपूर्वं च गुणैश्चोक्तैर्विवर्जितम् ।। ६१ ।।
अरोगसात्म्यं दुर्युक्तमनिष्टं मनसश्च यत् । यस्य पीतस्य पाकान्ते दोषः सूक्ष्मोऽपि लक्ष्यते ।। ६२ ।।
व्याधेश्च प्रशमो न स्यात्तच्च वर्ज्यं विजानता ।

त्याज्य ओषधि—जो ओषधि-व्याधि, दोष, बल एवं अग्नि से हीन अथवा अधिक हो, जिसका पहले से ज्ञान न हो, जो यथोक्त गुणों से रहित हो, जो रोग के अनुसार न हो, ठीक प्रकार से प्रयुक्त न की गई हो, जो मन के अनुकूल न हो, जिस ओषधि के पीने के बाद पाक के अनन्तर भी थोड़ा बहुत दोष अवशिष्ट दिखाई देता हो तथा व्याधि शान्ति न हो-बुद्धिमान् व्यक्ति को उस ओषधि का त्याग कर देना चाहिये ।।६१-६२।।

यन्नात्तुरबलं हन्ति व्याधिवीर्यं निहन्ति च ।। ६३ ।।
तदेवास्यावचार्यं स्यादाव्याध्युच्छेददर्शनात् ।

प्रयोज्य ओषधि—जो ओषधि रोगी के बल को नष्ट नहीं करती परन्तु रोग के बल को नष्ट करती है उसी ओषधि का व्याधि के नष्ट होने पर्यन्त प्रयोग करना चाहिये ।।६३।।

कामं व्याधौ प्रशान्तेऽपि शमदानाच्छमौषधम् ।। ६४ ।।
तदेवाल्पं विधातव्यं सकृद् द्विस्त्रिर्यथाबलम् ।

व्याधि के शान्त हो जाने पर भी व्याधि को शान्त करने के कारण उस शामक ओषधि का अल्पमात्रा में बल के अनुसार एक, दो अथवा तीन बार प्रयोग करना चाहिये ।।६४।।

पुण्येऽहनि नमस्यादौ देवद्विजभिषग्गुरून् ।। ६५ ।।
पूर्वाह्णे प्राङ्मुखायास्मै सुखासीनाय साधवे । बुभूषमाणाय भिषङ्मन्त्रवद्द्वेषजं शुचिः ।। ६६ ।।
इदं $^१$हन्त पिब चेति संप्रयच्छेदुदङ्मुखः ।

औषध प्रयोग विधि—पुण्य दिन में सर्वप्रथम देव, ब्राह्मण, वैद्य तथा गुरुओं को नमस्कार करके पूर्वाह्न (प्रातःकाल) के समय पूर्व की ओर मुख किये हुए, सुखपूर्वक बैठे हुए, सज्जन तथा ओषधि का सेवन करने की इच्छा वाले रोगी को पवित्र हुआ तथा उत्तर दिशा की ओर मुख किया हुआ वैद्य कहे कि हन्त$^२$ ! (सम्बोधन) तू इस मन्त्रयुक्त ओषधि को पी ।।६५-६६।।

अतिचङ्क्रमणस्थानशयनासनभाषणम् ।। ६७ ।।
क्रोधशोकदिवास्वप्नविरुद्धान्नहिमातपान् । पीतौषधो न सेवेत तथा स्त्रीवेगधारणम् ।। ६८ ।।


१. पञ्चयज्ञान्तर्गते मनुष्ययज्ञे मनुष्येभ्यो हन्तशब्देन दानविधानवदत्रापि मनुष्येष्वेष्वौषधदाने आर्यसम्प्रदायसम्भवो हन्तशब्दप्रयोगः, नत्वत्र खेदवाचको हर्षवाचको वाऽयं शब्दः, किन्तु त्यागविशेषवाचक इति ध्येयम् ।
२. पञ्चयज्ञ के अन्तर्गत मनुष्य यज्ञ में मनुष्यों के लिये हन्त शब्द के द्वारा दान विधान की तरह यहां भी मनुष्यो के लिये औषध का प्रयोग करते हुए आर्य सम्प्रदाय वाले हन्त शब्द का प्रयोग किया गया प्रतीत होता है । यह हन्त शब्द खेद अथवा हर्ष वाचक नहीं है, अपितु त्याग विशेष वाचक ही है ।