काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभैषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ] खिलस्थानम् ३७१
औषध सेवन के बाद त्याज्य भाव—ओषधिका सेवन करने के बाद अतिचङ्क्रमण (अधिक चलना), अधिक बैठना, अधिक सोना, अधिक बोलना, क्रोध, शोक, दिवास्वप्नविरुद्ध भोजन, हिम (बरफ), धूप तथा स्त्रीसम्बन्धी वेग के धारण आदि का सेवन नहीं करना चाहिये ॥६७-६८॥
विजृम्भाः शब्दविद्वेषो मुखशोषोऽरतिः क्लमः।
तन्द्रीरुद्वेष्टनं सादो लिङ्गं जीर्यति भेषजे ॥६९॥
ओषधि के जीर्ण होने के लक्षण—औषध के जीर्ण होने पर जंभाई, शब्दों से विद्वेष, मुख का सूखना, अरुचि, थकावट, तन्द्रा, उद्वेष्टन (हाथ-पैर में अकड़ाहट) तथा आलस्य आदि लक्षण होते हैं ॥६९॥
सृष्टिविण्मूत्रवातानां शरीरस्य च लाघवम्। उद्गारशुद्धिर्वैशद्यं वैमल्यं हृदयस्य च ॥७०॥
प्रकाङ्क्षा कुक्षिशैथिल्यमन्नकालस्य लक्षणम्।
अन्नकाल के लक्षण—मल, मूत्र तथा वायु का निकलना, शरीर का हलकापन, डकार का साफ आना, विशदता, हृदय की विमलता, भोजन में रुचि, कुक्षिकी शिथिलता इत्यादि—अन्नकाल (भोजन के समय) के लक्षण होते हैं ॥७०॥
वयस्त्रिधा विभज्यादौ मात्रा वक्ष्याम्यतः परम् ॥७१॥
पहले अवस्था (आयु-Age) को तीन प्रकार से विभक्त करके तदुपरान्त मैं औषध की मात्रा का निर्देश करूंगा ॥७१॥
गर्भबालकुमाराख्यमित्येतत्त्रिविधं वयः। यौवनं मध्यमं वृद्धमेतच्च त्रिविधं पुनः ॥७२॥
गर्भ, बाल तथा कुमार—यह तीन प्रकार की अवस्था होती है। यह यौवन, मध्यम तथा वृद्ध के भेद से पुनः तीन प्रकार की होती है ॥७२॥
वर्षावरः क्षीरपः स्याद्यावत् पिबति वा पयः। वयस्तद्बालसस्माच्च यावत् षोडशवार्षिकः ॥७३॥
अन्नादः सर्व एव स्यात् कौमारे वयसि स्थितः। अतः परं धातुसत्त्वबलवीर्यपराक्रमैः ॥७४॥
वर्धमानैश्चतुस्त्रिंशद्युवा वर्षाण्युदर्कतः। धात्वादिभिः स्थिरीभूतैर्यावदासप्ततिर्नरः ॥७५॥
(इति ताडपत्रपुस्तके २०६ तमं पत्रम्।)
मध्यो धात्वादिभिः पश्चात् क्षीयमाणैर्यथाक्रमम्। वृद्धो भवति मन्दात्मा प्रवृत्तिर्यावदायुषः ॥७६॥
एक वर्ष की अवस्था तक अथवा जब तक बालक दूध पीता है तब तक उसे क्षीरप कहते हैं। यह बाल अवस्था कहलाती है। इस एक वर्ष की अवस्था से लेकर १६ वर्ष की अवस्था तक सम्पूर्ण अन्नाद (अन्न का सेवन करनेवाले) बालक कौमारावस्था में होते हैं। इसके बाद धातु, सत्त्व, बल, वीर्य एवं पराक्रम के द्वारा बढ़ता हुआ व्यक्ति उत्तर परिणाम के अनुसार ३४ वर्ष की अवस्था तक युवा कहलाता है। धातु आदियों के स्थिर हो जाने पर सत्तर वर्ष की अवस्था तक मनुष्य की मध्यम अवस्था समझी जाती है। इसके बाद धातु आदियों के क्रमशः क्षीण हो जाने पर मन्द आत्मावाला व्यक्ति आयु पर्यन्त वृद्ध कहलाता है। अर्थात् यहां आयु को पहले मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा गया है—१. यौवन (३४ वर्ष तक) २. मध्यम अवस्था (३४ से ७० वर्ष तक) तथा ३. वृद्धावस्था (७० से आयु पर्यन्त) यौवन अवस्था के भी तीन भाग किये गये हैं १. बालावस्था (१ वर्ष तक अथवा दूध पीने की अवस्था तक) २. कौमारावस्था (१ से १६ वर्ष की आयु तक) ३. युवा (१६ से ३४ वर्ष की अवस्था तक) सुश्रुत सू. अ. ३५ में भी अवस्था के ये ही भेद दिये हैं—वयस्तु त्रिविधं-बाल्यं, मध्यं, वृद्धमिति। तत्रोनषोडशवर्षिया बालाः। तेऽपि त्रिविधाः-क्षीरपाः, क्षीरान्नादाः, अन्नादा इति।