काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 732, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३७२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | भेषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ] |
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तेषु संवत्सरपराः क्षीरपाः, द्विसंवत्सरपराः क्षीरान्नादाः, परतोऽन्नादा इति । षोडशसप्तत्योरन्तरे मध्यं वयः । तस्य विकल्पो वृद्धियौवनं संपूर्णता परिहाणिरिति । तत्र, आविंशतेर्वृद्धिः, आत्रिंशतो यौवनम्, आचत्वारिंशतः सर्वधात्विन्द्रियबलवीर्यसंपूर्णता, अत ऊर्ध्वमीषत्परिहाणिर्यावत् सप्त तिरिति । सप्ततेरूर्ध्वं क्षीयमाणधात्विन्द्रियबलवीर्योत्साहमहन्यहनि बलीपलितखालित्यजुष्ट कासश्वासप्रभृतिभिरुपद्रवैरभिभूयमानं सर्वक्रियास्वसमर्थं जीर्णागारमिवाभिवृष्टमवसोदन्तं वृद्धमाचक्षते । यहां भी वर्णन करने के ढंग में थोड़ा बहुत अवश्य अन्तर है अन्यथा वे ही भेद दिये गये हैं। मुख्यरूप से यहां भी तीन भेद दिये गये हैं। १. बाल्यावस्था (१६ वर्ष तक) २. मध्यमावस्था (६० वर्ष तक) तथा ३. वृद्धावस्था (६० वर्ष के बाद आयुपर्यन्त)। इन्हीं के अवान्तर भेद भी पृथक् २ दिये हैं जिनका प्रकृत ग्रन्थोक्त भेदों में ही अन्तर्भाव किया जा सकता है। इसी प्रकार चरक वि. अ. ८ में भी आयु के लगभग ये ही भेद दिये गये हैं ॥७३-७६॥
विकल्पनाऽन्या वृद्धस्य तस्य षोडशवार्षिकी । भवेद्भेषजमात्रा तु क्षीयमाणोत्तरोत्तरा ।।७७।।
शतिके शताधिके वाऽपि क्षीरान्नादवदिष्यते ।
वृद्ध व्यक्ति की ओषधि की मात्रा १६ वर्ष के व्यक्ति (Adult) की अपेक्षा उत्तरोत्तर क्षीण होती जाती है। तथा अन्त में जाकर १०० वर्ष अथवा इससे अधिक अवस्था में क्षीरान्नाद बालक के समान होती है। अर्थात् १०० वर्ष अथवा उसके बाद की अवस्था में व्यक्ति की औषध की मात्रा उतनी ही होनी चाहिये जितने क्षीरान्नाद (२ वर्ष के) बालक की होती है ॥७७॥
जातमात्रस्य मात्रा स्यात् सर्पिष्कोलास्थिसंमिता ।।७८।।
पञ्चरात्रं भवेद्यावद्दशाहमधिकं ततः । कोलार्धसंमितं यावद्विंशद्रात्रमतः परम् ।।७९।।
उत्पन्न हुए बालक के लिए घृत की मात्रा छोटे बेर की गुठली के प्रमाण के बराबर होनी चाहिये। उसके बाद ५ दिन तथा १० दिन की अवस्था तक उससे कुछ अधिक मात्रा देनी चाहिये। इसके बाद २० दिन तक की अवस्था में आधे कोल (बेर) के प्रमाण की मात्रा होनी चाहिये ॥७८-७९॥
कोलमात्रं भवेद्यावन्मासं मासद्वयेऽधिकम् । द्विकोलसंमितं सर्पिस्तृतीये मासि शस्यते ।।८०।।
एक मास की अवस्था तक एक कोल (बेर) के बराबर तथा दो मास तक उससे कुछ अधिक मात्रा होनी चाहिये। तीसरे मास में घृत की मात्रा दो कोल के बराबर होनी चाहिये ॥
शुष्कामलकमात्रं तु चतुर्थे मास्युदाहृतम् । पञ्चमे मासि षष्ठे च ह्याद्रामलकसंमितम् ।।८१।।
तदेवाभ्यधिकं किञ्चिद्विहितं सप्तमाष्टमे ।
चौथे मास में शुष्क आंवले के समान मात्रा होनी चाहिये। तथा पांचवें और छठे मास में घृत की मात्रा गीले आंवले के बराबर होनी चाहिये। सातवें तथा आठवें मास में इससे कुछ अधिक मात्रा होनी चाहिये ॥८१॥
क्षीरान्नादस्य बालस्य प्रायेणाहारसंकरात् ।।८२।।
भवत्यनियतो वह्निः पक्तौ बह्वनिलात्मनः । तस्याऽग्न्यावेक्षिकी तस्मात् स्नेहमात्रा विधीयते ।।८३।।
वातप्रधान क्षीरान्नाद (दूध तथा अन्न दोनों का सेवन करनेवाले) बालक की जाठराग्नि प्रायः मिश्रित भोजन के खाने से भोजन के पचाने में अनिश्चित होती है अर्थात् जाठराग्नि सम नहीं होती। इसलिये उसके लिये स्नेह की मात्रा उसकी अग्नि के अनुसार होनी चाहिये ॥८२-८३॥
अन्नादस्य तु भूयिष्ठं समो भवति पावकः । तस्यामलकमात्रस्य सर्पिषः पानमिष्यते ।।८४।।