काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभैषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ] खिलस्थानम् ३७३
अन्नाद (अन्न का सेवन करने वाले) बालक की जाठराग्नि अपेक्षाकृत अधिक सम होती है। उसे आंवले के प्रमाण के बराबर घृत का पान कराना चाहिये ॥८४॥
तदेवाग्निबलं वीक्ष्य वर्धमानस्य वर्धयेत् । क्षीरपस्य कुमारस्य क्षीरान्नादस्य चोभयोः ॥८५॥
ज्यों २ वह वृद्धि को प्राप्त होता जाय त्यों २ क्षीरप (दूध पीने वाले) तथा क्षीरान्नाद (दूध और अन्न दोनों का सेवन करने वाले) दोनों की मात्रा अग्निबल को देखकर बढ़ानी चाहिये ॥८५॥
देयं स्नेहचतुर्भागं भेषजस्य यथामयम् । घृतेन पाययेद्बालं यावत् स्यादष्टमासिकः ॥८६॥
मासादतोऽष्टमाज्जन्तोज्जलपिष्टं प्रदापयेत् ।
आठ मास की अवस्था तक बालक को रोग के अनुसार स्नेह की चतुर्थांश औषध घृत के साथ पिलानी चाहिये। आठ मास के बाद बालक को जल में धुली हुई ओषधि देनी चाहिये ॥८६॥
अतः परं यथाशास्त्रं कुमारस्यान्नसेविनः ॥८७॥
वक्ष्यामि विविधां मात्रां भेषजानां विभागशः ।
इसके बाद अन्न का सेवन करने वाले बालक के लिये मैं शास्त्र के अनुसार विभागपूर्वक ओषधियों की विविध प्रकार की मात्रा का उपदेश करूंगा ॥८७॥
मुचूटिं^१ वा प्रकुञ्चं वा प्रसृतं वाऽथवाऽञ्जलिम् ॥८८॥
आतुरस्य प्रमाणेन समेतव्यं चिकित्सिते ।
चिकित्सा में रोगी के रोग अथवा बल के प्रमाण के अनुसार एक मुष्टि, पल, प्रसृत अथवा अञ्जलि प्रमाण ओषधि देनी चाहिये ॥८८॥
अग्रपर्वाङ्गुलिग्राह्या चूर्णमात्रा तु पाणिना ॥८९॥
चूर्णानां दीपनीयानामेषा मात्रा विधीयते । द्विगुणा जीवनीयानां तथा संशमनस्य च ॥९०॥
ऊर्ध्वभागे त्वर्धमात्रा तथैवं च विरेचने ।
हाथ की अंगुली के अगले पर्व (पोर—Phalynx) के समान चूर्ण की मात्रा ग्रहण करनी चाहिये। यह दीपनीय चूर्णों की मात्रा कही गई है। जीवनीय तथा संशमनीय चूर्णों की मात्रा इससे दुगुनी होनी चाहिये। वमन तथा विरेचन के लिये चूर्णों की मात्रा उससे आधी होनी चाहिये ॥
वातपित्तकफघ्नानां कषाये तु प्रदापयेत् ॥९१॥
द्वौ दापयेत प्रसूतौ शर्करामधुसंयुतौ ।
वात पित्त तथा कफ नाशक कषायों में शर्करा तथा मधु के साथ मिलाकर चूर्ण की मात्रा दो प्रसृत लेनी चाहिये ॥९१॥
प्रसृतं छर्दनीयस्य निष्क्वाथस्य प्रदापयेत् ॥९२॥
तथा वैरेचनीयस्य प्रसृतं नात्र संशयः ।
द्विगुणां जीवनीयस्य तथा संशमनस्य च ।
१. मुचूटिर्मुष्टिः प्रकुञ्चः पलम् ।