भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 734

३७४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् भैषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ]

वामक तथा विरेचक क्वाथ की मात्रा निश्चित रूप से एक प्रसृत होनी चाहिये तथा दीपनीय और संशमनीय क्वाथ की मात्रा इससे दुगुनी होनी चाहिये ॥९२॥

दीपनीयस्य कल्कं तु अक्षमात्रं प्रदापयेत् ॥९३॥ द्विगुणं जीवनीयस्य तथा संशमनस्य च । अक्षार्धं छर्द्दनीयस्य तथा वैरेचिकस्य च ॥९४॥ दीपनीय कल्क की मात्रा एक अक्ष (कर्ष), जीवनीय तथा संशमनीय की इससे दुगुनी तथा वामक और विरेचक कल्क की मात्रा इससे आधी होनी चाहिये ॥९३-९४॥

स्नेहमात्रामतो वक्ष्ये वमने सविरेचने । वमने वमनीयाभिरोषधीभिः सुसंस्कृते ॥९५॥ मात्रावत्तु घृतं दद्याद्धमने कफसंभवे । अर्धमात्रा भवेद्धेया विरेके सर्पिषस्तथा ॥९६॥ वैरेचनैर्विपक्वस्य पित्ते प्रकुपिते सति ।

वमन तथा विरेचन के लिये अब मैं स्नेह (घृत) की मात्रा का उपदेश करूंगा। श्लैष्मिक वमन में वमनीय ओषधियों से सुसंस्कृत घृत मात्रा में देना चाहिये। तथा पित्त के प्रकुपित होने से उत्पन्न विरेचन में विरेचन द्रव्यों से पकाये हुए स्नेह की मात्रा इससे आधी देनी चाहिये ॥९५-९६॥

मात्राऽधश्चोर्ध्वभागा च श्लैष्मिकस्य प्रशस्यते ॥९७॥ दीपनैः शमनीयैश्च जीवनीयैश्च साधितम् । श्लैष्मिक वमन तथा विरेचन में भी दीपक, शामक एवं जीवनीय द्रव्यों से साधित स्नेह की इतनी ही मात्रा देनी चाहिये ॥९७॥

तथाऽपि कुपिते वाते दोषे पक्वाशये स्थिते ॥९८॥ कुक्षिग्रन्थिषु पार्श्वे च सक्ते देयं विरेचनम् । शमनैर्दीपनीयैश्च पाचनीयैश्च साधितम् ॥९९॥ वायु के प्रकुपित होने पर और दोष के पक्वाशय, कुक्षिग्रन्थि तथा पार्श्वों में स्थित होने पर शामक, दीपक एवं पाचक द्रव्यों से सिद्ध विरेचन देना चाहिये ॥९८-९९॥

चतुर्भागगुणं दद्यान्मात्रायाः कुम्भसर्पिषः । पादार्धहीनं पादोनमर्धं वाऽपि यथाक्रमम् ॥१००॥ सर्पिर्विदद्याद्बालेषु संप्रधार्य वयोबले । एतदर्थ बालकों की अवस्था तथा बल के अनुसार क्रमशः कुम्भसर्पि की मात्रा चौगुनी, पादार्धहीन, तीन चौथाई (३/४) अथवा आधी होनी चाहिये।

वक्तव्य—कुम्भसर्पि—कुछ लोक १० वर्ष तथा कुछ १०० वर्ष पुराने घृत को कुम्भसर्पि कहते हैं। यथा—कौम्भं दशाब्दिकम् (चक्रपाणि) तथा शतवर्षस्थितं यत्तु कुम्भसर्पिस्तदुच्यते (योगरत्नाकर) ॥१००॥

निष्क्वाथानां सकल्कानां चूर्णानां सर्पिषस्तथा ॥१०१॥ इत्युक्ता विविधा मात्रा मात्रामूलं चिकित्सितम् । इस प्रकार क्वाथ, कल्क, चूर्ण तथा घृत की अनेक प्रकार की मात्रायें कही हैं क्योंकि मात्रा पर ही चिकित्सा निर्भर है ॥

तस्मादग्निमृतुं सात्म्यं देहं कोष्ठं वयो बलम् ॥१०२॥ प्रकृतिं भेषजं चैव दोषाणामुदयं व्ययम् । विज्ञायैतद्यथोद्दिष्टं मात्रां सम्यक् प्रयोजयेत् ॥१०३॥

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