काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 735, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंभैषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ] खिलस्थानम् ३७५
इसलिये अग्नि, ऋतु, सात्म्य, देह, कोष्ठ, वय (अवस्था), बल, प्रकृति, ओषधि तथा दोषों के प्रकोप और शान्ति को जानकर ही ठीक प्रकार से मात्रा का प्रयोग करे ॥१०२-१०३॥
अप्रमत्तः सदा च स्याद्भेषजानां प्रयोजने । ओषधीर्नामरूपाभ्यां जानन्ति वनगोचराः ।।१०४।।
अजपालाश्च गोपाश्च न तु कर्मगुणं विदुः ।
ओषधियों के प्रयोग में सदा सावधान रहना चाहिये । वनों में घूमने वाले बकरियों तथा गायों के चरवाहे ओषधियों के नाम तथा रूप को जानते हैं परन्तु वे उनके कर्म तथा गुणों को नहीं जानते हैं । इसी प्रकार चरक सू. अ. १ में भी कहा है ॥१०४॥
योगं त तासां योगज्ञा भिषजः शास्त्रकोविदाः ।।१०५।।
मात्राबलविधानज्ञा जानते गुणकर्म च ।
ओषधियों के योग को जानने वाले, शास्त्रों के पण्डित तथा उनके मात्रा, बल और विधान को जानने वाले वैद्य ओषधियों के योग तथा गुण और कर्म को जानते हैं ॥१०५॥
कर्मज्ञो वाऽप्यरूपज्ञस्तासां तत्त्वविदुच्यते ।।१०६।।
किं पुनर्ये विजानीयादोषधीः सर्वथा भिषक् ।
ओषधियों के कर्म को जानने वाला वैद्य उनके रूप को न जानने पर भी तत्त्ववित् (तत्त्वज्ञ) कहलाता है । और जो वैद्य ओषधियों को सर्वथा जानता है अर्थात् उनके रूप, गुण, कर्म आदि सब कुछ जानता है उसका तो कहना ही क्या है ॥
यथा विषं यथा शस्त्रं यथाऽग्निरशनिर्यथा ।।१०७।।
तथौषधमविज्ञातं विज्ञातममृतोपमम् ।
जिस औषध को वैद्य नाम, रूप, गुण अथवा सम्यकयोग द्वारा नहीं जानता है उस औषध को विष, शस्त्र, अग्नि तथा वज्र के समान जानना चाहिये अर्थात् अविज्ञात औषध विष आदि के समान प्राणनाशक है । तथा सम्यक् प्रकार से जानी हुई ओषधि को अमृत के समान जानना चाहिये । चरक सू. अ. १ में भी यह श्लोक लगभग इसी रूप में मिलता है ॥१०७॥
औषधं चापि दुर्युक्तं तीक्ष्णं संपद्यते विषम् ।।१०८।।
विषं च विधिना युक्तं भैषज्यायोपकल्पते ।
ठीक प्रकार से प्रयुक्त न की गई औषध तीक्ष्ण विष के समान हो जाती है । तथा विधिपूर्वक प्रयुक्त किया गया विष भी उत्तम ओषधि हो जाता है इसी प्रकार चरक सू. अ. १ में भी कहा है ॥१०८॥
अग्निर्यथा प्रज्वलितः क्रुद्धश्चाशीविषो यथा ।।१०९।।
असिधारा यथा तीक्ष्णा प्रभिन्नो वाऽपि कुञ्जरः । तथौषधमसंयुक्तमवैद्येनावचारितम् ।।११०।।
विपर्ययेण मात्राणा निरुणद्ध्वस्य जीवितम् ।
प्रज्वलित हुई अग्नि, क्रुद्ध हुए सर्प, तीक्ष्ण तलवार तथा मदमस्त हाथी के समान सम्यक् प्रकार से प्रयुक्त न की हुई तथा मूर्ख वैद्य द्वारा व्यवहृत ओषधि मात्रा के विपर्यय के कारण रोगी के जीवन को नष्ट कर देती है । इसी प्रकार चरक सू. अ. १ में भी कहा है अर्थात् इन्द्र के वज्र के सिर पर गिरने से भी शायद मनुष्य बच जाय परन्तु मूर्ख वैद्य द्वारा प्रयुक्त की गई औषध से रोगी नहीं बचता अर्थात् उसकी मृत्यु हो जाती है ॥१०९-११०॥