काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३७६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | भैषज्योपक्रमणीयाध्यायः ३ ]
दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा तथा पृष्ट्वा कार्यकार्याक्रियां ततः ।। १९१ ।।
औषधानि प्रसिद्धानि यानि स्युर्बहुशो भिषक् । रसतो वीर्यतश्चैव तानि तत्रावचारयेत् ।। १९२ ।।
अतोऽन्यथा ह्यमात्रज्ञो युक्त्यागमबहिष्कृतः ।
(इति ताडपत्रपुस्तके २०७ तमं पत्रम्।)
जो भी प्रसिद्ध ओषधियां हैं उन्हें देखकर स्पर्श करके तथा उनके कार्य और अकार्य को अच्छी प्रकार पूंछ करके वैद्य को उनके रस तथा वीर्य के अनुसार प्रयोग करना चाहिये। मात्रा को न जानने वाला तथा युक्ति और शास्त्र से बहिष्कृत वैद्य इससे विपरीत प्रयोग करता है ।।१९१-१९२।।
कृशं रोगपरिव्ध्वस्तं सुकुमारं समात्वि(धि१)कम् ।। १९३ ।।
तीक्ष्णौषधप्रयोगेण हन्ति चाप्यतिमात्रया । महारोगं महाहारं महासत्त्वं महाबलम् ।। १९४ ।।
मृद्वल्पौषधयोगेन क्लेशयत्यातुरं भिषक् ।
कमजोर, रोग से घिरे हुए, सुकुमार तथा आधि (मानसिक रोग) से युक्त रोगी को वैद्य तीक्ष्ण औषध के प्रयोग तथा अधिक मात्रा के द्वारा मार देता है। इसके विपरीत महान् रोग, अधिक आहार, महान् सत्त्व तथा अधिक बल वाले रोगी को वैद्य मृदु एवं अल्प औषध के प्रयोग से क्लेश पहुंचाता है। अर्थात् कमजोर एवं सुकुमार रोगी को तीक्ष्ण औषध के प्रयोग से हानि होती है तथा महान् रोग और महान् बल वाले रोगी को अल्प एवं मृदु ओषधि का यदि प्रयोग कराया जाय तो उसका कोई लाभ नहीं होता है। इसलिये रोगी एवं रोग के बल को सम्यक् प्रकार से देखकर ही ओषधि का प्रयोग कराना चाहिये ।।१९३-१९४।।
उपक्रम्यो बली तस्माद् दुर्बलो निरुपक्रमः ।। १९५ ।।
मध्यं युक्तैरुपक्रम्य न चाहारान्निवर्तयेत् ।
इसलिये बलवान् रोगी की चिकित्सा करनी चाहिये और दुर्बल की चिकित्सा नहीं करनी चाहिये। तथा मध्य बलवाले रोगी की योग्य उपक्रमों के द्वारा चिकित्सा करे तथा उसका आहार बन्द न करे ।।१९५।।
कृशं विश्राम्य विश्राम्य पथ्यैरौषधसाधनैः ।। १९६ ।।
धारयेद्वर्धयेदग्निमग्नौ वृद्धे हि जीवति ।
कमजोर रोगी को बार २ विश्राम देकर औषध के द्वारा सिद्ध पथ्यों से उसका धारण करे तथा अग्नि को बढ़ाये। क्योंकि अग्नि के बढ़ने पर रोगी जीवित रहता है ।।१९६।।
यथाऽनिलः पित्तकफासृजश्च नित्याः शरीरे निहिता नराणाम् ।
तथैव बालेष्वपि सर्वमेतद्द्द्वयोस्तु रूपं तु तदल्पमल्पम् ।। १९७ ।।
जिस प्रकार मनुष्यों के शरीर में वायु, पित्त, कफ और रक्त सदा विद्यमान रहते हैं उसी प्रकार बालकों के शरीर में भी ये सब विद्यमान रहते हैं। दोनों में अन्तर इतना ही होता है कि बालकों में ये सब अल्प मात्रा में होते हैं ।।१९७।।
यथाऽल्पदेहस्य तदल्पमल्पं तथाऽन्नपानौषधमल्पमल्पम् ।
बुद्ध्या विमृश्येह भिषग्विद्ध्यात् मात्रा हि देहाग्निवयः प्रधानाः ।। १९८ ।।
१. आधिग्रस्तमित्यर्थः सम्भवति ।