काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंयूषनिर्देशीयाध्यायः ४] खिलस्थानम् ३७७
जिस प्रकार अल्प देह वाले व्यक्ति में ये वात पित्त आदि अल्प मात्रा में होते हैं उसी प्रकार वैद्य को बुद्धि के द्वारा विचार करके उसके लिये अन्न, पान तथा औषध आदि भी अल्प मात्रा में प्रयुक्त करने चाहिये क्योंकि मात्रा मुख्यरूप से देहाग्नि तथा अवस्था के अनुसार होती है ॥११८॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।
अलष्फ (१३४$^१$)
(इति) खिलेषु भेषज्योपक्रमणीयाध्यायस्तृतीयः ॥३॥
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। अलष्फ (१३४)
(इति) खिलेषु भेषज्योपक्रमणीयाध्यायस्तृतीयः ॥३॥
अथ यूषनिर्देशीयो नाम चतुर्थोऽध्यायः ।
अथातो यूषनिर्देशीयं नामाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥
अब हम यूष निर्देशीय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
**वक्तव्य—**यूष सिद्ध करने के लिये मूंग आदि को कुछ भून करके १४ या १८ गुना जल में पकाकर आधा जल शेष रहने पर उतार लिया जाता है। कहा भी है—चतुर्दशगुणे तोये अष्टादशगुणेऽथवा। ईषदभ्रष्टं तु विदलं पक्त्वा यूषोऽर्धशेषितः ॥ यूष तथा सूप में यह अन्तर है कि यूष में केवल मात्र द्रव भाग लिया जाता है जब कि सूप में दाल के दाने तथा जल दोनों ही रहते हैं तथा जल भी चतुर्थांश रहता है ॥१-२॥
यूषादिव्यञ्जनोपेतं भोज्यं पथ्यतरं भवेत् । स्वस्थानामातुराणां च विशेषारोग्यकारकम् ॥३॥
यूष आदि व्यञ्जनों से युक्त भोज्य पदार्थ स्वस्थ तथा रोगी दोनों के लिये पथ्य होता है तथा विशेषरूप से आरोग्य को देने वाला होता है ॥३॥
अतश्च सर्वभूतानामाहारः स्थितिकारणम् । न त्वाहारादृतेऽस्त्यन्यत् प्राणिनां प्राणधारणम् ॥४॥
इसलिये आहार सब प्राणियों की स्थिति का कारण कहा गया है। आहार के अतिरिक्त और कोई वस्तु ऐसी नहीं है जो प्राणियों के प्राणों को धारण कराये। सुश्रुत सू. अ. ४६ में कहा भी है—प्रागभिहितः प्राणिनामित्यादि, Sir Robert Me Carrison ने भी अपनी पुस्तक Food में आहार प्रयोजन बतलाया है ॥४॥
१. अत्र अलष्फ इत्यक्षराङ्कोल्लेखेन १३४ श्लोकमानमायाति, परमत्र ११६ श्लोका एव भवन्ति, तेन कतिपये एतत्प्रकरणमध्यगताः श्लोकाः पूर्वमेव विलुप्ताः किमु।
यहां 'अलष्फ' शब्द द्वारा अक्षरों का उल्लेख होने से १३४ श्लोकों की प्रतीति होती है परन्तु यहां ११६ श्लोक ही हैं। इससे अनुमान किया जा सकता है कि इस प्रकरण के बीच के कुछ श्लोक लुप्त हो गये हैं। इस अध्याय में श्लोकों की संख्या ११६ नहीं अपितु ११८ हैं। बीच में संख्या की गड़बड़ी के कारण ११६ संख्या आती है। हमने उस संख्या को ठीक करके ११८ कर दिया है। (अनुवादक)।