भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 738
३७८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्यूषनिर्देशीयाध्यायः ४]

न चाहारसमं किञ्चिद्भैषज्यमुपलभ्यते । शक्यतेऽप्यन्नमात्रेण नरः कर्तुं निरामयः ॥५॥

आहार के समान अन्य कोई भी ओषधि नहीं है केवल अन्न (पथ्य आहार) के द्वारा ही मनुष्य को निरोग किया जा सकता है। इसीलिये 'वैद्यजीवन' में कहा है—पथ्ये सति गदार्तस्य किमौषधनिषेवणैः । पथ्येऽसति गदार्तस्य किमौषधनिषेवणैः ॥ अर्थात् यदि रोगी पथ्य का सेवन करता है तो वह ओषधि के बिना केवल उस पथ्य के द्वारा ही स्वास्थ्य लाभ कर लेता है। और यदि रोगी पथ्य का सेवन नहीं करता है तो चाहे कितनी ही ओषधियों का प्रयोग किया जाय सब व्यर्थ होती हैं ॥५॥

भेषजेनोपपन्नोऽपि निराहारो न शक्यते । तस्माद्भिषग्भिराहारो महाभैषज्यमुच्यते ॥६॥

ओषधि का सेवन करने पर भी आहार के बिना व्यक्ति की स्थिति नहीं होती है। इसलिये वैद्यों ने आहार को महाभैषज्य कहा है। अर्थात् केवल ओषधियों के सेवन से कोई भी व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता है। जीवन को स्थिर रखने के लिये आहार अत्यन्त आवश्यक है। इसलिए आजकल भी 'आहार ही औषध हैं' 'Food De Medicine' इत्यादि वचन भी इसी अभिप्राय को प्रकट करते हैं ॥६॥

स ह्याहरणसामान्याद्दृष्ट एकविधो बुधैः । द्विविधो वीर्यभेदेन, त्रिविधो दोषभेदतः ॥७॥
भक्ष्यभोज्यादिभेदेन तथैवोक्तश्चतुर्विधः । पञ्चभूतात्मकत्वाच्च पुनः पञ्चविधः स्मृतः ॥८॥
स एव पुनरुद्दिष्टः षड्विधः षड्रसाश्रयात् । पुनर्द्वादशधा भिन्नो द्वादशप्रविचारतः ॥९॥

विद्वान् लोग 'आहरण' (आहार्यते गलादधो नीयते) की समानता के कारण सम्पूर्ण आहार को केवल एक प्रकार का मानते हैं। शीत तथा उष्ण वीर्य के अनुसार वह दो प्रकार का, वात पित्त कफ आदि दोषों के अनुसार तीन प्रकार का, भक्ष्य भोज्य (अशित, खादित, पीत, लीढ) आदि के अनुसार चार प्रकार का तथा पंचमहाभूतों के अनुसार वह ५ प्रकार का माना गया है। वही आहार पुनः मधुर अम्ल आदि ६ रसों के आश्रय के अनुसार ६ प्रकार का तथा भोजन की १२ प्रकार की प्रकृष्ट विचारणाओं के अनुसार आहार १२ प्रकार का होता है ॥७-९॥

चतुर्विंशतिधा भूयः कालादीनां विकल्पतः । प्रवर्तते तमाश्रित्य धर्मार्थादिचतुष्टयम् ॥१०॥
स्वस्थयात्रा चिकित्सा च तमेवाश्रित्य वर्तते ।

काल आदियों के भेद के अनुसार पुनः आहार २४ प्रकार का होता है। उस आहार पर ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि चारों कर्म आश्रित होते हैं। मनुष्य का स्वास्थ्य तथा चिकित्सा भी आहार पर आश्रित होते हैं ॥१०॥

तुष्टिः पुष्टिर्धृतिर्बुद्धिरुत्साहः पौरुषं बलम् ॥११॥
सौस्व१र्यमोजस्तेजश्च जीवितं प्रतिभा प्रभा। आहारादेव जायन्ते एवमाद्या गुणा नृणाम् ॥१२॥
तदात्मवान् हितमितं काले भुञ्जीत षड्रसम् ।

तुष्टि (सन्तोष), पोषण, धैर्य, बुद्धि, उत्साह, पौरुष, बल, उत्तम स्वर, ओज, तेज, जीवन, प्रतिभा, प्रभा आदि गुण भी मनुष्य में आहार से ही उत्पन्न होते हैं। इसलिये आयुष्मान् व्यक्ति को चाहिये कि वह उचितकाल में षड्रसयुक्त हितकारी तथा परिमित आहार का सेवन करे। स्वास्थ्य प्राप्ति के लिये हित एवं मित आहार का माहात्म्य तन्त्रान्तर में भी दिया है—कोऽरुक् कोऽरुक् कोऽरुक् हितभुङ् मितभुग् जितेन्द्रियो नियमतः। सोऽरुक् सोऽरुक् सोऽरुक् ॥११-१२॥


१. सुस्वरतेत्यर्थः ।