काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंयूषनिर्देशीयाध्यायः ४] खिलस्थानम् ३७९
यथा च यच्च भोक्तव्यंये च भोग्य(ज्य)गुणागुणाः ।। १३ ।।
तत्ते भोज्यविभागीये सर्वं वक्ष्याम्यतः परम् ।
जिस प्रकार से तथा जो २ भोजन करना चाहिये और भोजन के जो २ गुण एवं अवगुण हैं वे सब मैं बाद में भोज्यविभागीय नामक अध्याय में कहूँगा ॥ १३॥
अत्र ते संप्रवक्ष्यामि नानाद्रव्योपसंस्कृतान् ।। १४ ।।
नानारोगोपशमनान् यूषान् स्थविरजीवक ! ।
हे वृद्धजीवक ! अब मैं अनेक रोगों को शान्त करने वाले तथा नाना द्रव्यों से संस्कृत यूषों का वर्णन करूंगा ॥ १४॥
रोचनो दीपनो वृष्यः स्वरवर्णबलाग्निकृत् ।। १५ ।।
प्रस्वेदजननो मुख्यस्तुष्टिपुष्टिसुखावहः ।
यूष के गुण—यूष रुचिकारक, दीपन, वृष्य, स्वर, वर्ण, बल तथा अग्नि को बढ़ाने वाला, स्वेद लाने वाला (Diaphoratic), मुख के लिये हितकर, तुष्टि, पुष्टि तथा सुखदायक होता है ॥ १५॥
यूषः स्नेहोष्णभावाच्च वातं, स्नेहकषायतः ।। १६ ।।
पित्तं, कफं कदुष्णत्वात् संस्काराच्च नियच्छति ।
स्निग्ध तथा उष्ण होने के कारण यूष वात को, स्निग्ध तथा कषाय रस के कारण पित्त को और ईषदुष्ण होने के कारण तथा संस्कार के कारण कफ को शान्त करता है ॥ १६॥
यूषधातुं वदन्ति ज्ञा द्रवीकरणपाकयोः ।। १७ ।।
द्रवीकरोति भोज्यानि पक्वः सद्यूष इत्यतः ।
विद्वान् लोग यूष धातु को द्रवीकरण (Liquidation) तथा पाक (पचाने) अर्थ में प्रयुक्त करते हैं । पकाया हुआ यूष भोज्य पदार्थों को द्रव अवस्था में ले आता है ॥ १७॥
द्रव्यै(वै)र्बहुविधैर्द्रव्यैस्तथा चान्यैरतण्डुलैः ।। १८ ।।
यूष इत्युच्यते सिद्धो, यवागूस्तण्डुलैः सह ।
तण्डुलों (चावलों) को छोड़कर अन्य बहुत से पदार्थों को अनेक प्रकार के द्रवों के साथ मिलाकर सिद्ध करने पर यूष कहलाता है । तथा यदि तण्डुलों के साथ सिद्ध किया जाय तो उसे यवागू कहते हैं ॥ १८॥
मुद्गयूषो विरसिका यूषो दाडिमकस्तथा ।। १९ ।।
चित्रकामलकानां च द्वौ यूषौ परिकीर्तितौ । पञ्चकोलकयूषौ द्वौ संग्राही दीपनस्तथा ।। २० ।।
धान्ययूषोऽथ कौलत्थः फलयूषश्च भार्गव ! । पुष्पयूषः पत्रयूषो वल्कयूषरतथैव च ।। २१ ।।
मुख्यः पल्लवयूषश्च महायूषस्तथैव च । रास्त्रायूषो महायूषश्चाङ्गेर्या मूलकस्य च ।। २२ ।।
पुनर्नवातिबलयोर्गुडक(का१)म्बलिकस्तथा । मुख्यत्रिकटुयूषश्च लशुनैर्वास्तुकेन च ।। २३ ।।
पञ्चविंशतिरित्येते यूषाः कश्यपनिर्मिताः ।
१. ग्रन्थान्तरेषु निर्माणविशेषदर्शनेऽपि गुडकाम्बलिकोऽयमत्रैव वक्ष्यमाणो ग्राह्यः ।