काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 740, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें३८० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | यूषनिर्देशीयाध्यायः ४]
यूषों के भेद—१. मुद्गयूष, २ विरसिका, ३. अनार का यूष, ४. चित्रक यूष, ५. आंवले का यूष, ६.७. पंचकोल के दो संग्राही तथा दीपन यूष, ८ धान्य यूष, ९. कुलत्थ यूष, १०. फलयूष, ११. पुष्पयूष, १२. पत्रयूष, १३. वल्कयूष, १४. पल्लवयष, १५. महायूष, १६. रास्नायूष, १७. चाङ्गेरी का यूष, १८. मूली का यूष, १९. पुनर्नवा यूष, २०. अतिबला यूष, २१. गुड़काम्बलिक यूष, २२. मुख्यत्रिकटु यूष, २३. लशुन यूष, २४. बथुए का-यूष, इस प्रकार कश्यप द्वारा निर्मित ये २५ यूष हैं।
वक्तव्य—उपर्युक्त संख्या को यदि गिना जाय तो ये यूष संख्या में २५ नहीं होते अपितु २४ ही रहते हैं ॥१९-२३॥
यूषाः कषायमधुरा कषायाम्लाश्च भार्गव ! ॥२४॥ द्विविधा विहिताः सर्वे सर्वे च द्रव्ययोनयः।
हे भार्गव (भृगुकुलोत्पन्न वृद्धजीवक) सम्पूर्ण प्रकार के यूष दो प्रकार के होते हैं—१. कषाय और मधुर, २. कषाय और अम्ल। तथा सम्पूर्ण यूषों का योनि (उत्पत्ति कारण) द्रव होता है ॥२४॥
कृ¹ताऽकृताऽकृतकृताः पित्तश्लेष्मानिलात्मसु ॥२५॥ रोगेषु स्नेहयोगाच्च ते यूषास्त्रिविधाः स्मृताः।
पित्त, श्लेष्म (कफ) तथा वातरोगों में स्नेह के योग के अनुसार तीन प्रकार के यूष माने गये हैं—१. कृत, २. अकृत, ३. अकृतकृत। ‘कृत’ यूष से अभिप्राय यह है कि जिसे स्नेह, नमक या कालीमिर्च आदि मसाले के साथ सिद्ध किया जाय। तथा जिसे उपर्युक्त मसालों के साथ सिद्ध न किया जाय उसे ‘अकृत’ यूष कहते हैं ॥२५॥
त एव पाचनाः प्रोक्ताः कर्षणा बृंहणास्तथा ॥२६॥ शीतोष्णमिश्रवीर्यत्वान्नानाद्रव्योपसंश्रयात् ।
वे ही यूष शीत, उष्ण तथा मिश्र वीर्य के कारण तथा नाना द्रव्यों के संयोग से पाचन, कर्षण तथा बृंहण के भेद से तीन प्रकार के होते हैं ॥२६॥
लवणव्योषणस्नेहपक्तिसंस्कारयुक्तयः ॥२७॥ सिद्धा यूषेषु विदुषो न वक्ष्यामि पुनः।
नमक, त्रिकटु तथा स्नेह के साथ पकाकर संस्कार तथा युक्ति के द्वारा सिद्ध किये हुए यूषों का मैं विद्वानों को बार-२ उपदेश नहीं करूंगा ॥२७॥
दोषभेदेन यूषास्ते संख्याताः पञ्चसप्ततिः ॥२८॥ तथैव यापनादित्वात् पञ्चाशत्तु रसाश्रयात् ।
दोष भेद से यूष ७५ कहे गये हैं। अर्थात् वात पित्त एवं कफ के अनुसार ये ही २५ यूष (२५×३) ७५ हो जाते हैं। इसी प्रकार यापन आदि के अनुसार भी ये ७५ ही होते हैं। अर्थात् साध्य, याप्य और असाध्य के अनुसार भी ये २५×३=७५ ही होते हैं। तथा रसों के आश्रय के अनुसार ये ५० होते हैं। अर्थात् पहले २४ वें श्लोक में जो कषायमधुर और कषायाम्ल भेद से दो प्रकार के यूष बताये हैं उसके अनुसार ये २५×२=५० होते हैं ॥२८॥
१. चरकसिद्धिस्थानटीकायां चक्रपाणि-‘अकृतयूषः स्नेहलवणाद्यसंस्कृतः, कृतयूषः स्नेहलवणादिसंस्कृत’ इति।