काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंयूषनिर्देशीयाध्यायः ४] खिलस्थानम् ३८१
एके यूषास्तथैकेषां यत्किञ्चिद्व्यञ्जनं द्रवम् ।।२९।।
अग्नौ सिद्धमसिद्धं तु रागखाडवपानकम् ।
कुछ यूष ऐसे होते हैं जिनमें कुछ व्यञ्जन आदि डालकर उसे द्रवरूप में बनाया जाता है। उन्हीं को अग्नि पर सिद्ध करके अथवा बिना सिद्ध किये हुए राग, खाडव एवं पानक बनाये जाते हैं।
वक्तव्य—राग षाडव (खाडव) का लक्षण—चरक सू. अ. २७ में कहा है—क्वथितन्तु गुडोपेतं सहकारफलं नवम्। तैलनागरसंयुक्तं विज्ञेयो रागषाडवः ॥२९॥
यमकस्नेहसिद्धास्तु ते यूषा घृततैलयोः ।।३०।।
शष्यन्ते वातरोगेषु वर्चः शोषाभिघातयोः । दीप्ताग्नीनामनिद्राणां भाराध्वश्रममैथुनैः ।।३१।।
क्लान्तानां पतनाद्यैश्च यूषोऽयमेक इष्यते ।
घृत तथा तैल रूपी यमक स्नेह में सिद्ध किये हुए यूष वात रोग, वर्चः शोष (मल का सूख जाना) तथा अभिघात (चोट) रोग में और दीप्त अग्निवाले, जिन्हें निद्रा नहीं आती है, और भार, अध्व (मार्गगमन), श्रम, मैथुन तथा गिरने से थके हुए रोगियों में उपयोगी होते हैं ॥३०-३१॥
दधिकाञ्जिकशुक्तानि वर्गो यश्चापि दीपनः ।।३२।।
निर्यूहः सर्वयूषाणामन्यस्मात् पाञ्चकर्मिकात् ।
(इति ताडपत्रपुस्तके २०८ तमं पत्रम्)।
क्वाथो निर्यूह आदानं कषायश्चेति तत् समम् ।।३३।।
गर्भः कल्कस्तथाऽऽवापः पाकः संस्कार उच्यते ।
दही, कांजी, शुक्त (सिरका) तथा दीपन वर्ग आदि से बनाये हुए सम्पूर्ण यूषों का निर्यूह पञ्चकर्म के अतिरिक्त सब कार्यों में प्रयुक्त होता है। उसे क्वाथ, निर्यूह, आदान, कषाय, गर्भ, कल्क, आवाप, पाक तथा संस्कार आदि समान शब्दों से कहा जाता है ॥३२-३३॥
निस्तुषाणां पुराणानां मुद्गानां दीपनाम्बुना ।।३४।।
मुद्गमण्डस्तनुत्वात् स मुद्गयूषो घनोऽल्पशः ।
मुद्गतक्राम्लसिद्धस्तु यूषो विरसिका स्मृतः ।।३५।।
स एव दाडिमोदश्वित्कृतो रोचन उच्यते । स्मृतो दाडिमयूषश्च मुद्गदाडिमसंस्कृतः ।।३६।।
मुद्गामलकनिर्यूहो धात्रीयूषोऽभिधीयते । इत्येते पञ्च यूषास्तु विहिताः पाञ्चकर्मिकाः ।।३७।।
छिलके सहित पुराने मूंगों के दीपन द्रव्य के साथ बनाये हुए पदार्थ को तनु (पतला) होने के कारण मुद्गमण्ड कहते हैं। वही घना एवं अल्प होने के कारण मुद्गयूष कहलाता है। मूंग तथा तक्राम्ल के द्वारा सिद्ध किया यूष विरसिका कहलाता है। वही अनागर तथा तक्र के साथ सिद्ध करने पर रोचक कहलाता है। तथा मूंग और अनार से सिद्ध किये हुए को दाडिमयूष कहते हैं। मूंग तथा आंवले के निर्यूह को धात्रीयूष कहते हैं। ये पांच यूष पञ्चकर्म के लिये प्रयुक्त किये जाते हैं ॥३४-३७॥
काम्यांस्त्वन्यान् प्रवक्ष्यामि यूषानामयदर्शनात् । सिद्धश्चित्रकनिर्यूहे समूलस्कन्धपत्रके ।।३८।।
ख्यातश्चित्रकयूषस्तु ग्रहणीदोषशूलनुत् । प्लीहार्शोगुल्मकुष्ठघ्नो हृद्रोगकफवातजित् ।।३९।।
तद्वन्मूलकयूषोऽपि स वै संस्कारमीक्षते ।