काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३८२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् यूषनिर्देशीयाध्यायः ४]
रोगों के अनुसार मैं अन्य इष्ट यूषों का वर्णन करूंगा। मूल, स्कन्ध (तना) तथा पत्रों सहित चित्रक के क्वाथ में सिद्ध किया हुआ यूष चित्रक यूष कहलाता है। यह ग्रहणी दोष, शूल, प्लीहा, अर्श, गुल्म, कुष्ठ, हृद्रोग तथा कफ और वात को नष्ट करता है। इसी प्रकार मूलक यूष भी है। यह संस्कार की अपेक्षा करता है ॥३८-३९॥
शटीकर्कटकीबिल्वमाजपौष्करधातकी ॥४०॥ दधित्थं दाडिमफलं चाङ्गेरीससमङ्गयोः। पञ्चकोलक्यूषोऽयं परः सांग्राहिकः स्मृतः ॥४१॥ स एव दीपनोपेतो लवणैश्चापि दीपनः।
शटी (कपूरकचरी-कचूर), काकड़ाशृंगी, बिल्व, अजशृंगी, पुष्करमूल, धाय के फूल, दधित्थ (कपित्थ), दाडिम, चांगरी, समङ्गा (मञ्जिष्ठा)—यह पञ्चकोल यूष कहलाता है जो कि अत्यन्त संग्राही (Astringent) माना गया है। उसी में यदि दीपक पदार्थ तथा लवण डाल दिये जायं तो वह दीपक हो जाता है ॥४०-४१॥
अखण्डितानां धान्यानां सर्वेषां समभागिनाम् ॥४२॥ निर्यूहः स्यादृते माषतिलनिष्पावसर्पपात्। धान्ययूषः स्मृतो मुख्यो द्वीपदाडिमसंस्कृतः ॥४३॥
अखण्डित धान्यों को समभाग में लेकर तिल, निष्पाव (राजशिम्बी) और सरसों से रहित उनका निर्यूह (क्वाथ) बनाकर उसे चित्रक तथा दाडिम से सिद्ध करने पर धान्ययूष कहलाता है ॥४२-४३॥
दधिमण्डेऽथ वा सिद्धस्तक्रे वा रोगदर्शनात्। शिरःकर्णाक्षिरोगेषु हृद्रोगेऽवर्धाभेदके ॥४४॥ अरुचौ चातिसारे च कार्यः सतिलमाषकः।
दधिमण्ड अथवा तक्र में सिद्ध किया हुआ यूष रोगों के दिखाई देने तक शिर, कर्ण तथा अक्षिरोगों में और हृद्रोग, अर्धावभेद, अरुचि एवं अतिसार में तिल एवं माष के सहित प्रयोग करना चाहिये ॥४४॥
कुलत्थानां तु निर्यूहे कौलत्थो यूष उच्यते ॥४५॥ सन्निपातानिलकफव्याधीन् हन्ति विरूक्षणः।
कुलत्थ के क्वाथ को कौलत्थयूष कहते हैं। यह सन्निपात, वायु तथा कफ के रोगों को नष्ट करता है तथा रूक्ष है ॥४५॥
कपित्थबिल्वबदरद्राक(?)दाडिमचूतजैः ॥४६॥ फलयूषं(षः)फलैरामैर्जीर्णातीसारनाशनम् (नः)।
कपित्थ, बिल्व, बेर, द्राक (?), अनार तथा आम के कच्चे फलों से फलयूष बनाया जाता है जो कि जीर्ण अतिसार को नष्ट करता है ॥४६॥
शणशाल्मलिधातक्यः पद्मसौगन्धिकैः सह ॥४७॥ कोविदारात् कर्बुदारात् पुष्पैर्यूषं प्रकल्पयेत्। असृग्दरे रक्तपित्ते दाहे चोदरचक्षुषोः ॥४८॥ तैलाम्लाभ्यामृते सिद्धः पुष्पयूषः सदाडिमः।
शण (सन), शाल्मलि (सिम्बल), धाय के फूल, कमल तथा सौगन्धिक के साथ कोविदार (कचनार) तथा कर्बुदार (सफेद कचनार) के फूलों से यूष बनाये। तैल तथा अम्ल से रहित अनार से सिद्ध किया हुआ यह पुष्पयूष प्रदर, रक्तपित्त, दाह एवं उदर और चक्षुरोगों में उपयोगी है ॥४७-४८॥