काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंयूषनिर्देशीयाध्यायः ४] खिलस्थानम् ३८३
बिल्वशोभाञ्जनैरण्डबलारास्नाम्रवारिणा ।।४९।।
पत्रनिष्क्वाथयूषः स्यात् पत्रयूषोऽनिलापहः ।
पानी में बिल्व, सुहांजना, एरण्ड, बला, रास्ना तथा आम्र के पत्तों को पाककर यूष बनाया जाता है। यह पत्रयूष वातनाशक है ॥४९॥
दाडिमाम्रातजम्बूनां चिरबिल्वस्य च त्वचः ।।५०।।
निष्क्वाथ्य दधिमण्डेन वल्कयूषोऽतिसारनुत् ।
अनार, आम्रातक (अम्बाड़ा), जामुन तथा चिरबिल्व (नाटाकरंज) की छाल का दही के मण्ड के साथ क्वाथ करके वल्कयूष बनाया जाता है। यह अतिसार को नष्ट करता है ॥५०॥
न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थप्लक्षकालापलाशजैः ।।५१।।
पल्लवैः कमलानां च घृतदाडिमसंस्कृतः । पित्तरोगेषु सर्वेषु गर्भच्यवनदाहयोः ।।५२।।
मुख्यः पल्लवयूषोऽयं हितः कटुकिनीषु च ।
बढ़, गूलर, पीपल, पिलखन, त्रिवृत्, ढाक तथा कमल के पत्तों से घी और अनार के साथ सिद्ध करके पल्लवयूष बनाया जाता है। यह सम्पूर्ण पित्त रोगों में, गर्भपात, दाह तथा कटुकिनी (ग्रह रोग) में हितकर होता है ॥५१-५२॥
पुनर्नवाया रास्नायाश्चाङ्गेरीबलयोस्तथा ।।५३।।
पृथग्यूषाः समाख्याता वातघ्ना दधिसर्पिषा ।
पुनर्नवा, रास्ना, चाङ्गेरी तथा बला के दही तथा घृत के साथ पृथक् २ यूष बनाये जाते हैं। ये वातनाशक होते हैं ॥५३॥
रोहितापोत¹मत्स्यानां निर्यूहं साधयेज्जले ।।५४।।
तं क्वाथं साधयेद्भूयः शुक्तकाञ्जिकमस्तुभिः । द्रवाणि कुडबीजानि गुडपञ्चपले शृतः ।।५५।।
एष काम्बलिको रूक्षः कटुतैलेन वा कृतः । वातरोगप्रशमनो बृंहणो बलवर्धनः ।।५६।।
रतिनिद्रारुचिकरस्तिलतैलेन वा कृतः ।
रोहित जाति की छोटी मछलियों को जल में पकाकर सिद्ध करे। उसे पुनः सिरके, कांजी तथा दधिमस्तु के साथ सिद्ध करे। इसमें द्रव (Liquid) कुडबीज (कुटजबीज) लेवे तथा ५ पल गुड लेकर पकाये। यह रूक्ष अथवा कटु तैल (सरसों के तेल) के साथ बनाया हुआ काम्बलिक कहलाता है। यह काम्बलिक वातरोगों का शामक, बृंहण तथा बलवर्धक है। अथवा तिल तैल के साथ बनाने पर रति (कामशक्ति) निद्रा तथा रुचि को बढ़ाने वाला है ॥५४-५६॥
दीपनं पञ्चमूलं च फलानि मधुराणि च ।।५७।।
पूर्ववत् सर्वधान्यानि धान्यकं मरिचानि च । काकोलीक्षीरकाकोलीकाश्मर्याणि परूषकम् ।।५८।।
बदराणि कुलत्थाश्च रास्नैरण्डपुनर्नवाः । द्वे पले गोक्षुरः शिग्रुपलाशतरुणानि च ।।५९।।
जलद्रोणे पचेदेतं निर्यूहं पादशेषितम् । दधिकाञ्जिकशुक्तानि प्रस्थशस्तैलसर्पिषी ।।६०।।
मूलकानाम्पत्राणां तरुणानां शतं भवेत् । एष सिद्धो महायूषो व्योषसंस्कारसंस्कृतः ।।६१।।
१. रोहितायाः पोतमत्स्यानां बालमत्स्यानामित्यर्थः ।