काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
यूषनिर्देशीयाध्यायः ४] खिलस्थानम् ३७७
जिस प्रकार अल्प देह वाले व्यक्ति में ये वात पित्त आदि अल्प मात्रा में होते हैं उसी प्रकार वैद्य को बुद्धि के द्वारा विचार करके उसके लिये अन्न, पान तथा औषध आदि भी अल्प मात्रा में प्रयुक्त करने चाहिये क्योंकि मात्रा मुख्यरूप से देहाग्नि तथा अवस्था के अनुसार होती है ॥११८॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।
अलष्फ (१३४$^१$)
(इति) खिलेषु भेषज्योपक्रमणीयाध्यायस्तृतीयः ॥३॥
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। अलष्फ (१३४)
(इति) खिलेषु भेषज्योपक्रमणीयाध्यायस्तृतीयः ॥३॥
अथ यूषनिर्देशीयो नाम चतुर्थोऽध्यायः ।
अथातो यूषनिर्देशीयं नामाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥
अब हम यूष निर्देशीय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
**वक्तव्य—**यूष सिद्ध करने के लिये मूंग आदि को कुछ भून करके १४ या १८ गुना जल में पकाकर आधा जल शेष रहने पर उतार लिया जाता है। कहा भी है—चतुर्दशगुणे तोये अष्टादशगुणेऽथवा। ईषदभ्रष्टं तु विदलं पक्त्वा यूषोऽर्धशेषितः ॥ यूष तथा सूप में यह अन्तर है कि यूष में केवल मात्र द्रव भाग लिया जाता है जब कि सूप में दाल के दाने तथा जल दोनों ही रहते हैं तथा जल भी चतुर्थांश रहता है ॥१-२॥
यूषादिव्यञ्जनोपेतं भोज्यं पथ्यतरं भवेत् । स्वस्थानामातुराणां च विशेषारोग्यकारकम् ॥३॥
यूष आदि व्यञ्जनों से युक्त भोज्य पदार्थ स्वस्थ तथा रोगी दोनों के लिये पथ्य होता है तथा विशेषरूप से आरोग्य को देने वाला होता है ॥३॥
अतश्च सर्वभूतानामाहारः स्थितिकारणम् । न त्वाहारादृतेऽस्त्यन्यत् प्राणिनां प्राणधारणम् ॥४॥
इसलिये आहार सब प्राणियों की स्थिति का कारण कहा गया है। आहार के अतिरिक्त और कोई वस्तु ऐसी नहीं है जो प्राणियों के प्राणों को धारण कराये। सुश्रुत सू. अ. ४६ में कहा भी है—प्रागभिहितः प्राणिनामित्यादि, Sir Robert Me Carrison ने भी अपनी पुस्तक Food में आहार प्रयोजन बतलाया है ॥४॥
१. अत्र अलष्फ इत्यक्षराङ्कोल्लेखेन १३४ श्लोकमानमायाति, परमत्र ११६ श्लोका एव भवन्ति, तेन कतिपये एतत्प्रकरणमध्यगताः श्लोकाः पूर्वमेव विलुप्ताः किमु।
यहां 'अलष्फ' शब्द द्वारा अक्षरों का उल्लेख होने से १३४ श्लोकों की प्रतीति होती है परन्तु यहां ११६ श्लोक ही हैं। इससे अनुमान किया जा सकता है कि इस प्रकरण के बीच के कुछ श्लोक लुप्त हो गये हैं। इस अध्याय में श्लोकों की संख्या ११६ नहीं अपितु ११८ हैं। बीच में संख्या की गड़बड़ी के कारण ११६ संख्या आती है। हमने उस संख्या को ठीक करके ११८ कर दिया है। (अनुवादक)।
| ३७८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | यूषनिर्देशीयाध्यायः ४] |
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न चाहारसमं किञ्चिद्भैषज्यमुपलभ्यते । शक्यतेऽप्यन्नमात्रेण नरः कर्तुं निरामयः ॥५॥
आहार के समान अन्य कोई भी ओषधि नहीं है केवल अन्न (पथ्य आहार) के द्वारा ही मनुष्य को निरोग किया जा सकता है। इसीलिये 'वैद्यजीवन' में कहा है—पथ्ये सति गदार्तस्य किमौषधनिषेवणैः । पथ्येऽसति गदार्तस्य किमौषधनिषेवणैः ॥ अर्थात् यदि रोगी पथ्य का सेवन करता है तो वह ओषधि के बिना केवल उस पथ्य के द्वारा ही स्वास्थ्य लाभ कर लेता है। और यदि रोगी पथ्य का सेवन नहीं करता है तो चाहे कितनी ही ओषधियों का प्रयोग किया जाय सब व्यर्थ होती हैं ॥५॥
भेषजेनोपपन्नोऽपि निराहारो न शक्यते । तस्माद्भिषग्भिराहारो महाभैषज्यमुच्यते ॥६॥
ओषधि का सेवन करने पर भी आहार के बिना व्यक्ति की स्थिति नहीं होती है। इसलिये वैद्यों ने आहार को महाभैषज्य कहा है। अर्थात् केवल ओषधियों के सेवन से कोई भी व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता है। जीवन को स्थिर रखने के लिये आहार अत्यन्त आवश्यक है। इसलिए आजकल भी 'आहार ही औषध हैं' 'Food De Medicine' इत्यादि वचन भी इसी अभिप्राय को प्रकट करते हैं ॥६॥
स ह्याहरणसामान्याद्दृष्ट एकविधो बुधैः । द्विविधो वीर्यभेदेन, त्रिविधो दोषभेदतः ॥७॥
भक्ष्यभोज्यादिभेदेन तथैवोक्तश्चतुर्विधः । पञ्चभूतात्मकत्वाच्च पुनः पञ्चविधः स्मृतः ॥८॥
स एव पुनरुद्दिष्टः षड्विधः षड्रसाश्रयात् । पुनर्द्वादशधा भिन्नो द्वादशप्रविचारतः ॥९॥
विद्वान् लोग 'आहरण' (आहार्यते गलादधो नीयते) की समानता के कारण सम्पूर्ण आहार को केवल एक प्रकार का मानते हैं। शीत तथा उष्ण वीर्य के अनुसार वह दो प्रकार का, वात पित्त कफ आदि दोषों के अनुसार तीन प्रकार का, भक्ष्य भोज्य (अशित, खादित, पीत, लीढ) आदि के अनुसार चार प्रकार का तथा पंचमहाभूतों के अनुसार वह ५ प्रकार का माना गया है। वही आहार पुनः मधुर अम्ल आदि ६ रसों के आश्रय के अनुसार ६ प्रकार का तथा भोजन की १२ प्रकार की प्रकृष्ट विचारणाओं के अनुसार आहार १२ प्रकार का होता है ॥७-९॥
चतुर्विंशतिधा भूयः कालादीनां विकल्पतः । प्रवर्तते तमाश्रित्य धर्मार्थादिचतुष्टयम् ॥१०॥
स्वस्थयात्रा चिकित्सा च तमेवाश्रित्य वर्तते ।
काल आदियों के भेद के अनुसार पुनः आहार २४ प्रकार का होता है। उस आहार पर ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि चारों कर्म आश्रित होते हैं। मनुष्य का स्वास्थ्य तथा चिकित्सा भी आहार पर आश्रित होते हैं ॥१०॥
तुष्टिः पुष्टिर्धृतिर्बुद्धिरुत्साहः पौरुषं बलम् ॥११॥
सौस्व१र्यमोजस्तेजश्च जीवितं प्रतिभा प्रभा। आहारादेव जायन्ते एवमाद्या गुणा नृणाम् ॥१२॥
तदात्मवान् हितमितं काले भुञ्जीत षड्रसम् ।
तुष्टि (सन्तोष), पोषण, धैर्य, बुद्धि, उत्साह, पौरुष, बल, उत्तम स्वर, ओज, तेज, जीवन, प्रतिभा, प्रभा आदि गुण भी मनुष्य में आहार से ही उत्पन्न होते हैं। इसलिये आयुष्मान् व्यक्ति को चाहिये कि वह उचितकाल में षड्रसयुक्त हितकारी तथा परिमित आहार का सेवन करे। स्वास्थ्य प्राप्ति के लिये हित एवं मित आहार का माहात्म्य तन्त्रान्तर में भी दिया है—कोऽरुक् कोऽरुक् कोऽरुक् हितभुङ् मितभुग् जितेन्द्रियो नियमतः। सोऽरुक् सोऽरुक् सोऽरुक् ॥११-१२॥
१. सुस्वरतेत्यर्थः ।
यूषनिर्देशीयाध्यायः ४] खिलस्थानम् ३७९
यथा च यच्च भोक्तव्यंये च भोग्य(ज्य)गुणागुणाः ।। १३ ।।
तत्ते भोज्यविभागीये सर्वं वक्ष्याम्यतः परम् ।
जिस प्रकार से तथा जो २ भोजन करना चाहिये और भोजन के जो २ गुण एवं अवगुण हैं वे सब मैं बाद में भोज्यविभागीय नामक अध्याय में कहूँगा ॥ १३॥
अत्र ते संप्रवक्ष्यामि नानाद्रव्योपसंस्कृतान् ।। १४ ।।
नानारोगोपशमनान् यूषान् स्थविरजीवक ! ।
हे वृद्धजीवक ! अब मैं अनेक रोगों को शान्त करने वाले तथा नाना द्रव्यों से संस्कृत यूषों का वर्णन करूंगा ॥ १४॥
रोचनो दीपनो वृष्यः स्वरवर्णबलाग्निकृत् ।। १५ ।।
प्रस्वेदजननो मुख्यस्तुष्टिपुष्टिसुखावहः ।
यूष के गुण—यूष रुचिकारक, दीपन, वृष्य, स्वर, वर्ण, बल तथा अग्नि को बढ़ाने वाला, स्वेद लाने वाला (Diaphoratic), मुख के लिये हितकर, तुष्टि, पुष्टि तथा सुखदायक होता है ॥ १५॥
यूषः स्नेहोष्णभावाच्च वातं, स्नेहकषायतः ।। १६ ।।
पित्तं, कफं कदुष्णत्वात् संस्काराच्च नियच्छति ।
स्निग्ध तथा उष्ण होने के कारण यूष वात को, स्निग्ध तथा कषाय रस के कारण पित्त को और ईषदुष्ण होने के कारण तथा संस्कार के कारण कफ को शान्त करता है ॥ १६॥
यूषधातुं वदन्ति ज्ञा द्रवीकरणपाकयोः ।। १७ ।।
द्रवीकरोति भोज्यानि पक्वः सद्यूष इत्यतः ।
विद्वान् लोग यूष धातु को द्रवीकरण (Liquidation) तथा पाक (पचाने) अर्थ में प्रयुक्त करते हैं । पकाया हुआ यूष भोज्य पदार्थों को द्रव अवस्था में ले आता है ॥ १७॥
द्रव्यै(वै)र्बहुविधैर्द्रव्यैस्तथा चान्यैरतण्डुलैः ।। १८ ।।
यूष इत्युच्यते सिद्धो, यवागूस्तण्डुलैः सह ।
तण्डुलों (चावलों) को छोड़कर अन्य बहुत से पदार्थों को अनेक प्रकार के द्रवों के साथ मिलाकर सिद्ध करने पर यूष कहलाता है । तथा यदि तण्डुलों के साथ सिद्ध किया जाय तो उसे यवागू कहते हैं ॥ १८॥
मुद्गयूषो विरसिका यूषो दाडिमकस्तथा ।। १९ ।।
चित्रकामलकानां च द्वौ यूषौ परिकीर्तितौ । पञ्चकोलकयूषौ द्वौ संग्राही दीपनस्तथा ।। २० ।।
धान्ययूषोऽथ कौलत्थः फलयूषश्च भार्गव ! । पुष्पयूषः पत्रयूषो वल्कयूषरतथैव च ।। २१ ।।
मुख्यः पल्लवयूषश्च महायूषस्तथैव च । रास्त्रायूषो महायूषश्चाङ्गेर्या मूलकस्य च ।। २२ ।।
पुनर्नवातिबलयोर्गुडक(का१)म्बलिकस्तथा । मुख्यत्रिकटुयूषश्च लशुनैर्वास्तुकेन च ।। २३ ।।
पञ्चविंशतिरित्येते यूषाः कश्यपनिर्मिताः ।
१. ग्रन्थान्तरेषु निर्माणविशेषदर्शनेऽपि गुडकाम्बलिकोऽयमत्रैव वक्ष्यमाणो ग्राह्यः ।
३८० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | यूषनिर्देशीयाध्यायः ४]
यूषों के भेद—१. मुद्गयूष, २ विरसिका, ३. अनार का यूष, ४. चित्रक यूष, ५. आंवले का यूष, ६.७. पंचकोल के दो संग्राही तथा दीपन यूष, ८ धान्य यूष, ९. कुलत्थ यूष, १०. फलयूष, ११. पुष्पयूष, १२. पत्रयूष, १३. वल्कयूष, १४. पल्लवयष, १५. महायूष, १६. रास्नायूष, १७. चाङ्गेरी का यूष, १८. मूली का यूष, १९. पुनर्नवा यूष, २०. अतिबला यूष, २१. गुड़काम्बलिक यूष, २२. मुख्यत्रिकटु यूष, २३. लशुन यूष, २४. बथुए का-यूष, इस प्रकार कश्यप द्वारा निर्मित ये २५ यूष हैं।
वक्तव्य—उपर्युक्त संख्या को यदि गिना जाय तो ये यूष संख्या में २५ नहीं होते अपितु २४ ही रहते हैं ॥१९-२३॥
यूषाः कषायमधुरा कषायाम्लाश्च भार्गव ! ॥२४॥ द्विविधा विहिताः सर्वे सर्वे च द्रव्ययोनयः।
हे भार्गव (भृगुकुलोत्पन्न वृद्धजीवक) सम्पूर्ण प्रकार के यूष दो प्रकार के होते हैं—१. कषाय और मधुर, २. कषाय और अम्ल। तथा सम्पूर्ण यूषों का योनि (उत्पत्ति कारण) द्रव होता है ॥२४॥
कृ¹ताऽकृताऽकृतकृताः पित्तश्लेष्मानिलात्मसु ॥२५॥ रोगेषु स्नेहयोगाच्च ते यूषास्त्रिविधाः स्मृताः।
पित्त, श्लेष्म (कफ) तथा वातरोगों में स्नेह के योग के अनुसार तीन प्रकार के यूष माने गये हैं—१. कृत, २. अकृत, ३. अकृतकृत। ‘कृत’ यूष से अभिप्राय यह है कि जिसे स्नेह, नमक या कालीमिर्च आदि मसाले के साथ सिद्ध किया जाय। तथा जिसे उपर्युक्त मसालों के साथ सिद्ध न किया जाय उसे ‘अकृत’ यूष कहते हैं ॥२५॥
त एव पाचनाः प्रोक्ताः कर्षणा बृंहणास्तथा ॥२६॥ शीतोष्णमिश्रवीर्यत्वान्नानाद्रव्योपसंश्रयात् ।
वे ही यूष शीत, उष्ण तथा मिश्र वीर्य के कारण तथा नाना द्रव्यों के संयोग से पाचन, कर्षण तथा बृंहण के भेद से तीन प्रकार के होते हैं ॥२६॥
लवणव्योषणस्नेहपक्तिसंस्कारयुक्तयः ॥२७॥ सिद्धा यूषेषु विदुषो न वक्ष्यामि पुनः।
नमक, त्रिकटु तथा स्नेह के साथ पकाकर संस्कार तथा युक्ति के द्वारा सिद्ध किये हुए यूषों का मैं विद्वानों को बार-२ उपदेश नहीं करूंगा ॥२७॥
दोषभेदेन यूषास्ते संख्याताः पञ्चसप्ततिः ॥२८॥ तथैव यापनादित्वात् पञ्चाशत्तु रसाश्रयात् ।
दोष भेद से यूष ७५ कहे गये हैं। अर्थात् वात पित्त एवं कफ के अनुसार ये ही २५ यूष (२५×३) ७५ हो जाते हैं। इसी प्रकार यापन आदि के अनुसार भी ये ७५ ही होते हैं। अर्थात् साध्य, याप्य और असाध्य के अनुसार भी ये २५×३=७५ ही होते हैं। तथा रसों के आश्रय के अनुसार ये ५० होते हैं। अर्थात् पहले २४ वें श्लोक में जो कषायमधुर और कषायाम्ल भेद से दो प्रकार के यूष बताये हैं उसके अनुसार ये २५×२=५० होते हैं ॥२८॥
१. चरकसिद्धिस्थानटीकायां चक्रपाणि-‘अकृतयूषः स्नेहलवणाद्यसंस्कृतः, कृतयूषः स्नेहलवणादिसंस्कृत’ इति।
यूषनिर्देशीयाध्यायः ४] खिलस्थानम् ३८१
एके यूषास्तथैकेषां यत्किञ्चिद्व्यञ्जनं द्रवम् ।।२९।।
अग्नौ सिद्धमसिद्धं तु रागखाडवपानकम् ।
कुछ यूष ऐसे होते हैं जिनमें कुछ व्यञ्जन आदि डालकर उसे द्रवरूप में बनाया जाता है। उन्हीं को अग्नि पर सिद्ध करके अथवा बिना सिद्ध किये हुए राग, खाडव एवं पानक बनाये जाते हैं।
वक्तव्य—राग षाडव (खाडव) का लक्षण—चरक सू. अ. २७ में कहा है—क्वथितन्तु गुडोपेतं सहकारफलं नवम्। तैलनागरसंयुक्तं विज्ञेयो रागषाडवः ॥२९॥
यमकस्नेहसिद्धास्तु ते यूषा घृततैलयोः ।।३०।।
शष्यन्ते वातरोगेषु वर्चः शोषाभिघातयोः । दीप्ताग्नीनामनिद्राणां भाराध्वश्रममैथुनैः ।।३१।।
क्लान्तानां पतनाद्यैश्च यूषोऽयमेक इष्यते ।
घृत तथा तैल रूपी यमक स्नेह में सिद्ध किये हुए यूष वात रोग, वर्चः शोष (मल का सूख जाना) तथा अभिघात (चोट) रोग में और दीप्त अग्निवाले, जिन्हें निद्रा नहीं आती है, और भार, अध्व (मार्गगमन), श्रम, मैथुन तथा गिरने से थके हुए रोगियों में उपयोगी होते हैं ॥३०-३१॥
दधिकाञ्जिकशुक्तानि वर्गो यश्चापि दीपनः ।।३२।।
निर्यूहः सर्वयूषाणामन्यस्मात् पाञ्चकर्मिकात् ।
(इति ताडपत्रपुस्तके २०८ तमं पत्रम्)।
क्वाथो निर्यूह आदानं कषायश्चेति तत् समम् ।।३३।।
गर्भः कल्कस्तथाऽऽवापः पाकः संस्कार उच्यते ।
दही, कांजी, शुक्त (सिरका) तथा दीपन वर्ग आदि से बनाये हुए सम्पूर्ण यूषों का निर्यूह पञ्चकर्म के अतिरिक्त सब कार्यों में प्रयुक्त होता है। उसे क्वाथ, निर्यूह, आदान, कषाय, गर्भ, कल्क, आवाप, पाक तथा संस्कार आदि समान शब्दों से कहा जाता है ॥३२-३३॥
निस्तुषाणां पुराणानां मुद्गानां दीपनाम्बुना ।।३४।।
मुद्गमण्डस्तनुत्वात् स मुद्गयूषो घनोऽल्पशः ।
मुद्गतक्राम्लसिद्धस्तु यूषो विरसिका स्मृतः ।।३५।।
स एव दाडिमोदश्वित्कृतो रोचन उच्यते । स्मृतो दाडिमयूषश्च मुद्गदाडिमसंस्कृतः ।।३६।।
मुद्गामलकनिर्यूहो धात्रीयूषोऽभिधीयते । इत्येते पञ्च यूषास्तु विहिताः पाञ्चकर्मिकाः ।।३७।।
छिलके सहित पुराने मूंगों के दीपन द्रव्य के साथ बनाये हुए पदार्थ को तनु (पतला) होने के कारण मुद्गमण्ड कहते हैं। वही घना एवं अल्प होने के कारण मुद्गयूष कहलाता है। मूंग तथा तक्राम्ल के द्वारा सिद्ध किया यूष विरसिका कहलाता है। वही अनागर तथा तक्र के साथ सिद्ध करने पर रोचक कहलाता है। तथा मूंग और अनार से सिद्ध किये हुए को दाडिमयूष कहते हैं। मूंग तथा आंवले के निर्यूह को धात्रीयूष कहते हैं। ये पांच यूष पञ्चकर्म के लिये प्रयुक्त किये जाते हैं ॥३४-३७॥
काम्यांस्त्वन्यान् प्रवक्ष्यामि यूषानामयदर्शनात् । सिद्धश्चित्रकनिर्यूहे समूलस्कन्धपत्रके ।।३८।।
ख्यातश्चित्रकयूषस्तु ग्रहणीदोषशूलनुत् । प्लीहार्शोगुल्मकुष्ठघ्नो हृद्रोगकफवातजित् ।।३९।।
तद्वन्मूलकयूषोऽपि स वै संस्कारमीक्षते ।
३८२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् यूषनिर्देशीयाध्यायः ४]
रोगों के अनुसार मैं अन्य इष्ट यूषों का वर्णन करूंगा। मूल, स्कन्ध (तना) तथा पत्रों सहित चित्रक के क्वाथ में सिद्ध किया हुआ यूष चित्रक यूष कहलाता है। यह ग्रहणी दोष, शूल, प्लीहा, अर्श, गुल्म, कुष्ठ, हृद्रोग तथा कफ और वात को नष्ट करता है। इसी प्रकार मूलक यूष भी है। यह संस्कार की अपेक्षा करता है ॥३८-३९॥
शटीकर्कटकीबिल्वमाजपौष्करधातकी ॥४०॥ दधित्थं दाडिमफलं चाङ्गेरीससमङ्गयोः। पञ्चकोलक्यूषोऽयं परः सांग्राहिकः स्मृतः ॥४१॥ स एव दीपनोपेतो लवणैश्चापि दीपनः।
शटी (कपूरकचरी-कचूर), काकड़ाशृंगी, बिल्व, अजशृंगी, पुष्करमूल, धाय के फूल, दधित्थ (कपित्थ), दाडिम, चांगरी, समङ्गा (मञ्जिष्ठा)—यह पञ्चकोल यूष कहलाता है जो कि अत्यन्त संग्राही (Astringent) माना गया है। उसी में यदि दीपक पदार्थ तथा लवण डाल दिये जायं तो वह दीपक हो जाता है ॥४०-४१॥
अखण्डितानां धान्यानां सर्वेषां समभागिनाम् ॥४२॥ निर्यूहः स्यादृते माषतिलनिष्पावसर्पपात्। धान्ययूषः स्मृतो मुख्यो द्वीपदाडिमसंस्कृतः ॥४३॥
अखण्डित धान्यों को समभाग में लेकर तिल, निष्पाव (राजशिम्बी) और सरसों से रहित उनका निर्यूह (क्वाथ) बनाकर उसे चित्रक तथा दाडिम से सिद्ध करने पर धान्ययूष कहलाता है ॥४२-४३॥
दधिमण्डेऽथ वा सिद्धस्तक्रे वा रोगदर्शनात्। शिरःकर्णाक्षिरोगेषु हृद्रोगेऽवर्धाभेदके ॥४४॥ अरुचौ चातिसारे च कार्यः सतिलमाषकः।
दधिमण्ड अथवा तक्र में सिद्ध किया हुआ यूष रोगों के दिखाई देने तक शिर, कर्ण तथा अक्षिरोगों में और हृद्रोग, अर्धावभेद, अरुचि एवं अतिसार में तिल एवं माष के सहित प्रयोग करना चाहिये ॥४४॥
कुलत्थानां तु निर्यूहे कौलत्थो यूष उच्यते ॥४५॥ सन्निपातानिलकफव्याधीन् हन्ति विरूक्षणः।
कुलत्थ के क्वाथ को कौलत्थयूष कहते हैं। यह सन्निपात, वायु तथा कफ के रोगों को नष्ट करता है तथा रूक्ष है ॥४५॥
कपित्थबिल्वबदरद्राक(?)दाडिमचूतजैः ॥४६॥ फलयूषं(षः)फलैरामैर्जीर्णातीसारनाशनम् (नः)।
कपित्थ, बिल्व, बेर, द्राक (?), अनार तथा आम के कच्चे फलों से फलयूष बनाया जाता है जो कि जीर्ण अतिसार को नष्ट करता है ॥४६॥
शणशाल्मलिधातक्यः पद्मसौगन्धिकैः सह ॥४७॥ कोविदारात् कर्बुदारात् पुष्पैर्यूषं प्रकल्पयेत्। असृग्दरे रक्तपित्ते दाहे चोदरचक्षुषोः ॥४८॥ तैलाम्लाभ्यामृते सिद्धः पुष्पयूषः सदाडिमः।
शण (सन), शाल्मलि (सिम्बल), धाय के फूल, कमल तथा सौगन्धिक के साथ कोविदार (कचनार) तथा कर्बुदार (सफेद कचनार) के फूलों से यूष बनाये। तैल तथा अम्ल से रहित अनार से सिद्ध किया हुआ यह पुष्पयूष प्रदर, रक्तपित्त, दाह एवं उदर और चक्षुरोगों में उपयोगी है ॥४७-४८॥
यूषनिर्देशीयाध्यायः ४] खिलस्थानम् ३८३
बिल्वशोभाञ्जनैरण्डबलारास्नाम्रवारिणा ।।४९।।
पत्रनिष्क्वाथयूषः स्यात् पत्रयूषोऽनिलापहः ।
पानी में बिल्व, सुहांजना, एरण्ड, बला, रास्ना तथा आम्र के पत्तों को पाककर यूष बनाया जाता है। यह पत्रयूष वातनाशक है ॥४९॥
दाडिमाम्रातजम्बूनां चिरबिल्वस्य च त्वचः ।।५०।।
निष्क्वाथ्य दधिमण्डेन वल्कयूषोऽतिसारनुत् ।
अनार, आम्रातक (अम्बाड़ा), जामुन तथा चिरबिल्व (नाटाकरंज) की छाल का दही के मण्ड के साथ क्वाथ करके वल्कयूष बनाया जाता है। यह अतिसार को नष्ट करता है ॥५०॥
न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थप्लक्षकालापलाशजैः ।।५१।।
पल्लवैः कमलानां च घृतदाडिमसंस्कृतः । पित्तरोगेषु सर्वेषु गर्भच्यवनदाहयोः ।।५२।।
मुख्यः पल्लवयूषोऽयं हितः कटुकिनीषु च ।
बढ़, गूलर, पीपल, पिलखन, त्रिवृत्, ढाक तथा कमल के पत्तों से घी और अनार के साथ सिद्ध करके पल्लवयूष बनाया जाता है। यह सम्पूर्ण पित्त रोगों में, गर्भपात, दाह तथा कटुकिनी (ग्रह रोग) में हितकर होता है ॥५१-५२॥
पुनर्नवाया रास्नायाश्चाङ्गेरीबलयोस्तथा ।।५३।।
पृथग्यूषाः समाख्याता वातघ्ना दधिसर्पिषा ।
पुनर्नवा, रास्ना, चाङ्गेरी तथा बला के दही तथा घृत के साथ पृथक् २ यूष बनाये जाते हैं। ये वातनाशक होते हैं ॥५३॥
रोहितापोत¹मत्स्यानां निर्यूहं साधयेज्जले ।।५४।।
तं क्वाथं साधयेद्भूयः शुक्तकाञ्जिकमस्तुभिः । द्रवाणि कुडबीजानि गुडपञ्चपले शृतः ।।५५।।
एष काम्बलिको रूक्षः कटुतैलेन वा कृतः । वातरोगप्रशमनो बृंहणो बलवर्धनः ।।५६।।
रतिनिद्रारुचिकरस्तिलतैलेन वा कृतः ।
रोहित जाति की छोटी मछलियों को जल में पकाकर सिद्ध करे। उसे पुनः सिरके, कांजी तथा दधिमस्तु के साथ सिद्ध करे। इसमें द्रव (Liquid) कुडबीज (कुटजबीज) लेवे तथा ५ पल गुड लेकर पकाये। यह रूक्ष अथवा कटु तैल (सरसों के तेल) के साथ बनाया हुआ काम्बलिक कहलाता है। यह काम्बलिक वातरोगों का शामक, बृंहण तथा बलवर्धक है। अथवा तिल तैल के साथ बनाने पर रति (कामशक्ति) निद्रा तथा रुचि को बढ़ाने वाला है ॥५४-५६॥
दीपनं पञ्चमूलं च फलानि मधुराणि च ।।५७।।
पूर्ववत् सर्वधान्यानि धान्यकं मरिचानि च । काकोलीक्षीरकाकोलीकाश्मर्याणि परूषकम् ।।५८।।
बदराणि कुलत्थाश्च रास्नैरण्डपुनर्नवाः । द्वे पले गोक्षुरः शिग्रुपलाशतरुणानि च ।।५९।।
जलद्रोणे पचेदेतं निर्यूहं पादशेषितम् । दधिकाञ्जिकशुक्तानि प्रस्थशस्तैलसर्पिषी ।।६०।।
मूलकानाम्पत्राणां तरुणानां शतं भवेत् । एष सिद्धो महायूषो व्योषसंस्कारसंस्कृतः ।।६१।।
१. रोहितायाः पोतमत्स्यानां बालमत्स्यानामित्यर्थः ।
३८४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् यूषनिर्देशीयाध्यायः ४]
सर्वरोगेषु भूयिष्ठं संसृष्टेषु प्रशस्यते। अत्यग्निषु विनिद्रेषु स्तब्धाङ्गच्छुबुकाक्षिषु (?) ।।६२।। निर्यूहिण समं दद्यान्मांसनिर्यूहमेव तु। कार्यः सतितलकल्को वा जीर्णातीसारशान्तये ।।६३।।
दीपक पञ्चमूल, मधुर वर्ग के फल, सब धान्य, धनिया, मरिच, काकोली, क्षीर काकोली, गंभारी, फालसा, बेर, कुलत्थ, रास्ना, एरण्ड, पुनर्नवा, दो पल गोखुरु तथा तरुण सुहांजना और ढाक—इन्हें एक द्रोण जल में पकाकर इस क्वाथ का चतुर्थांश शेष रखे। दही, कांजी, सिरका, तैल तथा घृत—सब एक २ प्रस्थ होने चाहिये। पत्र सहित तरुण मूलियां १०० होनी चाहिये। यह त्रिकटु के संस्कार से संस्कृत करके सिद्ध किया हुआ यूष महायूष कहलाता है। यह सब प्रकार के मिश्रित रोगों, अग्नि की वृद्धि, अनिद्रा, स्तब्धाङ्ग तथा छुबुकाक्षि (?) रोगों में प्रशस्त माना गया है। इस निर्यूह के समान इसमें मांस का निर्यूह और तिल का कल्क मिलावे। यह जीर्ण अतिसार को नष्ट करता है ।।५७-६३।।
उक्तो लशुनयूषस्तु स्वकल्पे वातनाशनः। सूपाश्च रसकाश्चैव त्रिविधाः प्राङ्निदर्शिताः ।।६४।।
लशुन कल्प में वातनाशक लशुन यूष कहा गया है। पहले तीन प्रकार से सूप तथा रसक कहे गये हैं ।।६४।।
स्विन्नानि मूलकान्यप्सु निष्पीड्य तरुणो विभुः। परिभृज्य ततः स्नेहे तत आदानमावपेत् ।।६५।। एष मूलकयूषस्तु सर्वरोगविनाशनः।
तरुण एवं सर्वज्ञाता वैद्य पानी में मूली को उबाल कर पीस ले। तब उसे स्नेह (घृत या तैल) में भून ले उसमें प्रक्षेप डालकर यूष बनाये। यह मूलक यूष सब रोगों को नष्ट करता है ।।६५।।
अनम्लोलदक(लावक ?)रसः संस्कृतो जलसर्पिषोः ।।६६।। भवेत् पित्तोपशमनस्तैलभृष्टोऽनिलापहः।
अम्ल (खटाई) से रहित लावक (बटेर) का मांस रस जल और घृत में संस्कृत किया हुआ पैत्तिक रोगों को शान्त करता है तथा तेल में भूनने पर वात को नष्ट करता है ।।६६।।
एते यूषाः स्वतन्त्रोत्था उक्ता व्याससमासतः ।।६७।।
ये स्वतन्त्र रूप से बनाये हुए यूष विस्तार तथा संक्षेप से कहे गये हैं ।।६७।।
यवागूरपि वक्ष्यामि नानाद्रव्योपसंस्कृताः। नानारोगोपशमनीः शृणु वृद्धैकविंशतिम् ।।६८।।
अब मैं नाना द्रव्यों से संस्कृत यवागुओं का वर्णन करूंगा। हे वृद्धजीवक ! तू नाना रोगों को शान्त करनेवाली २१ यवागुओं को सुन ।।६८।।
ओदनस्य विलेप्याश्च यवाग्वाश्च किमन्तरम्। शुश्रूषे भगवन्नेतदित्युक्तः प्राह कश्यपः ।।६९।।
हे भगवन् ! मैं ओदन, विलेपी तथा यवागू के भेद को सुनना चाहता हूँ। यह प्रश्न किया जाने पर भगवान् कश्यप ने उत्तर दिया ।।६९।।
ओदनो विशदः सिद्धः सुस्विन्नो निस्रुतो मृदुः। तण्डुलैः सकलप्रायैरक्षीणैश्चापि पठ्यते ।।७०।।
ओदन के गुण—ओदन विशद होता है, सिद्ध किया हुआ होता है, अच्छी प्रकार से स्विन्न (उबाला हुआ-पकाया हुआ) होता है, निस्रुत—इसमें से मांड चुआ दी जाती है, मृदु होता है तथा इसमें तण्डुल (चावल) सम्पूर्ण (पूरे) होते हैं तथा कम नहीं होते ।।७०।।
अस्विन्नत्वमवक्लेदस्त्वसाकल्यमनिस्स्रवः। विरसोऽविशदः शीत ओदनस्य विपर्ययाः ।।७१।।
यूषनिर्देशीयाध्यायः ४] खिलस्थानम् ३८५
ओदन के विपरीत गुण—अच्छी प्रकार स्विन्न न होना (अच्छी प्रकार पका हुआ न होना), क्लेद का न होना, असाकल्य (चावलों का पूरे रूप में न होना), मांड का चुआया न जाना, विरस तथा अविशद (रस तथा विशदता का अभाव) और ठण्डा होना—ये ओदन के विपरीत गुण हैं अर्थात् ये ओदन के अप्रशस्त गुण हैं ।।७१।।
द्वाविंशतिभागेन तण्डुलैः सह साधयेत् । तथा पञ्चदशाख्येन यवागूर्दशकेन वा ।।७२।।
यवागू बनाते हुए चावलों को बीस भाग, पन्द्रह भाग अथवा दस भाग पानी के साथ सिद्ध करना चाहिये ।।७२।।
विंशतेः स्फुटितैः सिक्थैस्तुल्याधोमध्यतोपरि ।
(इति ताडपत्रपुस्तके २०९ तमं पत्रम्) ।
अह^१स्तहार्या पेया स्याद्यवागूः सपरिग्रहाः ।।७३।।
पेया तथा यवागू में अन्तर—जो बीस गुने पानी में सिद्ध की हुई हो, सिक्थ (चावलों की कणियां) जिसमें स्फुटित हों, ऊपर नीचे तथा मध्य में समान रूप से द्रव होने के कारण हाथ से जो ग्रहण न की जा सके—उसे पेया कहते हैं । तथा जो परिग्रह युक्त अर्थात् हाथ से ग्रहण की जा सकने वाली हो—उसे यवागू कहते हैं । अन्यत्र इनके भेद निम्न प्रकार से दिये हैं—सिक्थकै रहितो मण्डः पेया सिक्थसमन्विता । यवागूर्बहुसिक्था स्याद् विलेपी विरलद्रवा ।। अर्थात् अल्प सिक्थयुक्त द्रव्य को पेया तथा सिक्थ प्रधान द्रव्य को यवागू कहते हैं ।।७३।।
घना विशीर्णा शीता च न चावक्षीणतण्डुला । पिच्छिला विशदाऽहृद्या यवाग्वा दोषसंग्रहः ।।७४।।
यवागू के दोष—बहुत गाढ़ी, विशीर्ण (पतली), ठण्डी, चावलों का कम न होना, पिच्छिलता, विशदता तथा अहृद्या (हृदय को अच्छी न लगना)—ये यवागुओं के दोष है ।।७४।।
तक्रसिद्धा यवागूस्तु दधिसिद्धा च ते घने । संस्कृते हस्तहार्ये ते प्रतिषिद्धे क्रियावताम् ।।७५।।
उष्णा घना प्रशिथिला दलितैस्तण्डुलैः कृता ।
तक्र एवं दही में सिद्ध की हुई जो यवागू सान्द्र एवं संस्कारयुक्त हो, हाथों से जिसका ग्रहण हो सके तथा जो उष्ण, घन (गाढ़ी-सान्द्र), शिथिल तथा टूटे हुए चावलों से बनाई हुई हो—उनका क्रियायुक्त व्यक्तियों के लिये निषेध है ।।७५।।
विलेप्या गुणदोषांस्तु यवाग्वा इव निर्दिशेत् ।।७६।।
विलेपी के गुण एवं दोष यवागू के समान ही जानने चाहिये ।।
दीर्घोपवासिनां नृणां क्षीरपेया प्रशस्यते । शीतपित्तोपशमनी बृंहणी वर्चबन्धनी ।।७७।।
लम्बे उपवास करनेवाले व्यक्तियों के लिये क्षीर पेया प्रशस्त मानी गई है । यह शीत पित्त को शान्त करती है, बृंहणकारक है तथा मल को बांधती है ।।७७।।
शूलघ्नी दीपनी पेया दीपनीयोपसाधिता । पाचनी पचनी चोक्ता कषायैर्वर्चबन्धनी ।।७८।।
दीपन द्रव्यों से सिद्ध की हुई पेया शूल को नष्ट करती है, दीपक हैं, पाचक है, स्वयं पचने वाली है तथा कषायों के द्वारा मल को बांधती है ।।७८।।
बिल्वं दधित्थं सह दाडिमेन सव्योषचाङ्गेरिकृता यवागूः ।
सांग्राहिणी दीपनपाचनी च सपञ्चमूलाऽनिलपीडिते तु ।।७९।।
१. विंशतिभागजलसिद्धा स्फुटितसिक्था उपर्यधोर्ध्वभागेषु समानरूपा द्रवतया हस्तेन ग्रहीतुमयोग्या पेया, ग्रहीतं योग्या तु यवागूरित्यर्थः ।
३८६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् यूषनिर्देशीयाध्यायः ४]
त्रिकटु तथा चांगेरी के साथ बिल्व एवं दधित्थ (कपित्थ) की बनाई हुई, अनारदाने से युक्त यवागू संग्राहक (Astringent) तथा दीपक और पाचक होती है। तथा पञ्चमूल के सहित बनाई हुई यवागू वायु से पीड़ित रोग में प्रयुक्त की जाती है ॥७९॥
बला वृषत्पर्ण्यथ शालपर्णी स्याद्दाडिमं बिल्वशलाटुयुक्तम् । पेया हिता पित्तकफातिसारे तोयं च तत्तत्र वदन्ति पेयम् ॥८०॥
बला, वृषत्पर्णी (आखुकर्णी), शालपर्णी, अनार तथा बिल्वशलाटु (कच्चा बिल्व) से युक्त पेया पित्त तथा कफातिसार में हितकर होती है। इस अवस्था में इसका जल पीना चाहिये ॥८०॥
एषैव दध्ना रुचिवर्धनी स्यान्निर्वाहिकां हन्ति तिलोपसिद्धा । रक्तातिसारं शमयत्युदीर्णमसृग्दरं गर्भपरिस्रवं च ॥८१॥
यही पेया दही के साथ रुचिवर्धक होती है। तिलों के द्वारा सिद्ध की हुई यह प्रवाहिका को नष्ट करती है। यह उत्पन्न हुए रक्तातिसार, रक्तप्रदर तथा गर्भस्त्राव को शान्त करती है ॥
सदाडिमा सातिविषाऽथ साम्ला पेया भवेदामविपाचनीया । स्यात् कण्टकारीरसगोक्षुराभ्यां सफाणिता मूत्रगदे यवागूः ॥८२॥
अनार, अतीस तथा अम्ल द्रव्यों से युक्त पेया आम का पाचन करती है। कण्टकारी के रस तथा गोखरु में फाणित (राब) मिलाकर बनाई हुई यवागू मूत्र रोगों में हितकर होती है ॥८२॥
सुवर्चिकाक्षारविडङ्गशिग्रुसपिप्पलीमूलकृता यवागूः । तक्रेापसिद्धा क्रिमिनाशनी स्याद्गुल्मेऽथ कासे ग्रहणीगदे च ॥८३॥
सज्जीक्षार, विडङ्ग, सुहांजना तथा पिप्पलीमूल के द्वारा बनाई हुई एवं तक्र से सिद्ध की हुई यवागू कृमिनाशक होती है तथा गुल्म, कास और ग्रहणी रोग में प्रयुक्त होती है ॥८३॥
मृद्वीकलाजामधुपिप्पलीभिः ससारिवा तृड्शमनी यवागूः । विषं निहन्त्याशु त सोमराज्ञा, वराहनियूहकृता तु बल्या ॥८४॥
मुनक्का, लाजा (खील), मधु, पिप्पली तथा सारिवा से युक्त यवागू प्यास को शान्त करती है। सोमराजी (वाकुची) से युक्त यवागू विष को नष्ट करती है तथा वराह (सूअर) के निर्यूह से बनाई हुई यवागू बल्य (बलकारक) होती है ॥८४॥
कार्श्यार्थमिष्टा तु गवेधुकानां, सर्पिष्मती सैन्धवयुग्बलाय । द्विपञ्चमूलोदकसाधिता तु श्वासं च कासं च कफं च हन्ति ॥८५॥
गेहुओं की यवागू कृशता के लिये श्रेष्ठ मानी गई है। घृत तथा सैन्धव से युक्त यवागू बलकारक होती है। दोनों पञ्चमूल अर्थात् दशमूल से सिद्ध की हुई यवागू श्वास, कास तथा कफ को नष्ट करती है ॥८५॥
शाकैः समांसैः सतलैः समाषैः सर्पिष्मती स्नेहनभेदनी तु । जम्ब्वाम्रयोरस्थिदधित्थबिल्वैस्तैरम्लयुग्वर्चविबन्धनी तु ॥८५॥
शाक, मांस, तिल, उड़द तथा घृत युक्त यवागू स्नेहन तथा मल का भेदन करती है। जामुन तथा आम की गुठली, दधित्थ (कपित्थ) तथा बिल्व की आम्लयुक्त यवागू मल को बांधती है ॥८६॥
भोज्योपक्रमणीयाध्यायः ५] खिलस्थानम् ३८७
तक्रोपासिद्धा तु घृतामये स्यात्, पिण्याकयुक् सैव तु तैलरोगे।
उपोदिकादध्युपसाधिता तु मदं विदाहं च नयेत् प्रसादम्॥८७॥
तक्र से सिद्ध की हुई यवागू घृत से उत्पन्न हुए रोग में, पिण्याक (खल) से युक्त यवागू तैल के प्रयोग से उत्पन्न हुए रोग में, उपोदिका (पोई का शाक-Bassela Alba) तथा दही से सिद्ध की हुई यवागू मद तथा विदाह को शान्त करती है॥८७॥
शाकैरभृष्टैः परिभृष्टकैश्च रोगातुरावेक्ष्यपकल्पयेत्ताः१।
लोके प्रसिद्धं यन्मानं तर्कमानं तुलाधृतम्।
तत्तन्त्रेऽस्मिन् प्रमाणं स्याद्वक्तव्यं तत्र नास्ति मे॥८८॥
रोग तथा रोगी को देखकर (अर्थात् रोग तथा रोगी की अवस्था के अनुसार) बिना तले हुए तथा तले हुए शाकों के द्वारा यवागू बनाये। जो तर्क संगत तुलायुक्त मान लोक (व्यवहार) में प्रसिद्ध है, वही इस तन्त्र में भी प्रमाण माना गया है। इस विषय में मुझे विशेष वक्तव्य नहीं है अर्थात् इस विषय में इसलिये विशेष उपदेश नहीं करूंगा॥८८॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।
(इति) खिलेषु यूषनिर्देशीयो (नाम चतुर्थोऽध्यायः) ।।
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
(इति) खिलेषु यूषनिर्देशीयो (नाम चतुर्थोऽध्यायः) ।।
भोज्योपक्रमणीयाध्यायः पञ्चमः।
अथातो भोज्योपक्रमणीयं नामाध्यायं व्याख्यास्यामः॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः॥२॥
अब हम भोज्योपक्रमणीय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था॥१-२॥
अथ खल्वस्माभिः पूर्वं यद्रसविमानेऽभिहितं कालादिचतुर्विंशतिविधमाहारमानं, तस्येदानीं प्रतिविकल्पविशेषानुपदेक्ष्यामः। किं कारणम् ? न ह्याहारादृते प्राणिनां प्राणाधिष्ठानं किञ्चिदप्युपलभामहे। स सम्यगुपयुज्यमानो जीवयति, सर्वेन्द्रियाणि ह्लादयति, धातूनाप्याययति, स्मृतिमतिसर्वबलौजांस्यूर्जयति, वर्णप्रसादं चोपजनयति; असम्यगुपयुज्यमानस्त्वसुखैनोपयोजयति। तस्मात् काले सात्म्यं मात्रावदुष्णं स्निग्धमविरोधि शुचौ देशे शुचिषु पात्रेषु शुचिपरिचरेणोपनीतं प्राङ्मुखस्तूष्णींस्तन्मना आस्वादयन्नातिद्रुतं नातिविलम्बितं नात्युष्णं नातिशीतं नातिरूक्षं नातिस्निग्धं नातिबहु नातिस्तोकं नातिद्रवं नातिशुष्कं नाकांक्षितो न प्रतान्तो नैकरसं वाऽऽरोग्यायुर्बलार्थी समश्रीयात् ॥३॥
१. अत्रार्धमात्रमन्तेऽवशिष्टमर्धान्तरं त्रुटितं सम्भाव्यते।
३८८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् भोज्योपक्रमणीयाध्यायः ५]
हमने पहले रस विमान में काल आदि २४ प्रकार का जो आहार का मान कहा है, अब हम उसके विशेष विकल्पों (भेदों) को कहेंगे। क्योंकि आहार के बिना किञ्चिन्मात्र भी प्राणियों के प्राण स्थिर नहीं रहते हैं। यदि आहार का अच्छी प्रकार से प्रयोग किया जाय तो वह जीवन प्रदान करता है, सम्पूर्ण इन्द्रियों को प्रसन्न करता है, धातुओं की वृद्धि करता है, स्मृति, बुद्धि, सब प्रकार के बल तथा ओज को बढ़ाता है तथा वर्ण (Complexion) को निखारता है। इसके विपरीत यदि आहार का अच्छी प्रकार प्रयोग न किया जाय तो वह शरीर को दुःखों से युक्त करता है।
वक्तव्य—आरोग्य, आयु तथा बल को चाहने वाले व्यक्ति को चाहिये कि १ उचित काल में, २ सात्म्य, ३. उचित मात्रा में, ४. उष्ण, ५. स्निग्ध, ६. जो विरुद्ध न हो, ७. पवित्र स्थान में पवित्र पात्रों (वर्तनों) में पवित्र परिचारक द्वारा लाया गया, ८ पूर्व दिशा की ओर मुख करके, ९. शान्त होकर, १०. अच्छी प्रकार मन लगाकर दत्तचित्त होकर, ११. स्वादपूर्वक, १२. न अत्यन्त शीघ्रता से, १३. न अत्यन्त धीरे-धीरे, १४ न अत्यन्त उष्ण, १५. न अत्यन्त शीत, १६. न अत्यन्त रूक्ष, १७. न अत्यन्त स्निग्ध, १८. न अत्यन्त अधिक परिमाण में, १९. न अत्यन्त स्वल्प परिमाण में, २०. न अत्यन्त द्रव, २१. न अत्यन्त शुष्कं, २२. न भोजन के प्रति अनिच्छा होने पर, २३. न निरन्तर-बारबार तथा २४ न केवल एक रस वाला भोजन करे ॥३॥
भवन्ति चात्र— आरोग्यं दोषसमता सर्वाबाधनिवर्तनम् । तदर्थमृषयः पुण्यमायुर्वेदमध्येयते ॥४॥ दोषों का समावस्था में होना तथा सम्पूर्ण रोगों की निवृत्ति (आरोग्य) कहलाता है। इस आरोग्य के लिये ही ऋषि लोग पुण्यकारक आयुर्वेद का अध्ययन करते हैं ॥४॥
रसायनानि विधिवत्तदर्थं चोपयुञ्जते । धर्मार्थकाममोक्षाणामवाप्तिश्च तदाश्रया ॥५॥ तदात्मवांस्तदर्थाय प्रयतेत विचक्षणः । उस आरोग्य के लिये ही विधिवत् रसायनों का प्रयोग किया जाता है। धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष आदि चतुर्विध पुरुषार्थ की प्राप्ति भी आरोग्य से ही होती है। चरक सू. अ. १६ में कहा है कि आरोग्य दान के द्वारा वैद्य धर्म, अर्थ, काम तथा अभ्युदय एवं निश्रेयस रूप मोक्ष का दाता होता है। निर्बल पुरुष जहां भौतिक अर्थ एवं काम की प्राप्ति में असमर्थ रहता है वहां वह धर्म तथा मोक्ष से भी वञ्चित रहता है। इसलिये बुद्धिमान् तथा आत्मवान् (जितेन्द्रिय मनुष्य) को उस आरोग्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिये ॥५॥
अन्नाभिलाषो भुक्तस्य परिपाकः सुखेन च ॥६॥ सृष्टविण्मूत्रवातत्वं शरीरस्य च लाघवम् । सुप्रसन्नेन्द्रियत्वं च सुखस्वप्रप्रबोधनम् ॥७॥ बलवर्णायुषां लाभः सौमनस्यं समाग्निता । विद्यादारोग्यलिङ्गानि विपरीते विपर्ययम् ॥८॥ आरोग्य के लक्षण— अन्न में रुचि, खाये हुए अन्न का सुख-पूर्वक परिपाक हो जाना, मल, मूत्र, तथा वायु का निकलना, शरीर की लघुता, इन्द्रियों की प्रसन्नता, सुखपूर्वक सोना तथा जागना, बल, वर्ण तथा आयु की प्राप्ति, मन की प्रसन्नता, तथा अग्नि की समता ये आरोग्य के लक्षण जानने चाहिये। अनारोग्य (अस्वास्थ्य-रोग) में इससे विपरीत लक्षण होते हैं।
आरोग्यं भोजनाधीनं भोज्यं विधिमवेक्षते । विधिर्विकल्पं भजते विकल्पस्तु प्रवक्ष्यते ॥९॥ आरोग्य (स्वास्थ्य) भोजन पर निर्भर होता है तथा भोजन विधि की अपेक्षा करता है। भोजन की विधि उसके विकल्प पर आश्रित होती है इसलिये हम भोजन के विकल्पों का व्याख्यान करेंगे ॥९॥
भोज्योपक्रमणीयाध्यायः ५] खिलस्थानम् ३८९
स्वस्थानस्थेषु दोषेषु स्रोतःसु विमलेषु च। जातायां च प्रकाङ्क्षायामन्नकालं विदुर्बुधाः ॥१०॥
अन्न का काल—दोषों के अपने स्थान में स्थित होने पर, स्त्रोतों के मल रहित हो जाने पर तथा भोजन के प्रति इच्छा उत्पन्न होने पर विद्वान् लोग अन्न का काल कहते हैं। अर्थात् जब तक दोष अपने स्थान में स्थित न हों, स्त्रोत मल रहित न हों तथा भोजन की इच्छा उत्पन्न न हो तब तक अन्न का सेवन नहीं करना चाहिये ॥१०॥
कालेऽश्नतोऽन्नं स्वदते तुष्टिः पुष्टिश्च वर्धते । सुखेन जीर्यते न स्युः प्रतान्ताजीर्णजा गदाः ।।११।।
अब भोजन के २४ विकल्पों का व्याख्यान किया जायगा।
१. योग्यकाल में खाया हुआ अन्न स्वादु लगता है, शरीर को सन्तुष्ट करता है, पोषण की वृद्धि होती है वह सुखपूर्वक जीर्ण हो जाता है तथा बार २ भोजन के करने तथा अजीर्ण से उत्पन्न होने वाले रोग नहीं होते हैं। सुश्रुत में भी कहा है—‘काले भुक्तं प्रीणयति' ॥११॥
सात्म्यं नामाहुरौचित्यं सातत्येनोपसेवितम् । आहारजातं यद्यस्य चानुशेते स्वभावतः ।।१२।।
२. सात्म्य का लक्षण—सात्म्य औचित्य को कहते हैं। निरन्तर सेवन किया जाता हुआ जो आहार स्वाभाविक रूप से जिसके अनुकूल होता है उसे सात्म्य कहते हैं। चरक वि. अ. १ में कहा है कि सात्म्य उसे कहते हैं जो अपने (मन, आत्मा एवं शरीर के संयोग रूप) को सुखकर हो। सात्म्य और उपशय परस्पर पर्यायवाची शब्द हैं। यह मुख्य रूप से तीन प्रकार का है। प्रवर, अवर तथा मध्यम। इनमें सम्पूर्ण रस सात्म्य तथा एक रस अवर सात्म्य होता है। प्रत्येक व्यक्ति को प्रयत्न करना चाहिये कि उसे छओं रस सात्म्य हों अर्थात् प्रवर सात्म्य की प्राप्ति का प्रयत्न करना चाहिये ॥१२॥
सात्म्याशी सात्म्यसाद्गुण्याच्छतं वर्षाणि जीवति । न चाप्यनुचिताहारविकारैरुपसृज्यते ।।१३।। (इति ताडपत्रपुस्तके २१० तमं पत्रम् ।)
सात्म्य का सेवन करने वाला व्यक्ति सात्म्य के साद्गुण (श्रेष्ठ गुण कारक होने) के कारण सौ वर्ष तक जीवित रहता है तथा इसे अनुचित आहार से उत्पन्न होने वाले विकार नहीं होते हैं। सुश्रुत सू. अ. ४६ में कहा है—'सात्म्यमन्नं न बाधते' अर्थात् सात्म्य अन्न शरीर में किसी प्रकार का कष्ट नहीं पहुंचाता है ॥१३॥
लघूनां नातिसौहित्यं गुरूणामल्पशस्तथा। मात्रावदश्नतो भुक्तं सुखेन परिपच्यते ।।१४।। स्वस्थ(स्वास्थ्य)यात्राग्निचेष्टानांमविरोधि च तद्भवेत् ।
३. लघु पदार्थों को अत्यन्त सौहित्य से अर्थात् खूब पेट भरकर नहीं खाना चाहिये तथा गुरु पदार्थों को भी अल्प मात्रा में सेवन करना चाहिये। इस प्रकार उचित मात्रा में भोजन करने वाले व्यक्ति को खाया हुआ आहार सुखपूर्वक पच जाता है तथा वह मात्रा में खाया हुआ आहार शरीर की स्वास्थ्यरूपी यात्रा, जाठराग्नि तथा शरीर की चेष्टाओं का विरोधी नहीं होता। चरक सू. अ. ५ में कहा है कि भोजन मात्रा (उपयुक्त परिमाण) में ही करना चाहिये। तथा भोजन की मात्रा अग्निबल के अनुसार होती है अर्थात् जाठराग्नि के अनुसार मात्रा कम या अधिक करनी चाहिये। जितना भोजन यथासमय सुखपूर्वक जीर्ण हो जाय उतनी ही आहारमात्रा समझनी चाहिये। अर्थात् आहारमात्रा प्रत्येक व्यक्ति की अपेक्षा रखती है। सबके लिये कोई एक समान मात्रा निर्धारित नहीं की जा सकती है। उचित मात्रा में सेवन किया गया गुरु भोजन भी परिणाम में लघु हो जाता है तथा इसके विपरीत लघु भोजन भी यदि अधिक मात्रा में सेवन किया जाय तो वह परिणाम में गुरु (भारी) हो जाता है। इसलिये प्रत्येक द्रव्य मात्रा की अपेक्षा रखता है। इसीलिये सुश्रुत सू. अ. ४६ में भी कहा है कि मात्रा के अनुसार किया हुआ भोजन सुखपूर्वक जीर्ण हो जाता है तथा धातुओं की समता करता है ॥१४॥
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| ३९० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | भोज्योपक्रमणीयाध्यायः ५] |
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उष्णं हि भुक्तं स्वदते श्लेष्माणं च जयत्यपि ।।१५।।
वातानुलोम्यं कुरुते क्षिप्रमेव च जीर्यते । अन्नाभिलाषं लघुतामग्निदीप्तिं च देहिनाम् ।।१६।।
४. उष्ण भोजन खाया हुआ मनुष्य को स्वादु लगता है, श्लेष्मा (कफ) को शान्त करता है, वायु का अनुलोमन करता है, शीघ्र ही जीर्ण हो जाता है, अन्न में रुचि उत्पन्न करता है, शरीर में लघुता तथा अग्नि को प्रदीप्त करता है। सुश्रुत सू. अ. ४६ में भी कहा है—'स्निग्धोष्णं बलवह्निदम्' ।।
स्निग्धं प्रीणयते देहमूर्जयत्यपि पौरुषम् । करोति धातूपचयं बलवर्णौ दधाति च ।।१७।।
५. स्निग्ध भोजन शरीर को प्रसन्न करता है, पौरुष को बढ़ाता है, धातुओं की वृद्धि करता है तथा बल और वर्ण को धारण कराता है ।।१७।।
सुमृष्टमपि नाश्नीयाद्विरुद्धं तद्धि देहिनः । प्राणानस्याऽऽशु वा हन्यात्तुल्यं मधुघृतं यथा ।।१८।।
अविरुद्धान्नभुक स्वास्थ्यमायुर्वर्णं बलं सुखम् । प्राप्नोति, विपरीताशी तेषामेव विपर्ययम् ।।१९।।
६. अच्छी प्रकार साफ किया हुआ भी विरुद्ध भोजन नहीं करना चाहिये। विरुद्ध भोजन शीघ्र ही प्राणियों के प्राणों को नष्ट कर देता है जिस प्रकार समान मात्रा में मधु और घृत का सेवन। अविरुद्ध अन्न का सेवन करने वाला व्यक्ति स्वास्थ्य, आयु, वर्ण, बल तथा सुख को प्राप्त करता है। इससे विपरीत अर्थात् विरुद्ध अन्न का सेवन करने वाला व्यक्ति उपर्युक्त गुणों से विपरीत अर्थात् आयु, वर्ण, बल तथा सुख के ह्रास को प्राप्त करता है ।।१८-१९।।
शुचिपात्रोपचरणः शुचौ देशे शुचिः स्वयं । भुञ्जानो लभते तुष्टिं पुष्टिं तेनाधिगच्छति ।।२०।।
नानिष्टैरमनस्यैर्वा विघातं मनसोर्च्छति । तस्मादनिष्टे नाश्नीयादायुरारोग्यलिप्सया ।।२१।।
७. पवित्र पात्रों में, पवित्र देश में तथा स्वयं पवित्र होकर भोजन करने वाला व्यक्ति तुष्टि को प्राप्त करता है तथा शरीर का पोषण होता है। जो इष्ट न हो तथा मन को रुचिकर न हो ऐसे ढंग से आहार न करे। इससे मन का विघात होता है। इसलिये आयु तथा आरोग्य को चाहने वाला व्यक्ति ऐसे स्थान पर भोजन न करे जो इष्ट (मन के अनुकूल) न हो ।।२०-२१।।
प्राङ्मुखोऽश्नन्नरो धीमान् दीर्घमायुरवाप्नुते । तूष्णीं सर्वेन्द्रियाह्लादं मनःसात्म्यं च विन्दति ।।२२।।
८-९. पूर्व दिशा की ओर मुख करके भोजन करने वाला बुद्धिमान् व्यक्ति दीर्घ आयु को प्राप्त करता है। शान्त (चुप-चाप) होकर भोजन करने वाला व्यक्ति सब इन्द्रियों की प्रसन्नता तथा मन की सात्म्यता को प्राप्त करता है ।।२२।।
एतदेव च मात्रां च पक्तिं युक्तिं च तन्मनाः ।
तस्मात्तत्प्रवणोऽजल्पन् स्वस्थो भुञ्जीत भोजनम् ।।२३।।
१०. दत्तचित्त होकर भोजन करने वाला व्यक्ति पूर्वोक्त गुणों को तथा इसके साथ ही मात्रा, पाचन, शक्ति तथा युक्ति को जानता है। इसलिये स्वस्थ व्यक्ति को भोजन में मन लगाकर तथा बिना अधिक बातचीत किये भोजन करना चाहिये ।।२३।।
आस्वाद्यास्वाद्य योऽश्नाति शुद्धजिह्वेन्द्रियो रसान् । स वेत्ति रसनानात्वं विशेषांश्चाधिगच्छति ।।२४।।
११. जो शुद्ध रसनेन्द्रिय वाला मनुष्य अच्छी प्रकार रसों का स्वाद ले लेकर भोजन करता है वह अनेक रसों को तथा उनके भेदों को जानता है ।।२४।।
अतिद्रुतं हि भुञ्जानो नाहारस्थितिमाप्नुयात् । भोज्यानुपूर्वीं नो वेत्ति न चान्नरससंपदम् ।।२५।।
भोज्योपक्रमणीयाध्यायः ५] खिलस्थानम् ३९१
नातिद्रूताशी तत्सर्वमनूनं प्रतिपद्यते । प्रसादमिन्द्रियाणां च तथा वातानुलोमताम् ।।२६।।
१२. अत्यन्त शीघ्र भोजन करने से आहार अपनी स्थिति में नहीं पहुंचता है। वह भोज्यानुपूर्वी (भोजन में कौन सा पदार्थ पहले खाना चाहिये) तथा अन्नरस के गुणों को नहीं जान सकता है। अत्यन्त शीघ्र भोजन करने वाला व्यक्ति इन्द्रियों की प्रसन्नता और वायु के अनुलोमन आदि सब बातों को पूर्णरूप से नहीं जान पाता है ॥२५-२६॥
शीतीकरोति चान्नाद्यं भुञ्जानोऽतिविलम्बितम् । भुङ्क्ते बहु च शीतं च न तृप्तिमधिगच्छति ।।२७।। शैत्याद्वहुत्वाद्धैरस्याद् भुक्तं क्लेशेन पच्यते ।
१३. अत्यन्त धीरे २ भोजन करने से सारा अन्न ठण्डा हो जाता है। अन्न अधिक मात्रा में खाया जाता है। तथा ठण्डे हुए अन्न से तृप्ति नहीं होती है। ठण्डा मात्रा में अधिक तथा विरस होने से खाया हुआ भोजन कष्ट से पचता है ॥२७॥
अत्युष्णभोजनाज्जिह्वाकण्ठौष्ठहृदयोदरम् ।।२८।। दह्यते न रसं वेत्ति रोगांश्चाप्नोति दारुणान् । मुखाक्षिपाकवैसर्परक्तपित्तभ्रमज्वरान् ।।२९।।
१४. अत्यन्त उष्ण भोजन करने से जिह्वा, कण्ठ, ओष्ठ, हृदय तथा उदर में दाह हो जाता है, रस का ज्ञान नहीं होता तथा मुखपाक, अक्षिपाक, विसर्प, रक्तपित्त, भ्रम तथा ज्वर आदि भयंकर रोग हो जाते हैं ॥२८-२९॥
अतिशीताशिनः शूलं ग्रहणीमार्दवं घृणा । कफवाताभिवृद्धिश्च कासो हिक्का च जायते ।।३०।।
१५. अत्यन्त शीत भोजन करने से शूल, ग्रहणी की मृदुता, घृणा, कफ और वात की वृद्धि, कास तथा हिक्का उत्पन्न हो जाती है ॥३०॥
रूक्षं करोति विष्टम्भमुदावर्तं विवर्णताम् । ग्लानिं बह्वशितं वायोः प्रकोपं मूत्रनिग्रहम् ।।३१।।
१६. रूक्ष भोजन से विष्टम्भ, उदावर्त, विवर्णता, ग्लानि, अधिक खाना, वायु का प्रकोप तथा मूत्र की रुकावट हो जाती है ॥३१॥
अतिस्निग्धाशिनस्तन्द्रीतृष्णाजीर्णोदरामयाः । भवन्ति कफमेदोत्था रोगाः कण्ठोद्भवास्तथा ।।३२।।
१७. अत्यन्त स्निग्ध भोजन करने से तन्द्रा, तृष्णा, जीर्ण उदर रोग, कफ, भेद तथा कण्ठ के रोग हो जाते हैं ॥३२॥
विष्टम्भोद्वेष्टनक्लेशचेष्टाहानिविसूचिकाः । ज्ञेया विकारा जन्तूनामतिबह्वशनोद्भवाः ।।३३।।
१८. अत्यन्त अधिक मात्रा में भोजन करने से मनुष्यों को विष्टम्भ, उद्वेष्टन, क्लेश, चेष्टाहानि (गति का अभाव) तथा विसूचिका आदि रोग हो जाते हैं ॥३३॥
अतिस्तोकाशिनोऽत्यग्निविकाराः कृशता भ्रमः । अतृप्तिर्लघुता निद्राशकृन्मूत्रबलक्षयः ।।३४।।
१९. अत्यन्त कम भोजन करने से अत्यग्नि के विकार, कृशता, भ्रम, अतृप्ति, लघुता (शरीर का परिमाण में लघु-छोटा होना), निद्रा, मल, मूत्र, तथा बल का क्षय हो जाता है ॥३४॥
अतिद्रवाशानाज्जन्तोरुत्क्लेशो बहुमूत्रता । पार्श्वभेदः प्रतिश्यायो विड्भेदश्चोपजायते ।।३५।।
२०. अत्यन्त द्रव भोजन करने से व्यक्ति को उत्क्लेश, बहुमूत्र (Polyurea) पार्श्वभेद (पसलियों में पीडा), प्रतिश्याय तथा विड्भेद (अतिसार) हो जाता है ॥३५॥
३९२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | भोज्योपक्रमणीयाध्यायः ५]
अतिशुष्काशनं चापि विष्टभ्य परिपच्यते। पूर्वजातरसं जग्ध्वा कुर्यान्मूत्रकफक्षयम्।।३६।।
२१. अत्यन्त शुष्क भोजन विष्टब्ध होकर पचता है। वह पहले उत्पन्न हुए रस को जलाकर (शुष्क करके) मूत्र तथा कफ के क्षय को करता है ।।३६।।
मोहात् प्रमादाल्लौल्याद्वा यो भुङ्क्ते ह्यप्रकाङ्क्षितः। अविपाकारुचिच्छर्दिशूलानाहान् समृच्छति ।।३७।।
२२. जो व्यक्ति भोजन के प्रति रुचि न होने पर भी मोह, प्रसाद अथवा जिह्वालौल्य के कारण भोजन करता है उसे अविपाक (भोजन का न पचना), अरुचि, वमन, शूल तथा आनाह रोग हो जाते हैं ।।३७।।
प्रता¹न्तभोक्तुस्तृण्मूर्च्छा वह्निसादोऽङ्गसीदनम्। ज्वरः क्षतोऽतिसारो वा मन्दत्वं दर्शनस्य च ।।३८।।
२३. निरन्तर (बारबार) भोजन करने वाले व्यक्ति को तृष्णा, मूर्च्छा, अग्निससाद (जाठराग्नि का मन्द होना), अङ्गों की पीडा, ज्वर, क्षय, अतिसार तथा दृष्टि का मन्द होना, हो जाता है ।।३८।।
दौर्बल्यमदृढत्वं च भवत्येकरसाशनात्। दोषाप्रवृद्धिर्धातूनां साम्यं वृद्धिर्बलायुषोः ।।३९।। आरोग्यं चाग्निदीप्तिश्च जन्तोः सर्वरसाशनात्। तस्मादेकरसाभ्यासमारोग्यार्थी विवर्जयेत् ।।४०।।
२४. सदा एक ही रस का सेवन करने से दुर्बलता तथा अदृढता हो जाती है। इसके विपरीत सब रसों का सेवन करने से दोषों की कमी, धातुओं में समता, बल और आयु की वृद्धि, आरोग्य तथा अग्नि दीप्त होती है। इसलिये आरोग्य को चाहने वाला व्यक्ति केवल एक रस के अभ्यास को त्याग दे। सुश्रुत सू. अ. ४६ में कहा है कि कभी भी एक ही रस के सेवन में आसक्ति नहीं होनी चाहिये ।।३९-४०।।
कालसात्म्यादिनाऽन्नेन विधिनाऽश्नाति यो नरः। स प्राप्नोति गुणांस्तज्जान्न च दोषैः प्रबाध्यते ।।४१।।
उपर्युक्त काल, सात्म्य आदि की विधि के अनुसार जो व्यक्ति भोजन करता है वह उन २ के गुणों से युक्त होता है तथा उसे उन २ काल सात्म्य आदि से सम्बन्धित दोष कष्ट नहीं पहुंचाते हैं ।।४१।।
स्थिरतां स्वस्थताऽङ्गानामिन्द्रियोपचयं बलम्। कफमेदोऽभिवृद्धिं च कुर्यान्मधुरसात्म्यता ।।४२।।
मधुर रस की सात्म्यता के कारण शरीर की स्थिरता, अङ्गों की स्वस्थता, इन्द्रियों का उपचय, बल तथा कफ और मेद की वृद्धि होती है ।।४२।।
दन्ताक्षिकेशदौर्बल्यं कफपित्तामयोद्भवम्। लघुतामग्निदीप्तिं च जनयेदम्लसात्म्यता ।।४३।।
अम्ल रस की सात्म्यता के कारण दांतों, आंखों तथा बालों की दुर्बलता, कफ तथा पित्त रोगों की उत्पत्ति, लघुता एवं अग्निदीप्ति हो जाती है ।।४३।।
रक्तप्रकोपं तैमिर्यं तृष्णां दुर्बलशुक्रताम्। पालित्यं बलहानिं च कुर्याल्लवणसात्म्यता ।।४४।।
लवण रस की सात्म्यता से रक्तप्रकोप, तिमिर रोग, तृष्णा, शुक्र की दुर्बलता, पालित्य (बालों का सफेद होना) तथा बल में कमी हो जाती है। लवणसात्म्यता के विषय में चरक वि. अ. १ में भी कहा है ।।४४।।
पक्तेरुपचयं कार्श्यं रौक्ष्यं शुक्रबलक्षयम्। पित्तानिलप्रवृद्धिं च कुर्यात् कटुकसात्म्यता ।।४५।।
१. नितान्तभोक्तः निरन्तरं भक्षणशीलस्येति यावत्।
भोज्योपक्रमणीयाध्यायः ५] खिलस्थानम् ३९३
कटु रस की सात्म्यता से पाचन शक्ति की वृद्धि, कृशता, रूक्षता, शुक्र और बल का क्षय तथा पित्त और वायु की वृद्धि हो जाती है ॥४५॥
क्लेदाल्पतां वातवृद्धिं दृष्टिहानिं कफक्षयम्। त्वग्विकारोपशान्तिं च जनयेत्तिक्तसात्म्यता ॥४६॥
तिक्तरस की सात्म्यता के कारण क्लेद की कमी, वायु की वृद्धि, दृष्टि की कमी, कफ का क्षय तथा त्वचा के रोगों की शान्ति हो जाती है ॥४६॥
कफपित्तक्षयं वायोः प्रकोपं पक्तिमार्दवम्। कुर्याद्रक्तोपशान्तिं च कषायरससात्म्यता ॥४७॥
कषाय रस की सात्म्यता के कारण कफ और पित्त का क्षय, वायु का प्रकोप, पाचन शक्ति की मृदुता तथा रक्त रोगों की शान्ति हो जाती है ॥४७॥
ओजस्तेजो बलं वर्णमायुर्मेधा धृतिः स्मृतिः। जायते सौकुमार्यं च घृतसात्म्यस्य देहिनः ॥४८॥
जिस व्यक्ति को घृत सात्म्य हो उसमें ओज, तेज, बल, वर्ण, आयु, मेधा, धृति, स्मृति तथा सुकुमारता हो जाती है॥
तथैव क्षीरसात्म्यस्य परं चैतद्रसायनम्। दृढोपचितगात्रश्च निर्मेदरको जितश्रमः ॥४९॥
जिस व्यक्ति को क्षीर (दूध) सात्म्य हो उसके लिये वह रसायन है तथा उसका शरीर दृढ़ होता है। मेदा (चर्बी) कम हो जाती है तथा वह व्यक्ति परिश्रमी होता है ॥४९॥
बलवान् तैलसात्म्यः स्यात् क्षीणवातकफामयः। चक्षुष्मान् बलवाञ्छ्लेष्मी दृढसत्त्वो दृढेन्द्रियः ॥५०॥
जिस व्यक्ति को तैल सात्म्य हो वह बलवान् होता है, उसके वात तथा कफ के रोग क्षीण हो जाते हैं। उसके चक्षु (नेत्र) उत्तम हो जाते हैं वह बलवान् होता है, उसमें कफ की वृद्धि हो जाती है तथा उसका सत्त्व एवं इन्द्रियां दृढ़ हो जाती हैं ॥५०॥
दृढाश्रयो मन्दरुजो मांससात्म्यो भवेन्नरः।
(इति ताडपत्रपुस्तके २११ तमं पत्रम्।)
अहितं यस्य सात्म्यं स्यादसात्म्यं च हितं भवेत् ॥५१॥
स शनैर्हितमादद्यादहितं च शनैस्त्यजेत्।
जिस व्यक्ति को मांस सात्म्य होता है वह दृढ़ आश्रयवाला होता है तथा उसके रोग मन्द हो जाते हैं। अहितकर पदार्थ जिसे सात्म्य होते हैं तथा हितकर पदार्थ जिसे असात्म्य होते उसे शनैः २ हित का ग्रहण तथा अहित का त्याग करना चाहिये। चरक वि. अ. १ में कहा है—तस्मात्तेषां त सात्म्यतः क्रमेणापगमनं श्रेयः, सात्म्यमपि हि क्रमेणोपनिवर्त्त्यमानमदोषमल्पदोषं वा भवति। अर्थात् अहित का त्याग एवं हित का ग्रहण भी क्रमशः ही होना चाहिये। अहित का सहसा त्याग ठीक नहीं है॥
आदौ तु स्निग्धमधुरं विचित्रं मध्यतस्तथा ॥५२॥
रूक्षद्रवावसानं च भुञ्जानो नावसीदति।
भोजन के प्रारम्भ में स्निग्ध तथा मधुर पदार्थ, मध्य में नाना प्रकार के भोजन तथा अन्त में रूक्ष और द्रव पदार्थों का सेवन करनेवाला व्यक्ति कष्ट नहीं पाता। इसी संहिता के कल्प स्थान के भोजनकल्पाध्याय में कहा है—स्निग्धञ्च पूर्वं मधुरं च भोज्यं मध्ये द्रवं शीतमथो विचित्रम्। तीक्ष्णोष्णरूक्षाणि लघूनि पश्चाद्भोज्यानुपूर्वी खलु सात्म्यतश्च ॥५२॥
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भागद्वयमिहान्नस्य तृतीयमुदकस्य च ।। ५३ ।।
वायोः संचरणार्थं च चतुर्थमवशेषयेत् ।
कुक्षि के चार भागों में से दो भाग अन्न (ठोस आहार) द्रव्य से तथा तीसरा जल (द्रव पदार्थ–Liquids) से भरना चाहिये और चौथा भाग वायु की गति के लिये खाली रखना चाहिये। यह अर्धसौहित्य की दृष्टि से कहा गया है। इसमें मूर्त आहार आमाशय के १/२ भाग में रहते हैं। अष्टाङ्ग हृदय सू. अ. १० में भी कहा है कि यदि आमाशय के अवकाश (रिक्त) स्थान को चार भागों में विभक्त किया जाय तो उसमें से दो भाग अन्न द्वारा तथा एक भाग पेय पदार्थों से भरकर चौथा स्थान (भाग) वायु आदि की गति के लिये खाली रखना चाहिये ।। ५३ ।।
ततो मुहूर्त्तमाश्वस्य गत्वा पादशतं शनैः ।। ५४ ।।
स्वासीनस्य सुखेनान्नमव्यथं परिपच्यते । वीणावेणुस्वनोमिश्रं गीतं नाट्यविडम्बितम् ।। ५५ ।।
विचित्रांश्च कथाः शृण्वन् भुक्त्वा वर्धयते बलम् । सुखस्पर्शविहारं च सम्यगाप्नोत्यतोऽन्यथा ।। ५६ ।।
भोजन के बाद मुहूर्त भर आराम करके धीरे २ सौ कदम टहले तथा फिर सुखपूर्वक अच्छी तरह (आराम से) बैठ जाय। इस प्रकार उसका खाया हुआ अन्न बिना बाधा के पच जाता है। भोजन करते हुए अथवा भोजन के बाद वीणा तथा वेणु के शब्द से मिश्रित गीत (गाना), नाटक का देखना तथा विचित्र कथाओं के सुनने² से बल बढ़ता है। तथा वह सुखकारक स्पर्श और विहार को अच्छी प्रकार प्राप्त करता है। सुश्रुत सू. अ. ४६ में कहा है कि भोजन के बाद जब तक अन्न का क्लम (भारीपन–नशा) रहे तब तक सुखपूर्वक आराम करे। उसके बाद सौ कदम अर्थात् थोड़ी दूर टहल कर बांई करवट से लेट जाना चाहिये। तथा भोजन के बाद मनुष्य को मन को प्रसन्न करने वाले शब्द, रूप, रस, गन्ध एवं स्पर्श का सेवन करना चाहिये। भोजन के बाद शारीरिक तथा मानसिक आराम करना बहुत आवश्यक है। अंगरेजी में एक कहावत है—(After dinner reot awhile) भोजन के बाद विश्राम न करने से खाया हुआ अन्न सम्यक् प्रकार से नहीं पचता है जिससे अजीर्ण, वमन, अतिसार आदि शिकायतें हो जाती हैं। इसीलिये कहा भी है—
व्यायामं च व्यवायं च धावनं यानमेव च । युद्धं गीतं च पाठं च मुहूर्तं भुक्तवांस्त्यजेत् ।। ५४-५५ ।।
अतिस्निग्धातिशुष्काणां गुरूणां चातिसेवनात् । जन्तोरत्यम्बुपानाच्च वातविण्मूत्रधारणात् ।। ५७ ।।
रात्रौ जागरणात् स्वप्नाह्निवा विषमभोजनात् । असात्म्यसेवनाच्चैव न सम्यक् परिपच्यते ।। ५८ ।।
इसके विपरीत अतिस्निग्ध, अतिशुष्क तथा गुरु पदार्थों के अत्यन्त सेवन से, वायु, मल तथा मूत्र के धारण करने
१. शृण्वन् भुक्त्वात्यत्रत्यपदक्रमस्वरसतो भोजनसमये गीतवाद्यादिश्रवणं रुचिवर्धकत्वेन बलवृद्ध्यादिजनकत्या आधुनिकपाश्चात्यसंप्रदायवदनुकूलं प्रतीयते, 'अजल्पन्नहसंस्तन्मना भुञ्जीत' इति चरकोक्तेः, 'शब्दरूपरसान् गन्धान् स्पर्शांश्च मनसः प्रियान्। भुक्तवानुपसेवेत' इति सुश्रुतोक्तेश्च संवादो यद्यपेक्षेत तदा 'भुक्त्वा शृण्वन्' इति पदव्यत्ययेनान्वयो विधेयः।
२. 'शृण्वन् भुक्त्वा' इस पदक्रम के स्वारस्य के अनुसार भोजन के समय गीत वाद्य आदि का सुनना रुचिवर्धक तथा बलवर्धक होने से आधुनिक पाश्चात्य सम्प्रदाय के अनुकूल प्रतीत होता है। इसके विपरीत चरक के 'अजल्पन्नहसंस्तन्मना भुञ्जीत' तथा 'शब्दरूपान् रसान् गन्धान् स्पर्शांश्च मनसः प्रियान्। भुक्तवानुपसेवेत' को यदि दृष्टि में रखा जाय तो 'भुक्त्वा शृण्वन्' यह अन्वय करना चाहिये। अर्थात् यदि पाश्चात्यमत को दृष्टि में रखा जाय तो वे लोग भोजन के समय गाना बजाना, रेडियो आदि सुनते हैं तब 'शृण्वन् भुक्त्वा' यह अन्यव होना चाहिये। इसके विपरात चरक तथा सुश्रुत के प्राचीन आर्ष मतों को दृष्टि में रखा जाय तो वे भोजन के समय शान्त भाव से भोजन करने को कहते हैं तथा उसके बाद गाना, बजाना आदि का विधान बतलाते हैं। इसके अनुसार 'भुक्त्वा शृण्वन्' यह अन्वय किया जा सकता है।
रसदोषविभागीयाध्यायः ६] खिलस्थानम् ३९५
से, रात्रि जागरण से, दिन में सोने से, विषम भोजन तथा असात्म्य सेवन के द्वारा प्राणी का खाया हुआ अन्न ठीक प्रकार से नहीं पचता है ॥५६-५८॥
हिताहितं यदैकध्यं भुक्तं समशनं तु तत् । पूर्वभक्तेऽपरिणते विद्यादध्यशनं भिषक् ॥५९॥
क्षुत्तृष्णोपरमे जाते शान्तेऽग्नौ प्रमृताशनात् (नम्) । विषमं गुणसंस्कारात् क्रमसात्म्यव्यतिक्रमात् ॥६०॥
हितकर और अहितकर दोनों प्रकार के पदार्थ एक ही समय या एक साथ मिलाकर भोजन करना समशन कहलाता है। पूर्व भोजन का पूरा परिपाक न होने पर भी पुनः भोजन करना अध्यशन कहलाता है। क्षुधा तथा तृष्णा के नष्ट हो जाने एवं अग्नि के शान्त हो जाने पर प्रमृताशन कहलाता है तथा गुणों के संस्कार और सात्म्य क्रम के बदल जाने से विषमाशन कहलाता है। सुश्रुत सू. अ. ४६ में भी ऐसा कहा है ॥
विरुद्धं पयसा मत्स्या यथा वा गुडमूलकम् । स्यादजीर्णाशनं नाम व्युष्टाजीर्णे चतुर्विधे ॥६१॥
तथैवात्यशनं ज्ञेयमतिमात्रोपयोगतः । स.....तान्यामयोत्पत्तौ मूलहेतुं प्रचक्षते ॥६२॥
दूध तथा मछली परस्पर विरुद्ध हैं। इसी प्रकार गुड़ और मूली भी परस्पर विरुद्ध हैं। चार प्रकार का व्युष्टाजीर्ण (प्रभात काल में हुआ अजीर्ण) अजीर्णाशन कहलाता है। इसी प्रकार मात्रा में अधिक भोजन करना अत्यशन कहलाता है। ये सब रोगों की उत्पत्ति के मूल कारण माने गये हैं ॥६१-६२॥
आहारसात्म्यं देशेषु येषु येषु यथा यथा । प्रोक्तं तथोपदेष्टव्यं तेषु तेषु तथा तथा ॥६३॥
जिन २ देशों में जो २ आहार सात्म्य माना गया है उन २ देशों में उसी २ आहार का उसी प्रकार उपदेश करना चाहिये ॥६३॥
चतुर्विंशतिरित्येते विकल्पाः समुदाहृताः । भिषजा ह्युपदेष्टव्या राज्ञो राजोपमस्य वा ॥६४॥
अन्येषां वा वसुमतां यशोधर्मार्थसिद्धये ।
ये आहार के २४ विकल्प कहे गये हैं। यश, धर्म एवं अर्थ (धन) की सिद्धि के लिये वैद्य को राजा तथा राजा के समान अन्य ऐश्वर्यशाली व्यक्तियों के लिये उपदेश करना चाहिये ॥६४॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥
(इति) खिलेषु भोज्यविभागीयो (नाम पञ्चमोऽध्यायः) ॥५॥
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
(इति) खिलेषु भोज्यविभागीयो (नाम पञ्चमोऽध्यायः) ॥५॥
अथ रसदोषविभागीयाध्यायः षष्ठः ।
अथातो रसदोषविभागीयँ नामाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥
| ३९६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | रसदोषविभागीयाध्यायः ६] |
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अब हम रसदोषविभागीय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥
रसदोषविभागज्ञः प्रकोपोपशमं प्रति। भिषग्भिषक्त्वं लभते विपर्ययमथान्यथा ॥३॥
रस और दोष के विभाग को जानने वाला वैद्य रोगों के प्रकोप तथा शान्ति के प्रति भिषक्त्व (वैद्यत्व) को प्राप्त करता है। अर्थात् रस और दोषों के विभाग को जानने वाला वैद्य ही वस्तुतः वैद्य कहलाता है। यदि वह इससे विपरीत है तो वैद्य कहलाने के योग्य नहीं है ॥३॥
तस्माद्दोषविकल्पांश्च विकल्पांश्च रसाश्रयान्। प्रवक्ष्यामि यथाशास्त्रं सविशेषं सविस्तरम् ॥४॥
इसलिये मैं शास्त्र के अनुसार दोषों तथा रसों के भेदों को विशेषज्ञान एवं विस्तार सहित कहूंगा ॥४॥
व्यासतःस्तु ज्वरादीनां व्याधीनां दोषभेदतः।
द्विषष्टिधा कल्पनोक्ता स्थूलसंख्या त्वतः परम् ॥५॥
ज्वरों के विस्तार तथा रोगों के दोष भेद के अनुसार इनकी ६२ कल्पनाएं कही गई हैं। इसके बाद इनकी स्थूल संख्या कही जायेंगी। सुश्रुत उ. अ. ६६ में भी कहा है-भिन्ना दोषास्त्रयो गुणाः । द्विषष्ट्या भवन्त्येते भूयिष्ठमिति निश्चयः ॥५॥
एकैकशस्त्रयो द्वन्द्वैर्नव सर्वे त्रयोदश। क्षीणाधिकसमैश्चान्यैर्दश द्वौ च प्रकीर्तिताः ॥६॥
पृथक् २ दोषों के अनुसार तीन विकार होते हैं। द्वन्द्वज (द्विदोषज) विकार ९ होते हैं। तथा सम्पूर्ण दोषों (सन्निपात) से १३ विकार होते हैं। क्षीण, अधिक तथा समता के अनुसार दोषों की संख्या १२ होती है अर्थात् पृथक् २ दोषों के अनुसार ३, द्वन्द्व के अनुसार ९, सन्निपात के अनुसार १३, इस प्रकार बढ़े हुए दोषों को दृष्टि में रखते हुए कुल २५ विकार होते हैं। बढ़े हुए दोषों की तरह ही क्षीण हुए दोषों के अनुसार भी २५ विकार होते हैं। क्षीणवृद्ध तथा समता के अनुसार दोषों की संख्या-१२ इस प्रकार कुल विकारों की संख्या=२५+२५+१२=६२ चरक सू. अ. १७ तथा सुश्रुत उ. अ. ६६ में भी ये ही ६२ भेद दिये गये हैं ॥६॥
तेषां विभागं वक्ष्यामि विस्तरेण यथाक्रमम्। एकैकशस्त्रयो ज्ञेया वातपित्तकफैर्गदाः ॥७॥
समैर्द्वन्द्वैस्त्रयः षट तु विषमैर्नव ते स्मृताः।
द्व्यधिकैकाधिकैः षट् च हीनमध्याधिकैश्च षट् ॥८॥
एकः समैस्त्रिभिर्दोषैरित्यातङ्कास्त्रयोदश। दोषैरेतैर्विवृद्धैः स्युर्विकल्पाः पञ्चविंशतिः ॥९॥
अब मैं उनके विभाग को क्रमशः विस्तारपूर्वक कहूंगा। पृथक् २ दोषों (की वृद्धि) से तीन विकार होते हैं। यथा— १. वातवृद्ध, २. पित्तवृद्ध ३. कफवृद्ध अर्थात् एकदोषज विकार ३ होते हैं। द्वन्द्वज विकार ९ होते हैं। इनमें से दोनों दोष समता से बढ़े हुए हों तो ३ विकार होते हैं—१. वातपित्त (दोनों समवृद्ध), २. वात-कफ (दोनों समवृद्ध), ३. पित्त-कफ (दोनों समवृद्ध), द्वन्द्वज विकारों में यदि दोष विषमता से बढ़े हुए हों तो ६ विकार होते हैं—१. वातवृद्ध (पित्तवृद्धतर), २. पित्त-वृद्ध (वातवृद्धतर), ३. कफ-वृद्ध (पित्तवृद्धतर), ४. पित्त-वृद्ध (कफवृद्धतर), ५. वात-वृद्ध (कफवृद्धतर), ६. कफ-वृद्ध (वातवृद्धतर)। इस प्रकार वृद्ध दोष द्वन्द्वज (संसर्गज) विकार ३+६=९ होते हैं।
सन्निपात से १३ विकार होते हैं। इनमें दो दोष तथा एक दोष की अधिकता से ६ विकार होते हैं। इनमें से दो दोष अधिक बढ़े हुए हों तो निम्न तीन विकार होते हैं। यथा—१. कफवृद्ध वातपित्त दोनों अधिक वृद्ध, २. पित्त वृद्ध वातकफ दोनों अधिक वृद्ध, ३. वातवृद्ध पित्तकफ दोनों अधिक वृद्ध, सन्निपात में एक दोष अधिक बढ़ा हुआ हो तो