भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 754, कुल 942 में से

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पृष्ठ 754
३९४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्भोज्योपक्रमणीयाध्यायः ५]

भागद्वयमिहान्नस्य तृतीयमुदकस्य च ।। ५३ ।।
वायोः संचरणार्थं च चतुर्थमवशेषयेत् ।

कुक्षि के चार भागों में से दो भाग अन्न (ठोस आहार) द्रव्य से तथा तीसरा जल (द्रव पदार्थ–Liquids) से भरना चाहिये और चौथा भाग वायु की गति के लिये खाली रखना चाहिये। यह अर्धसौहित्य की दृष्टि से कहा गया है। इसमें मूर्त आहार आमाशय के १/२ भाग में रहते हैं। अष्टाङ्ग हृदय सू. अ. १० में भी कहा है कि यदि आमाशय के अवकाश (रिक्त) स्थान को चार भागों में विभक्त किया जाय तो उसमें से दो भाग अन्न द्वारा तथा एक भाग पेय पदार्थों से भरकर चौथा स्थान (भाग) वायु आदि की गति के लिये खाली रखना चाहिये ।। ५३ ।।

ततो मुहूर्त्तमाश्वस्य गत्वा पादशतं शनैः ।। ५४ ।।
स्वासीनस्य सुखेनान्नमव्यथं परिपच्यते । वीणावेणुस्वनोमिश्रं गीतं नाट्यविडम्बितम् ।। ५५ ।।
विचित्रांश्च कथाः शृण्वन् भुक्त्वा वर्धयते बलम् । सुखस्पर्शविहारं च सम्यगाप्नोत्यतोऽन्यथा ।। ५६ ।।

भोजन के बाद मुहूर्त भर आराम करके धीरे २ सौ कदम टहले तथा फिर सुखपूर्वक अच्छी तरह (आराम से) बैठ जाय। इस प्रकार उसका खाया हुआ अन्न बिना बाधा के पच जाता है। भोजन करते हुए अथवा भोजन के बाद वीणा तथा वेणु के शब्द से मिश्रित गीत (गाना), नाटक का देखना तथा विचित्र कथाओं के सुनने² से बल बढ़ता है। तथा वह सुखकारक स्पर्श और विहार को अच्छी प्रकार प्राप्त करता है। सुश्रुत सू. अ. ४६ में कहा है कि भोजन के बाद जब तक अन्न का क्लम (भारीपन–नशा) रहे तब तक सुखपूर्वक आराम करे। उसके बाद सौ कदम अर्थात् थोड़ी दूर टहल कर बांई करवट से लेट जाना चाहिये। तथा भोजन के बाद मनुष्य को मन को प्रसन्न करने वाले शब्द, रूप, रस, गन्ध एवं स्पर्श का सेवन करना चाहिये। भोजन के बाद शारीरिक तथा मानसिक आराम करना बहुत आवश्यक है। अंगरेजी में एक कहावत है—(After dinner reot awhile) भोजन के बाद विश्राम न करने से खाया हुआ अन्न सम्यक् प्रकार से नहीं पचता है जिससे अजीर्ण, वमन, अतिसार आदि शिकायतें हो जाती हैं। इसीलिये कहा भी है—
व्यायामं च व्यवायं च धावनं यानमेव च । युद्धं गीतं च पाठं च मुहूर्तं भुक्तवांस्त्यजेत् ।। ५४-५५ ।।

अतिस्निग्धातिशुष्काणां गुरूणां चातिसेवनात् । जन्तोरत्यम्बुपानाच्च वातविण्मूत्रधारणात् ।। ५७ ।।
रात्रौ जागरणात् स्वप्नाह्निवा विषमभोजनात् । असात्म्यसेवनाच्चैव न सम्यक् परिपच्यते ।। ५८ ।।

इसके विपरीत अतिस्निग्ध, अतिशुष्क तथा गुरु पदार्थों के अत्यन्त सेवन से, वायु, मल तथा मूत्र के धारण करने


१. शृण्वन् भुक्त्वात्यत्रत्यपदक्रमस्वरसतो भोजनसमये गीतवाद्यादिश्रवणं रुचिवर्धकत्वेन बलवृद्ध्यादिजनकत्या आधुनिकपाश्चात्यसंप्रदायवदनुकूलं प्रतीयते, 'अजल्पन्नहसंस्तन्मना भुञ्जीत' इति चरकोक्तेः, 'शब्दरूपरसान् गन्धान् स्पर्शांश्च मनसः प्रियान्। भुक्तवानुपसेवेत' इति सुश्रुतोक्तेश्च संवादो यद्यपेक्षेत तदा 'भुक्त्वा शृण्वन्' इति पदव्यत्ययेनान्वयो विधेयः।

२. 'शृण्वन् भुक्त्वा' इस पदक्रम के स्वारस्य के अनुसार भोजन के समय गीत वाद्य आदि का सुनना रुचिवर्धक तथा बलवर्धक होने से आधुनिक पाश्चात्य सम्प्रदाय के अनुकूल प्रतीत होता है। इसके विपरीत चरक के 'अजल्पन्नहसंस्तन्मना भुञ्जीत' तथा 'शब्दरूपान् रसान् गन्धान् स्पर्शांश्च मनसः प्रियान्। भुक्तवानुपसेवेत' को यदि दृष्टि में रखा जाय तो 'भुक्त्वा शृण्वन्' यह अन्वय करना चाहिये। अर्थात् यदि पाश्चात्यमत को दृष्टि में रखा जाय तो वे लोग भोजन के समय गाना बजाना, रेडियो आदि सुनते हैं तब 'शृण्वन् भुक्त्वा' यह अन्यव होना चाहिये। इसके विपरात चरक तथा सुश्रुत के प्राचीन आर्ष मतों को दृष्टि में रखा जाय तो वे भोजन के समय शान्त भाव से भोजन करने को कहते हैं तथा उसके बाद गाना, बजाना आदि का विधान बतलाते हैं। इसके अनुसार 'भुक्त्वा शृण्वन्' यह अन्वय किया जा सकता है।

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