भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 755

रसदोषविभागीयाध्यायः ६] खिलस्थानम् ३९५

से, रात्रि जागरण से, दिन में सोने से, विषम भोजन तथा असात्म्य सेवन के द्वारा प्राणी का खाया हुआ अन्न ठीक प्रकार से नहीं पचता है ॥५६-५८॥

हिताहितं यदैकध्यं भुक्तं समशनं तु तत् । पूर्वभक्तेऽपरिणते विद्यादध्यशनं भिषक् ॥५९॥
क्षुत्तृष्णोपरमे जाते शान्तेऽग्नौ प्रमृताशनात् (नम्) । विषमं गुणसंस्कारात् क्रमसात्म्यव्यतिक्रमात् ॥६०॥

हितकर और अहितकर दोनों प्रकार के पदार्थ एक ही समय या एक साथ मिलाकर भोजन करना समशन कहलाता है। पूर्व भोजन का पूरा परिपाक न होने पर भी पुनः भोजन करना अध्यशन कहलाता है। क्षुधा तथा तृष्णा के नष्ट हो जाने एवं अग्नि के शान्त हो जाने पर प्रमृताशन कहलाता है तथा गुणों के संस्कार और सात्म्य क्रम के बदल जाने से विषमाशन कहलाता है। सुश्रुत सू. अ. ४६ में भी ऐसा कहा है ॥

विरुद्धं पयसा मत्स्या यथा वा गुडमूलकम् । स्यादजीर्णाशनं नाम व्युष्टाजीर्णे चतुर्विधे ॥६१॥
तथैवात्यशनं ज्ञेयमतिमात्रोपयोगतः । स.....तान्यामयोत्पत्तौ मूलहेतुं प्रचक्षते ॥६२॥

दूध तथा मछली परस्पर विरुद्ध हैं। इसी प्रकार गुड़ और मूली भी परस्पर विरुद्ध हैं। चार प्रकार का व्युष्टाजीर्ण (प्रभात काल में हुआ अजीर्ण) अजीर्णाशन कहलाता है। इसी प्रकार मात्रा में अधिक भोजन करना अत्यशन कहलाता है। ये सब रोगों की उत्पत्ति के मूल कारण माने गये हैं ॥६१-६२॥

आहारसात्म्यं देशेषु येषु येषु यथा यथा । प्रोक्तं तथोपदेष्टव्यं तेषु तेषु तथा तथा ॥६३॥

जिन २ देशों में जो २ आहार सात्म्य माना गया है उन २ देशों में उसी २ आहार का उसी प्रकार उपदेश करना चाहिये ॥६३॥

चतुर्विंशतिरित्येते विकल्पाः समुदाहृताः । भिषजा ह्युपदेष्टव्या राज्ञो राजोपमस्य वा ॥६४॥
अन्येषां वा वसुमतां यशोधर्मार्थसिद्धये ।

ये आहार के २४ विकल्प कहे गये हैं। यश, धर्म एवं अर्थ (धन) की सिद्धि के लिये वैद्य को राजा तथा राजा के समान अन्य ऐश्वर्यशाली व्यक्तियों के लिये उपदेश करना चाहिये ॥६४॥

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥
(इति) खिलेषु भोज्यविभागीयो (नाम पञ्चमोऽध्यायः) ॥५॥


ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
(इति) खिलेषु भोज्यविभागीयो (नाम पञ्चमोऽध्यायः) ॥५॥


अथ रसदोषविभागीयाध्यायः षष्ठः ।

अथातो रसदोषविभागीयँ नामाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥