काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 756, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३९६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | रसदोषविभागीयाध्यायः ६] |
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अब हम रसदोषविभागीय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥
रसदोषविभागज्ञः प्रकोपोपशमं प्रति। भिषग्भिषक्त्वं लभते विपर्ययमथान्यथा ॥३॥
रस और दोष के विभाग को जानने वाला वैद्य रोगों के प्रकोप तथा शान्ति के प्रति भिषक्त्व (वैद्यत्व) को प्राप्त करता है। अर्थात् रस और दोषों के विभाग को जानने वाला वैद्य ही वस्तुतः वैद्य कहलाता है। यदि वह इससे विपरीत है तो वैद्य कहलाने के योग्य नहीं है ॥३॥
तस्माद्दोषविकल्पांश्च विकल्पांश्च रसाश्रयान्। प्रवक्ष्यामि यथाशास्त्रं सविशेषं सविस्तरम् ॥४॥
इसलिये मैं शास्त्र के अनुसार दोषों तथा रसों के भेदों को विशेषज्ञान एवं विस्तार सहित कहूंगा ॥४॥
व्यासतःस्तु ज्वरादीनां व्याधीनां दोषभेदतः।
द्विषष्टिधा कल्पनोक्ता स्थूलसंख्या त्वतः परम् ॥५॥
ज्वरों के विस्तार तथा रोगों के दोष भेद के अनुसार इनकी ६२ कल्पनाएं कही गई हैं। इसके बाद इनकी स्थूल संख्या कही जायेंगी। सुश्रुत उ. अ. ६६ में भी कहा है-भिन्ना दोषास्त्रयो गुणाः । द्विषष्ट्या भवन्त्येते भूयिष्ठमिति निश्चयः ॥५॥
एकैकशस्त्रयो द्वन्द्वैर्नव सर्वे त्रयोदश। क्षीणाधिकसमैश्चान्यैर्दश द्वौ च प्रकीर्तिताः ॥६॥
पृथक् २ दोषों के अनुसार तीन विकार होते हैं। द्वन्द्वज (द्विदोषज) विकार ९ होते हैं। तथा सम्पूर्ण दोषों (सन्निपात) से १३ विकार होते हैं। क्षीण, अधिक तथा समता के अनुसार दोषों की संख्या १२ होती है अर्थात् पृथक् २ दोषों के अनुसार ३, द्वन्द्व के अनुसार ९, सन्निपात के अनुसार १३, इस प्रकार बढ़े हुए दोषों को दृष्टि में रखते हुए कुल २५ विकार होते हैं। बढ़े हुए दोषों की तरह ही क्षीण हुए दोषों के अनुसार भी २५ विकार होते हैं। क्षीणवृद्ध तथा समता के अनुसार दोषों की संख्या-१२ इस प्रकार कुल विकारों की संख्या=२५+२५+१२=६२ चरक सू. अ. १७ तथा सुश्रुत उ. अ. ६६ में भी ये ही ६२ भेद दिये गये हैं ॥६॥
तेषां विभागं वक्ष्यामि विस्तरेण यथाक्रमम्। एकैकशस्त्रयो ज्ञेया वातपित्तकफैर्गदाः ॥७॥
समैर्द्वन्द्वैस्त्रयः षट तु विषमैर्नव ते स्मृताः।
द्व्यधिकैकाधिकैः षट् च हीनमध्याधिकैश्च षट् ॥८॥
एकः समैस्त्रिभिर्दोषैरित्यातङ्कास्त्रयोदश। दोषैरेतैर्विवृद्धैः स्युर्विकल्पाः पञ्चविंशतिः ॥९॥
अब मैं उनके विभाग को क्रमशः विस्तारपूर्वक कहूंगा। पृथक् २ दोषों (की वृद्धि) से तीन विकार होते हैं। यथा— १. वातवृद्ध, २. पित्तवृद्ध ३. कफवृद्ध अर्थात् एकदोषज विकार ३ होते हैं। द्वन्द्वज विकार ९ होते हैं। इनमें से दोनों दोष समता से बढ़े हुए हों तो ३ विकार होते हैं—१. वातपित्त (दोनों समवृद्ध), २. वात-कफ (दोनों समवृद्ध), ३. पित्त-कफ (दोनों समवृद्ध), द्वन्द्वज विकारों में यदि दोष विषमता से बढ़े हुए हों तो ६ विकार होते हैं—१. वातवृद्ध (पित्तवृद्धतर), २. पित्त-वृद्ध (वातवृद्धतर), ३. कफ-वृद्ध (पित्तवृद्धतर), ४. पित्त-वृद्ध (कफवृद्धतर), ५. वात-वृद्ध (कफवृद्धतर), ६. कफ-वृद्ध (वातवृद्धतर)। इस प्रकार वृद्ध दोष द्वन्द्वज (संसर्गज) विकार ३+६=९ होते हैं।
सन्निपात से १३ विकार होते हैं। इनमें दो दोष तथा एक दोष की अधिकता से ६ विकार होते हैं। इनमें से दो दोष अधिक बढ़े हुए हों तो निम्न तीन विकार होते हैं। यथा—१. कफवृद्ध वातपित्त दोनों अधिक वृद्ध, २. पित्त वृद्ध वातकफ दोनों अधिक वृद्ध, ३. वातवृद्ध पित्तकफ दोनों अधिक वृद्ध, सन्निपात में एक दोष अधिक बढ़ा हुआ हो तो