भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 757

रसदोषविभागीयाध्यायः ६] खिलस्थानम् ३९७

निम्न ३ विकार होते हैं। यथा—१. पित्त कफ दोनों वृद्ध वात अधिक वृद्ध, २. वात कफ दोनों वृद्ध पित्त अधिक वृद्ध, ३. वात पित्त दोनों वृद्ध कफ अधिक वृद्ध, तीनों दोषों के हीन, मध्य एवं अधिक भेद से सन्निपात ६ प्रकार के होते हैं। यथा—१. वात वृद्ध, पित्त वृद्धतर, कफ वृद्धतम, २. वात वृद्ध, कफ वृद्धतर, पित्त वृद्धतम, ३. पित्त वृद्ध, कफ वृद्धतर, वात वृद्धतम, ४. पित्त वृद्ध, वात वृद्धतर, कफ वृद्धतम, वात वृद्धतम, ५. कफ वृद्ध, वात वृद्धतर, पित्त वृद्धतम, ६. कफ वृद्ध, पित्त वृद्धतर, वातवृद्धतम, हीन, मध्य एवं अधिक का अभिप्राय यही है कि सन्निपातों में क्रमशः एक दोष कम बढ़ा हुआ हो, एक मध्यम बढ़ा हुआ हो तथा एक अधिक बढ़ा हुआ हो। अर्थात् तीनों दोष बढ़े हुए होते हैं परन्तु उन तीनों में भी एक कम, एक मध्यम तथा एक अधिक बढ़ा हुआ होता है। सन्निपात में तीनों दोष यदि समान रूप से बढ़े हुए हों तो एक विकार होता है। यथा—१. वात पित्त कफ तीनों समवृद्ध अर्थात् द्वयुल्वण ३+एकोल्वण ३+हीन मध्य एवं अधिक भेद से ६+समवृद्ध १=१३ सन्निपात विकार होते हैं। इस प्रकार बढ़े हुए दोषों को दृष्टि में रखते हुए २५ विकार होते हैं। यथा—एक दोषज ३+द्विदोषज ९+सान्निपातिक १३=२५ ।।७-९।।

दोषैः क्षीणैरपि गदा दृष्ट्वैवं पञ्चविंशतिः ।

इसी प्रकार वृद्ध दोषों की तरह क्षीण दोषों को दृष्टि में रखते हुए भी २५ ही विकार होते हैं। अर्थात् पूर्ववत् एक दोषज ३, द्विदोषज ९ तथा सन्निपात से १३ विकार होते हैं। यथा—पृथक् २ एक दोषज) क्षीण विकार ३ होते हैं। यथा—१. वात क्षीण, २. पित्त क्षीण, ३. कफ क्षीण, द्विदोषज (संसर्गज) विकार ९ होते हैं। इन क्षीण द्विदोषजों में दोनों दोषों के समान रूप से क्षीण होने पर ३ विकार होते हैं। यथा—१. वात पित्त दोनों समक्षीण, २. वात कफ दोनों समक्षीण, ३. पित्त कफ दोनों समक्षीण, यदि दोनों दोष विषमता से क्षीण हों तो ६ विकार होते हैं। यथा—१. वातक्षीण पित्त क्षीणतर, २. पित्त क्षीण वात क्षीणतर, ३. वात क्षीण कफ क्षीणतर, ४. कफ क्षीण वात क्षीणतर, ५. कफ क्षीण पित्त क्षीणतर, ६. पित्त क्षीण कफ क्षीणतर, इस प्रकार क्षीण दोष द्वन्द्वज रोग ३+६-९ होते हैं। सन्निपात में दो दोषों के अतिक्षीण होने से ३ विकार होते हैं। यथा—१. वातक्षीण पित्त कफ दोनों अतिक्षीण, २. पित्त क्षीण वात कफ दोनों अतिक्षीण, ३. कफ क्षीण वात पित्त दोनों अति क्षीण, सन्निपात में एक दोष के अतिक्षीण होने से ३ भेद होते हैं। यथा—१. वात पित्त दोनों क्षीण कफ अतिक्षीण, २. वात कफ दोनों क्षीण पित्त अतिक्षीण, ३. पित्त कफ दोनों क्षीण वात अतिक्षीण, सन्निपात में हीन, मध्य एवं अधिक के भेद से ६ विकार होते हैं। यथा—१. कफ क्षीण, पित्त क्षीणतर, वात क्षीणतम, २. वात क्षीण, कफ क्षीण, पित्त क्षीणतर, वात क्षीणतम ३. पित्त क्षीण, कफ क्षीणतर, वात क्षीणतम, ४. कफ क्षीण, वात क्षीणतर, पित्त क्षीणतम, ५. वात क्षीण, पित्त क्षीणतर, कफ क्षीणतम, ६. पित्त क्षीण, वात क्षीणतर, कफ क्षीणतम, यहां हीन, मध्य तथा अधिक से अभिप्राय क्रमशः कम क्षीण, मध्यम क्षीण तथा अधिक क्षीण से है। सन्निपात में तीनों दोषों के समक्षीण होने से १ विकार होता है। यथा—१. वात पित्त कफ तीनों समक्षीण अर्थात् क्षीण दोष सन्निपात ३+३+६+१=१३ होते हैं। इस प्रकार क्षीण दोषों को दृष्टि में रखते हुए ३+९+१३=२५ विकार होते हैं॥

द्विक्षीणैरेकवृद्धैः स्युरेकक्षीणैर्द्विवृद्धलैः ।।१०।।
षट् षट् क्षीणाधिकसमैर्दश द्वौ चापरे गदाः ।

दो दोष क्षीण तथा एक वृद्ध और एक दोष क्षीण तथा दो वृद्ध से ६ भेद होते हैं। तथा एक क्षीण एक वृद्ध तथा एक सम के भेद से ६ हैं। इस प्रकार ये १२ विकार होते हैं। अर्थात्—दो का क्षय तथा एक की वृद्धि इस भेद से ३ विकार होते हैं। यथा—१. कफ पित्त दोनों क्षीण वात वृद्ध, २. वात कफ दोनों क्षीण पित्त वृद्ध, ३. वात पित्त दोनों क्षीण कफ वृद्ध, एक का क्षय तथा दो की वृद्धि इस भेद से ३ विकार होते हैं। यथा—१. वातक्षीण कफ पित्त दोनों