काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 758, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें३९८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रसदोषविभागाध्यायः ६]
वृद्ध, २. पित्त क्षीण वात कफ दोनों वृद्ध, ३. कफ क्षीण वात पित्त दोनों वृद्ध, एक का क्षय, एक की वृद्धि तथा एक की समता के अनुसार ६ भेद होते हैं। यथा—१. कफ क्षीण, पित्त सम, वात वृद्ध, २. पित्त क्षीण, कफ सम, वात वृद्ध, ३. वात क्षीण, कफ सम, पित्त वृद्ध, ४. कफ क्षीण, वात सम, पित्त वृद्ध, ५. वात क्षीण, पित्त सम, कफ वृद्ध, ६. पित्त क्षीण, वात सम, कफ वृद्ध, ये विकार १२ होते हैं। इस प्रकार दोषों के परिणाम के भेद से २५+२५+१२=६२ विकार होते हैं। चरक सू. अ. १७ में भी ये ही ६२ विकार दिये हैं ॥१०॥
इति द्विषष्टिसंख्येषा विकाराणां विकल्पशः ॥११॥
वातपित्तकफैरेको दश स्यात् प्रकृतिस्थितैः ।
इस प्रकार विकल्प (भेद) के अनुसार विकारों की संख्या ६२ होती है। इसके अतिरिक्त वात पित्त तथा कफ के प्रकृतिस्थ होने पर एक भेद और होता है। अष्टाङ्ग हृदय में भी इन ६२ दोष भेदों के अतिरिक्त एक ६३ वां भेद और दिया है। वहां कहा है—'त्रिषष्टः स्वास्थ्यकारणम्'। यह ६३ वां भेद आरोग्य का कारण माना गया है। इस अवस्था में वात पित्त कफ तीनों अपने परिमाण में स्थित होते हैं। इसका अभिप्राय यह है कि पूर्वोक्त ६२ भेद रोग के कारण होते हैं ॥११॥
रसानां तु विकल्पाः स्युरेकैकश्येनः षट् स्मृताः ॥१२॥
पूर्वः पूर्वः परैर्युक्तो द्विकाः पञ्चदशापरे ।
रसों के विकल्प—एक रस वाले ६ भेद होते हैं। यथा—१. मधुर, २. अम्ल, ३. लवण, ४. कटु, ५. तिक्त, ६. कषाय द्विक (दो रसों का संयोग)—पूर्व २ रस अगले २ रस के साथ मिलकर १५ योग बनाता है। चरक सू. अ. २६ में भी द्विकों के १५ भेद दिये हैं। इसी प्रकार सुश्रुत उ. अ. ६३ में भी कहा है ॥१२॥
रसेषु त्रिषु पूर्वेषु विकल्पाः स्युस्त्रयोऽधिकाः ॥१३॥
द्विकेषु त्रिष्वथैकैकं संयोज्य कटुकादिभिः । कट्वादिषु तथा पूर्वैः स्वादम्ललवणैः पृथक् ॥१४॥
अष्टादशैते द्वाभ्यां च त्रिकाभ्यां विंशतिस्त्रिकाः ।
मधुर, अम्ल तथा लवण आदि प्रथम तीन रसों से तीन अधिक भेद (द्विकों के) हो जाते हैं (मधुराम्ल, मधुरलवण तथा अम्ललवण) इन तीनों द्विकों के साथ कटु आदि (कटु, तिक्त, कषाय) एक २ को जोड़कर (संयुक्त करके) तथा कटु आदि तीनों द्विकों (कटु तिक्त, कटु कषाय, तिक्त कषाय) के साथ पूर्वोक्त मधुर आदियों (मधुर, अम्ल, लवण) को जोड़ने से १८ भेद (द्विक) बन जाते हैं। इनमें दो त्रिकों (मधुराम्ललवण तथा कटुतिक्तकषाय) को जोड़ने से १८+२=२० त्रिक बन जाते हैं ॥१३-१४॥
पूर्वोत्तराभ्यां मधुरव्योषादिभ्यां यथाक्रमम् ॥१५॥
ये द्विकास्त्रिषु पूर्वेषु योज्यास्ते त्रिभिरुत्तरैः । प्रत्येकशो नवैते स्युर्विकल्पा षडिहान्यथा ॥१६॥
युक्ताः स्वादम्ललवणाः पृथक् कट्वादिभिस्त्रिभिः ।
कट्वादयस्तथा पूर्वैरित्येते दश पञ्च च ॥१७॥
चतुष्काः पञ्चकाः षट् स्युरेकैकस्य विवर्जनात् ।
पूर्व एवं उत्तर (पहले एवं पिछले) मधुर (मधुर, अम्ल, लवण) तथा कटु (कटु, तिक्त, कषाय) आदि के जो द्विक हैं (अर्थात् मधुराम्ल, मधुरलवण एवं अम्ललवण तथा कटुतिक्त, कटुकषाय एवं तिक्तकषाय) उनमें पहले तीन के साथ पिछले तीन को क्रमशः जोड़ने से ९ चतुष्क बनते हैं। तथा संयुक्त मधुर, अम्ल, लवण तीनों को कटु, तिक्त एवं कषाय