भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 759

रसदोषविभागीयाध्यायः ६] खिलस्थानम् ३९९

के साथ तथा कटु, तिक्त एवं कषाय को मधुर, अम्ल, लवण के साथ पृथक् २ मिलाने से ६ चतुष्क बनते हैं। इस प्रकार ९+६=१५ चतुष्क होते हैं॥१५-१७॥

षड्भिरेके रसैस्तेषां कल्पनेयं त्रिषष्ठिधा ॥१८॥

पञ्चक (पांच रसों वाले) द्रव्य—छओं रसों में से एक २ रस को छोड़ने से ५ रस वाले द्रव्य ६ होते हैं। चरक सू. अ. २६ में भी कहा है—'षट् तु पञ्चरसान्याहुरेकैकस्यापवर्जनात्।' ६ रस वाले द्रव्य—एक हैं। इस प्रकार कल्पना के अनुसार ६+१५+२०+१५+६+१=६३ रसों के भेद होते हैं। चरक सू. अ. २६ में तथा सुश्रुत उ. अ. ६३ में भी इसी प्रकार कहा है॥१८॥

संयोगाः सप्तपञ्चाशदसंयुक्तास्तु षड्रसाः। षडेव त्रिषु युज्यन्ते रसा दोषेषु योगतः ॥१९॥

संयुक्त रस ५७ होते हैं। अर्थात् उपर्युक्त ६३ में से पृथक् २ एक २ रस को छोड़ने से शेष ५७ भेद होते हैं। ये संयोग दो २, तीन २, चार २, पांच २ तथा छ रसों के संयोग से होते हैं। असंयुक्त (पृथक् २ मधुर अम्ल आदि) रस ६ होते हैं। वातपित्त तथा कफ रूप तीनों दोषों में भिन्न २ योग के अनुसार ये ६ रस ही प्रयुक्त होते हैं। कहीं एक रस का प्रयोग किया जाता है, कहीं दो का तथा दोष की यदि अधिक वृद्धि हो तो कहीं तीन रस इत्यादि का प्रयोग किया जाता है। इसी प्रकार चरक सू. अ. २६ में भी कहा है॥१९॥

क्वचिदेकः क्वचिद् द्वौ च दोषवृद्ध्या क्वचित्त्रयः। हीनमध्यातिक्रुद्धानां दोषाणां तु यथाक्रमम्॥२०॥
हीनमध्याधिकैरेवं रसैः कुर्यादुपक्रमम्। द्व्युद्वलैकोद्वलानां च समानां चैव तद्विधैः ॥२१॥

हीन, मध्य तथा वृद्ध दोषों की यथाक्रम हीन, मध्य तथा अधिक (वृद्ध) रसों के द्वारा ही चिकित्सा करनी चाहिये। द्व्युल्बण, एकोल्बण तथा समान वृद्ध दोषों की भी इसी प्रकार के रसों से चिकित्सा करनी चाहिये॥२०-२१॥

वृद्धानां क्षपणं कार्यं मध्यानां यापनं तथा। क्षीणानां वर्धनं चैव रसवृद्धिप्रमाणतः ॥२२॥

रस की वृद्धि के प्रमाण के अनुसार बढ़े हुए दोषों को घटाने का, समावस्था में स्थित दोषों को स्थिर रखने का तथा क्षीण हुए दोषों को बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिये। अर्थात् यदि दोष अपने प्रमाण से अधिक बढ़े हुए हैं तो उन्हें कम करने का प्रयत्न करना चाहिये तथा यदि दोष स्वप्रमाण से घटे हुए हैं तो उन्हें बढ़ाकर अपने प्रमाण में लाने का प्रयत्न करना चाहिये। ये दोनों अवस्थाएँ विषम हैं तथा रोग या अस्वास्थ्य को सूचित करती हैं। तीसरी अवस्था स्वस्थ व्यक्ति की है अर्थात् दोष अपने स्वाभाविक परिमाण में स्थित हों। इस अवस्था में दोषों के स्वाभाविक परिमाण को स्थिर रखने का प्रयत्न करना चाहिये। यही आयुर्वेद का प्रधान उद्देश्य है। इसे आजकल के विज्ञान के अनुसार Prophilactic या Preventive Treatment अथवा Hygiene कह सकते हैं। दोषों की विषमता होकर रोग उत्पन्न ही न होने पावें—यह श्रेष्ठ प्रयत्न है। इसीलिये सुश्रुत में स्वास्थ्य का रक्षण भी आयुर्वेद का प्रयोजन बताते हुए भगवान् धन्वन्तरि ने कहा है—'इह खल्वायुर्वेदप्रयोजनं-व्याध्युपसृष्टानां व्याधिपरिमोक्षः स्वस्थस्य रक्षणं च। चरक सू. अ. ३० में भी यही प्रयोजन बतलाया गया है। परन्तु वहां अनुक्रम उलटा है और वही स्वाभाविक भी है। उत्पन्न होते हुए व्यक्ति जन्म के समय साधारणतया स्वस्थ एवं नीरोग ही होते हैं। बाद में प्रज्ञापराध आदि के कारण ही व्याधियां हो जाती हैं। इसलिये प्रजाहित के लिये आयुर्वेद की उत्पत्ति प्रजा की उत्पत्ति के साथ या उससे पहले हुई—उसका प्रयोजन भी यही था कि स्वस्थ व्यक्ति किस प्रकार से अपने स्वास्थ्य को स्थिर रख सके। इसीलिये चरक में कहा भी है—'धातुसाम्यक्रिया चोक्ता तन्त्रस्यास्य प्रयोजनम्'॥

विशेषोऽत्र यथायोगं कार्यो रसविपर्ययात्।
(इति ताडपत्रपुस्तके २१२ तमं पत्रम्।)