काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 760, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४०० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | रसदोषविभागीयाध्यायः ६] |
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एवं द्विषष्टिदोषाणां रसैरेषां द्विषष्टिभिः ।। २३ ।।
साम्यं तैः षट्कैरेवैकः स्वस्थवृत्तौ प्रयुज्यते ।
रसों के विपर्यय से योग के अनुसार इसमें परिवर्तन करना पड़ता है । इस प्रकार ६२ रसों के द्वारा ६२ दोषों की चिकित्सा करनी चाहिये । परन्तु ६ रसों के योग से जो एक रस (मधुराम्ललवणकटुतिक्तकषाय) बनता है उससे दोष समावस्था में स्थित रहते हैं तथा वही स्वस्थवृत्त (स्वस्थावस्था) में प्रयुक्त होता है । अर्थात् रसों की ६३ कल्पनायें कही गई हैं । तथा कुपित और अकुपित दोषों के भेद भी ६३ ही दिये गये हैं । इनमें कुपित ६२ प्रकार के दोषों में ६२ प्रकार के ही रसों की कल्पना का उपयोग होता है तथा ६३ वें (समधातु वा समदोष) में ६३ वें रस भेद (छओं रसों के मिश्रण) का सेवन करना चाहिये ।। २३ ।।
कटुतिक्तकषायांस्तु रसान् प्राज्ञो यथाक्रमम् ।। २४ ।।
योगतः कफजे व्याधौ भैषज्यमवतारयेत् ।
बुद्धिमान् व्यक्ति कटु, तिक्त तथा कषाय रसों को क्रमशः सम्यक् योग के द्वारा कफज व्याधि में भैषज्य के रूप में प्रयुक्त करे ।। २४ ।।
प्रयुक्तः कटुकः पूर्वं पैच्छिल्यं गौरवं च यत् ।। २५ ।।
श्लेष्मणस्तं निहन्त्याशु तिक्तस्तस्मादनन्तरम् । ह्रासयत्यास्यमाधुर्यं कफं संशोषयत्यपि ।। २६ ।।
संगृह्णाति कषायश्च स्नेहं चास्यापकर्षति ।
इनमें से प्रयुक्त किया गया कटु रस सर्वप्रथम श्लेष्मा (कफ) की पिच्छिलता तथा गौरवता को शीघ्र ही नष्ट कर देता है । इसके बाद तिक्त रस मुख की मधुरता को नष्ट करता है तथा कफ का शोषण करता है । और कषाय रस इसका संग्रहण करता है तथा श्लेष्मा के स्नेह का अपकर्षण करता है अर्थात् इसके स्नेहांश को कम करता है ।। २५-२६ ।।
तिक्तस्वादुकषायाः स्युः क्रमशः पैत्तिके हिताः ।। २७ ।।
आमान्वयत्वात् पित्तस्य पूर्वं तिक्तोऽवचारितः । पाचयत्याशु तं पक्वं ततस्तु मधुरो रसः ।। २८ ।।
शैत्याद् गुरुत्वात् स्नेहाच्च माधुर्याच्च नियच्छति । तद्द्रवत्वविघातार्थं कषायश्चावचारितः ।। २९ ।।
रौक्ष्याद्विशोषिभावाच्च विशोषयति तैजसम् ।
तिक्त, स्वादु एवं कषाय रस क्रमशः पैत्तिक रोगों में हितकर हैं । पित्त में आमरस का संसर्ग होने से प्रारम्भ में प्रयुक्त किया गया तिक्तरस उस आम का शीघ्र ही पाचन कर देता है । उसके बाद मधुर रस अपनी शीतलता, गुरुता (गौरव), स्निग्धता तथा मधुरता के कारण उस पके हुए पित्त को शान्त कर देता है । उसके बाद उसकी द्रवता को नष्ट करने के लिये कषाय रस का प्रयोग किया जाता है । यह कषाय रस अपनी रूक्षता तथा विशोषण के स्वभाव के कारण इस पित्त का शोषण कर देता है ।। २७-२९ ।।
वातिके लवणः पूर्वं संयोगादवचारितः ।। ३० ।।
प्रक्लेदिभावाज्जयति विबन्धं मातरिश्वनः । निहन्ति शैत्यमुष्णत्वाद् गुरुत्वाच्चापि लाघवम् ।। ३१ ।।
तथैवाम्लो रसः पश्चात्सस्नेहेवावचारितः । जडीकृतानि स्रोतांसि तैक्ष्ण्यादुद्घाट्य मारुतम् ।। ३२ ।।
अनुलोमयति क्षिप्रं स्निग्धोष्णत्वाद्द्विमार्गगम् । अम्लादनन्तरं पश्चात् प्रयुक्तो मधुरो रसः ।। ३३ ।।
वायोर्लघुत्वं वैशद्यं रूक्षत्वं च व्यपोहति । गुरुत्वात् पिच्छिलत्वाच्च स्निग्धत्वाच्च यथाबलम् ।। ३४ ।।
इत्युक्ताः सर्वरोगेषु रसानां प्रविचारणाः ।