भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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[रसदोषविभागीयाध्यायः ६] खिलस्थानम् ४०१

वातरोगों में सर्वप्रथम संयोग के द्वारा प्रयुक्त किया गया लवणरस क्लेद के कारण वायु के विबन्ध को शान्त करता है। यही लवण रस उष्ण होने के कारण वायु की शीतलता को तथा गुरु होने के कारण वायु की लघुता को नष्ट कर देता है। उसके बाद वातरोग में प्रयुक्त किया गया अम्लरस अपनी तीक्ष्णता के कारण जडीभूत स्रोतों का उद्घाटन करके (खोलकर) स्निग्धता तथा उष्णता के कारण विमार्गस्थित वायु का शीघ्र ही अनुलोमन करता है। अर्थात् प्रतिकूल मार्ग में जाती हुई वायु का अनुलोमन करता है अर्थात् अनुकूल मार्ग में लाता है। अम्लरस के अनन्तर प्रयुक्त किया गया मधुर रस अपने बल के अनुसार गुरुता, पिच्छिलता तथा स्निग्धता के कारण वायु की लघुता, विशदता तथा रूक्षता को नष्ट करता है। इस प्रकार सम्पूर्ण (वातिक, पैत्तिक तथा श्लैष्मिक) रोगों में रसों के भेद कहे गये हैं। अर्थात् जिन रोगों में जिन रसों का प्रयोग किया जाना चाहिए-इसका निर्देश किया गया है। कौन २ से रस किस २ दोष को शान्त करते हैं तथा किन २ को बढ़ाते हैं इस विषय में चरक वि. अ. १ में तथा सु. सू. अ. ४२ में भी विस्तृत रूप से कहा है ॥३०-३४॥

दृश्यन्ते प्रायशो योगा रोगेषूक्ता ज्वरादिषु ॥३५॥
कटुतिक्तकषायाश्च रसतो मधुरास्तथा।
वातज्वरे यथापूर्वं पेयायूषरसादिषु । लवणोऽम्लश्च युज्येते रसौ संस्कारयोगिनौ ॥३६॥
ततो विदारिगन्धादिर्मधुरः संप्रयुज्यते ।

ज्वर आदि रोगों में प्रायः कटु, तिक्त, कषाय तथा मधुर रस वाले योग कहे गये हैं। वातज्वर में पहले पेया, यूष तथा रस आदियों में संस्कार से युक्त लवण एवं अम्ल रस का प्रयोग किया जाता है। इसके बाद विदारिगन्ध आदि मधुर द्रव्यों का प्रयोग किया जाता है ॥३५-३६॥

पित्तज्वरे यथा तिक्तः शार्ङ्गष्टादिः प्रयुज्यते ॥३७॥
मधुरः सारिवादिश्ञ्च, कषायश्चाभयादिकः ।

पित्तज्वर में शार्ङ्गेष्टा (काकजंघा अथवा काकमाची) आदि तिक्त, सारिवा आदि मधुर तथा अभया (हरीतकी) आदि कषाय द्रव्य प्रयुक्त किये जाते हैं ॥३७॥

पिप्पल्यादिर्यथापूर्वं कटुकः कफजे ज्वरे ॥३८॥
आरग्वधादिकस्तिक्तः, कषायस्त्रिफलादिकः ।

कफज (श्लैष्मिक) ज्वर में यथापूर्वं पिप्पली आदि कटु, आरग्वध (अमलतास) आदि तिक्त तथा त्रिफला आदि कषाय द्रव्यों का प्रयोग करना चाहिये ॥३८॥

सर्वत्रैवानया युक्त्या यथोद्दिष्टान्त्रसान् बुधः ॥३९॥
यथादोषं यथायोगं प्रयुञ्जीत यथेप्सितम् । प्रक्षेपैरवकषैश्च द्रव्याणामन्यथाऽन्यथा ॥४०॥

बुद्धिमान् व्यक्ति सर्वत्र इसी उपर्युक्त युक्ति से यथोद्दिष्ट रसों को दोष एवं योग के अनुसार द्रव्यों के प्रक्षेप (बढ़ाना) तथा अपकर्ष (घटाने) के द्वारा इच्छानुसार प्रयुक्त करे ॥३९-४०॥

यथा वा वीणया वीणी तन्त्रीणां स्वरके विदः । उत्कर्षश्चावकर्षंश्च स्वरान् सम्यक् प्रयोजयेत् ॥४१॥
विन्दन् नानाविकल्पैश्च ग्रामरागांश्च दर्शयेत् । स्वरमण्डलतत्त्वज्ञो विकल्पैर्बहुविस्तरैः ॥४२॥
तथैव शास्त्रतत्त्वज्ञो योगज्ञः प्रतिपत्तिमान् । व्याधौ बलाबलज्ञश्च प्रकृतिज्ञश्च योगवान् ॥४३॥
उत्कर्षश्चावकर्षंश्च प्रयोगाच्छास्त्रकोविदः । केवलैः शीतवीर्यैश्च तथैवोष्णैश्च वीर्यतः ॥४४॥