भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 762

४०२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रसदोषविभागीयाध्यायः ६]

शीतैरुष्णैश्च संसृक्तैर्द्रव्यैर्योगान् प्रयोजयेत् । कार्त्स्न्यतश्च प्रयुञ्जीत यथावदनुपूर्वशः ।।४५।।

जिस प्रकार तन्त्रियों के स्वरों को जानने वाला वीणावादक व्यक्ति आरोह तथा अवरोह के द्वारा ठीक प्रकार से स्वरों को प्रयुक्त करता है तथा स्वरमण्डलों के तत्त्व को जानने वाला अनेक विस्तृत विकल्पों (भेदों) के द्वारा ज्ञान प्राप्त करके ग्रामरोगों का प्रदर्शन करता है अर्थात् ७ स्वरों के ही आरोह अवरोह के द्वारा नाना भेद हो जाते हैं। उसी प्रकार शास्त्रों के तत्त्व, योग, युक्ति, रोग के बलाबल तथा प्रकृति को जानने वाला शास्त्र का पण्डित प्रयोगों के उत्कर्ष तथा अपकर्ष के द्वारा केवल शीतवीर्य, केवल उष्णवीर्य अथवा शीतवीर्य एवं उष्णवीर्य दोनों प्रकार के द्रव्यों के संयोग से बनाये हुए योगों का सम्पूर्णरूप में अथवा क्रमशः धीरे २ प्रयोग करे ।।४१-४५।।

समुच्चयैर्विकल्पैश्च नानारससमुच्चयैः । युञ्जीत बहुधा योगान्नृत्तं गीतवशादिव ।।४६।।

नाना रसों से बने हुए योगों का समुच्चय (सामूहिक) तथा विकल्प (पृथक् २) रूप में नृत्य तथा गीत की तरह प्रयोग करे ।।४६।।

समस्योक्तं पृथक्चोक्तं संप्रधार्य बलाबलम् । द्विषष्टिर्दोषभेदा ये निर्दिष्टास्तानतः परम् ।।४७।। स्थानानि दश संगृह्य प्रवक्ष्यामि सविस्तरम् ।

इस प्रकार दोषों के बलाबलको देखकर सम एवं पृथक् रूप में जो दोषों के ६२ भेद कहे गये हैं उन्हें अब १० स्थानों के अनुसार विभक्त करके विस्तार पूर्वक कहूँगा।

वक्तव्य—दस स्थानों से अभिप्राय रस-रक्त आदि सात धातु एवं वात पित्त कफ तीन दोषों (मिलकर दस होते हैं) से प्रतीत होता है ।।४७।।

त्रय एकैकशस्तेषां ये च वृद्धास्त्रयः समाः ।।४८।। समैरेकश्च सप्तैते क्षयवृद्ध्या चतुर्दश । स्थानवृद्ध्या भवेत्तेषां चत्वारिंशोत्तरं शतम् ।।४९।।

वे दोष पृथक् २ तीन हैं। यथा १. वात २. पित्त ३. कफ तथा समानरूप से एक २ दोष की वृद्धि के अनुसार भी वे तीन हैं। यथा १. वातवृद्ध २. पित्तवृद्ध ३. कफवृद्ध। तथा दोषों के समावस्था में स्थित होने पर एक भेद होता है। यथा—१. समवात पित्त कफ। ये सात भेद होते हैं। क्षय के अनुसार भी ये सात दोष होते हैं। इस प्रकार वृद्धि एवं क्षय के अनुसार ये भेद ७×२=१४ हो जाते हैं। तथा १० स्थानों की वृद्धि के अनुसार इनके १४×१०=१४० भेद हो जाते हैं ।।४८-४९।।

व्युदस्यैतानतः शेषा ये त्रिंशद्दश चाष्ट च । ते भेदं यान्त्यमेयत्वाच्छतशोऽथ सहस्रशः ।।५०।। द्वन्द्वानां विषमाणां तु षण्णामन्यतमं बुधः । स्वस्थानाद्वर्धयेत्तावद्यावत् स्यात् स्थानमष्टमम् ।।५१।।

इन १४ भेदों को छोड़कर जो शेष अर्थात् ६२—१४=४८ भेद बचते हैं, उनके अपरिमित होने से सैकड़ों तथा हजारों भेद हो जाते हैं। ६ विषमद्वन्द्वों—(१-वातवृद्ध पित्तवृद्ध तर, २. पित्त वृद्ध वात वृद्धतर, ३. कफ वृद्ध पित्त वृद्धतर, ४. पित्त वृद्ध कफ वृद्धतर, ५. वात वृद्ध कफ वृद्धतर ६. कफ वृद्ध वात वृद्धतर) को एक २ को लेकर अपने स्थान से तब तक बढ़ाये जब तक कि आठवें स्थान तक न पहुंच जायं। इस प्रकार ये ६×८=४८ भेद होते हैं ।।५०-५१।।

एकैकशो द्विशश्चैव चतुर्विंशद्भवन्ति ते । ह्रासेनैकेकंशश्चापि विंशन्नव च भेदतः ।।५२।। एवमेते त्रिपञ्चाशद् द्वन्द्वेनैकेन दर्शिताः ।