भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 763

रसदोषविभागीयाध्यायः ६] खिलस्थानम् ४०३

पृथक् २ एक दोष तथा द्वन्द्वों के अनुसार वे २४ हो जाते हैं। अर्थात् पृथक् २ दोष तीन तथा द्वन्द्वज ९ होते हैं जो कि मिलकर १२ होते हैं। इनके ह्रास तथा वृद्धि के अनुसार १२×२=२४ भेद हो जाते हैं। एक २ दोष के ह्रास के द्वारा २९ भेद और हो जाते हैं। इस प्रकार एक द्वन्द्व के द्वारा ये २४+२९=५३ भेद हो जाते हैं ॥५२॥

एषैव युक्तिः शिष्टानां द्वन्द्वानां स्यान्न संशयः ॥५३॥
शतत्रयं भवत्येवमेषामष्टादशोत्तरम् ।

अवशिष्ट (६-१=५) द्वन्द्वों के भी इसी प्रकार से योग बन जाते हैं। इस प्रकार ६ द्वन्द्वों से ये कुल ५३×६=३१८ भेद हो जाते हैं ॥५३॥

द्व्युद्वलैकोद्वलानां च तावदेव विनिर्दिशेत् ॥५४॥

इसी प्रकार सन्निपातों में द्वयुल्बण तथा एकोल्बण (३+३=६) दोषों के भी इतने ही भेद होते हैं ॥५४॥

हीनमध्याधिका दोषाः स्वे स्वे स्थाने व्यवस्थिताः ।
स्वस्थानात् सप्तमं स्थानमेकैकश्येन यान्ति ते ॥५५॥
द्वौ च द्वौ च समस्ताश्च तेषां षट् सप्तकास्तथा ।
भवन्ति ह्रासयेत्तांश्च यथा(स्था)नमधः क्रमात् ॥५६॥
पञ्चाशीतिमत्तस्तेषां भेदानां परिचक्षते ।
एष एव विकल्पः स्याच्छेषाणां प्रविभागशः ॥५७॥
शतानि सप्त षटिश्च द्वौ च भेदा भवन्ति ते ।
एवं सहस्त्रं भेदानां वृद्धैस्त्रीणि शतानि च ॥५८॥
दोषैर्नवतिरष्टौ च क्षीणैस्तावन्त एव ते ।

हीन मध्य एवं अधिक के अनुसार अर्थात् तर-तम आदि के अनुसार अपने २ स्थान पर स्थित हुए दोष अपने स्थान से एक २ करके सप्तम स्थान तक पहुंचते हैं। इस प्रकार समस्त दोष मिलकर चार, छै और सात अर्थात् १७ बन जाते हैं। इसी प्रकार इन्हें यथास्थान उलटे क्रम से कम करते जायें। इस प्रकार ये १७×५=८५ भेद हो जाते हैं। इसी प्रकार शेष द्वन्द्वों के भी विभागपूर्वक ये ही भेद हो जाते हैं। ये ७६२ भेद हो जाते हैं। इस प्रकार वृद्ध दोषों के ३१८+३१८+७६२=१३९८ भेद हो जाते हैं। इसी प्रकार क्षीण दोषों के भी इतने ही अर्थात् १३९८ भेद होते हैं ॥५५-५८॥

द्विक्षीणैरेकवृद्धैः स्युः षट् च त्रीणि शतानि च ॥५९॥
यावन्त्येव च भेदानामेकक्षीणैर्द्विरुद्वलैः ।
क्षीणाधिकसमैः षट् च षट् च षट् च शतानि च ॥६०॥

(इति ताडपत्रपुस्तके २१३ तमं पत्रम्)

क्रम एवात्र भागः स्याद्यो द्वन्द्वेषु निदर्शितः ।

दो क्षीण तथा एक वृद्ध दोष वाले द्वन्द्व के ३०६ भेद होते हैं। इसी प्रकार एक क्षीण तथा दो वृद्ध दोष वाले द्वन्द्व के भी इतने ही अर्थात् ३०६ भेद होते हैं। पूर्व द्वन्द्वों का जो क्रम बताया है उसके अनुसार क्षीण, अधिक एवं सम दोषों के ६१२ भेद हो जाते हैं ॥५९-६०॥

चतुर्दश विनिर्दिष्टाः सविकल्पास्तयोः पृथक् ॥६१॥