काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 764, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४०४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | रसदोषविभागीयाध्यायः ६] |
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तैः सार्धमेषां सर्वेषां कार्त्स्न्येनैव विभावयेत् । सहस्त्राणि च चत्वारि शतं षष्ट्युत्तरं तथा ।। ६२ ।।
इनके अतिरिक्त जो पहले १४ भेद बताये हैं उनके भेद अर्थात् १४x१० = १४० पृथक् समझने चाहिये । इन १४० भेदों के साथ इन उपर्युक्त सम्पूर्ण भेदों को गिनने से १३९८+१३९८+३०६+३०६+६१२+१४०=४१६० भेद हो जाते हैं।
एतावन्तो ज्वराद्यानां भेदाः प्रोक्ता यथागमम् । अथैतेषु चतुर्योगविभागगतिकर्मतः ।। ६३ ।।
सहस्रं सन्निपातानां विद्यात् सनवकं भिषक् ।
ज्वर आदियों के भी शास्त्रानुसार इतने ही भेद कहे गये हैं। इनमें योग, विभाग, गति एवं कर्म इन चार के अनुसार सन्निपातों के भी नौ हजार भेद समझने चाहिये ॥६३॥
अत ऊर्ध्वं रसानां तु वक्ष्यते भेदविस्तरः ।। ६४ ।।
अब हम विस्तारपूर्वक रसों के भेदों का वर्णन करेंगे ॥६४॥
कर्मस्थानानि दोषाणां भाववृद्ध्या यथाक्रमम् ।
तथा रसानां षट् कुर्यात् स्थानानीति विनिश्चयः ।। ६५ ।।
यथाक्रम वृद्धि के अनुसार दोषों के कर्म एवं स्थान के समान निश्चय से रसों के भी ६ स्थान होते हैं ॥६५॥
तदेव कर्म सर्वेषां द्विकादीनां क्षयं विना । भवत्येवं द्विकानां तु पञ्चषष्ट्युत्तरं शतम् ।। ६६ ।।
क्षय के बिना सम्पूर्ण द्विकों के भी वे ही कर्म होते हैं इस प्रकार द्विकों (१५) के १६५ भेद होते हैं ॥६६॥
त्रिकानां च सविंशानि षट्शतानि विनिर्दिशेत् । चतुष्कानां सहस्रं च पञ्चषष्ट्युत्तरं वदेत् ।। ६७ ।।
त्रिकों के ६२० भेद होते हैं तथा चतुष्कों के १०६५ भेद होते हैं ॥६७॥
पञ्चकाणां शतान्यष्टौ स्याच्छतं च षडुत्तरम् । षष्ठकानां शते द्वे तु शतं चैकादशोत्तरम् ।। ६८ ।।
संयुक्तानां विकल्पोऽयं सविकल्पाः षडेककः ।
पञ्चकों के ९०६ भेद होते हैं तथा षष्ठकों (६ रसों के संयोग) के ३११ भेद होते हैं। इसप्रकार संयुक्त रसों के ये उपर्युक्त विकल्प (भेद) हैं तथा एक (पृथक् २) रस ६ होते हैं ॥६८॥
समानां रसभेदानामेकमेकं तु पिण्डितम् ।। ६९ ।।
त्रिसप्ततिर्भवत्येषां सहस्रत्रयमेव च ।
इस प्रकार सब समान रसों को परस्पर मिलाकर इनके १६५+६२०+१०६५+९०६+३११+६=३०७३ भेद होते हैं॥
रसदोषविकल्पानामतिसौक्ष्म्यादतः परम् । न वक्ष्यामि महाभाग ! न तु बुद्धिपरिक्षयात् ।। ७० ।।
हे महाभाग ! इससे आगे बुद्धि के क्षीण होने के कारण नहीं, अपितु रसों तथा दोषों के भेदों के अत्यन्त सूक्ष्म होने से नहीं वर्णन करूंगा। अर्थात् इससे आगे रसों तथा दोषों के भेद अत्यन्त सूक्ष्म हो जाते हैं इसलिये उनका मैं वर्णन नहीं करूंगा। इसका तुम यह तात्पर्य मत समझना कि इससे आगे बुद्धि की पहुंच नहीं है ॥७०॥
अतः परमिदानीं रसभेदान् विस्तरेणोपदेक्ष्यामः । तद्यथा-मधुराम्ललवणकटुकतिक्तकषायाः षड्रसाः । एषामिदानीं रसानां विकल्पास्त्रिषष्टिर्भवन्ति । तत्रैकैकश्येन षट् । तद्यथा-मधुर एव, अम्ल एव, लवण एव, कटुक एव, तिक्त एव, कषाय एव ।। ७१ ।।