काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
रसदोषविभागीयाध्यायः ६] खिलस्थानम् ४०३
पृथक् २ एक दोष तथा द्वन्द्वों के अनुसार वे २४ हो जाते हैं। अर्थात् पृथक् २ दोष तीन तथा द्वन्द्वज ९ होते हैं जो कि मिलकर १२ होते हैं। इनके ह्रास तथा वृद्धि के अनुसार १२×२=२४ भेद हो जाते हैं। एक २ दोष के ह्रास के द्वारा २९ भेद और हो जाते हैं। इस प्रकार एक द्वन्द्व के द्वारा ये २४+२९=५३ भेद हो जाते हैं ॥५२॥
एषैव युक्तिः शिष्टानां द्वन्द्वानां स्यान्न संशयः ॥५३॥
शतत्रयं भवत्येवमेषामष्टादशोत्तरम् ।
अवशिष्ट (६-१=५) द्वन्द्वों के भी इसी प्रकार से योग बन जाते हैं। इस प्रकार ६ द्वन्द्वों से ये कुल ५३×६=३१८ भेद हो जाते हैं ॥५३॥
द्व्युद्वलैकोद्वलानां च तावदेव विनिर्दिशेत् ॥५४॥
इसी प्रकार सन्निपातों में द्वयुल्बण तथा एकोल्बण (३+३=६) दोषों के भी इतने ही भेद होते हैं ॥५४॥
हीनमध्याधिका दोषाः स्वे स्वे स्थाने व्यवस्थिताः ।
स्वस्थानात् सप्तमं स्थानमेकैकश्येन यान्ति ते ॥५५॥
द्वौ च द्वौ च समस्ताश्च तेषां षट् सप्तकास्तथा ।
भवन्ति ह्रासयेत्तांश्च यथा(स्था)नमधः क्रमात् ॥५६॥
पञ्चाशीतिमत्तस्तेषां भेदानां परिचक्षते ।
एष एव विकल्पः स्याच्छेषाणां प्रविभागशः ॥५७॥
शतानि सप्त षटिश्च द्वौ च भेदा भवन्ति ते ।
एवं सहस्त्रं भेदानां वृद्धैस्त्रीणि शतानि च ॥५८॥
दोषैर्नवतिरष्टौ च क्षीणैस्तावन्त एव ते ।
हीन मध्य एवं अधिक के अनुसार अर्थात् तर-तम आदि के अनुसार अपने २ स्थान पर स्थित हुए दोष अपने स्थान से एक २ करके सप्तम स्थान तक पहुंचते हैं। इस प्रकार समस्त दोष मिलकर चार, छै और सात अर्थात् १७ बन जाते हैं। इसी प्रकार इन्हें यथास्थान उलटे क्रम से कम करते जायें। इस प्रकार ये १७×५=८५ भेद हो जाते हैं। इसी प्रकार शेष द्वन्द्वों के भी विभागपूर्वक ये ही भेद हो जाते हैं। ये ७६२ भेद हो जाते हैं। इस प्रकार वृद्ध दोषों के ३१८+३१८+७६२=१३९८ भेद हो जाते हैं। इसी प्रकार क्षीण दोषों के भी इतने ही अर्थात् १३९८ भेद होते हैं ॥५५-५८॥
द्विक्षीणैरेकवृद्धैः स्युः षट् च त्रीणि शतानि च ॥५९॥
यावन्त्येव च भेदानामेकक्षीणैर्द्विरुद्वलैः ।
क्षीणाधिकसमैः षट् च षट् च षट् च शतानि च ॥६०॥
(इति ताडपत्रपुस्तके २१३ तमं पत्रम्)
क्रम एवात्र भागः स्याद्यो द्वन्द्वेषु निदर्शितः ।
दो क्षीण तथा एक वृद्ध दोष वाले द्वन्द्व के ३०६ भेद होते हैं। इसी प्रकार एक क्षीण तथा दो वृद्ध दोष वाले द्वन्द्व के भी इतने ही अर्थात् ३०६ भेद होते हैं। पूर्व द्वन्द्वों का जो क्रम बताया है उसके अनुसार क्षीण, अधिक एवं सम दोषों के ६१२ भेद हो जाते हैं ॥५९-६०॥
चतुर्दश विनिर्दिष्टाः सविकल्पास्तयोः पृथक् ॥६१॥
| ४०४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | रसदोषविभागीयाध्यायः ६] |
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तैः सार्धमेषां सर्वेषां कार्त्स्न्येनैव विभावयेत् । सहस्त्राणि च चत्वारि शतं षष्ट्युत्तरं तथा ।। ६२ ।।
इनके अतिरिक्त जो पहले १४ भेद बताये हैं उनके भेद अर्थात् १४x१० = १४० पृथक् समझने चाहिये । इन १४० भेदों के साथ इन उपर्युक्त सम्पूर्ण भेदों को गिनने से १३९८+१३९८+३०६+३०६+६१२+१४०=४१६० भेद हो जाते हैं।
एतावन्तो ज्वराद्यानां भेदाः प्रोक्ता यथागमम् । अथैतेषु चतुर्योगविभागगतिकर्मतः ।। ६३ ।।
सहस्रं सन्निपातानां विद्यात् सनवकं भिषक् ।
ज्वर आदियों के भी शास्त्रानुसार इतने ही भेद कहे गये हैं। इनमें योग, विभाग, गति एवं कर्म इन चार के अनुसार सन्निपातों के भी नौ हजार भेद समझने चाहिये ॥६३॥
अत ऊर्ध्वं रसानां तु वक्ष्यते भेदविस्तरः ।। ६४ ।।
अब हम विस्तारपूर्वक रसों के भेदों का वर्णन करेंगे ॥६४॥
कर्मस्थानानि दोषाणां भाववृद्ध्या यथाक्रमम् ।
तथा रसानां षट् कुर्यात् स्थानानीति विनिश्चयः ।। ६५ ।।
यथाक्रम वृद्धि के अनुसार दोषों के कर्म एवं स्थान के समान निश्चय से रसों के भी ६ स्थान होते हैं ॥६५॥
तदेव कर्म सर्वेषां द्विकादीनां क्षयं विना । भवत्येवं द्विकानां तु पञ्चषष्ट्युत्तरं शतम् ।। ६६ ।।
क्षय के बिना सम्पूर्ण द्विकों के भी वे ही कर्म होते हैं इस प्रकार द्विकों (१५) के १६५ भेद होते हैं ॥६६॥
त्रिकानां च सविंशानि षट्शतानि विनिर्दिशेत् । चतुष्कानां सहस्रं च पञ्चषष्ट्युत्तरं वदेत् ।। ६७ ।।
त्रिकों के ६२० भेद होते हैं तथा चतुष्कों के १०६५ भेद होते हैं ॥६७॥
पञ्चकाणां शतान्यष्टौ स्याच्छतं च षडुत्तरम् । षष्ठकानां शते द्वे तु शतं चैकादशोत्तरम् ।। ६८ ।।
संयुक्तानां विकल्पोऽयं सविकल्पाः षडेककः ।
पञ्चकों के ९०६ भेद होते हैं तथा षष्ठकों (६ रसों के संयोग) के ३११ भेद होते हैं। इसप्रकार संयुक्त रसों के ये उपर्युक्त विकल्प (भेद) हैं तथा एक (पृथक् २) रस ६ होते हैं ॥६८॥
समानां रसभेदानामेकमेकं तु पिण्डितम् ।। ६९ ।।
त्रिसप्ततिर्भवत्येषां सहस्रत्रयमेव च ।
इस प्रकार सब समान रसों को परस्पर मिलाकर इनके १६५+६२०+१०६५+९०६+३११+६=३०७३ भेद होते हैं॥
रसदोषविकल्पानामतिसौक्ष्म्यादतः परम् । न वक्ष्यामि महाभाग ! न तु बुद्धिपरिक्षयात् ।। ७० ।।
हे महाभाग ! इससे आगे बुद्धि के क्षीण होने के कारण नहीं, अपितु रसों तथा दोषों के भेदों के अत्यन्त सूक्ष्म होने से नहीं वर्णन करूंगा। अर्थात् इससे आगे रसों तथा दोषों के भेद अत्यन्त सूक्ष्म हो जाते हैं इसलिये उनका मैं वर्णन नहीं करूंगा। इसका तुम यह तात्पर्य मत समझना कि इससे आगे बुद्धि की पहुंच नहीं है ॥७०॥
अतः परमिदानीं रसभेदान् विस्तरेणोपदेक्ष्यामः । तद्यथा-मधुराम्ललवणकटुकतिक्तकषायाः षड्रसाः । एषामिदानीं रसानां विकल्पास्त्रिषष्टिर्भवन्ति । तत्रैकैकश्येन षट् । तद्यथा-मधुर एव, अम्ल एव, लवण एव, कटुक एव, तिक्त एव, कषाय एव ।। ७१ ।।
रसदोषविभागीयाध्यायः ६] खिलस्थानम् ४०५
इसके बाद अब मैं रसों के भेदों का विस्तारपूर्वक वर्णन करूंगा। उदाहरण के लिये मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय—ये ६ रस होते हैं। इन ६ रसों के ६३ भेद होते हैं। इनमें से पृथक् २ रस ६ होते हैं। यथा—१. अकेला मधुर (सन्तानिकागोदुग्धातिकम्) २. अकेला अम्ल (आमकर्मार्दादिकम्) ३. अकेला लवण (रोमकादिकम्) ४. कटु (चव्यादिकम्) ५. तिक्त (निम्बपर्पटादिकम्) ६. कषाय (पद्मन्यग्रोधाद्यङ्कुरादिकम्) ।।७१।।
पूर्वः पूर्वः परैर्युक्तो द्विकः, ते पञ्चदश भवन्ति। तत्र मधुरः पञ्चभिरम्लादिभिर्युज्यते। तद्यथा—मधुराम्लः, मधुरलवणः, मधुरकटुकः, मधुरतिक्तः, मधुरकषाय इति। अम्लश्चतुर्भिर्लवणादिभिः; तद्यथा—अम्ललवणः, अम्लकटुकः अम्लतिक्तः, अम्लकषाय इति। लवणस्त्रिभिः कटुकादिभिः; तद्यथा—लवणकटुः, लवणतिक्तः, लवणकषाय इति। कटुकस्तिक्तकषायाभ्यां द्वाभ्यां; तद्यथा—कटुतिक्तः, कटुकषाय इति। तिक्तः कषायेण च। तद्यथा—तिक्तकषाय इति। ते पञ्चदश एव। ते द्विकाः पञ्चदशविकल्पा भवन्ति; मधुरसंयोगेन पञ्च भवन्ति, अम्लसंयोगेन चत्वारः, लवणसंयोगेन त्रयः, कटुसंयोगेन द्वौ, तिक्तसंयोगेनैकइति। पूर्वेषु त्रिषु रसेषु मधुराम्ललवणेषु त्रयोऽधिका निष्पद्यन्ते। मधुराम्लः, मधुरलवणः, अम्ललवण इति।।
पूर्व रस अगले रस के साथ मिलकर द्विक बनते हैं। ये १५ होते हैं। इनमें से मधुर रस अम्ल आदि ५ रसों के साथ संयुक्त होता है। यथा—१. मधुराम्ल (वदरकपित्थफलादिकम्) २. मधुर लवण (उष्ट्रीक्षीरोरभ्रमांसादिकम्) ३. मधुर कटु (कुक्कुरशृगालमांसादिकम्) ४. मधुर तिक्त (श्रीवाससर्जरसादिकम्) ५. मधुर कषाय (तैलधन्वनफलादिकम्)। अम्ल लवण आदि ४ रसों के साथ संयुक्त होता है। यथा—१. अम्ल लवण (ऊषकादिकम्) २. अम्ल कटु (चुक्रादिकम्) ३. अम्ल तिक्त (सुरादिकम्) ४. अम्ल कषाय (हस्तिनीदधिशुकमांसादिकम्) लवण रस कटु आदि ३ के साथ संयुक्त होता है। यथा—१. लवण कटु (गोमूत्रस्वर्जिकादिकम्) २. लवण तिक्त (त्रपुसीसादिकम्) ३. लवण कषाय (समुद्रफेनादिकम्) कटु रस तिक्त एवं कषाय रस के साथ संयुक्त होता है। यथा—१. कटुतिक्त (कर्पूरजातिफलादिकम्) २. कटुकषाय (भल्लातकमज्जाहरितालादिकम्) तिक्त रस, कषाय के साथ संयुक्त होता है। यथा—१. तिक्तकषाय (लवलीफलहस्तिनीघृतादिकम्) इस प्रकार इन द्विकों के १५ भेद होते हैं। इनमें मधुर के संयोग से पांच, अम्ल के संयोग से चार, लवण के संयोग से तीन, कटु के संयोग से दो तथा तिक्त के संयोग से एक होते हैं। इसी प्रकार चरक सू. अ. २६ में तथा सुश्रुत उ. अ. ६३ में भी कहा है। मधुर, अम्ल, लवण आदि प्रथम तीन रसों में तीन संयोग अधिक होते हैं। यथा—१. मधुराम्ल २. मधुरलवण ३. अम्ल लवण ।।७२।।
एषां त्रयाणां द्विकानामेकैको द्विकस्त्रिभिरितरैः कटुतिक्तकषायै रसैर्योज्यः, ततस्त्रिका निष्पद्यन्ते। तद्यथा—मधुराम्लकटुः, मधुराम्लतिक्तः, मधुराम्लकषायः, मधुरलवणकटुः, मधुरलवणतिक्तः, मधुरलवणकषायः; अम्ललवणकटुः अम्ललवणतिक्तः, अम्ललवणकषाय इति। उत्तरेषु त्रिषु रसेषु कटुतिक्तकषायेषु त्रयो द्विका निष्पद्यन्ते; तद्यथा—कटुतिक्तः, कटुकषायः, तिक्तकषाय इति; एषां त्रयाणां द्विकानामेकैको द्विकस्त्रिभिरितरैर्मधुराम्ललवणै रसैर्योजयितव्यः, तत्र त्रिका निष्पद्यन्ते। तद्यथा—कटुतिक्तमधुरः, कटुतिक्ताम्लः, कटुतिक्तलवणः; कटुकषायमधुरः, कटुकषायाम्लः, कटुकषायलवणः; तिक्तकषायमधुरः, तिक्तकषायाम्लः, तिक्तकषायलवण इति। पूर्वे चोत्तरे च। पूर्वे च त्रयः, मधुराम्ललवणत्रिक एकः, उत्तरे च त्रयः, कटुकतिक्तकषायत्रिक एकः। त एते त्रिका विंशतिर्भवन्ति; प्रथमेन सूत्रेणोक्ता नव, नव च द्वितीयेन, तृतीयेन द्वाविति ।।७३।।
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इन उपर्युक्त तीनों द्विकों में से एक २ द्विक शेष तीन कटु, तिक्त तथा कषाय रसों के साथ मिलकर त्रिक बनते हैं। यथा—१. मधुराम्लकटु (शल्पकमीमांसादिकम्) २. मधुराम्लतिक्त (गोधूमोत्यसुरादिकम्) ३. मधुराम्लकषाय (मस्तुतक्रादिकम्) ४. मधुर लवण कटु (काणकषोतमांसादिकम्) ५. मधुरलवणतिक्त (शम्बूकादिमांसम्) ६. मधुरलवणकषाय (पद्मकन्दादिकं गुडसंयुक्तम्) ७. अम्ळलवण कटु (रौप्यशिलाजत्वादिकम्) ८. अम्ललवण तिक्त (हस्तिमूत्रादिकम्) ९. अम्ललवणकषाय (सरोमकं हस्तिनीदध्यादिकम्) पिछले तीन कटु तिक्त एवं कषाय रसों से तीन द्विक बनते हैं। यथा—१. कटुतिक्त २. कटुकषाय ३. तिक्तकषाय इन तीनों द्विकों में से एक २ द्विक शेष मधुर, अम्ल तथा लवण आदि तीनों रसों से मिलाया जाता है। इससे त्रिक बनते हैं। यथा—१. कटुतिक्त मधुर (तृणशून्याफलशुष्ककुस्तुम्बर्यादिकम्) २. कटुतिक्ताम्ल (मरिचसंस्कृतसुरादिकम्) ३. कटुतिक्त लवण (अविमूत्रादिकम्) ४. कटुकषायमधुर (गोधामान्सैरण्डतैलादिकम्) ५. कटुकषायाम्ल (अम्लवेतसादिकम्) ६. कटुकषायलवण (अरुष्करं सरोमकम्) ७. तिक्तकषायमधुर (गुडूचीशाखामृगाभिषुतवरकतैलादिकम्) ८. तिक्तकषायाम्ल (कीरमांसयुतसुरादिकम्) ९. तिक्तकषायलवण (समुद्रफेनादिकम्) प्रथम तीन रसों से एक त्रिक बनता है—१. मधुराम्ललवण (हस्तिमांसादिकम्)। तथा पिछले तीन रसों से एक त्रिक बनता है २. कटुतिक्तकषाय (कृष्णागुरुसुरदारुस्नेहादिकम्) इस प्रकार त्रिक २० होते हैं। प्रथम सूत्र के द्वारा ९+द्वितीय के द्वारा ९+तथा तृतीय के द्वारा २=२० सु. उ. अ. ६३ में कहा है कि मधुर के योग से १० त्रिक+अम्ल के योग से ६+लवण के योग से ३+कटु के योग से १=२० त्रिक होते हैं ॥७३॥
पूर्वेषु त्रिषु रसेषु मधुराम्ललवणेषु त्रयोऽधिका ये पूर्वोक्तास्ते परेषां त्रयाणां रसानां कटुकतिक्तकषायाणां पूर्वोक्तैस्त्रिभिर्द्विकैः प्रत्येककशयेन योजयितव्याः; तेन चतुष्का निष्पद्यन्ते। तद्यथा-मधुराम्लकटुतिक्तः, मधुराम्लकटुकषायः, मधुराम्लतिक्तकषायः, मधुरलवणकटुतिक्तः, मधुरलवणकटुकषायः, मधुरलवणतिक्तकषायः, अम्ललवणकटुतिक्तः, अम्ललवणकटुकषायः, अम्ललवणतिक्तकषाय इति। पूर्वे मधुराम्ललवणा उत्तरैः कटुकतिक्तकषायैरैककशो युज्यन्ते। तद्यथा-मधुराम्ललवणकटुः, मधुराम्ललवणतिक्तः, मधुरलवणकटुतिक्तः, मधुटलवणकटुकषायः, मधुरलवणतिक्तकणायः। मधुराम्ललवणकषाय इति। उत्तरे त्रयः कटुकतिक्तकषायाः पूर्वैर्मधुराम्ललवणैरैककशो युज्यन्ते, ततश्चतुष्का निष्पद्यन्ते। तद्यथा-कटुतिक्तकषायमधुरः, कटुतिक्तकषायाम्लः, कटुतिक्तकषायाम्लः, कटुतिक्तकषायलवण इति। एते चतुष्काः पञ्चदश, पूर्वसूत्रोक्ता नव, द्वितीयसूत्रोक्तास्त्रयः, तृतीयसूत्रोक्तास्त्रयः; इत्येते चतुष्काः पञ्चदश ।।७४।।
(इति ताडपत्रपुस्तके २१४ तमं पत्रम्।)
पूर्वोक्त, मधुर, अम्ल, लवण आदि तीन रसों में जो तीन अधिक रस कहे हैं वे पिछले तीन कटु, तिक्त तथा कषाय रसों में जो पूर्वोक्त तीन द्विक हैं-उनमें प्रत्येक के साथ जोड़ने चाहिये जिससे चतुष्कसंयोग बनते हैं। यथा—१. मधुराम्लकटुतिक्त (लशुनान्वितं सुरादिकम्) २. मधुराम्लकटुकषाय (काञ्जिकान्वितैरण्डतैलादि खदिरान्वितशिलाहादिकं च) ३. मधुराम्लतिक्तकषाय (उदुम्बरान्वितं यवासशर्करादिकम्) ४. मधुर लवणकटुतिक्त (वार्ताकफलादिकम्) ५. मधुरलवणकटुकषाय (गोमूत्रान्वितं तैलादिकम्) ६. मधुरलवणतिक्तकषाय (समुद्रफेनशर्कराचित्रकान्वितबदरादि) ७. अम्ललवणकटुतिक्त (सुवर्चलान्वितहस्तिनीदध्यादिकृतसुरादिकम्) ८. अम्ललवणकटुकषाय (सौवर्चलान्वितहस्तिनीदध्यादिकम्) ९. अम्ललवणतिक्तकषाय (औद्भिदलवणान्वितं शुकमांसादिकम्) पूर्व मधुराम्ललवण, पिछले कटु तिक्त कषाय में से एक २ के साथ पृथक् २ जुड़ते हैं। यथा—१. मधुराम्ललवणकटु (गोमूत्रान्वितशिलाजतु प्रभृतिकम्) २. मधुराम्ललवणतिक्त (गोमूत्रैकशफक्षीरादिकम्) ३. मधुराम्ललवणकषाय (सैन्धवान्विततक्रादिकम्) पिछले तीन कटु, तिक्त एवं कषायरस प्रथम तीन-मधुर, अम्ल तथा लवण में से प्रत्येक के साथ पृथक् २जुड़ते हैं जिससे चतुष्क संयोग बनते हैं। यथा—१.
संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७] खिलस्थानम् ४०७
कटुतिक्तकषाय मधुर (तिलगुग्गुल्वादिकम्) २. कटुतिक्तकषायाम्ल (बालमूलकहस्तिनीदध्यादिकम्) ३. कटुतिक्तकषायलवण (सरोमकं बालबिल्वादिकम्) इस प्रकार चतुष्क संयोग १५ होते हैं। पूर्व सूत्रोक्त ९+द्वितीय सूत्रोक्त ३+तृतीय सूत्रोक्त ३=इस प्रकार चतुष्क १५ होते हैं। इसी प्रकार चरक सू. अ. २६ में तथा सु. उ. अ. ६३ में भी कहा है॥७४॥
षट् पञ्चकाः । षण्णां रसानां मधुराम्ललवणकटुतिक्तकषायाणामैकैकमपनयितव्याः, षट् पञ्चका निष्पद्यन्ते । तद्यथा—अम्ललवणकटुतिक्तकषायः, मधुरलवणकटुतिक्तकषायः, मधुराम्लकटुतिक्तकषायः, मधुराम्ललवणतिक्तकषायः मधुराम्ललवणकटुकषायः, मधुराम्ललवणकटुतिक्त इति । त एते षट् पञ्चकाः । षड्भिर्मधुराम्ललवणकटुतिक्तकषायैरेकः । तद्यथा—मधुराम्ललवणकटुतिक्तकषाय इति । त एवमेते रसास्त्रिषष्टिविधा¹ भिन्नाः; तत्र संयुक्ताः सप्तपञ्चाशत्, असंयुक्ताः षट् ७५ ।
पंचक (पांच रसों के संयोग) ६ होते हैं। मधुर अम्ल लवण कटु तिक्त तथा कषाय इन छहों रसों में से एक २ रस कम करते जाना चाहिये। इस प्रकार ६ पञ्चक संयोग बनते हैं। तथा—१. अम्ललवण कटु तिक्त कषाय (भल्लातकरौप्यशिलाजतुमिश्रितनिम्बादिकम्) २. मधुरलवणकटुतिक्तकषाय (रसोनादिकम्) ३. मधुराम्लकटुतिक्तकषाय (हरीतकीधात्रीफलादिकम्) ४. मधुराम्ललवणतिक्तकषाय (औद्भिदान्विततक्रादिकम्) ५. मधुराम्ललवणकटुकषाय (कटुत्रययवक्षारान्विततक्रादिकम्) ६. मधुराम्ललवणकटुतिक्त (आमकर्मर्दान्वितं भृष्टवार्ताकफलादिकम्) षष्ट्क संयोग—मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त तथा कषाय इन छहों रसों के संयोग से एक रस बनता है। यथा—१. मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय (एणमांसाणादिकम्) इस प्रकार इन रसों के ६३ भेद हो जाते हैं। इनमें से संयुक्त रस ५७ होते हैं तथा असंयुक्त (पृथक् २) रस ६ होते हैं। चरक सू. अ. २६ में भी कहा है—संयोगाः सप्तपञ्चाशत्कल्पना तु त्रिषष्टिधा ॥७५॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥७६॥ ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥७६॥
(इति) खिलेषु रसदोषविभागीयो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥
अथसंशुद्धिविशेषणीयो नाम सप्तमोऽध्यायः
अथातः संशुद्धिविशेषणीयं व्याख्यास्यामः ॥१॥ इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥
अब हम संशुद्धिविशेषणीय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥
सिद्धौ विशोधनाख्यायामनुक्तं यद्विशेषणम्। ऊर्ध्वानुलोमयोः सर्वं तत् प्रवक्ष्याम्यतः परम् ॥३॥
सिद्धिस्थान में विशोधन के प्रकरण में ऊर्ध्व तथा अनुलोम शोधन के विषय में जो बातें नहीं कही हैं। उन सबको अब मैं यहां कहूंगा ॥३॥
१. एष एव त्रिषष्टिविधो रसबिकल्पश्चरकसूत्रस्थाने २६ अध्याये; सुश्रुतोत्तरतन्त्रे ६४ अध्याये चोपवर्णितः ।
| ४०८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७] |
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चयप्रकोपप्रशमाः पित्तस्य प्रावृडादिषु। श्लेष्मणः शिशिराद्येषु, वायोर्ग्रीष्मादिषु त्रिषु ।।४।।
पित्त का प्रावृट् आदि ऋतुओं में क्रमशः संचय, प्रकोप तथा शान्ति होती है। अर्थात् प्रावृट् ऋतु में पित्त का संचय, शरद् में पित्त का प्रकोप तथा हेमन्त में पित्त की शान्ति होती है। श्लेष्मा का शिशिर आदि ऋतुओं में संचय, प्रकोप तथा शान्ति होती है अर्थात् शिशिर में कफ का संचय, वसन्त में कफ का प्रकोप तथा ग्रीष्म में कफ की शान्ति हो जाती है। तथा वायु का ग्रीष्म आदि ऋतुओं में क्रमशः संचय, प्रकोप तथा शान्ति होती है। अर्थात् ग्रीष्म ऋतु में वात का संचय, वर्षा में प्रकोप तथा शरद् में शान्ति होती है ॥
प्रावृट्शरद्धेमन्ताख्या विसर्गस्त्वृतवस्त्रयः। शिशिरश्च वसन्तश्च ग्रीष्मश्चादानसंज्ञिताः ।।५।।
प्रावृट्, शरद् तथा हेमन्त आदि तीन ऋतुएं विसर्गकाल तथा शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म ऋतुएं आदानकाल कहलाती हैं। विसर्गकाल सौम्य तथा आदानकाल आग्नेय होता है। विसर्गकाल का अर्थ है जिसमें प्राणियों के शरीर तथा बल की वृद्धि होती है। विसृजति जनयत्याप्यमंशं प्राणिनां च बलमिति विसर्गः। आदानकाल में जगत् का आप्यभाग तथा प्राणियों का बल खींचा जाता है। इसलिये—'आददाति क्षपयति पृथिव्याः सौम्यांशं प्राणिनाञ्च बलमित्यादानम्' ।।५।।
विसर्गादानयोर्मध्ये बलं मध्ये शरीरिणाम्। आद्यन्तयोस्तु दौर्बल्यमन्ताद्योरुत्तमं बलम् ।।६।।
विसर्गकाल तथा आदानकाल के मध्य में अर्थात् शरद् और वसन्त ऋतु में प्राणियों का बल मध्यम होता है। अर्थात् इन ऋतुओं में मनुष्यों का बल न बहुत अधिक होता है और न बहुत कम। विसर्गकाल के आदि (प्रावृट् ऋतु) तथा आदानकाल के अन्त (ग्रीष्म ऋतु) में मनुष्यों में दुर्बलता होती है। विसर्गकाल के अन्त (हेमन्त ऋतु) तथा आदानकाल के प्रारंभ (शिशिर ऋतु) में पुरुषों का बल उत्तम (श्रेष्ठ) रहता है ।।६।।
हेमन्ते स्निग्धशीताभिरद्भिरोषधिभिस्तथा। चितोऽपि शैत्यात् प्रस्कन्नः कफो नात्र प्रकुप्यति ।।७।।
स कुप्यति हिमापाये संतप्तो भास्करांशुभिः। तस्मात् संशोधनं तत्र कर्तव्यं वमनोत्तरम् ।।८।।
हेमन्त ऋतु में स्निग्ध एवं शीतल जल तथा ओषधियों के द्वारा संचित हुआ भी कफ ठण्ड से जमा हुआ होने के कारण इस ऋतु में कुपित नहीं होता है। वही कफ ठण्ड के समाप्त हो जाने पर सूर्य की किरणों के द्वारा संतप्त होने के कारण कुपित हो जाता है। अर्थात् हेमन्त के बाद वसन्त ऋतु में कफ का प्रकोप हो जाता है इसलिये इस ऋतु (वसन्त) में वमन द्वारा शरीर का संशोधन करना चाहिये। वमन द्वारा शरीर का संशोधन 'माधवप्रथमे मासि' के अनुसार चैत्र मास में कराना चाहिये। कफ के प्रकोप को शान्त करने के लिये वमन श्रेष्ठ माना गया है। चरक सू. अ. २० में इसका उल्लेख मिलता है ।।७-८।।
ग्रीष्मे निष्पीतसारत्वाद्रसानां विचितोऽपि सः। औष्ण्यातिरेकात् कालस्य वायुरत्र न कुप्यति ।।९।।
रवेरम्बुदसंरोधात् प्रकुप्यत्यम्बुदागमे। बस्तिकर्मोत्तरं तत्र प्रतिकर्म विशिष्यते ।।१०।।
ग्रीष्म ऋतु में सम्पूर्ण रसयुक्त पदार्थों के सारभाग के सूर्य की किरणों के द्वारा पान किया जाने के कारण संचित हुआ भी वायु इस ऋतु में उष्णता की अधिकता के कारण प्रकुपित नहीं होता है। अर्थात् यद्यपि ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की किरणों के द्वारा जगत् के प्रत्येक पदार्थ के रस (सार भाग) का शोषण किया जाने से शरीर में रूक्षता के कारण वायु संचित हो जाता है तथापि काल के उष्ण होने के कारण वायु प्रकुपित नहीं होता है। वायु शीतगुण वाला होने के कारण शीतकाल में ही प्रकुपित हो सकता है। क्योंकि 'वृद्धिः समानैः सर्वेषाम् के अनुसार समान गुण (शीत) के कारण समान वस्तु (वायु) की वृद्धि होती है इसलिये उष्णकाल में वायु का प्रकोप नहीं हो पाता है। इसीलिये चरक में कहा भी है—'शीतः शीते प्रकुप्यति'। वही वायु वर्षार्ऋतु के आने पर बादलों में सूर्य के छिप जाने से प्रकुपित हो जाता है। अर्थात्
संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७] खिलस्थानम् ४०९
अब वर्षारृतु में सूर्य बादलों में छिपा रहता है इसलिये पहले (ग्रीष्म ऋतु) के समान गर्मी नहीं रहती अपितु मौसम ठण्डा हो जाता है। मौसम के शीतल हो जाने के कारण ‘वृद्धिः समानैः सर्वेषाम्’ के अनुसार वायु का प्रकोप हो जाता है। इसलिये इस ऋतु (वर्षा) में बस्तिकर्म द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये। वायु को शान्त करने के लिये बस्तिकर्म श्रेष्ठ उपक्रम माना गया है। चरक सू. अ. २० में भी इसका उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार बस्ति के विषय में सुश्रुत चि. अ. ३६ में भी कहा है ॥९-१०॥
अपां चैवौषधीनां च वर्षास्वम्लविपाकतः । चितमप्यत्र तत् पित्तं वर्षाशैत्यान्न कुप्यति ॥११॥
दिवाकरांशुसंतप्तं शरत्काले प्रकुप्यति । विरेचनोत्तरं चात्र विधातव्यं विशोधनम् ॥१२॥
वर्षा ऋतु में जल तथा ओषधियों के अम्लविपाकी अर्थात् सम्यक् प्रकार से पाक न होने से विदग्ध हो जाने के कारण शरीर में संचित हुआ भी पित्त वर्षा ऋतु की शीतलता के कारण प्रकुपित नहीं होता है। अर्थात् पित्त को प्रकुपित करने के लिये पित्त के समान गुण-उष्णता की आवश्यकता होती है। परन्तु वर्षा में उस उष्णता का अभाव होता है इसलिये इस ऋतु में पित्त प्रकुपित नहीं हो पाता। वही पित्त सूर्य की किरणों के द्वारा संतप्त हुआ शरत् काल में प्रकुपित हो जाता है। क्योंकि उष्णता पित्त का समान धर्मी होने से इसे प्रकुपित कर देती है। इस ऋतु (शरत् काल) में विरेचन के द्वारा शरीर का शोधन करना चाहिये। पित्त के प्रकोप को शान्त करने के लिये विरेचन सर्वश्रेष्ठ उपक्रम माना गया है॥
दोषप्रकोपे सर्वस्मिन् कार्यमनन्तरम् । न हि हेत्वीरितो दोषः कञ्चित्कालमुदीक्ष्यते ॥१३॥
औचित्यादार्तवो दोषप्रकोपो न तथा भृशः । यथा हेतुकृतस्तस्मात् क्षिप्रेमेनमुपक्रमेत् ॥१४॥
अथवा दोषों का प्रकोप हो जाने पर सम्पूर्ण कालों में इनका शोधन किया जा सकता है। अर्थात् दोषों के प्रकुपित हो जाने पर दोष शोधन के योग्य पूर्वोक्त ऋतुओं की अपेक्षा न करके प्रत्येक ऋतु में उन २ दोषों का शोधन कर देना चाहिये। क्योंकि अपने २ हेतुओं के द्वारा प्रेरित हुआ दोष थोड़ी देर भी प्रतीक्षा नहीं करता है। उन २ ऋतुओं में होने वाला दोषप्रकोप अर्थात् वर्षा में वायु, शरद में पित्त तथा वसन्त में कफ का प्रकोप उचित (काल के अनुसार स्वाभाविक) होने के कारण उतना भयंकर नहीं होता है जितना कि अपने २ प्रकोपक कारणों के द्वारा प्रकुपित हुआ दोष। इसलिये इस दोष को शीघ्र ही शान्त करने का प्रयत्न करना चाहिये। अर्थात् अपने २ प्रकोपक कारणों के द्वारा प्रकुपित होने से पूर्व ही उन २ दोषों का उन २ ऋतुओं में शोधन कर लेना चाहिये जिनमें कि उनका प्रकोप होता है। जैसे वायु का वर्षा में, पित्त का शरद् में तथा कफ का वसन्त में। अर्थात् उपर्युक्त ऋतुओं में इन दोषों का प्रकोप स्वाभाविक रूप से हो होता है। इसलिये इन ऋतुओं में ये दोष स्वाभाविक होते हैं और इतने कष्टसाध्य नहीं होते हैं। यदि इन ऋतुओं में अपने २ दोषों का शोधन नहीं किया जाय तो उसके बाद अपने २ हेतुओं के द्वारा प्रकुपित हुए वे ही दोष सुखसाध्य नहीं होते क्योंकि फिर वे दोष स्वाभाविक नहीं होते। इसलिये जबतक दोष का स्वाभाविक प्रकोप ही है तभी उसे उन २ ऋतुओं में शान्त करने का प्रयत्न करना चाहिये ॥१३-१४॥
वमनैश्च विरेकैश्च निरूहैः सानुवासनैः । तथा स्वास्थ्यमवाप्नोति रोगेभ्यश्च प्रमुच्यते ॥१५॥
वमन, विरेचन तथा अनुवासन सहित निरूह बस्तियों के द्वारा मनुष्य स्वास्थ्य को प्राप्त करता है तथा रोगों से मुक्त हो जाता है। अर्थात् योग्य काल में—वसन्त में वमन के द्वारा कफ का, शरद् में विरेचन के द्वारा पित्त तथा वर्षा में बस्तियों के द्वारा वायु की शान्ति हो जाने पर मनुष्य स्वस्थ रहता है। तथा यदि रोग हो भी जाते हैं तो उन रोगों से शीघ्र ही मुक्त हो जाता है। यहां यह स्मरण रखना चाहिये कि आयुर्वेद के दो प्रयोजन हैं—१. स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा तथा २. रोगी होने पर रोगों से मुक्ति। इनमें से प्रथम प्रयोजन प्रधान है इसीलिये इसका प्रथम वर्णन किया है। चरक
४१० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७]
सू. अ. ३० में कहा भी है—“प्रयोजनं चास्य स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणमातुरस्य विकारप्रशमनं च”। अर्थात् प्रयत्न यह किया जाता है कि मनुष्य रुग्ण ही न होने पावे। इसलिये रुग्ण होने से पूर्व ही अमुक २ ऋतु में अमुक २ दोष का शोधन कर लेना चाहिये। स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना अधिक सरल है। रोग होने के बाद उन्हें दूर करना अपेक्षाकृत कठिन है ॥१५॥
स्थौल्यामपाण्डुताकर्णकोठारुःपिडकोद्भवः। निद्रानाशोऽरतिस्तन्द्रीरुत्क्लेशः कफपित्तयोः ॥१६॥
श्रमदौर्बल्यदौर्गन्ध्यमालस्यं सीदनं क्लमः। भक्तद्वेषोऽविपाकश्च क्लैब्यं बुद्धेरुपप्लवः ॥१७॥
बृंहणैस्तृप्यतोऽपि(स्या)द्वलवर्णपरिक्षयः। दुःस्वप्रदर्शनं चेति बहुदोषस्य लक्षणम् ॥१८॥
बहुदोष व्यक्ति के लक्षण—स्थूलता, आमदोष, पाण्डु, कर्णरोग, कोठ (चर्मरोग-Ringwarm), अरु (क्षतव्रण) तथा पिडकाओं का उत्पन्न होना, निद्रा का नष्ट होना, अरति (ग्लानि), तन्द्रा, कफ और पित्त का उत्क्लेश (बाहर आने की प्रवृत्ति), परिश्रम, दुर्बलता, दुर्गन्धि, आलस्य, अङ्गसीदन, थकावट, भोजन में अरुचि, खाये हुए अन्न का ठीक प्रकार से पाक न होना, क्लीबता (नपुंसकता), बुद्धिविभ्रम, बृंहण आहार मिलने पर भी लगातार बल और वर्ण (कान्ति) का क्षीण होना तथा बुरे स्वप्नों का दिखाई देना-ये शरीर में दोषों की अधिक मात्रा में उपस्थिति के लक्षण हैं। अर्थात् यदि शरीर में दोष बहुत अधिक मात्रा में विद्यमान हों तो उपर्युक्त लक्षण होते हैं ॥१६-१८॥
बलिनः स्थिरदेहस्य तस्य संशोधनं भिषक्।
कुर्यात्, संशमनं चैव मध्यदोषबलस्य तु ॥१९॥
अल्पदोषबलस्यापि यथाकालं विशोषणम्।
यदि रोगी बलवान् है तथा उसका शरीर भी स्थिर है तो चिकित्सक को चाहिये कि उसका संशोधन तथा यदि रोगी का दोष और बल दोनों मध्यम हैं तो दोषों का संशमन करना चाहिये। अर्थात् यदि न तो दोष ही बहुत अधिक या बहुत कम हों और न रोगी का बल भी बहुत कम या बहुत अधिक हो तो उस अवस्था में संशोधन की अपेक्षा संशमन चिकित्सा अधिक श्रेष्ठ मानी गई है। यदि रोगी के दोष और बल अल्प मात्रा में हों तो उनका यथासमय शोषण करना चाहिये। अर्थात् यदि रोगी का दोष एवं बल अधिक हो तो संशोधन चिकित्सा, यदि दोष एवं बल मध्य मात्रा में हों तो संशमन चिकित्सा और यदि दोष एवं बल अल्प मात्रा में हों तो रूक्ष या शोषण चिकित्सा करनी चाहिये। जो शरीरस्थ दोषों को बाहर निकाल देता है उन्हें संशोधन कहते हैं। संशोधन बाह्य एवं आभ्यन्तर भेद से दो प्रकार का होता है। वमन, विरेचन, शिरोविरेचन और बस्ति चार प्रकार का अन्तः शोधन है तथा यन्त्र, शस्त्र, क्षार, अग्नि प्रयोग आदि द्वारा बाह्य शोधन किया जाता है। यहां निरूह से अभिप्राय आस्थापान (रूक्ष) बस्ति से है। संशोधन में अनुवासन बस्ति का ग्रहण नहीं किया जाता है। क्योंकि अनुवासन बृंहण है अतः संशोधन से अभिप्राय अनुवासन को छोड़कर शेष चार संशोधन—अन्तः (वमन, विरेचन, आस्थापान, शिरोविरेचन) तथा पांचवां रक्तमोक्षण है। संशोधन के द्वारा बलवान् मनुष्यों के दोषों का निर्हरण करना चाहिये। संशमन-जो शरीरस्थ दोषों को बाहर नहीं निकालता है, समावस्था में स्थित दोषों में विषमता उत्पन्न नहीं करता है तथा विषम दोषों को शान्त करता है-उसे संशमन कहते हैं। संशमन तीन प्रकार का होता है—१. दैवव्यपाश्रय मन्त्र ओषधि, बलि आदि के द्वारा दोषों को शान्त करना, २. बाह्यप्लस्तर आदि लेप के द्वारा दोषों को शान्त करना, ३. आभ्यन्तर (Internally) पाचन आदि के द्वारा दोषों का शमन करना। संशमन के द्वारा मध्य बल एवं रोग वाले मनुष्यों के दोषों का शमन करना चाहिये। शोषण—लङ्घन आदि के द्वारा दोषों को अन्दर ही सुखा देने को शोषण कहते हैं। अल्प दोष एवं अल्प बल वाले व्यक्तियों के लिये यह उपक्रम श्रेष्ठ माना गया है ॥१९॥
अथ संशोधनाहें तु स्नेहस्वेदोपपादिते ॥२०॥
वमनं स्त्रंसनं वाऽपि यथावदुपकल्पयेत्।
संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७] खिलस्थानम् ४१९
इसके बाद संशोधन के योग्य रोगी को पहले स्नेहन तथा स्वेदन देकर पुनः यथावत् वमन तथा विरेचन कराना चाहिये। अर्थात् जिस व्यक्ति का संशोधन करना है उसे पहले स्नेहन तथा स्वेदन कराना चाहिये ॥२०॥
स्नेहः पीतोऽनिलं हन्ति कुरुते देहमार्दवम् ।। २१ ।।
सङ्गं मलानां निघ्न(ह)न्ति, स्वेदः स्निग्धस्य देहिनः ।
सेवन किया गया स्नेह वायु को शान्त करता है, शरीर को मृदु करता है तथा मलों के सङ्ग-समूह को नष्ट करता है अर्थात् सामूहिक रूप में एकत्र हुए मलों को ढीला करता है ॥
स्रोतःसु लीनं सूक्ष्मेषु दोषं द्रवयति, द्रवम् ।। २२ ।।
स्निग्ध (जिसका स्वेहन किया गया है) मनुष्य को दिया गया स्वेदन सूक्ष्म स्रोतों में लीन हुए दोष को पिघला देता है। अर्थात् पहले स्नेहन के द्वारा दोषों का संघात ढीला पड़ जाता है। तदनन्तर स्वेदन के द्वारा दोष पतले हो जाते हैं। वे दोष पतले हो जाने से शरीर में रुके नहीं रह सकते, आराम से शरीर से बाहर निकल जाते हैं ॥२२॥
शोधनं हरति क्षिप्रं यथावत् संप्रयोजितम् । मन्त्र^१पूतमबीभत्सं हृद्यं कार्यं विरेचनम् ।। २३ ।।
सबीभत्सं तु वमनं तथा तद्योगमृच्छति ।
द्रव शोधन यथावत् प्रयुक्त किया गया शीघ्र ही दोषों को हर लेता है। इसलिये शोधन के लिये ऐसा विरेचन प्रयुक्त चाहिये जो मन्त्रों के द्वारा पवित्र किया गया हो, जो बीभत्स न हो अर्थात् जिसे देखकर शरीर में घृणा उत्पन्न न हो तथा जो हृदय के लिये रुचिकर हो। बीभत्स (घृणित) वमन के द्वारा वमन का अतियोग हो जाता है ॥२३॥
स्निग्धो वमेत्तृतीयेऽह्नि चतुर्थे स्रंसनं पिबेत् ।। २४ ।।
विकारजाते तद्युक्तं स्वस्थवृत्तौ तु कामतः ।
स्नेहन के बाद तीसरे दिन वमन औषध तथा चौथे दिन विरेचन औषध पीनी चाहिये। यह उपर्युक्त व्यवस्था विकारों के उत्पन्न होने की अवस्था में बताई गई है। स्वस्थ अवस्था में तो इसका यथेच्छ प्रयोग किया जा सकता है। अर्थात् रुग्णावस्था में स्नेह के बाद तीसरे दिन वमन और चौथे दिन विरेचन देना चाहिये। परन्तु यदि व्यक्ति स्वस्थ हो तो उपर्युक्त विधान आवश्यक नहीं है। उस समय आवश्यकतानुसार उसका यथेच्छ प्रयोग किया जा सकता है ॥२४॥
कफवृद्धिकरं भोज्यः श्वः पाता वमनं नरः ।। २५ ।।
विरेचनं द्रवप्रायं स्निग्धोष्णाविशदं लघु । तथोत्क्लिष्टकफत्वाच्च पुरीषस्य च लाघवात् ।। २६ ।।
ऊर्ध्वं चाधश्च दोषाणां प्रवृत्तिः स्यादयत्नतः ।
अगले दिन जिस व्यक्ति को वमन द्रव्य का पान करना है उसे पहले दिन कफ की वृद्धि करने वाला भोजन कराना चाहिये। तथा विरेचन औषध-द्रव (Liquid), स्निग्ध, उष्ण (गरम), विशद (जो पिच्छिल न हो) तथा लघु होना चाहिये। इस प्रकार उपर्युक्त आहार के द्वारा कफ के उत्क्लिष्ट (बहिः प्रवृत्त्युन्मुख) हो जाने पर तथा पुरीष के लघु हो जाने से दोषों की ऊर्ध्व (ऊपर) तथा अधः (नीचे) प्रवृत्ति बिना यत्न के हो जाती है अर्थात् वमन एवं विरेचन सुखपूर्वक जाते हैं। वमन एवं विरेचन कराने से पूर्व दोषों का उत्क्लेश कराना आवश्यक है। चरक-सि. अ. १ में भी कहा है कि ग्राम्य, औदक एवं आनूप मांसरसों से तथा दूध से कफ को उत्क्लिष्ट करना चाहिये-उसे बहिः प्रवृत्ति के लिये उन्मुख करना चाहिये। तथा जिस व्यक्ति को विरेचन देना है उसके दोष (पित्त) को स्निग्ध जांगल मांसरसों से तथा कफ को न बढ़ाने वाले यूषों
१. आशीर्भिरभिमन्त्रितमिति चरके सुश्रुते च श्लोकमन्त्रयोरप्युल्लेखस्य दर्शनेन अत्रापि मन्त्रशब्देन मन्त्र एव ग्राह्यः ।
४१२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७]
से उत्क्लिष्ट करना चाहिये। वमन योग्य रोगी को यह आहार एक दिन तथा विरेच्य पुरुष को तीन दिन देना चाहिये। कफ को बढ़ाने वाले भोजनों के द्वारा कफ के उत्क्लिष्ट हो जाने से वमन सुखपूर्वक हो जाता है। यदि कफ उत्क्लिष्ट न हो अथवा मन्द हो तो वमन ओषधि वमन नहीं लायेगी प्रत्युत नीचे जाकर विरेचन करा देती है। इससे विपरीत यदि कफ बढ़ा हुआ होगा तो विरेचन ओषधि विरेचन नहीं लायेगी अपितु ऊपर की ओर जाकर वमन ले आयेगी ॥२५-२६॥
विषे विसर्पे श्वयथौ वातरक्ते हलीमके ॥२७॥
कामलापाण्डुरोगे च नातिस्निग्धं विरेचयेत् ।
विष (विष का प्रयोग), विसर्परोग, शोथ, वातरक्त, हलीमक, कामला तथा पाण्डुरोग में-जिन्हें अत्यन्त स्नेहन नहीं कराया गया है, विरेचन देना चाहिये। अर्थात् विष, विसर्प आदि रोगों में यदि विरेचन कराना हो तो उससे पूर्व स्नेहन तो कराना चाहिये परन्तु अधिक स्नेहक नहीं कराना चाहिये ॥२७॥
नातिस्निग्धशरीराय विदध्यात् स्नेहसयुतम् ॥२८॥
स्निग्धाय रूक्ष(क्षं,)रूक्षाय कामं स्नेहविरेचनम् ।
स्निग्धाभारं रथात् (?) को वा स्रंसनं सहते नरः ॥२९॥
जिस व्यक्ति का शरीर अधिक स्निग्ध हो उसे स्नेह विरेचन नहीं देना चाहिये। जिस व्यक्ति का शरीर स्निग्ध है उसे रूक्ष विरेचन दें तथा जिसका शरीर रूक्ष है उसे यथेच्छ स्निग्ध विरेचन देना चाहिये। अर्थात् अतिस्निग्ध पुरुष में दोषों के बहिः प्रवृत्त्युन्मुख होने पर यदि स्नेह विरेचन दिया जाय तो दोष बाहर नहीं निकलेंगे। अपितु पुनः स्रोतों में लीन हो जायेंगे। उस अवस्था में रूक्ष विरेचन ही देना चाहिये जिससे बहिः प्रवृत्त्युन्मुख दोष पुनः स्रोतों में लीन न हो सकें। परन्तु यदि शरीर रूक्ष है जैसा कि पूर्वोक्तानुसार विष, विसर्प आदि रोगों में होता है तो वहां स्निग्ध विरेचन ही देना चाहिये। अत्यन्त स्नेहन से युक्त विरेचन को कौन व्यक्ति सहन कर सकता है अर्थात् ऐसे व्यक्ति बहुत कम हैं जो स्निग्ध विरेचन को सहन कर सकते हों¹ ॥
घृतकुम्भाद्यथा तोयमयत्नेन निरस्यते । निरस्यते तथा दोषः स्निग्धाद्देहाद्विरेचनैः ॥३०॥
घृतयुक्त अर्थात् स्निग्ध (चिकने) घड़े से जिस प्रकार पानी को बिना यत्न के हटाया जा सकता है उसी प्रकार स्निग्ध देह से विरेचन के द्वारा दोष सुखपूर्वक हटाये जा सकते हैं। यहां ‘विरेचन’ शब्द उपलक्षणमात्र है इससे वमन आदि सम्पूर्ण संशोधनों का ग्रहण होता है। अर्थात् संशोधन से पूर्व स्नेहन के द्वारा दोष चलाय मान हो जाते हैं। तदुपरान्त वमन आदि के द्वारा उन दोषों को बिना कठिनाई के निकाला जा सकता है ॥३०॥
स्निग्धं विष्यन्दयत्यङ्गं स्वेदो(दः)स्निग्धार्द्रमि²न्धनम् (?) ।
ततः स्विन्नशरीरस्य दोषान् हरति भेषजम् ॥३१॥
जैसे स्निग्ध एवं गीली ईंधन (लकड़ी) को अग्नि विष्यन्दित (क्षरित) कर देती है उसी प्रकार स्निग्ध (स्नेहन युक्त) शरीर (शरीर के दोषों) को स्वेदन भी विष्यन्दित कर देता है-विचलित कर देता है। इस प्रकार स्वेदन किये गये शरीर
१. यहां 'स्निग्धाभारं रथात् को वा स्रंसनं सहते नरः' के स्थान पर 'स्निग्धाहारमृते को वा स्रंसनं सहते नरः' यह पाठ होता तो सम्यक् अर्थ हो सकता था। यहां पर इसी पाठ के अनुसार उपर्युक्त अर्थ किया गया है।
२. अत्र स्नेहार्द्रमिन्धनमिव स्वेदः स्निग्धमङ्गं विष्यन्दयतीति पदयोजने यथाऽऽर्दे इन्धने स्नेहनं विधाय ज्वालने स्वेदेन रसनिष्यन्दः, एवमेव शरीरेऽपि स्नेहनं कृत्वा स्वेदने दोषनिःसरणं भवतीति भावः प्रतीयते, परं यथेवादिपदमपेक्ष्यते । एतदादर्शपुस्तके पाठो भ्रष्टः किल ।
संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७] खिलस्थानम् ४१३
से ओषधि (वमन-विरेचन आदि के लिये प्रयुक्त की गई ओषधि) दोषों को नष्ट कर देती है। अर्थात् स्निग्ध शरीर में स्वेदन के द्वारा दोष अपने स्थान से विचलित हो जाते हैं ॥३१॥
यथा हि मलिनं वासः क्षारेणोत्क्लेश्य वारिणा। शोध्यते शोध्यनैस्तद्वदुत्क्लेश्य विधिवद्बलात् ॥३२॥
जिस प्रकार मैला वस्त्र क्षार के द्वारा मैल या दोषों को उत्क्लिष्ट करके फिर जल के द्वारा साफ किया जाता है उसी प्रकार शरीर भी पूर्व स्नेहन एवं स्वेदन के द्वारा विधिवत् दोषों को उत्क्लिष्ट करके पुनः वमन आदि शोधनों के द्वारा बलपूर्वक शुद्ध किया जाता है। अर्थात् जिस प्रकार वस्त्र की मैल को ढीला करने के लिये पहले क्षार का प्रयोग किया जाता है उसी प्रकार संशोधन से पूर्व स्नेहन एवं स्वेदन के द्वारा शरीर के दोषों को ढीला-बहिः प्रवृत्त्युन्मुख किया जाता है। अन्यथा शारीरिक दोष सुखपूर्वक तथा पूर्णरूप से नहीं निकल पाते हैं। ३२॥
वामितं लङ्घयेल्लङ्घ्यं (लङ्घितं) लघु भोजयेत्।
तस्य वान्तविरिक्तस्य क्रमः पेयादिरिष्यते ॥३३॥
तेनाग्निर्वर्धते सूक्ष्मैरिन्धनै¹रणयो यथा (रिन्धनैररणेर्यथा)।
(इति ताडपत्रपुस्तके २१५ तमं पत्रम्।)
वमन कराने के बाद रोगी को लङ्घन (उपवास) कराये तथा लङ्घन के बाद लघुभोजन कराये। वमन और विरेचन के बाद रोगी को पेया आदि संसर्जन क्रम से आहार देना चाहिये। चरक सि. अ. १ में यह संसर्जन क्रम इस प्रकार से दिया है कि-शोधन के पश्चात् रोगी को पहले पेया तदनन्तर क्रमशः विलेपी, अकृतयूष, कृतयूष, मांसरस आदि धीरे २ देने चाहिये। चरक सू. अ. १५ में भी १२ अन्नकाल का संसर्जनक्रम दिया है। अर्थात् संशोधन के ७ दिन के बाद स्वाभाविक भोजन पर लाये। क्योंकि संशोधन के द्वारा जाठराग्नि मन्द हो जाती है, उस मन्द को क्रमशः तीक्ष्ण करने के लिये पेयादि क्रम कराया जाता है। सूक्ष्म ईंधनों के द्वारा जिस प्रकार अरणि से उत्पन्न हुई अग्नि प्रदीप्त हो जाती है उसी प्रकार उपर्युक्त पेयादि क्रम युक्तलघु आहार के द्वारा संशोधन से मन्द हुई अग्नि प्रदीप्त हो जाती है ॥३३॥
समुत्थितेऽग्नौ संजाते म(ब)ले देहे च निर्मले ॥३४॥
वाससीवार्पितो रागः सिद्धिं यात्युत्तरो विधिः।
कायाग्नि के प्रदीप्त हो जाने, शरीर में बल के उत्पन्न हो जाने तथा संशोधन के द्वारा शरीर के निर्मल हो जाने पर बाद में की गई चिकित्सा आदि की सम्पूर्ण विधि सफल होती है जिसप्रकार वस्त्रों को सम्यक् प्रकार से धोने के बाद उनपर चढ़ाया गया रंग अच्छी प्रकार चढ़ जाता है। अर्थात् वस्त्र को अच्छी प्रकार धोने के बाद उसपर जो भी रंग चढ़ाया जाता है वह वस्त्र पर अच्छी तरह चढ़ जाता है उसी प्रकार संशोधन के बाद पेयादि क्रम के द्वारा जाठराग्नि के प्रदीप्त हो जाने तथा शरीर में बल उत्पन्न हो जाने के बाद जो भी क्रिया की जाती है उसका अच्छी प्रकार प्रभाव होता है ॥३४॥
यश्चात्र वा यदाबाधः स्यादयोगादियोगतः ॥३५॥
समासव्यासस्तस्तस्य सिद्धौ सिद्धिरुदाहृता।
चिकित्सा कार्य में अयोग आदि (अयोग, अतियोग, हीनयोग एवं मिथ्यायोग) के कारण जो कष्ट अथवा उपद्रव होते हैं उनकी चिकित्सा संक्षेप तथा विस्तार से सिद्धिस्थान में पहले कही गई है ॥३५॥
ततोऽत्रप्रविचारस्य विकल्पः संप्रवक्ष्यते ॥३६॥
१. अरणिसंभवो वह्निः सूक्ष्मैरिन्धनैरिव वान्तविरिक्तस्य जाठराग्निर्लघुभोजनैर्वर्धते इति भावः । अत्रापि मूलपाठो विभ्रष्टः ।
४१४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७]
इसके बाद अब अन्न की प्रकृष्ट विचारणाओं के भेद कहे जायेंगे ॥३६॥
सर्वत्र त्रिविधा पेया संसर्गादौ विधीयते। अकृतादिविकल्पेन ततो यूषस्ततो रसः ॥३७॥
सम्पूर्ण चिकित्सा शास्त्र में संसर्जन आदि के लिये तीन प्रकार की पेयाओं का वर्णन मिलता है, १. कृतयूष २. अकृतयूष ३. मांसरस ॥३७॥
व्यपेतलवणा पूर्वा दीपनीयाम्बुसाधिता।
तानि(सा च)क्षुद्रा, द्वितीया स्यात् किञ्चिल्लवणदीपना ॥३८॥
तद्वदेव तृतीया तु संस्कृता स्नेहमात्रया।
इनमें से पहला अर्थात् कृतयूष लवण से युक्त होता है तथा दीपनीय जल के द्वारा सिद्ध किया हुआ होता है। यह हलका माना गया है इनमें से दूसरा अर्थात् अकृतयूष ईषत् लवण युक्त तथा दीपक होता है। इसी प्रकार तीसरा अर्थात् मांसरस होता है परन्तु यह अल्प (थोड़े) स्नेह के द्वारा सिद्ध किया गया होता है ॥३८॥
अव्यक्तलवणस्नेहो यूषस्त्वकृतको मतः ॥३९॥
मन्दाम्ललवणस्नेहसंस्कारः स्यात् कृताकृतः। व्यक्तस्नेहाम्ललवणः कृतयूषः सुसंस्कृतः ॥४०॥
एवमेव रसं विद्यादिमं पेयादिकं क्रमम्।
जिस यूष में लवण एवं स्नेह स्पष्ट न हो उसे अकृतयूष कहते हैं। जो स्वल्प अम्ल, लवण एवं स्नेह के द्वारा संस्कृत किया गया है उसे कृताकृत यूष कहते हैं। तथा जिस यूष में स्नेह, अम्ल एवं लवण व्यक्त-स्पष्ट हों उस संस्कृत यूष को कृतयूष कहते हैं। अर्थात् जिस यूष में अम्ल, लवण तथा स्नेह स्पष्ट रूप से प्रतीत न हो अथवा जो स्नेह एवं लवण आदि के द्वारा संस्कृत न हो उसे अकृतयूष, जिसमें स्नेह, अम्ल तथा लवण स्पष्ट रूप से प्रतीत हों—जो स्नेह अम्ल लवण आदि के द्वारा सिद्ध किया गया हो—उस यूष को कृतयूष तथा जिसमें अम्ल, लवण एवं स्नेह थोड़ी मात्रा में हों उसे कृताकृत यूष कहते हैं। इसी प्रकार मांसरस को भी समझना चाहिये अर्थात् मांसरस भी ऐसा हो सकता है जो स्नेह लवण आदि के द्वारा सिद्ध हो अथवा न हो। यह पेयादि क्रम कहा गया है ॥३९-४०॥
सकृज्जघन्या द्विर्मध्या त्रिः श्रेष्ठा शुद्धिमर्हति ॥४१॥
जघन्य (हीन) शुद्धि वाले व्यक्ति को इनमें से एक का सेवन करना चाहिये। मध्य शुद्धि वाले को इनमें से दो का तथा श्रेष्ठ शुद्धि वाले व्यक्ति को इनमें से तीनों का सेवन करना चाहिये। अर्थात् हीन शुद्धि वाले व्यक्ति को केवल अकृतयूष का सेवन करना चाहिये। मध्य शुद्धिवाले को अकृत तथा कृत यूष का सेवन करना चाहिये तथा श्रेष्ठ शुद्धि वाले व्यक्ति को अकृत तथा कृतयूष एवं मांसरस-तीनों का सेवन करना चाहिये ॥४१॥
इमां पेयादिसंसर्गी सर्वसंशोधनोपगाम्। आरोग्यकामः सेवेत स्वास्थ्ये प्रकृतिभोजनम् ॥४२॥
वर्जयित्वा विरुद्धान्नं गुर्वसात्म्यं च यद्भवेत्।
आरोग्य की कामना करनेवाले व्यक्ति को चाहिये कि वह संशोधन में सहायता देने वाले उपर्युक्त पेयादि संसर्जन क्रम का सेवन करे। तथा पूर्णरूप से स्वास्थ्य की प्राप्ति हो जाने पर विरुद्ध, गुरु तथा असात्म्य भोजन को छोड़कर शेष प्रकृति (साधारण) भोजन पर पहुंच जावे ॥४२॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रमाणादिप्रयोजनम् ॥४३॥
इसके बाद अब मैं प्रमाण आदि का प्रयोजन कहूंगा। अर्थात् अब वमन, विरेचन आदि की मात्रा का वर्णन करूंगा ॥
संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७] खिलस्थानम् ४१५
वमनीयकषायस्य चत्वारोऽञ्जलयः परा।
मात्रा, मध्या त्रयो, ह्रस्वा द्वौ, तदर्धा विरेचने ॥४४॥
वमन के लिये प्रयुक्त किये जाने वाले कषाय की उत्कृष्ट मात्रा चार अञ्जलि होती है। मध्य मात्रा तीन अञ्जलि तथा ह्रस्व (हीन) मात्रा दो अञ्जलि होनी चाहिये। विरेचन की मात्रा इससे आधी होनी चाहिये अर्थात् विरेचन की उत्कृष्ट मात्रा दो अञ्जलि, मध्य मात्रा डेढ़ अञ्जलि तथा ह्रस्व मात्रा एक अञ्जलि होनी चाहिये ॥४४॥
पुरुषं पुरुषं प्राप्य दोषाणां च बलाबलम्। मदनस्य फलक्वाथः पिप्पलीसर्पपान्वितः ॥४५॥
ग्रहघ्न्या वा स एवाऽथ पटोलारिष्टवत्सकैः ।
युक्तो वाऽथ प्रियङ्गूनां कल्केन मधुकस्य च ॥४६॥
वमनार्थे विधेयः स्यान्मधुसैन्धवमूर्च्छितः ।
प्रत्येक पुरुष (रोगी व्यक्ति) तथा उसके दोषों के बलाबल को देखकर मदनफल के क्वाथ को मधु और सैन्धव से मूच्छित करके अर्थात् मधु और सैन्धव से युक्त करके उसमें पिप्पली और सरसों अथवा ग्रहघ्नी (श्वेत सरसों), पटोल, अरिष्ट (नीम) और वत्सक (इन्द्रजौ) अथवा प्रियङ्गु (फूल प्रियङ्गु) और महुए का कल्क डालकर वमन के लिये प्रयुक्त करना चाहिये ॥४५॥
न त्वजीर्णे, हितं त्वत्र लवणोष्णाम्बु केवलम् ॥४७॥
तद्धि सर्वं समुत्क्लिश्य मुखेनाशु विनिर्हरेत् ।
परन्तु यदि रोगी को अजीर्ण हो तो उस अवस्था में उपर्युक्त ओषधियों का व्यवहार नहीं करना चाहिये, अपितु उस अवस्था में वमन के लिये केवल उष्ण जल में नमक डालकर प्रयोग करना चाहिये। यह सम्पूर्ण दोषों का उत्क्लेश करके दोषों को मुख से बाहर निकाल देता है। मदनफल के कषाय में मधु और सैन्धव का डालना कफ के विलयन के लिये लिखा है। इसलिये चरक सू. अ. १५ में भी कहा है—‘मधुमधुकसैन्धवफाणितोपहिता मदनफलकषायमात्रा पाययेत्’। यदि पूर्वकृत भोजन जीर्ण हो चुका हो तभी उपर्युक्त विधान प्रयोग में लाना चाहिये, भोजन के अजीर्ण की अवस्था में नहीं। इसीलिये चरक सू. अ. १५ में वमन के विधान में ‘सुप्रजीर्णभक्तं’ विशेषण दिया है। तथा चरक सि. अ. ६ में भी अजीर्ण की अवस्था में औषध का निषेध किया गया है ॥४७॥
यद्येवमामं विष्टम्भान्नापैति तत उत्तरम् ॥४८॥
वचाजगन्धामदनपिप्पलीभिस्तदुद्धरेत् । अन्यैर्वा कल्क(ल्प)विहितैर्बीभत्सोद्वेजनौषधैः ॥४९॥
अङ्गुल्युत्पलनालाद्यैर्गलावतुदनैः सुखैः । तत्पार्श्वोदरपृष्ठानां पीडनोन्मर्दनैरपि ॥५०॥
यदि वह दोष आम अवस्था में विद्यमान होने के कारण बाहर न निकले तो उसके बाद वच, अजगन्धा, मैनफल तथा पिप्पली के द्वारा उसे बाहर निकाले अथवा अन्य कल्पों (कटुतुम्बी, जीमूत, धामार्गव आदि) से बनाये हुए बीभत्स (घृणित) तथा उद्वेजन कारक ओषधियों अथवा अंगुली या कमलनाल के द्वारा गले में सुखकारक स्पर्श के द्वारा अथवा रोगी के पार्श्व, उदर और पृष्ठप्रदेश को दबाने या ऊपर की ओर मालिश करने के द्वारा उस दोष को बाहर निकाल देवे ॥
पीतवन्तं च वमनं मुहूर्तमनुपालयेत् । विदाहपूर्वः स्वेदोऽस्य यदा भवति सर्वतः ॥५१॥
विष्यन्दमानं जानीयात्तदा दोषं भिषग्वरः । लोमहर्षेण चान्वक्षं स्थानेभ्यश्चलितं तथा ॥५२॥
आध्मानोद्वेष्टनाभ्यां च निर्दिशेत् कोष्ठमाश्रितम् । हल्लासास्यपरिस्रावैश्चामुखीभूतमुद्धरेत् ॥५३॥
उष्णाम्बु लवणोपेतं पीत्वाऽऽकण्ठं पुनः पुनः ।
४१६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७]
वमन औषध पिलाने के बाद मुहूर्त भर (थोड़ी देर) प्रतीक्षा करे। रोगी को पहले गरमी लगेगी तथा उसके बाद सारे शरीर में पसीना आने लगेगा। उस समय वैद्य यह समझ ले कि दोष पिघल रहे हैं। तथा शरीर में लोमहर्ष के द्वारा दोषों को अपने स्थान से विचलित हुआ जाने। आध्मान तथा उद्वेष्टन के द्वारा दोषों को कोष्ठ में आया हुआ तथा जी मलचाने और मुख में लालास्राव के द्वारा दोषों को ऊर्ध्वमुख जाने तब कण्ठपर्यन्त लवणयुक्त उष्ण जल पुनः २ पीकर वमन के द्वारा दोषों को बाहर निकाल दे। सुश्रुत के अनुसार औषध पिलाने के बाद प्रतीक्षा काल में अग्नि पर हाथों को तपाकर रोगी को उष्णता पहुँचानी चाहिये ॥५१-५३॥
यावत् स्युरष्टौ षड्वाऽपि वेगाश्चत्वार एव वा ॥५४॥ आपित्तदर्शनाद्वाऽपि दोषोच्छित्तेरतथापि वा।
वमन के वेग-वमन में आठ, छै अथवा चार वेग आने चाहिये (अर्थात् उत्कृष्ट शोधन में ८ वेग, मध्य शोधन में ६ वेग तथा हीन शोधन में वमन के ४ वेग होने चाहिये। चरकसि. अ. १ में कहा है—जघन्यमध्यप्रवरेषु वेगाश्चत्वार इष्टा वमने षडष्टौ। अथवा वमन में कफ के बाद पित्त निकलने लगे या दोष नष्ट हो जायें तब तक वमन औषधि देनी चाहिये। चरक सि. अ. १ में कहा है-'पित्तान्तमिष्टं वमनं तथोर्ध्वम्' अर्थात् वमन पित्त निकलने पर्यन्त देना चाहिये। वमन में दोषों के निकलने का क्रम चरक सि. अ. १ में निम्न प्रकार से दिया है। क्रमात् कफः पित्तमथानिलश्च यस्यैति सम्यग्वमितः स इष्टः ॥५४॥
मानप्रमाणतो वैकाध्यर्धद्विप्रस्थसंमितम् ॥५५॥ पीतादभ्यधिकं यत् स्यात् सदोषस्तद्विनिर्गमे।
दोषों के मान के अनुसार पी हुई औषध के अतिरिक्त एक, डेढ़ और दो प्रस्थ दोष निकलने चाहिये अर्थात् हीन शुद्धि में एक प्रस्थ, मध्य शुद्धि में डेढ़ प्रस्थ तथा उत्कृष्ट शुद्धि में दो प्रस्थ होना चाहिये। वमन के वेगों के मान के विषय में चरक सि. अ. १ में कहा है—पित्तान्तमिष्टं वमनं विरेकादर्थम्.....। अर्थात् वमन में दोषों का परिमाण विरेचन से आधा होना चाहिये। वमन में पी हुई औषध के निकलने के बाद तथा विरेचन में दो तीन पुरीषयुक्त वेगों के पश्चात् वेगों को मापना चाहिये। यहां पर प्रस्थ १६ पल का नहीं लेना चाहिये अपितु परिभाषा के अनुसार १३-१/२ पल का लेना चाहिये। वमन आदि की मात्रा यदि पी हुई औषध से अधिक हो तो वह निकलते हुए दोषयुक्त होती है ॥५५॥
निरामगन्ध्यं सोद्गारं यावत् पीतमपिच्छिलम् ॥५६॥ यदा विकलुषं वान्तं दृश्यतेऽम्बु प्रतिग्रहे¹। कुक्ष्युरःकण्ठशिरसां लाघवं रोगमार्दवम् ॥५७॥ क्लमकार्श्ये न चात्यर्थमुत्साहो विशदात्मता। सद्यो निर्हृतदोषस्य लिङ्गान्येतानि निर्दिशेत् ॥५८॥
दोषों के निकल जाने पर लक्षण-जब पी हुई ओषधि रोगी को आमगन्ध से रहित उद्गार (डकार) सहित वापिस आ जाये तथा पीकदान में वमन किया हुआ जल (द्रव्य) पित्तालता तथा कलुषता (दोषों) से रहित दिखाई देवे, कुक्षि (कोख), छाती, कण्ठ तथा सिर में लघुता प्रतीत हो, रोग मृदु हो जायें, शरीर में थकावट तथा कमजोरी बहुत अधिक मालूम न पड़े, उत्साह एवं विशदता (प्रसन्नता) दिखाई दे-इन लक्षणों को देखकर यह समझना चाहिये कि उसके दोष निकल गये हैं ॥५६-५८॥
१. पतद्ग्रहे इत्यर्थः। 'पीकदानी' इति भाषायाम्। 'प्रतिग्रहः स्वीकारणे सैन्ये पृष्ठे पतद्ग्रहे' इति मेदिनी।
| संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७] | खिलस्थानम् | ४१७ |
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शिरोगतं ततश्चास्य त(तै)लैः स्विन्नस्य देहिनः। दोषावशेषं नस्येन धूमपानेन वा हरेत् ।। ५९ ।।
इसके (वमन के) बाद उसके सिर में बचे हुए दोषों को सिर में तेल की मालिश करके तथा फिर नस्य और धूम्रपान के द्वारा नष्ट करे। ऊर्ध्वजत्रुज दोषों को नष्ट करने के लिये धूम्रपान तथा नस्य विशेष प्रभाव रखते हैं अतः सिर में स्थित दोषों को निकालने के लिये धूम्रपान एवं नस्य का प्रयोग कराया जाता है ॥५९॥
यथाशुद्धि ततश्चैनं संसर्गेणोपपादयेत् । हरीतक्या ग्रहघ्न्या वा कल्पोक्तं स्याद्विरेचनम् ।। ६० ।।
इसके बाद सम्यक् प्रकार से शुद्धि हो जाने पर रोगी को संसर्जन क्रम के द्वारा भोजन कराये तदनन्तर कल्पोक्त हरीतकी अथवा ग्रहघ्नी (श्वेत सरसों) के द्वारा विरेचन कराये। जिस व्यक्ति को वमन के बाद विरेचन देना हो उसे पुनः स्नेहन तथा स्वेदन देकर तब विरेचन देना चाहिये। संशोधन कराने में वमन कराने के १५ दिन बाद विरेचन देना चाहिये। सुश्रुत में कहा है—'पक्षाद्विरेको वान्तस्य' इन १५ दिनों में पेयादि संसर्जन क्रम का सेवन और स्नेहन-स्वेदन आदि करना चाहिये ॥६०॥
पिप्पलीसैन्धवोपता पथ्या वा त्रिवृतायुता । शृतं चारग्वधफलं क्षीरेणाथ रसेन वा ।। ६१ ।।
त्रिफला वा त्रिवृद्युक्ता सघृतव्योषसैन्धवा । तथा गन्धर्वतैलं वा श्रेष्ठं स्नेहविरेचनम् ।। ६२ ।।
अथवा पिप्पली और सैन्धव से युक्त हरीतकी अथवा त्रिवृत् युक्त हरीतकी देवे। अथवा अमलतास के गूदे के क्वाथ को दूध या मांसरस से देवे। अथवा त्रिफला और त्रिवृत् में घृत, व्योष (त्रिकटु-सोंठ, मरिच, पीपल और सैन्धव) मिलाकर दें। अथवा गन्धर्व तैल (एरण्ड तैल) श्रेष्ठ स्नेह विरेचन है ॥६१-६२॥
दशमूलकषायेण जाङ्गलानां रसेन वा । द्राक्षाक्वाथेन वा युक्तमथवा दीपनाम्बुना ।। ६३ ।।
त्रिवृद्द्राक्षाभयानां वा गवां मूत्रेण संयुता । सद्राक्षा त्रिवृता वा स्यादथवा त्रिवृताष्टकम् ।। ६४ ।।
दशमूल के क्वाथ, जांगल मांसरस, द्राक्षा (मुनक्का) के क्वाथ, दीपनीय जल अथवा गोमूत्र के साथ त्रिवृत्, द्राक्षा और हरड़ का प्रयोग करना चाहिये। अथवा द्राक्षा और त्रिवृत् या त्रिवृताष्टक चूर्ण का सेवन करें ॥६३-६४॥
पथ्या त्रिजातकं व्यूषं विडङ्गामलकं घनम् । समानि, षड्गुणा त्वत्र शर्कराऽष्टगुणा त्रिवृत् ।। ६५ ।।
चूर्णं ज्वरश्रमश्वासकासपाण्ड्वामयक्षयान् । हन्यात् क्रिमिविषार्शांसि मूत्रकृच्छ्रं च देहिनाम् ।। ६६ ।।
त्रिवृताष्टक चूर्ण—हरड़, त्रिजातक (दालचीनी, छोटी इलायची तथा तेजपत्र), त्रिकटु, विडङ्ग, आंवला तथा नागरमोथा—सब द्रव्य समभाग लेवें। इसमें ६ गुना शर्करा तथा ८ गुना त्रिवृत् डालकर सबका चूर्ण करें। यह चूर्ण प्राणियों के ज्वर, श्रम, श्वास, कास, पाण्डुरोग, क्षय, कृमि, विष, अर्श तथा मूत्रकृच्छ्र को नष्ट करता है ॥६५-६६॥
दशावरे, पञ्चदश मध्यमे, त्रिंशदुत्तमे । वेगा द्वित्रिचतुष्प्रस्थप्रमाणाः स्युर्विरेचने ।। ६७ ।।
विरेचन के वेग—अवर (हीन) विरेचन में दस, मध्यम विरेचन में १५ तथा उत्तम विरेचन में ३० वेग होते हैं। तथा मान के अनुसार दोषों का प्रमाण हीन विरेचन में दो प्रस्थ, मध्यम विरेचन में तीन प्रस्थ तथा उत्तम विरेचन में चार प्रस्थ होना चाहिये। चरक सि. अ. १ में विरेचन के मध्यम योग में १५ के स्थान पर २० वेग दिये हैं ॥६७॥
विट्पित्तकफसंमिश्राः सवाताः स्युर्यथाक्रमम् । पित्तावसाना वमने कषायकफमूर्च्छिताः ।। ६८ ।।
सम्यग्योगेऽतियोगेऽतिप्रवृत्तिः शोणितोत्तरा ।
अयोगे त्वप्रवृत्तिः स्याद्विपरीताऽल्पशोऽपि वा ।। ६९ ।।
विभ्रंशः कर्मणो भ्रंशः केवलौषधनिर्गमः ।
| ४१८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७] |
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विरेचन में दोषों के निकलने का क्रम—विरेचन के सम्यक् योग में सबसे पहले मल फिर क्रमशः पित्त, कफ तथा वायु निकलते हैं। तथा वमन में पहले कषाय औषध फिर कफ तथा अन्त में पित्त निकलता है। आमाशय के खाली हो जाने पर अन्त में केवल वायु ही निकलती हैं। विरेचन का अतियोग—इसमें उपर्युक्त दोष अत्यधिक मात्रा में निकलते हैं तथा अन्त में मल के साथ रक्त आने लगता है। विरेचन के अयोग के लक्षण—विरेचन का सर्वथा प्रवृत्त न होना, विपरीत मार्ग में प्रवृत्त होना (अर्थात् विरेचन न होना तथा स्वयं औषध का भी वापिस न निकलना अपि तु ऊर्ध्वगति होकर आध्मान, वमन आदि उपद्रवों का करना), विरेचन का अल्प मात्रा में होना, विभ्रंश (कोष्ठस्थित अङ्गों का स्वस्थान से च्युत हो जाना अथवा गुदभ्रंश–कांच निकलना), विरेचन कार्य का बिलकुल न होना अथवा विरेचन के लिये पीई हुई केवल औषध का ही निकल जाना—ये अयोग के लक्षण होते हैं ॥६८-६९॥
सर्पिष्यानं विकारे स्यादातियोगानुबन्धजे ॥७०॥
मधुकादिविपक्वं वा तैलं तत्रानुवासनम् ।
विरेचन के अतियोग से होने वाले विकारों में घृतपान कराना चाहिये अथवा मुलहठी के द्वारा सिद्ध तैल से अनुवासन बस्ति देनी चाहिये ॥७०॥
दुर्वान्तं दुर्विरिक्तं वा स्निग्धदेहं बलान्वितम् ॥७१॥
बहुदोषं दृढाग्निं च पाययेदपरेऽहनि । दुर्बलं क्रमशो भूयः स्निग्धस्विन्नं विशोधयेत् ॥७२॥
(इति ताडपत्रपुस्तके २१६ तमं पत्रम्)
दुर्वान्त तथा दुर्विरिक्त पुरुष (जिसे वमन तथा विरेचन ठीक प्रकार न हुआ हो—अयोग हो) का शरीर यदि स्निग्ध तथा बलवान् हो, दोष अधिक मात्रा में विद्यमान हों तथा जाठराग्नि प्रदीप्त हो तो उसे अगले दिन वमन या विरेचन औषध पुनः पिलानी चाहिये। यदि रोगी दुर्बल है तो उसे नये सिरे से स्नेहन तथा स्वेदन देने के बाद ही पुनः वमन तथा विरेचन ओषधि पिलानी चाहिये। अर्थात् यदि रोगी को वमन तथा विरेचन औषध पिलाने के बाद ठीक प्रकार से वमन तथा विरेचन न हुआ हो परन्तु रोगी का शरीर स्निग्ध तथा बलवान् हो, शरीर में दोषों की मात्रा अधिक हो तथा जाठराग्नि तेज हो तो उसे अगले ही दिन पुनः वमन या विरेचन ओषधि पिलानी चाहिये। परन्तु यदि रोगी दुर्बल है तो अगले दिन ओषधि नहीं देनी चाहिये अपितु नये सिरे से दोबारा शरीर का स्नेहन तथा स्वेदन करने के बाद ही पुनः वमन तथा विरेचन ओषधि पिलाये। वमन या विरेचन के अयोग में पुनः ओषधि देने से पहले यह देख लेना आवश्यक है कि पूर्व प्रदत्त ओषधि जीर्ण हो चुकी है या नहीं। पूर्व औषधि के जीर्ण होने पर ही पुनः ओषधि देनी चाहिये अन्यथा अतियोग का भय रहता है। इसके अतिरिक्त रोगी के कोष्ठ तथा शारीरिक बल का ध्यान रखना भी आवश्यक है। यदि रोगी बलवान् है तो तीक्ष्ण ओषधि देनी चाहिये और यदि रोगी निर्बल है तो मृदु संशोधन देना चाहिये ॥
न तु दुश्छर्दनं जातु क्रूरकोष्ठमथापि वा । तयोः संशमनैर्दोषान् बस्तिभिर्वा शमं नयेत् ॥७३॥
अहृद्यमतिदुर्गन्धमजीर्णे चाति वा बहु । यस्यानुलोमिकं पीतमूर्ध्वं याति कफावृतम् ॥७४॥
तं वामितं लङ्घितं वा परिस्निग्धं विरेचयेत् ।
दुर्वम्य (जिसे वमन कठिनता से होता हो) अथवा क्रूरकोष्ठ (जिसे विरेचन अत्यन्त कठिनता से होता हो) पुरुष को कभी भी वमन या विरेचन ओषध दोबारा नहीं देनी चाहिये। उनके दोषों को संशमन उपायों अथवा बस्ति के द्वारा शान्त करना चाहिये। चरक सि. अ. ६ में कहा है कि उन्हें साधारणतया पुनः वामक या विरेचक ओषधि नहीं देनी चाहिये और यदि देनी ही पड़े तो अधिक मात्रा में नहीं देनी चाहिये ॥
संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७] खिलस्थानम् ४१९
जिस रोगी को पिलाई गई विरेचक औषध हृदय को अच्छी न लगने, अत्यन्त दुर्गन्ध युक्त होने, अजीर्ण में ओषधि का प्रयोग करने अथवा मात्रा में अत्यन्त अधिक होने के कारण कफ से आवृत्त हुई ओषधि ऊपर की ओर चली जाती है अर्थात् विरेचन न होकर वमन हो जाता है उसे वमन, लङ्घन तथा स्नेहन कराकर विरेचन कराये ।।७३-७४।।
अत्यर्थस्निग्धदेहस्य विशुद्धामाशयस्य वा ।।७५।। मारुतस्यानुलोम्यस्य यस्याधो वमनं व्रजेत् । तस्य संसर्गमात्रेण परिशुद्धिर्विधीयते ।।७६।। दुर्बलस्याल्पदोषस्य मृदु संशोधनं हितम्।
जिस व्यक्ति का शरीर अत्यन्त स्निग्ध होने से, आमाशय शुद्ध होने से अर्थात् आमाशय में कफ का संचय न होने से तथा वायु के अनुलोम होने से वमन औषध नीचे की ओर चली जाये अर्थात् वमन न होकर विरेचन हो जाये उस व्यक्ति की संसर्जन मात्र से शुद्धि हो जाती है । दुर्बल तथा अल्प दोष वाले व्यक्ति के लिये मृदु संशोधन देना चाहिये ।।७५-७६।।
विगृहीताचिराद्दोषैः स्तोकं स्तोकं व्रजत्यधः ।।७७।। उष्णाम्बुपानं तत्र स्यादानुलोम्यकरं परम्।
ओषधि के द्वारा दोषों के शीघ्र ही ग्रहण न किये जाने के कारण दोष धीरे २ नीचे आता है । उस अवस्था में उष्णजल पिलाना चाहिये । वह मल तथा दोषों की गति का अनुलोमन करता है अर्थात् जब बार २ थोड़ा २ मल आता हो तब उष्ण जल पिलाना चाहिये जिससे दोषों तथा मलों की गति अनुलोम हो जाती है ।।७७।।
दोषो भवेद्वा सोद्गारो नोर्ध्वं नाधश्च गच्छति ।।७८।। सशूले भेषजे जन्तोः स्वेदं तत्रावचारयेत्।
औषध का सेवन करने पर रोगी को उद्गार (उबकाई) आने लगे तथा दोष न ऊपर की ओर जाये और न नीचे की ओर जाये । अर्थात् दोष न वमन के द्वारा निकले और न विरेचन के द्वारा निकले तथा रोगी के पेट में शूल हो तो उस अवस्था में स्वेदन देना चाहिये ।।७८।।
मात्राविरिक्ते सोद्गारमौषध क्षिप्रमुद्धरेत् ।।७९।। अतिप्रवृत्तौ जीर्णेऽस्मिन् स्तम्भनीयैरुपक्रमेत्।
योग्य मात्रा में विरेचन हो जाने के बाद भी यदि ओषधि के डकार आते हों तो शीघ्र ही वमन द्वारा उस ओषधि को बाहर निकाल देना चाहिये । अन्यथा विरेचन का अतियोग हो जायेगा । तथा वेग की अति प्रवृत्ति (अतियोग) में औषध के जीर्ण होने पर स्तम्भक द्रव्यों के द्वारा इसका स्तम्भन करे ।।
दीप्ताग्नेः क्रूरकोष्ठस्य बहुदोषस्य देहिनः ।।८०।। सोदावर्तस्य निर्हृत्य पुरीषं फलवर्तिभिः । सुस्निग्धस्विन्नगात्रस्य भिषग्दद्याद्विरेचनम् ।।८१।।
जिस व्यक्ति की अग्नि दीप्त हो, कोष्ठ क्रूर हो (अर्थात् विरेचन अत्यन्त कठिनता से हो) तथा शरीर में दोष बहुत अधिक विद्यमान हों—उसे यदि उदावर्त हो जाय तो वैद्य फलवर्तियों के द्वारा उसके मल को निकाल कर शरीर का स्नेहन एवं स्वेदन करके उसे विरेचन देवे ।।८०-८१।।
यदसक्तं महावेगैः सुखेनाशु प्रवर्तते । अनाबाधकरं नातिग्लपनं दोषशोधनम् ।।८२।। अव्यापन्नगुणोदर्कं मात्रायुक्तं सुसंस्कृतम् । पीतमेकाग्रमनसा सम्यक्च्छुद्धिकृदावहेत् ।।८३।।
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४२० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
सम्यक् शुद्धि करनेवाली ओषधि के लक्षण—जो ओषधि शरीर के अन्दर लगी हुई न रहे, अत्यन्त वेग के साथ सुखपूर्वक प्रवृत्त हो जाय, जो शरीर में कोई कष्ट न पहुँचाये, अत्यन्त ग्लानि उत्पन्न न करे, दोषों का शोधन करे, जिसके शुभ गुण नष्ट न हों, जो योग्य मात्रा में सेवन की जाय, जिसका अच्छी प्रकार संस्कार किया गया हो तथा जो एकाग्र मन से पीई गई हो—वह ओषधि सम्यक् प्रकार से शुद्धि करनेवाली कही गई है ॥८२-८३॥
दीप्ताग्नयः कर्मनित्या ये नरा रूक्षभोजिनः । शश्वद्दोषाः क्षयं यान्ति तेषां वाय्वग्निकर्मभिः ॥८४॥
विरुद्धाध्यशनाजीर्णदोषानपि सहन्ति ते । स्वस्थवृत्तौ न ते शोध्या रक्ष्या वातविकारात: ॥८५¹॥
विज्ञायैवंविधं वैद्यः संशुद्धिं कर्म(र्तु)मर्हति ।।
जिन व्यक्तियों की अग्नि प्रदीप्त है, जो नित्य परिश्रम आदि करते हैं, जो रूक्ष भोजन करते हैं—उनके दोष वायु, अग्नि तथा व्यायाम आदि कर्मों के द्वारा ही शान्त हो जाते हैं। वे व्यक्ति विरुद्ध भोजन, अध्यशन तथा अजीर्ण आदि दोषों को भी सह लेते हैं अर्थात् इन उपद्रवों से भी उनमें कोई विकार उत्पन्न नहीं होता है। उनका स्वास्थ्यावस्था में शोधन नहीं करना चाहिये तथा वायु के विकारों से उनकी रक्षा करनी चाहिये—अर्थात् यदि उन्हें कोई रोग न हो तो उनका वमनविरेचन आदि के द्वारा संशोधन करने की आवश्यकता नहीं है। रोग होने पर तो संशोधन करना ही पड़ता है। अन्य व्यक्तियों को जिस प्रकार रोग न होने पर भी ऋतु के अनुसार संशोधन कराया जाता है वैसा इनमें नहीं करना चाहिये केवल रोग की अवस्था में ही शोधन कराया जा सकता है। वैद्य को इन सब उपर्युक्त बातों को देखकर संशोधन करना चाहिये ॥८४-८५॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।
(इति) खिलेषु संशुद्धिविशेषणीयो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७॥
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
(इति) खिलेषु संशुद्धिविशेषणीयो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७॥
अथ बस्तिविशेषणीयो नामाष्टमोऽध्यायः ।
अथातो बस्तिविशेषणीयं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।
अब हम बस्तिविशेषणीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। अर्थात् इस अध्याय में बस्ति के विशेष गुण तथा प्रयोगों का वर्णन किया जायगा ।।
बस्तिदानात् परं नास्ति चिकित्साऽङ्गेसुखावहा ।
शाखाकोष्ठगता रोगाः सर्वार्धाङ्गगताश्च ये ।।३।।
तेषां समुद्भवे हेतुर्वातादन्यो न विद्यते ।
१. अनयोः ८४-८५ श्लोकयोः प्रायः संवादिनी चरककल्पस्थाने १२ अध्याये ७८-७१ श्लोकौ ।
बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८] खिलस्थानम् ४२१
बस्ति से बढ़कर कोई भी चिकित्सा शरीर के अङ्गों को सुखक देनेवाली नहीं है। शाखागत, कोष्ठगत, सम्पूर्ण शरीरगत अथवा अर्धशरीरगत जितने भी रोग हैं उनकी उत्पत्ति में वायु के अतिरिक्त अन्य कोई कारण नहीं है।
वक्तव्य—चरक में तीन रोगों के मार्ग गिनाये गये हैं—१. शाखा २. मर्मास्थिसन्धि ३. कोष्ठ। शाखा से अभिप्राय रक्त आदि धातु तथा त्वचा है—यह रोग का बाह्य मार्ग है। बस्ति, हृदय, मूर्धादि मर्म तथा अस्थियों की सन्धियां—रोगों का मध्यम मार्ग है। कोष्ठ से अभिप्राय शरीर के आन्तरिक अवयवों—विशेषकर आमाशय, पक्वाशय आदि से है। यह रोगों का आभ्यन्तर मार्ग कहा गया है। यहां शाखा तथा कोष्ठ का स्पष्ट रूप से ग्रहण किया गया है परन्तु रोग के मध्यममार्ग (मर्मास्थिसन्धि) का उल्लेख स्पष्ट नहीं है। सर्वगत तथा अर्धाङ्गगत रोगों से इसका ग्रहण किया जा सकता है। इन सब रोगों का कारण वायु को माना गया है॥३॥
तथा कफस्य पित्तस्य मलानां च रसस्य च॥४॥
विक्षेपणे संहरणे वायुरेवात्र कारणम्।
इसी प्रकार कफ, पित्त, मल और रस के विक्षेप और संघात (वियोग तथा संयोग) में भी वायु ही कारण है। अर्थात् वास्तव में रोगों का कारण वायु ही है तथा कफ, पित्त आदि के वियोग और संयोग के कारण जो नाना प्रकार के रोग होते हैं-उनका भी वायु ही कारण है।
वक्तव्य—यद्यपि पित्त और कफ भी रोगों की उत्पत्ति में कारण होते हैं तथापि वायु प्रधान कारण है। पित्त तथा कफ चेष्टाहिन माने गये हैं। वायु ही उन्हें इधर उधर विक्षिप्त करके रोगोत्पत्ति कराता है॥४॥
जेता चास्य प्रवृद्धस्य बस्तितुल्यों न कश्चन॥५॥
तदुपार्धं¹ चिकित्सायाः सर्वं वातचिकित्सितम्।
इस प्रकार इस प्रवृद्ध हुए वायु को जीतने के लिये बस्ति के समान अन्य कोई उपाय नहीं है। इस प्रकार बस्तिक्रिया सम्पूर्ण वातरोगों की प्रायः आधी चिकित्सा मानी गई है। अर्थात् वातरोगों की सम्पूर्ण चिकित्सा में अकेली बस्ति ही लगभग आधी चिकित्सा है-वातरोगों की आधी चिकित्सा केवल बस्ति के द्वारा हो सकती है॥५॥
कर्म कालश्च योगश्च तिस्रः संज्ञा यथाक्रमम्॥६॥
वक्ष्ये निरुक्तनिर्देशसंख्यादोषविकल्पतः।
निरुक्ति, निर्देश, संख्या तथा दोष के भेद के अनुसार यथाक्रम कर्मबस्ति, कालबस्ति तथा योगबस्ति का मैं वर्णन करूंगा। अर्थात् बस्ति समूह तीन प्रकार का होता है। १. कर्म २. काल ३. योग॥६॥
बाहु ............ तेः कर्मसंज्ञितम्॥७॥
अत्युदीर्णबले जाते प्रयोज्यं तद्यथाविधि।
कर्मबस्ति—इनमें से कर्मसंज्ञक बस्ति का शरीर में बल के अधिक होने पर यथाविधि प्रयोग करना चाहिये॥७॥
तदर्धकलनात् कालः स हि मध्यबलान्वये॥८॥
पवने पित्तसंसृष्टे विधातव्यो विजानता।
१. तदुपार्धं बस्तिक्रियाऽर्धप्रायमित्यर्थः। यावन्ति वातचिकित्सितानि तेषु बस्तिकर्म अर्धप्रायं भवतीति भावः। चरकसिद्धिस्थानेऽपि बस्तिकर्मणो वातचिकित्सार्धत्वं निदर्शितम्।
४२२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८]
कालबस्ति—कर्मबस्ति की अपेक्षा संख्या में आधी होने के कारण इसे कालबस्ति कहते हैं। शरीर में बल मध्यम होने पर तथा वायु के साथ पित्त का संसर्ग होने पर बुद्धिमान व्यक्ति को इसका प्रयोग करना चाहिये ॥८॥
अल्पत्वात् स्नेहबस्तीनां युक्तेर्योगः स लाघवात् ।।९।।
प्रयोज्यः कफसंसृष्टे नातितीव्रबलेऽनिले ।
योगबस्ति—इसमें स्नेहबस्तियों के योग के कम होने से तथा इसी लिये लघु होने से इसे योगबस्ति कहा है। यदि कफ का संसर्ग हो तथा इसमें वायु का बल अधिक तीव्र न हो तो इसका प्रयोग करना चाहिये ॥९॥
अन्वासनाश्चतुर्विंशतिर्निरूहाः षट् च कर्मणि ।।१०।।
(द्वादशाऽन्वासनाः काले) निरूहाश्चात्र वै त्रयः ।।११।।
त्रय एव निरूहाः स्युर्योगे पञ्चानुवासनाः । कर्मादीनां त्रिपञ्चाशद्वस्तिसंख्या निदर्शिता ।।१२।।
कर्मबस्ति समुदाय में अनुवासन बस्ति २४ तथा निरूह बस्तियां ६ होती हैं। कालबस्तियों में १२ अनुवासन तथा ३ निरूह बस्तियां होती हैं। तथा योगबस्ति में ५ अनुवासन तथा ३ निरूह बस्तियां होती हैं। इस प्रकार कर्म, काल तथा योग में कुल बस्तिसंख्या ५३ होती हैं। कर्मबस्तियां कुल ३०, कालबस्तियां १५ तथा योगबस्तियां ८ होती हैं। इस प्रकार कुल ३०+१५+८=५३ बस्तियां होती हैं। चरक सि. अ. १ में कहा है--त्रिंशत्स्मृताः कर्मसु बस्तयो हि कालस्ततोऽर्धेन ततश्च योगः। अर्थात् कर्म ३० बस्तियों के समुदाय को कहते हैं। कालसंज्ञक बस्ति समुदाय में कर्म की अपेक्षा आधी अर्थात् १५ या १६ बस्ति होती हैं। और योग संज्ञक बस्ति समुदाय में इसमें भी आधी अर्थात् ८ बस्तियां होती हैं। यहां कुल संख्या ३०+१६+८=५४ दी है। क्योंकि १५ का आधा करने पर ७-१/२ होता है जो कि बस्ति की अवस्था में संभव नहीं। आधी बस्ति नहीं दी जा सकती। इस लिये इसे १६ मान लिया गया है। जिससे उसका आधा करने पर योगबस्तियां ८ होती हैं ॥१०-१२॥
पञ्चादौ कर्मणि स्नेहाश्चत्वारोऽन्ते तथाऽनयोः । मध्ये षण्णां निरूहाणामन्तरेषु त्रयस्त्रयः ।।१३।।
आदावन्तेऽन्तरे चैव काले स्नेहास्त्रयस्त्रयः । योगे निरूहान्तरितास्त्रयोऽन्ते द्वाविति क्रमात् ।।१४।।
प्रोक्तो विभागनिर्देशस्तद्विकल्पमतः शृणु ।
कर्मबस्ति में प्रारम्भ में ५ तथा अन्त में ४ स्नेहबस्तियां होती हैं तथा इनके मध्य में भी ६ निरूहों के बीच में तीन स्नेहबस्तियां होती हैं कालबस्ति में प्रारंभ, अन्त तथा बीच में भी तीन २ स्नेहबस्तियां होती हैं। अर्थात् इसमें स्नेह-बस्तियां ३ प्रारंभ में, तीन अन्त में तथा एक २ निरूह के व्यवधान से तीन निरूहों के बीच में तीन २ (अर्थात् ६) मध्य में होती हैं। इसमें निरूह बस्ति ३ होती हैं। योग बस्ति में स्नेहबस्तियां निरूह के व्यवधान से बीच २ में तीन तथा दो अन्त में होती हैं। अर्थात् तीन मध्य में, दो अन्त में एवं एक प्रारंभ में होती है। तथा बीच २ में तीन निरूह होती हैं। इन्हें हम निम्नरूप में रख सकते हैं-कर्मबस्ति-५ स्नेह+१ निरूह+३ स्नेह+१ निरूह+३ स्नेह+१ निरूह+३ स्नेह+१ निरूह+३ स्नेह+१ निरूह+३ स्नेह+१ निरूह+४ स्नेह=३०, कालबस्ति-३ स्नेह+१ निरूह+३ स्नेह+१ निरूह+३ स्नेह+१ निरूह+३ स्नेह=१५, योगबस्ति-१ स्नेह+१ निरूह+१ स्नेह+१ निरूह+१ स्नेह+१ निरूह+२ स्नेह+८। चरक सि. अ. १ में यह बस्ति समुदाय कुछ भिन्न रूप में मिलता है। तद्यथा-कर्मबस्ति में १ स्नेहबस्ति आदि में+५ अन्त में+मध्य में १२ अनुवासन+१२ निरूह=३० बस्तियां काल बस्ति में अन्त में ३ स्नेहबस्तियां+प्रारंभ में १ स्नेहबस्ति+निरूह के व्यवधान से ६ स्नेहबस्तियां=१६ बस्तियां। योगबस्ति में ३ निरूह+आदि, अन्त और मध्य की मिलाकर ५ स्नेहबस्तियां=८ बस्तियां। इस प्रकार यह कर्म, काल तथा योग के अनुसार बस्तियों के विभाग का निर्देश किया गया है। अब इसके विस्तार को सुनो। यहां यह जिज्ञासा हो सकती है कि इस प्रकार निरूह एवं अनुवासन के