काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 780, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें४२० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
सम्यक् शुद्धि करनेवाली ओषधि के लक्षण—जो ओषधि शरीर के अन्दर लगी हुई न रहे, अत्यन्त वेग के साथ सुखपूर्वक प्रवृत्त हो जाय, जो शरीर में कोई कष्ट न पहुँचाये, अत्यन्त ग्लानि उत्पन्न न करे, दोषों का शोधन करे, जिसके शुभ गुण नष्ट न हों, जो योग्य मात्रा में सेवन की जाय, जिसका अच्छी प्रकार संस्कार किया गया हो तथा जो एकाग्र मन से पीई गई हो—वह ओषधि सम्यक् प्रकार से शुद्धि करनेवाली कही गई है ॥८२-८३॥
दीप्ताग्नयः कर्मनित्या ये नरा रूक्षभोजिनः । शश्वद्दोषाः क्षयं यान्ति तेषां वाय्वग्निकर्मभिः ॥८४॥
विरुद्धाध्यशनाजीर्णदोषानपि सहन्ति ते । स्वस्थवृत्तौ न ते शोध्या रक्ष्या वातविकारात: ॥८५¹॥
विज्ञायैवंविधं वैद्यः संशुद्धिं कर्म(र्तु)मर्हति ।।
जिन व्यक्तियों की अग्नि प्रदीप्त है, जो नित्य परिश्रम आदि करते हैं, जो रूक्ष भोजन करते हैं—उनके दोष वायु, अग्नि तथा व्यायाम आदि कर्मों के द्वारा ही शान्त हो जाते हैं। वे व्यक्ति विरुद्ध भोजन, अध्यशन तथा अजीर्ण आदि दोषों को भी सह लेते हैं अर्थात् इन उपद्रवों से भी उनमें कोई विकार उत्पन्न नहीं होता है। उनका स्वास्थ्यावस्था में शोधन नहीं करना चाहिये तथा वायु के विकारों से उनकी रक्षा करनी चाहिये—अर्थात् यदि उन्हें कोई रोग न हो तो उनका वमनविरेचन आदि के द्वारा संशोधन करने की आवश्यकता नहीं है। रोग होने पर तो संशोधन करना ही पड़ता है। अन्य व्यक्तियों को जिस प्रकार रोग न होने पर भी ऋतु के अनुसार संशोधन कराया जाता है वैसा इनमें नहीं करना चाहिये केवल रोग की अवस्था में ही शोधन कराया जा सकता है। वैद्य को इन सब उपर्युक्त बातों को देखकर संशोधन करना चाहिये ॥८४-८५॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।
(इति) खिलेषु संशुद्धिविशेषणीयो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७॥
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
(इति) खिलेषु संशुद्धिविशेषणीयो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७॥
अथ बस्तिविशेषणीयो नामाष्टमोऽध्यायः ।
अथातो बस्तिविशेषणीयं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।
अब हम बस्तिविशेषणीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। अर्थात् इस अध्याय में बस्ति के विशेष गुण तथा प्रयोगों का वर्णन किया जायगा ।।
बस्तिदानात् परं नास्ति चिकित्साऽङ्गेसुखावहा ।
शाखाकोष्ठगता रोगाः सर्वार्धाङ्गगताश्च ये ।।३।।
तेषां समुद्भवे हेतुर्वातादन्यो न विद्यते ।
१. अनयोः ८४-८५ श्लोकयोः प्रायः संवादिनी चरककल्पस्थाने १२ अध्याये ७८-७१ श्लोकौ ।