काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबस्तिविशेषणीयाध्यायः ८] खिलस्थानम् ४२१
बस्ति से बढ़कर कोई भी चिकित्सा शरीर के अङ्गों को सुखक देनेवाली नहीं है। शाखागत, कोष्ठगत, सम्पूर्ण शरीरगत अथवा अर्धशरीरगत जितने भी रोग हैं उनकी उत्पत्ति में वायु के अतिरिक्त अन्य कोई कारण नहीं है।
वक्तव्य—चरक में तीन रोगों के मार्ग गिनाये गये हैं—१. शाखा २. मर्मास्थिसन्धि ३. कोष्ठ। शाखा से अभिप्राय रक्त आदि धातु तथा त्वचा है—यह रोग का बाह्य मार्ग है। बस्ति, हृदय, मूर्धादि मर्म तथा अस्थियों की सन्धियां—रोगों का मध्यम मार्ग है। कोष्ठ से अभिप्राय शरीर के आन्तरिक अवयवों—विशेषकर आमाशय, पक्वाशय आदि से है। यह रोगों का आभ्यन्तर मार्ग कहा गया है। यहां शाखा तथा कोष्ठ का स्पष्ट रूप से ग्रहण किया गया है परन्तु रोग के मध्यममार्ग (मर्मास्थिसन्धि) का उल्लेख स्पष्ट नहीं है। सर्वगत तथा अर्धाङ्गगत रोगों से इसका ग्रहण किया जा सकता है। इन सब रोगों का कारण वायु को माना गया है॥३॥
तथा कफस्य पित्तस्य मलानां च रसस्य च॥४॥
विक्षेपणे संहरणे वायुरेवात्र कारणम्।
इसी प्रकार कफ, पित्त, मल और रस के विक्षेप और संघात (वियोग तथा संयोग) में भी वायु ही कारण है। अर्थात् वास्तव में रोगों का कारण वायु ही है तथा कफ, पित्त आदि के वियोग और संयोग के कारण जो नाना प्रकार के रोग होते हैं-उनका भी वायु ही कारण है।
वक्तव्य—यद्यपि पित्त और कफ भी रोगों की उत्पत्ति में कारण होते हैं तथापि वायु प्रधान कारण है। पित्त तथा कफ चेष्टाहिन माने गये हैं। वायु ही उन्हें इधर उधर विक्षिप्त करके रोगोत्पत्ति कराता है॥४॥
जेता चास्य प्रवृद्धस्य बस्तितुल्यों न कश्चन॥५॥
तदुपार्धं¹ चिकित्सायाः सर्वं वातचिकित्सितम्।
इस प्रकार इस प्रवृद्ध हुए वायु को जीतने के लिये बस्ति के समान अन्य कोई उपाय नहीं है। इस प्रकार बस्तिक्रिया सम्पूर्ण वातरोगों की प्रायः आधी चिकित्सा मानी गई है। अर्थात् वातरोगों की सम्पूर्ण चिकित्सा में अकेली बस्ति ही लगभग आधी चिकित्सा है-वातरोगों की आधी चिकित्सा केवल बस्ति के द्वारा हो सकती है॥५॥
कर्म कालश्च योगश्च तिस्रः संज्ञा यथाक्रमम्॥६॥
वक्ष्ये निरुक्तनिर्देशसंख्यादोषविकल्पतः।
निरुक्ति, निर्देश, संख्या तथा दोष के भेद के अनुसार यथाक्रम कर्मबस्ति, कालबस्ति तथा योगबस्ति का मैं वर्णन करूंगा। अर्थात् बस्ति समूह तीन प्रकार का होता है। १. कर्म २. काल ३. योग॥६॥
बाहु ............ तेः कर्मसंज्ञितम्॥७॥
अत्युदीर्णबले जाते प्रयोज्यं तद्यथाविधि।
कर्मबस्ति—इनमें से कर्मसंज्ञक बस्ति का शरीर में बल के अधिक होने पर यथाविधि प्रयोग करना चाहिये॥७॥
तदर्धकलनात् कालः स हि मध्यबलान्वये॥८॥
पवने पित्तसंसृष्टे विधातव्यो विजानता।
१. तदुपार्धं बस्तिक्रियाऽर्धप्रायमित्यर्थः। यावन्ति वातचिकित्सितानि तेषु बस्तिकर्म अर्धप्रायं भवतीति भावः। चरकसिद्धिस्थानेऽपि बस्तिकर्मणो वातचिकित्सार्धत्वं निदर्शितम्।