भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 779

संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७] खिलस्थानम् ४१९

जिस रोगी को पिलाई गई विरेचक औषध हृदय को अच्छी न लगने, अत्यन्त दुर्गन्ध युक्त होने, अजीर्ण में ओषधि का प्रयोग करने अथवा मात्रा में अत्यन्त अधिक होने के कारण कफ से आवृत्त हुई ओषधि ऊपर की ओर चली जाती है अर्थात् विरेचन न होकर वमन हो जाता है उसे वमन, लङ्घन तथा स्नेहन कराकर विरेचन कराये ।।७३-७४।।

अत्यर्थस्निग्धदेहस्य विशुद्धामाशयस्य वा ।।७५।। मारुतस्यानुलोम्यस्य यस्याधो वमनं व्रजेत् । तस्य संसर्गमात्रेण परिशुद्धिर्विधीयते ।।७६।। दुर्बलस्याल्पदोषस्य मृदु संशोधनं हितम्।

जिस व्यक्ति का शरीर अत्यन्त स्निग्ध होने से, आमाशय शुद्ध होने से अर्थात् आमाशय में कफ का संचय न होने से तथा वायु के अनुलोम होने से वमन औषध नीचे की ओर चली जाये अर्थात् वमन न होकर विरेचन हो जाये उस व्यक्ति की संसर्जन मात्र से शुद्धि हो जाती है । दुर्बल तथा अल्प दोष वाले व्यक्ति के लिये मृदु संशोधन देना चाहिये ।।७५-७६।।

विगृहीताचिराद्दोषैः स्तोकं स्तोकं व्रजत्यधः ।।७७।। उष्णाम्बुपानं तत्र स्यादानुलोम्यकरं परम्।

ओषधि के द्वारा दोषों के शीघ्र ही ग्रहण न किये जाने के कारण दोष धीरे २ नीचे आता है । उस अवस्था में उष्णजल पिलाना चाहिये । वह मल तथा दोषों की गति का अनुलोमन करता है अर्थात् जब बार २ थोड़ा २ मल आता हो तब उष्ण जल पिलाना चाहिये जिससे दोषों तथा मलों की गति अनुलोम हो जाती है ।।७७।।

दोषो भवेद्वा सोद्गारो नोर्ध्वं नाधश्च गच्छति ।।७८।। सशूले भेषजे जन्तोः स्वेदं तत्रावचारयेत्।

औषध का सेवन करने पर रोगी को उद्गार (उबकाई) आने लगे तथा दोष न ऊपर की ओर जाये और न नीचे की ओर जाये । अर्थात् दोष न वमन के द्वारा निकले और न विरेचन के द्वारा निकले तथा रोगी के पेट में शूल हो तो उस अवस्था में स्वेदन देना चाहिये ।।७८।।

मात्राविरिक्ते सोद्गारमौषध क्षिप्रमुद्धरेत् ।।७९।। अतिप्रवृत्तौ जीर्णेऽस्मिन् स्तम्भनीयैरुपक्रमेत्।

योग्य मात्रा में विरेचन हो जाने के बाद भी यदि ओषधि के डकार आते हों तो शीघ्र ही वमन द्वारा उस ओषधि को बाहर निकाल देना चाहिये । अन्यथा विरेचन का अतियोग हो जायेगा । तथा वेग की अति प्रवृत्ति (अतियोग) में औषध के जीर्ण होने पर स्तम्भक द्रव्यों के द्वारा इसका स्तम्भन करे ।।

दीप्ताग्नेः क्रूरकोष्ठस्य बहुदोषस्य देहिनः ।।८०।। सोदावर्तस्य निर्हृत्य पुरीषं फलवर्तिभिः । सुस्निग्धस्विन्नगात्रस्य भिषग्दद्याद्विरेचनम् ।।८१।।

जिस व्यक्ति की अग्नि दीप्त हो, कोष्ठ क्रूर हो (अर्थात् विरेचन अत्यन्त कठिनता से हो) तथा शरीर में दोष बहुत अधिक विद्यमान हों—उसे यदि उदावर्त हो जाय तो वैद्य फलवर्तियों के द्वारा उसके मल को निकाल कर शरीर का स्नेहन एवं स्वेदन करके उसे विरेचन देवे ।।८०-८१।।

यदसक्तं महावेगैः सुखेनाशु प्रवर्तते । अनाबाधकरं नातिग्लपनं दोषशोधनम् ।।८२।। अव्यापन्नगुणोदर्कं मात्रायुक्तं सुसंस्कृतम् । पीतमेकाग्रमनसा सम्यक्च्छुद्धिकृदावहेत् ।।८३।।

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