भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 778
४१८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७]

विरेचन में दोषों के निकलने का क्रम—विरेचन के सम्यक् योग में सबसे पहले मल फिर क्रमशः पित्त, कफ तथा वायु निकलते हैं। तथा वमन में पहले कषाय औषध फिर कफ तथा अन्त में पित्त निकलता है। आमाशय के खाली हो जाने पर अन्त में केवल वायु ही निकलती हैं। विरेचन का अतियोग—इसमें उपर्युक्त दोष अत्यधिक मात्रा में निकलते हैं तथा अन्त में मल के साथ रक्त आने लगता है। विरेचन के अयोग के लक्षण—विरेचन का सर्वथा प्रवृत्त न होना, विपरीत मार्ग में प्रवृत्त होना (अर्थात् विरेचन न होना तथा स्वयं औषध का भी वापिस न निकलना अपि तु ऊर्ध्वगति होकर आध्मान, वमन आदि उपद्रवों का करना), विरेचन का अल्प मात्रा में होना, विभ्रंश (कोष्ठस्थित अङ्गों का स्वस्थान से च्युत हो जाना अथवा गुदभ्रंश–कांच निकलना), विरेचन कार्य का बिलकुल न होना अथवा विरेचन के लिये पीई हुई केवल औषध का ही निकल जाना—ये अयोग के लक्षण होते हैं ॥६८-६९॥

सर्पिष्यानं विकारे स्यादातियोगानुबन्धजे ॥७०॥
मधुकादिविपक्वं वा तैलं तत्रानुवासनम् ।

विरेचन के अतियोग से होने वाले विकारों में घृतपान कराना चाहिये अथवा मुलहठी के द्वारा सिद्ध तैल से अनुवासन बस्ति देनी चाहिये ॥७०॥

दुर्वान्तं दुर्विरिक्तं वा स्निग्धदेहं बलान्वितम् ॥७१॥
बहुदोषं दृढाग्निं च पाययेदपरेऽहनि । दुर्बलं क्रमशो भूयः स्निग्धस्विन्नं विशोधयेत् ॥७२॥
(इति ताडपत्रपुस्तके २१६ तमं पत्रम्)

दुर्वान्त तथा दुर्विरिक्त पुरुष (जिसे वमन तथा विरेचन ठीक प्रकार न हुआ हो—अयोग हो) का शरीर यदि स्निग्ध तथा बलवान् हो, दोष अधिक मात्रा में विद्यमान हों तथा जाठराग्नि प्रदीप्त हो तो उसे अगले दिन वमन या विरेचन औषध पुनः पिलानी चाहिये। यदि रोगी दुर्बल है तो उसे नये सिरे से स्नेहन तथा स्वेदन देने के बाद ही पुनः वमन तथा विरेचन ओषधि पिलानी चाहिये। अर्थात् यदि रोगी को वमन तथा विरेचन औषध पिलाने के बाद ठीक प्रकार से वमन तथा विरेचन न हुआ हो परन्तु रोगी का शरीर स्निग्ध तथा बलवान् हो, शरीर में दोषों की मात्रा अधिक हो तथा जाठराग्नि तेज हो तो उसे अगले ही दिन पुनः वमन या विरेचन ओषधि पिलानी चाहिये। परन्तु यदि रोगी दुर्बल है तो अगले दिन ओषधि नहीं देनी चाहिये अपितु नये सिरे से दोबारा शरीर का स्नेहन तथा स्वेदन करने के बाद ही पुनः वमन तथा विरेचन ओषधि पिलाये। वमन या विरेचन के अयोग में पुनः ओषधि देने से पहले यह देख लेना आवश्यक है कि पूर्व प्रदत्त ओषधि जीर्ण हो चुकी है या नहीं। पूर्व औषधि के जीर्ण होने पर ही पुनः ओषधि देनी चाहिये अन्यथा अतियोग का भय रहता है। इसके अतिरिक्त रोगी के कोष्ठ तथा शारीरिक बल का ध्यान रखना भी आवश्यक है। यदि रोगी बलवान् है तो तीक्ष्ण ओषधि देनी चाहिये और यदि रोगी निर्बल है तो मृदु संशोधन देना चाहिये ॥

न तु दुश्छर्दनं जातु क्रूरकोष्ठमथापि वा । तयोः संशमनैर्दोषान् बस्तिभिर्वा शमं नयेत् ॥७३॥
अहृद्यमतिदुर्गन्धमजीर्णे चाति वा बहु । यस्यानुलोमिकं पीतमूर्ध्वं याति कफावृतम् ॥७४॥
तं वामितं लङ्घितं वा परिस्निग्धं विरेचयेत् ।

दुर्वम्य (जिसे वमन कठिनता से होता हो) अथवा क्रूरकोष्ठ (जिसे विरेचन अत्यन्त कठिनता से होता हो) पुरुष को कभी भी वमन या विरेचन ओषध दोबारा नहीं देनी चाहिये। उनके दोषों को संशमन उपायों अथवा बस्ति के द्वारा शान्त करना चाहिये। चरक सि. अ. ६ में कहा है कि उन्हें साधारणतया पुनः वामक या विरेचक ओषधि नहीं देनी चाहिये और यदि देनी ही पड़े तो अधिक मात्रा में नहीं देनी चाहिये ॥