भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 777, कुल 942 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 777
संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७]खिलस्थानम्४१७

शिरोगतं ततश्चास्य त(तै)लैः स्विन्नस्य देहिनः। दोषावशेषं नस्येन धूमपानेन वा हरेत् ।। ५९ ।।

इसके (वमन के) बाद उसके सिर में बचे हुए दोषों को सिर में तेल की मालिश करके तथा फिर नस्य और धूम्रपान के द्वारा नष्ट करे। ऊर्ध्वजत्रुज दोषों को नष्ट करने के लिये धूम्रपान तथा नस्य विशेष प्रभाव रखते हैं अतः सिर में स्थित दोषों को निकालने के लिये धूम्रपान एवं नस्य का प्रयोग कराया जाता है ॥५९॥

यथाशुद्धि ततश्चैनं संसर्गेणोपपादयेत् । हरीतक्या ग्रहघ्न्या वा कल्पोक्तं स्याद्विरेचनम् ।। ६० ।।

इसके बाद सम्यक् प्रकार से शुद्धि हो जाने पर रोगी को संसर्जन क्रम के द्वारा भोजन कराये तदनन्तर कल्पोक्त हरीतकी अथवा ग्रहघ्नी (श्वेत सरसों) के द्वारा विरेचन कराये। जिस व्यक्ति को वमन के बाद विरेचन देना हो उसे पुनः स्नेहन तथा स्वेदन देकर तब विरेचन देना चाहिये। संशोधन कराने में वमन कराने के १५ दिन बाद विरेचन देना चाहिये। सुश्रुत में कहा है—'पक्षाद्विरेको वान्तस्य' इन १५ दिनों में पेयादि संसर्जन क्रम का सेवन और स्नेहन-स्वेदन आदि करना चाहिये ॥६०॥

पिप्पलीसैन्धवोपता पथ्या वा त्रिवृतायुता । शृतं चारग्वधफलं क्षीरेणाथ रसेन वा ।। ६१ ।।
त्रिफला वा त्रिवृद्युक्ता सघृतव्योषसैन्धवा । तथा गन्धर्वतैलं वा श्रेष्ठं स्नेहविरेचनम् ।। ६२ ।।

अथवा पिप्पली और सैन्धव से युक्त हरीतकी अथवा त्रिवृत् युक्त हरीतकी देवे। अथवा अमलतास के गूदे के क्वाथ को दूध या मांसरस से देवे। अथवा त्रिफला और त्रिवृत् में घृत, व्योष (त्रिकटु-सोंठ, मरिच, पीपल और सैन्धव) मिलाकर दें। अथवा गन्धर्व तैल (एरण्ड तैल) श्रेष्ठ स्नेह विरेचन है ॥६१-६२॥

दशमूलकषायेण जाङ्गलानां रसेन वा । द्राक्षाक्वाथेन वा युक्तमथवा दीपनाम्बुना ।। ६३ ।।
त्रिवृद्द्राक्षाभयानां वा गवां मूत्रेण संयुता । सद्राक्षा त्रिवृता वा स्यादथवा त्रिवृताष्टकम् ।। ६४ ।।

दशमूल के क्वाथ, जांगल मांसरस, द्राक्षा (मुनक्का) के क्वाथ, दीपनीय जल अथवा गोमूत्र के साथ त्रिवृत्, द्राक्षा और हरड़ का प्रयोग करना चाहिये। अथवा द्राक्षा और त्रिवृत् या त्रिवृताष्टक चूर्ण का सेवन करें ॥६३-६४॥

पथ्या त्रिजातकं व्यूषं विडङ्गामलकं घनम् । समानि, षड्गुणा त्वत्र शर्कराऽष्टगुणा त्रिवृत् ।। ६५ ।।
चूर्णं ज्वरश्रमश्वासकासपाण्ड्वामयक्षयान् । हन्यात् क्रिमिविषार्शांसि मूत्रकृच्छ्रं च देहिनाम् ।। ६६ ।।

त्रिवृताष्टक चूर्ण—हरड़, त्रिजातक (दालचीनी, छोटी इलायची तथा तेजपत्र), त्रिकटु, विडङ्ग, आंवला तथा नागरमोथा—सब द्रव्य समभाग लेवें। इसमें ६ गुना शर्करा तथा ८ गुना त्रिवृत् डालकर सबका चूर्ण करें। यह चूर्ण प्राणियों के ज्वर, श्रम, श्वास, कास, पाण्डुरोग, क्षय, कृमि, विष, अर्श तथा मूत्रकृच्छ्र को नष्ट करता है ॥६५-६६॥

दशावरे, पञ्चदश मध्यमे, त्रिंशदुत्तमे । वेगा द्वित्रिचतुष्प्रस्थप्रमाणाः स्युर्विरेचने ।। ६७ ।।

विरेचन के वेग—अवर (हीन) विरेचन में दस, मध्यम विरेचन में १५ तथा उत्तम विरेचन में ३० वेग होते हैं। तथा मान के अनुसार दोषों का प्रमाण हीन विरेचन में दो प्रस्थ, मध्यम विरेचन में तीन प्रस्थ तथा उत्तम विरेचन में चार प्रस्थ होना चाहिये। चरक सि. अ. १ में विरेचन के मध्यम योग में १५ के स्थान पर २० वेग दिये हैं ॥६७॥

विट्पित्तकफसंमिश्राः सवाताः स्युर्यथाक्रमम् । पित्तावसाना वमने कषायकफमूर्च्छिताः ।। ६८ ।।
सम्यग्योगेऽतियोगेऽतिप्रवृत्तिः शोणितोत्तरा ।
अयोगे त्वप्रवृत्तिः स्याद्विपरीताऽल्पशोऽपि वा ।। ६९ ।।
विभ्रंशः कर्मणो भ्रंशः केवलौषधनिर्गमः ।