भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 776, कुल 942 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 776

४१६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७]

वमन औषध पिलाने के बाद मुहूर्त भर (थोड़ी देर) प्रतीक्षा करे। रोगी को पहले गरमी लगेगी तथा उसके बाद सारे शरीर में पसीना आने लगेगा। उस समय वैद्य यह समझ ले कि दोष पिघल रहे हैं। तथा शरीर में लोमहर्ष के द्वारा दोषों को अपने स्थान से विचलित हुआ जाने। आध्मान तथा उद्वेष्टन के द्वारा दोषों को कोष्ठ में आया हुआ तथा जी मलचाने और मुख में लालास्राव के द्वारा दोषों को ऊर्ध्वमुख जाने तब कण्ठपर्यन्त लवणयुक्त उष्ण जल पुनः २ पीकर वमन के द्वारा दोषों को बाहर निकाल दे। सुश्रुत के अनुसार औषध पिलाने के बाद प्रतीक्षा काल में अग्नि पर हाथों को तपाकर रोगी को उष्णता पहुँचानी चाहिये ॥५१-५३॥

यावत् स्युरष्टौ षड्वाऽपि वेगाश्चत्वार एव वा ॥५४॥ आपित्तदर्शनाद्वाऽपि दोषोच्छित्तेरतथापि वा।

वमन के वेग-वमन में आठ, छै अथवा चार वेग आने चाहिये (अर्थात् उत्कृष्ट शोधन में ८ वेग, मध्य शोधन में ६ वेग तथा हीन शोधन में वमन के ४ वेग होने चाहिये। चरकसि. अ. १ में कहा है—जघन्यमध्यप्रवरेषु वेगाश्चत्वार इष्टा वमने षडष्टौ। अथवा वमन में कफ के बाद पित्त निकलने लगे या दोष नष्ट हो जायें तब तक वमन औषधि देनी चाहिये। चरक सि. अ. १ में कहा है-'पित्तान्तमिष्टं वमनं तथोर्ध्वम्' अर्थात् वमन पित्त निकलने पर्यन्त देना चाहिये। वमन में दोषों के निकलने का क्रम चरक सि. अ. १ में निम्न प्रकार से दिया है। क्रमात् कफः पित्तमथानिलश्च यस्यैति सम्यग्वमितः स इष्टः ॥५४॥

मानप्रमाणतो वैकाध्यर्धद्विप्रस्थसंमितम् ॥५५॥ पीतादभ्यधिकं यत् स्यात् सदोषस्तद्विनिर्गमे।

दोषों के मान के अनुसार पी हुई औषध के अतिरिक्त एक, डेढ़ और दो प्रस्थ दोष निकलने चाहिये अर्थात् हीन शुद्धि में एक प्रस्थ, मध्य शुद्धि में डेढ़ प्रस्थ तथा उत्कृष्ट शुद्धि में दो प्रस्थ होना चाहिये। वमन के वेगों के मान के विषय में चरक सि. अ. १ में कहा है—पित्तान्तमिष्टं वमनं विरेकादर्थम्.....। अर्थात् वमन में दोषों का परिमाण विरेचन से आधा होना चाहिये। वमन में पी हुई औषध के निकलने के बाद तथा विरेचन में दो तीन पुरीषयुक्त वेगों के पश्चात् वेगों को मापना चाहिये। यहां पर प्रस्थ १६ पल का नहीं लेना चाहिये अपितु परिभाषा के अनुसार १३-१/२ पल का लेना चाहिये। वमन आदि की मात्रा यदि पी हुई औषध से अधिक हो तो वह निकलते हुए दोषयुक्त होती है ॥५५॥

निरामगन्ध्यं सोद्गारं यावत् पीतमपिच्छिलम् ॥५६॥ यदा विकलुषं वान्तं दृश्यतेऽम्बु प्रतिग्रहे¹। कुक्ष्युरःकण्ठशिरसां लाघवं रोगमार्दवम् ॥५७॥ क्लमकार्श्ये न चात्यर्थमुत्साहो विशदात्मता। सद्यो निर्हृतदोषस्य लिङ्गान्येतानि निर्दिशेत् ॥५८॥

दोषों के निकल जाने पर लक्षण-जब पी हुई ओषधि रोगी को आमगन्ध से रहित उद्गार (डकार) सहित वापिस आ जाये तथा पीकदान में वमन किया हुआ जल (द्रव्य) पित्तालता तथा कलुषता (दोषों) से रहित दिखाई देवे, कुक्षि (कोख), छाती, कण्ठ तथा सिर में लघुता प्रतीत हो, रोग मृदु हो जायें, शरीर में थकावट तथा कमजोरी बहुत अधिक मालूम न पड़े, उत्साह एवं विशदता (प्रसन्नता) दिखाई दे-इन लक्षणों को देखकर यह समझना चाहिये कि उसके दोष निकल गये हैं ॥५६-५८॥


१. पतद्ग्रहे इत्यर्थः। 'पीकदानी' इति भाषायाम्। 'प्रतिग्रहः स्वीकारणे सैन्ये पृष्ठे पतद्ग्रहे' इति मेदिनी।