भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 775, कुल 942 में से

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पृष्ठ 775

संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७] खिलस्थानम् ४१५

वमनीयकषायस्य चत्वारोऽञ्जलयः परा।
मात्रा, मध्या त्रयो, ह्रस्वा द्वौ, तदर्धा विरेचने ॥४४॥

वमन के लिये प्रयुक्त किये जाने वाले कषाय की उत्कृष्ट मात्रा चार अञ्जलि होती है। मध्य मात्रा तीन अञ्जलि तथा ह्रस्व (हीन) मात्रा दो अञ्जलि होनी चाहिये। विरेचन की मात्रा इससे आधी होनी चाहिये अर्थात् विरेचन की उत्कृष्ट मात्रा दो अञ्जलि, मध्य मात्रा डेढ़ अञ्जलि तथा ह्रस्व मात्रा एक अञ्जलि होनी चाहिये ॥४४॥

पुरुषं पुरुषं प्राप्य दोषाणां च बलाबलम्। मदनस्य फलक्वाथः पिप्पलीसर्पपान्वितः ॥४५॥
ग्रहघ्न्या वा स एवाऽथ पटोलारिष्टवत्सकैः ।
युक्तो वाऽथ प्रियङ्गूनां कल्केन मधुकस्य च ॥४६॥
वमनार्थे विधेयः स्यान्मधुसैन्धवमूर्च्छितः ।

प्रत्येक पुरुष (रोगी व्यक्ति) तथा उसके दोषों के बलाबल को देखकर मदनफल के क्वाथ को मधु और सैन्धव से मूच्छित करके अर्थात् मधु और सैन्धव से युक्त करके उसमें पिप्पली और सरसों अथवा ग्रहघ्नी (श्वेत सरसों), पटोल, अरिष्ट (नीम) और वत्सक (इन्द्रजौ) अथवा प्रियङ्गु (फूल प्रियङ्गु) और महुए का कल्क डालकर वमन के लिये प्रयुक्त करना चाहिये ॥४५॥

न त्वजीर्णे, हितं त्वत्र लवणोष्णाम्बु केवलम् ॥४७॥
तद्धि सर्वं समुत्क्लिश्य मुखेनाशु विनिर्हरेत् ।

परन्तु यदि रोगी को अजीर्ण हो तो उस अवस्था में उपर्युक्त ओषधियों का व्यवहार नहीं करना चाहिये, अपितु उस अवस्था में वमन के लिये केवल उष्ण जल में नमक डालकर प्रयोग करना चाहिये। यह सम्पूर्ण दोषों का उत्क्लेश करके दोषों को मुख से बाहर निकाल देता है। मदनफल के कषाय में मधु और सैन्धव का डालना कफ के विलयन के लिये लिखा है। इसलिये चरक सू. अ. १५ में भी कहा है—‘मधुमधुकसैन्धवफाणितोपहिता मदनफलकषायमात्रा पाययेत्’। यदि पूर्वकृत भोजन जीर्ण हो चुका हो तभी उपर्युक्त विधान प्रयोग में लाना चाहिये, भोजन के अजीर्ण की अवस्था में नहीं। इसीलिये चरक सू. अ. १५ में वमन के विधान में ‘सुप्रजीर्णभक्तं’ विशेषण दिया है। तथा चरक सि. अ. ६ में भी अजीर्ण की अवस्था में औषध का निषेध किया गया है ॥४७॥

यद्येवमामं विष्टम्भान्नापैति तत उत्तरम् ॥४८॥
वचाजगन्धामदनपिप्पलीभिस्तदुद्धरेत् । अन्यैर्वा कल्क(ल्प)विहितैर्बीभत्सोद्वेजनौषधैः ॥४९॥
अङ्गुल्युत्पलनालाद्यैर्गलावतुदनैः सुखैः । तत्पार्श्वोदरपृष्ठानां पीडनोन्मर्दनैरपि ॥५०॥

यदि वह दोष आम अवस्था में विद्यमान होने के कारण बाहर न निकले तो उसके बाद वच, अजगन्धा, मैनफल तथा पिप्पली के द्वारा उसे बाहर निकाले अथवा अन्य कल्पों (कटुतुम्बी, जीमूत, धामार्गव आदि) से बनाये हुए बीभत्स (घृणित) तथा उद्वेजन कारक ओषधियों अथवा अंगुली या कमलनाल के द्वारा गले में सुखकारक स्पर्श के द्वारा अथवा रोगी के पार्श्व, उदर और पृष्ठप्रदेश को दबाने या ऊपर की ओर मालिश करने के द्वारा उस दोष को बाहर निकाल देवे ॥

पीतवन्तं च वमनं मुहूर्तमनुपालयेत् । विदाहपूर्वः स्वेदोऽस्य यदा भवति सर्वतः ॥५१॥
विष्यन्दमानं जानीयात्तदा दोषं भिषग्वरः । लोमहर्षेण चान्वक्षं स्थानेभ्यश्चलितं तथा ॥५२॥
आध्मानोद्वेष्टनाभ्यां च निर्दिशेत् कोष्ठमाश्रितम् । हल्लासास्यपरिस्रावैश्चामुखीभूतमुद्धरेत् ॥५३॥
उष्णाम्बु लवणोपेतं पीत्वाऽऽकण्ठं पुनः पुनः ।

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