भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 774

४१४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७]

इसके बाद अब अन्न की प्रकृष्ट विचारणाओं के भेद कहे जायेंगे ॥३६॥

सर्वत्र त्रिविधा पेया संसर्गादौ विधीयते। अकृतादिविकल्पेन ततो यूषस्ततो रसः ॥३७॥

सम्पूर्ण चिकित्सा शास्त्र में संसर्जन आदि के लिये तीन प्रकार की पेयाओं का वर्णन मिलता है, १. कृतयूष २. अकृतयूष ३. मांसरस ॥३७॥

व्यपेतलवणा पूर्वा दीपनीयाम्बुसाधिता।
तानि(सा च)क्षुद्रा, द्वितीया स्यात् किञ्चिल्लवणदीपना ॥३८॥
तद्वदेव तृतीया तु संस्कृता स्नेहमात्रया।

इनमें से पहला अर्थात् कृतयूष लवण से युक्त होता है तथा दीपनीय जल के द्वारा सिद्ध किया हुआ होता है। यह हलका माना गया है इनमें से दूसरा अर्थात् अकृतयूष ईषत् लवण युक्त तथा दीपक होता है। इसी प्रकार तीसरा अर्थात् मांसरस होता है परन्तु यह अल्प (थोड़े) स्नेह के द्वारा सिद्ध किया गया होता है ॥३८॥

अव्यक्तलवणस्नेहो यूषस्त्वकृतको मतः ॥३९॥
मन्दाम्ललवणस्नेहसंस्कारः स्यात् कृताकृतः। व्यक्तस्नेहाम्ललवणः कृतयूषः सुसंस्कृतः ॥४०॥
एवमेव रसं विद्यादिमं पेयादिकं क्रमम्।

जिस यूष में लवण एवं स्नेह स्पष्ट न हो उसे अकृतयूष कहते हैं। जो स्वल्प अम्ल, लवण एवं स्नेह के द्वारा संस्कृत किया गया है उसे कृताकृत यूष कहते हैं। तथा जिस यूष में स्नेह, अम्ल एवं लवण व्यक्त-स्पष्ट हों उस संस्कृत यूष को कृतयूष कहते हैं। अर्थात् जिस यूष में अम्ल, लवण तथा स्नेह स्पष्ट रूप से प्रतीत न हो अथवा जो स्नेह एवं लवण आदि के द्वारा संस्कृत न हो उसे अकृतयूष, जिसमें स्नेह, अम्ल तथा लवण स्पष्ट रूप से प्रतीत हों—जो स्नेह अम्ल लवण आदि के द्वारा सिद्ध किया गया हो—उस यूष को कृतयूष तथा जिसमें अम्ल, लवण एवं स्नेह थोड़ी मात्रा में हों उसे कृताकृत यूष कहते हैं। इसी प्रकार मांसरस को भी समझना चाहिये अर्थात् मांसरस भी ऐसा हो सकता है जो स्नेह लवण आदि के द्वारा सिद्ध हो अथवा न हो। यह पेयादि क्रम कहा गया है ॥३९-४०॥

सकृज्जघन्या द्विर्मध्या त्रिः श्रेष्ठा शुद्धिमर्हति ॥४१॥

जघन्य (हीन) शुद्धि वाले व्यक्ति को इनमें से एक का सेवन करना चाहिये। मध्य शुद्धि वाले को इनमें से दो का तथा श्रेष्ठ शुद्धि वाले व्यक्ति को इनमें से तीनों का सेवन करना चाहिये। अर्थात् हीन शुद्धि वाले व्यक्ति को केवल अकृतयूष का सेवन करना चाहिये। मध्य शुद्धिवाले को अकृत तथा कृत यूष का सेवन करना चाहिये तथा श्रेष्ठ शुद्धि वाले व्यक्ति को अकृत तथा कृतयूष एवं मांसरस-तीनों का सेवन करना चाहिये ॥४१॥

इमां पेयादिसंसर्गी सर्वसंशोधनोपगाम्। आरोग्यकामः सेवेत स्वास्थ्ये प्रकृतिभोजनम् ॥४२॥
वर्जयित्वा विरुद्धान्नं गुर्वसात्म्यं च यद्भवेत्।

आरोग्य की कामना करनेवाले व्यक्ति को चाहिये कि वह संशोधन में सहायता देने वाले उपर्युक्त पेयादि संसर्जन क्रम का सेवन करे। तथा पूर्णरूप से स्वास्थ्य की प्राप्ति हो जाने पर विरुद्ध, गुरु तथा असात्म्य भोजन को छोड़कर शेष प्रकृति (साधारण) भोजन पर पहुंच जावे ॥४२॥

अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रमाणादिप्रयोजनम् ॥४३॥

इसके बाद अब मैं प्रमाण आदि का प्रयोजन कहूंगा। अर्थात् अब वमन, विरेचन आदि की मात्रा का वर्णन करूंगा ॥