काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसंशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७] खिलस्थानम् ४१३
से ओषधि (वमन-विरेचन आदि के लिये प्रयुक्त की गई ओषधि) दोषों को नष्ट कर देती है। अर्थात् स्निग्ध शरीर में स्वेदन के द्वारा दोष अपने स्थान से विचलित हो जाते हैं ॥३१॥
यथा हि मलिनं वासः क्षारेणोत्क्लेश्य वारिणा। शोध्यते शोध्यनैस्तद्वदुत्क्लेश्य विधिवद्बलात् ॥३२॥
जिस प्रकार मैला वस्त्र क्षार के द्वारा मैल या दोषों को उत्क्लिष्ट करके फिर जल के द्वारा साफ किया जाता है उसी प्रकार शरीर भी पूर्व स्नेहन एवं स्वेदन के द्वारा विधिवत् दोषों को उत्क्लिष्ट करके पुनः वमन आदि शोधनों के द्वारा बलपूर्वक शुद्ध किया जाता है। अर्थात् जिस प्रकार वस्त्र की मैल को ढीला करने के लिये पहले क्षार का प्रयोग किया जाता है उसी प्रकार संशोधन से पूर्व स्नेहन एवं स्वेदन के द्वारा शरीर के दोषों को ढीला-बहिः प्रवृत्त्युन्मुख किया जाता है। अन्यथा शारीरिक दोष सुखपूर्वक तथा पूर्णरूप से नहीं निकल पाते हैं। ३२॥
वामितं लङ्घयेल्लङ्घ्यं (लङ्घितं) लघु भोजयेत्।
तस्य वान्तविरिक्तस्य क्रमः पेयादिरिष्यते ॥३३॥
तेनाग्निर्वर्धते सूक्ष्मैरिन्धनै¹रणयो यथा (रिन्धनैररणेर्यथा)।
(इति ताडपत्रपुस्तके २१५ तमं पत्रम्।)
वमन कराने के बाद रोगी को लङ्घन (उपवास) कराये तथा लङ्घन के बाद लघुभोजन कराये। वमन और विरेचन के बाद रोगी को पेया आदि संसर्जन क्रम से आहार देना चाहिये। चरक सि. अ. १ में यह संसर्जन क्रम इस प्रकार से दिया है कि-शोधन के पश्चात् रोगी को पहले पेया तदनन्तर क्रमशः विलेपी, अकृतयूष, कृतयूष, मांसरस आदि धीरे २ देने चाहिये। चरक सू. अ. १५ में भी १२ अन्नकाल का संसर्जनक्रम दिया है। अर्थात् संशोधन के ७ दिन के बाद स्वाभाविक भोजन पर लाये। क्योंकि संशोधन के द्वारा जाठराग्नि मन्द हो जाती है, उस मन्द को क्रमशः तीक्ष्ण करने के लिये पेयादि क्रम कराया जाता है। सूक्ष्म ईंधनों के द्वारा जिस प्रकार अरणि से उत्पन्न हुई अग्नि प्रदीप्त हो जाती है उसी प्रकार उपर्युक्त पेयादि क्रम युक्तलघु आहार के द्वारा संशोधन से मन्द हुई अग्नि प्रदीप्त हो जाती है ॥३३॥
समुत्थितेऽग्नौ संजाते म(ब)ले देहे च निर्मले ॥३४॥
वाससीवार्पितो रागः सिद्धिं यात्युत्तरो विधिः।
कायाग्नि के प्रदीप्त हो जाने, शरीर में बल के उत्पन्न हो जाने तथा संशोधन के द्वारा शरीर के निर्मल हो जाने पर बाद में की गई चिकित्सा आदि की सम्पूर्ण विधि सफल होती है जिसप्रकार वस्त्रों को सम्यक् प्रकार से धोने के बाद उनपर चढ़ाया गया रंग अच्छी प्रकार चढ़ जाता है। अर्थात् वस्त्र को अच्छी प्रकार धोने के बाद उसपर जो भी रंग चढ़ाया जाता है वह वस्त्र पर अच्छी तरह चढ़ जाता है उसी प्रकार संशोधन के बाद पेयादि क्रम के द्वारा जाठराग्नि के प्रदीप्त हो जाने तथा शरीर में बल उत्पन्न हो जाने के बाद जो भी क्रिया की जाती है उसका अच्छी प्रकार प्रभाव होता है ॥३४॥
यश्चात्र वा यदाबाधः स्यादयोगादियोगतः ॥३५॥
समासव्यासस्तस्तस्य सिद्धौ सिद्धिरुदाहृता।
चिकित्सा कार्य में अयोग आदि (अयोग, अतियोग, हीनयोग एवं मिथ्यायोग) के कारण जो कष्ट अथवा उपद्रव होते हैं उनकी चिकित्सा संक्षेप तथा विस्तार से सिद्धिस्थान में पहले कही गई है ॥३५॥
ततोऽत्रप्रविचारस्य विकल्पः संप्रवक्ष्यते ॥३६॥
१. अरणिसंभवो वह्निः सूक्ष्मैरिन्धनैरिव वान्तविरिक्तस्य जाठराग्निर्लघुभोजनैर्वर्धते इति भावः । अत्रापि मूलपाठो विभ्रष्टः ।