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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७] खिलस्थानम् ४१३

से ओषधि (वमन-विरेचन आदि के लिये प्रयुक्त की गई ओषधि) दोषों को नष्ट कर देती है। अर्थात् स्निग्ध शरीर में स्वेदन के द्वारा दोष अपने स्थान से विचलित हो जाते हैं ॥३१॥

यथा हि मलिनं वासः क्षारेणोत्क्लेश्य वारिणा। शोध्यते शोध्यनैस्तद्वदुत्क्लेश्य विधिवद्बलात् ॥३२॥

जिस प्रकार मैला वस्त्र क्षार के द्वारा मैल या दोषों को उत्क्लिष्ट करके फिर जल के द्वारा साफ किया जाता है उसी प्रकार शरीर भी पूर्व स्नेहन एवं स्वेदन के द्वारा विधिवत् दोषों को उत्क्लिष्ट करके पुनः वमन आदि शोधनों के द्वारा बलपूर्वक शुद्ध किया जाता है। अर्थात् जिस प्रकार वस्त्र की मैल को ढीला करने के लिये पहले क्षार का प्रयोग किया जाता है उसी प्रकार संशोधन से पूर्व स्नेहन एवं स्वेदन के द्वारा शरीर के दोषों को ढीला-बहिः प्रवृत्त्युन्मुख किया जाता है। अन्यथा शारीरिक दोष सुखपूर्वक तथा पूर्णरूप से नहीं निकल पाते हैं। ३२॥

वामितं लङ्घयेल्लङ्घ्यं (लङ्घितं) लघु भोजयेत्।
तस्य वान्तविरिक्तस्य क्रमः पेयादिरिष्यते ॥३३॥
तेनाग्निर्वर्धते सूक्ष्मैरिन्धनै¹रणयो यथा (रिन्धनैररणेर्यथा)।
(इति ताडपत्रपुस्तके २१५ तमं पत्रम्।)

वमन कराने के बाद रोगी को लङ्घन (उपवास) कराये तथा लङ्घन के बाद लघुभोजन कराये। वमन और विरेचन के बाद रोगी को पेया आदि संसर्जन क्रम से आहार देना चाहिये। चरक सि. अ. १ में यह संसर्जन क्रम इस प्रकार से दिया है कि-शोधन के पश्चात् रोगी को पहले पेया तदनन्तर क्रमशः विलेपी, अकृतयूष, कृतयूष, मांसरस आदि धीरे २ देने चाहिये। चरक सू. अ. १५ में भी १२ अन्नकाल का संसर्जनक्रम दिया है। अर्थात् संशोधन के ७ दिन के बाद स्वाभाविक भोजन पर लाये। क्योंकि संशोधन के द्वारा जाठराग्नि मन्द हो जाती है, उस मन्द को क्रमशः तीक्ष्ण करने के लिये पेयादि क्रम कराया जाता है। सूक्ष्म ईंधनों के द्वारा जिस प्रकार अरणि से उत्पन्न हुई अग्नि प्रदीप्त हो जाती है उसी प्रकार उपर्युक्त पेयादि क्रम युक्तलघु आहार के द्वारा संशोधन से मन्द हुई अग्नि प्रदीप्त हो जाती है ॥३३॥

समुत्थितेऽग्नौ संजाते म(ब)ले देहे च निर्मले ॥३४॥
वाससीवार्पितो रागः सिद्धिं यात्युत्तरो विधिः।

कायाग्नि के प्रदीप्त हो जाने, शरीर में बल के उत्पन्न हो जाने तथा संशोधन के द्वारा शरीर के निर्मल हो जाने पर बाद में की गई चिकित्सा आदि की सम्पूर्ण विधि सफल होती है जिसप्रकार वस्त्रों को सम्यक् प्रकार से धोने के बाद उनपर चढ़ाया गया रंग अच्छी प्रकार चढ़ जाता है। अर्थात् वस्त्र को अच्छी प्रकार धोने के बाद उसपर जो भी रंग चढ़ाया जाता है वह वस्त्र पर अच्छी तरह चढ़ जाता है उसी प्रकार संशोधन के बाद पेयादि क्रम के द्वारा जाठराग्नि के प्रदीप्त हो जाने तथा शरीर में बल उत्पन्न हो जाने के बाद जो भी क्रिया की जाती है उसका अच्छी प्रकार प्रभाव होता है ॥३४॥

यश्चात्र वा यदाबाधः स्यादयोगादियोगतः ॥३५॥
समासव्यासस्तस्तस्य सिद्धौ सिद्धिरुदाहृता।

चिकित्सा कार्य में अयोग आदि (अयोग, अतियोग, हीनयोग एवं मिथ्यायोग) के कारण जो कष्ट अथवा उपद्रव होते हैं उनकी चिकित्सा संक्षेप तथा विस्तार से सिद्धिस्थान में पहले कही गई है ॥३५॥

ततोऽत्रप्रविचारस्य विकल्पः संप्रवक्ष्यते ॥३६॥


१. अरणिसंभवो वह्निः सूक्ष्मैरिन्धनैरिव वान्तविरिक्तस्य जाठराग्निर्लघुभोजनैर्वर्धते इति भावः । अत्रापि मूलपाठो विभ्रष्टः ।

४१४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७]

इसके बाद अब अन्न की प्रकृष्ट विचारणाओं के भेद कहे जायेंगे ॥३६॥

सर्वत्र त्रिविधा पेया संसर्गादौ विधीयते। अकृतादिविकल्पेन ततो यूषस्ततो रसः ॥३७॥

सम्पूर्ण चिकित्सा शास्त्र में संसर्जन आदि के लिये तीन प्रकार की पेयाओं का वर्णन मिलता है, १. कृतयूष २. अकृतयूष ३. मांसरस ॥३७॥

व्यपेतलवणा पूर्वा दीपनीयाम्बुसाधिता।
तानि(सा च)क्षुद्रा, द्वितीया स्यात् किञ्चिल्लवणदीपना ॥३८॥
तद्वदेव तृतीया तु संस्कृता स्नेहमात्रया।

इनमें से पहला अर्थात् कृतयूष लवण से युक्त होता है तथा दीपनीय जल के द्वारा सिद्ध किया हुआ होता है। यह हलका माना गया है इनमें से दूसरा अर्थात् अकृतयूष ईषत् लवण युक्त तथा दीपक होता है। इसी प्रकार तीसरा अर्थात् मांसरस होता है परन्तु यह अल्प (थोड़े) स्नेह के द्वारा सिद्ध किया गया होता है ॥३८॥

अव्यक्तलवणस्नेहो यूषस्त्वकृतको मतः ॥३९॥
मन्दाम्ललवणस्नेहसंस्कारः स्यात् कृताकृतः। व्यक्तस्नेहाम्ललवणः कृतयूषः सुसंस्कृतः ॥४०॥
एवमेव रसं विद्यादिमं पेयादिकं क्रमम्।

जिस यूष में लवण एवं स्नेह स्पष्ट न हो उसे अकृतयूष कहते हैं। जो स्वल्प अम्ल, लवण एवं स्नेह के द्वारा संस्कृत किया गया है उसे कृताकृत यूष कहते हैं। तथा जिस यूष में स्नेह, अम्ल एवं लवण व्यक्त-स्पष्ट हों उस संस्कृत यूष को कृतयूष कहते हैं। अर्थात् जिस यूष में अम्ल, लवण तथा स्नेह स्पष्ट रूप से प्रतीत न हो अथवा जो स्नेह एवं लवण आदि के द्वारा संस्कृत न हो उसे अकृतयूष, जिसमें स्नेह, अम्ल तथा लवण स्पष्ट रूप से प्रतीत हों—जो स्नेह अम्ल लवण आदि के द्वारा सिद्ध किया गया हो—उस यूष को कृतयूष तथा जिसमें अम्ल, लवण एवं स्नेह थोड़ी मात्रा में हों उसे कृताकृत यूष कहते हैं। इसी प्रकार मांसरस को भी समझना चाहिये अर्थात् मांसरस भी ऐसा हो सकता है जो स्नेह लवण आदि के द्वारा सिद्ध हो अथवा न हो। यह पेयादि क्रम कहा गया है ॥३९-४०॥

सकृज्जघन्या द्विर्मध्या त्रिः श्रेष्ठा शुद्धिमर्हति ॥४१॥

जघन्य (हीन) शुद्धि वाले व्यक्ति को इनमें से एक का सेवन करना चाहिये। मध्य शुद्धि वाले को इनमें से दो का तथा श्रेष्ठ शुद्धि वाले व्यक्ति को इनमें से तीनों का सेवन करना चाहिये। अर्थात् हीन शुद्धि वाले व्यक्ति को केवल अकृतयूष का सेवन करना चाहिये। मध्य शुद्धिवाले को अकृत तथा कृत यूष का सेवन करना चाहिये तथा श्रेष्ठ शुद्धि वाले व्यक्ति को अकृत तथा कृतयूष एवं मांसरस-तीनों का सेवन करना चाहिये ॥४१॥

इमां पेयादिसंसर्गी सर्वसंशोधनोपगाम्। आरोग्यकामः सेवेत स्वास्थ्ये प्रकृतिभोजनम् ॥४२॥
वर्जयित्वा विरुद्धान्नं गुर्वसात्म्यं च यद्भवेत्।

आरोग्य की कामना करनेवाले व्यक्ति को चाहिये कि वह संशोधन में सहायता देने वाले उपर्युक्त पेयादि संसर्जन क्रम का सेवन करे। तथा पूर्णरूप से स्वास्थ्य की प्राप्ति हो जाने पर विरुद्ध, गुरु तथा असात्म्य भोजन को छोड़कर शेष प्रकृति (साधारण) भोजन पर पहुंच जावे ॥४२॥

अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रमाणादिप्रयोजनम् ॥४३॥

इसके बाद अब मैं प्रमाण आदि का प्रयोजन कहूंगा। अर्थात् अब वमन, विरेचन आदि की मात्रा का वर्णन करूंगा ॥

संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७] खिलस्थानम् ४१५

वमनीयकषायस्य चत्वारोऽञ्जलयः परा।
मात्रा, मध्या त्रयो, ह्रस्वा द्वौ, तदर्धा विरेचने ॥४४॥

वमन के लिये प्रयुक्त किये जाने वाले कषाय की उत्कृष्ट मात्रा चार अञ्जलि होती है। मध्य मात्रा तीन अञ्जलि तथा ह्रस्व (हीन) मात्रा दो अञ्जलि होनी चाहिये। विरेचन की मात्रा इससे आधी होनी चाहिये अर्थात् विरेचन की उत्कृष्ट मात्रा दो अञ्जलि, मध्य मात्रा डेढ़ अञ्जलि तथा ह्रस्व मात्रा एक अञ्जलि होनी चाहिये ॥४४॥

पुरुषं पुरुषं प्राप्य दोषाणां च बलाबलम्। मदनस्य फलक्वाथः पिप्पलीसर्पपान्वितः ॥४५॥
ग्रहघ्न्या वा स एवाऽथ पटोलारिष्टवत्सकैः ।
युक्तो वाऽथ प्रियङ्गूनां कल्केन मधुकस्य च ॥४६॥
वमनार्थे विधेयः स्यान्मधुसैन्धवमूर्च्छितः ।

प्रत्येक पुरुष (रोगी व्यक्ति) तथा उसके दोषों के बलाबल को देखकर मदनफल के क्वाथ को मधु और सैन्धव से मूच्छित करके अर्थात् मधु और सैन्धव से युक्त करके उसमें पिप्पली और सरसों अथवा ग्रहघ्नी (श्वेत सरसों), पटोल, अरिष्ट (नीम) और वत्सक (इन्द्रजौ) अथवा प्रियङ्गु (फूल प्रियङ्गु) और महुए का कल्क डालकर वमन के लिये प्रयुक्त करना चाहिये ॥४५॥

न त्वजीर्णे, हितं त्वत्र लवणोष्णाम्बु केवलम् ॥४७॥
तद्धि सर्वं समुत्क्लिश्य मुखेनाशु विनिर्हरेत् ।

परन्तु यदि रोगी को अजीर्ण हो तो उस अवस्था में उपर्युक्त ओषधियों का व्यवहार नहीं करना चाहिये, अपितु उस अवस्था में वमन के लिये केवल उष्ण जल में नमक डालकर प्रयोग करना चाहिये। यह सम्पूर्ण दोषों का उत्क्लेश करके दोषों को मुख से बाहर निकाल देता है। मदनफल के कषाय में मधु और सैन्धव का डालना कफ के विलयन के लिये लिखा है। इसलिये चरक सू. अ. १५ में भी कहा है—‘मधुमधुकसैन्धवफाणितोपहिता मदनफलकषायमात्रा पाययेत्’। यदि पूर्वकृत भोजन जीर्ण हो चुका हो तभी उपर्युक्त विधान प्रयोग में लाना चाहिये, भोजन के अजीर्ण की अवस्था में नहीं। इसीलिये चरक सू. अ. १५ में वमन के विधान में ‘सुप्रजीर्णभक्तं’ विशेषण दिया है। तथा चरक सि. अ. ६ में भी अजीर्ण की अवस्था में औषध का निषेध किया गया है ॥४७॥

यद्येवमामं विष्टम्भान्नापैति तत उत्तरम् ॥४८॥
वचाजगन्धामदनपिप्पलीभिस्तदुद्धरेत् । अन्यैर्वा कल्क(ल्प)विहितैर्बीभत्सोद्वेजनौषधैः ॥४९॥
अङ्गुल्युत्पलनालाद्यैर्गलावतुदनैः सुखैः । तत्पार्श्वोदरपृष्ठानां पीडनोन्मर्दनैरपि ॥५०॥

यदि वह दोष आम अवस्था में विद्यमान होने के कारण बाहर न निकले तो उसके बाद वच, अजगन्धा, मैनफल तथा पिप्पली के द्वारा उसे बाहर निकाले अथवा अन्य कल्पों (कटुतुम्बी, जीमूत, धामार्गव आदि) से बनाये हुए बीभत्स (घृणित) तथा उद्वेजन कारक ओषधियों अथवा अंगुली या कमलनाल के द्वारा गले में सुखकारक स्पर्श के द्वारा अथवा रोगी के पार्श्व, उदर और पृष्ठप्रदेश को दबाने या ऊपर की ओर मालिश करने के द्वारा उस दोष को बाहर निकाल देवे ॥

पीतवन्तं च वमनं मुहूर्तमनुपालयेत् । विदाहपूर्वः स्वेदोऽस्य यदा भवति सर्वतः ॥५१॥
विष्यन्दमानं जानीयात्तदा दोषं भिषग्वरः । लोमहर्षेण चान्वक्षं स्थानेभ्यश्चलितं तथा ॥५२॥
आध्मानोद्वेष्टनाभ्यां च निर्दिशेत् कोष्ठमाश्रितम् । हल्लासास्यपरिस्रावैश्चामुखीभूतमुद्धरेत् ॥५३॥
उष्णाम्बु लवणोपेतं पीत्वाऽऽकण्ठं पुनः पुनः ।

४१६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७]

वमन औषध पिलाने के बाद मुहूर्त भर (थोड़ी देर) प्रतीक्षा करे। रोगी को पहले गरमी लगेगी तथा उसके बाद सारे शरीर में पसीना आने लगेगा। उस समय वैद्य यह समझ ले कि दोष पिघल रहे हैं। तथा शरीर में लोमहर्ष के द्वारा दोषों को अपने स्थान से विचलित हुआ जाने। आध्मान तथा उद्वेष्टन के द्वारा दोषों को कोष्ठ में आया हुआ तथा जी मलचाने और मुख में लालास्राव के द्वारा दोषों को ऊर्ध्वमुख जाने तब कण्ठपर्यन्त लवणयुक्त उष्ण जल पुनः २ पीकर वमन के द्वारा दोषों को बाहर निकाल दे। सुश्रुत के अनुसार औषध पिलाने के बाद प्रतीक्षा काल में अग्नि पर हाथों को तपाकर रोगी को उष्णता पहुँचानी चाहिये ॥५१-५३॥

यावत् स्युरष्टौ षड्वाऽपि वेगाश्चत्वार एव वा ॥५४॥ आपित्तदर्शनाद्वाऽपि दोषोच्छित्तेरतथापि वा।

वमन के वेग-वमन में आठ, छै अथवा चार वेग आने चाहिये (अर्थात् उत्कृष्ट शोधन में ८ वेग, मध्य शोधन में ६ वेग तथा हीन शोधन में वमन के ४ वेग होने चाहिये। चरकसि. अ. १ में कहा है—जघन्यमध्यप्रवरेषु वेगाश्चत्वार इष्टा वमने षडष्टौ। अथवा वमन में कफ के बाद पित्त निकलने लगे या दोष नष्ट हो जायें तब तक वमन औषधि देनी चाहिये। चरक सि. अ. १ में कहा है-'पित्तान्तमिष्टं वमनं तथोर्ध्वम्' अर्थात् वमन पित्त निकलने पर्यन्त देना चाहिये। वमन में दोषों के निकलने का क्रम चरक सि. अ. १ में निम्न प्रकार से दिया है। क्रमात् कफः पित्तमथानिलश्च यस्यैति सम्यग्वमितः स इष्टः ॥५४॥

मानप्रमाणतो वैकाध्यर्धद्विप्रस्थसंमितम् ॥५५॥ पीतादभ्यधिकं यत् स्यात् सदोषस्तद्विनिर्गमे।

दोषों के मान के अनुसार पी हुई औषध के अतिरिक्त एक, डेढ़ और दो प्रस्थ दोष निकलने चाहिये अर्थात् हीन शुद्धि में एक प्रस्थ, मध्य शुद्धि में डेढ़ प्रस्थ तथा उत्कृष्ट शुद्धि में दो प्रस्थ होना चाहिये। वमन के वेगों के मान के विषय में चरक सि. अ. १ में कहा है—पित्तान्तमिष्टं वमनं विरेकादर्थम्.....। अर्थात् वमन में दोषों का परिमाण विरेचन से आधा होना चाहिये। वमन में पी हुई औषध के निकलने के बाद तथा विरेचन में दो तीन पुरीषयुक्त वेगों के पश्चात् वेगों को मापना चाहिये। यहां पर प्रस्थ १६ पल का नहीं लेना चाहिये अपितु परिभाषा के अनुसार १३-१/२ पल का लेना चाहिये। वमन आदि की मात्रा यदि पी हुई औषध से अधिक हो तो वह निकलते हुए दोषयुक्त होती है ॥५५॥

निरामगन्ध्यं सोद्गारं यावत् पीतमपिच्छिलम् ॥५६॥ यदा विकलुषं वान्तं दृश्यतेऽम्बु प्रतिग्रहे¹। कुक्ष्युरःकण्ठशिरसां लाघवं रोगमार्दवम् ॥५७॥ क्लमकार्श्ये न चात्यर्थमुत्साहो विशदात्मता। सद्यो निर्हृतदोषस्य लिङ्गान्येतानि निर्दिशेत् ॥५८॥

दोषों के निकल जाने पर लक्षण-जब पी हुई ओषधि रोगी को आमगन्ध से रहित उद्गार (डकार) सहित वापिस आ जाये तथा पीकदान में वमन किया हुआ जल (द्रव्य) पित्तालता तथा कलुषता (दोषों) से रहित दिखाई देवे, कुक्षि (कोख), छाती, कण्ठ तथा सिर में लघुता प्रतीत हो, रोग मृदु हो जायें, शरीर में थकावट तथा कमजोरी बहुत अधिक मालूम न पड़े, उत्साह एवं विशदता (प्रसन्नता) दिखाई दे-इन लक्षणों को देखकर यह समझना चाहिये कि उसके दोष निकल गये हैं ॥५६-५८॥


१. पतद्ग्रहे इत्यर्थः। 'पीकदानी' इति भाषायाम्। 'प्रतिग्रहः स्वीकारणे सैन्ये पृष्ठे पतद्ग्रहे' इति मेदिनी।

संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७]खिलस्थानम्४१७

शिरोगतं ततश्चास्य त(तै)लैः स्विन्नस्य देहिनः। दोषावशेषं नस्येन धूमपानेन वा हरेत् ।। ५९ ।।

इसके (वमन के) बाद उसके सिर में बचे हुए दोषों को सिर में तेल की मालिश करके तथा फिर नस्य और धूम्रपान के द्वारा नष्ट करे। ऊर्ध्वजत्रुज दोषों को नष्ट करने के लिये धूम्रपान तथा नस्य विशेष प्रभाव रखते हैं अतः सिर में स्थित दोषों को निकालने के लिये धूम्रपान एवं नस्य का प्रयोग कराया जाता है ॥५९॥

यथाशुद्धि ततश्चैनं संसर्गेणोपपादयेत् । हरीतक्या ग्रहघ्न्या वा कल्पोक्तं स्याद्विरेचनम् ।। ६० ।।

इसके बाद सम्यक् प्रकार से शुद्धि हो जाने पर रोगी को संसर्जन क्रम के द्वारा भोजन कराये तदनन्तर कल्पोक्त हरीतकी अथवा ग्रहघ्नी (श्वेत सरसों) के द्वारा विरेचन कराये। जिस व्यक्ति को वमन के बाद विरेचन देना हो उसे पुनः स्नेहन तथा स्वेदन देकर तब विरेचन देना चाहिये। संशोधन कराने में वमन कराने के १५ दिन बाद विरेचन देना चाहिये। सुश्रुत में कहा है—'पक्षाद्विरेको वान्तस्य' इन १५ दिनों में पेयादि संसर्जन क्रम का सेवन और स्नेहन-स्वेदन आदि करना चाहिये ॥६०॥

पिप्पलीसैन्धवोपता पथ्या वा त्रिवृतायुता । शृतं चारग्वधफलं क्षीरेणाथ रसेन वा ।। ६१ ।।
त्रिफला वा त्रिवृद्युक्ता सघृतव्योषसैन्धवा । तथा गन्धर्वतैलं वा श्रेष्ठं स्नेहविरेचनम् ।। ६२ ।।

अथवा पिप्पली और सैन्धव से युक्त हरीतकी अथवा त्रिवृत् युक्त हरीतकी देवे। अथवा अमलतास के गूदे के क्वाथ को दूध या मांसरस से देवे। अथवा त्रिफला और त्रिवृत् में घृत, व्योष (त्रिकटु-सोंठ, मरिच, पीपल और सैन्धव) मिलाकर दें। अथवा गन्धर्व तैल (एरण्ड तैल) श्रेष्ठ स्नेह विरेचन है ॥६१-६२॥

दशमूलकषायेण जाङ्गलानां रसेन वा । द्राक्षाक्वाथेन वा युक्तमथवा दीपनाम्बुना ।। ६३ ।।
त्रिवृद्द्राक्षाभयानां वा गवां मूत्रेण संयुता । सद्राक्षा त्रिवृता वा स्यादथवा त्रिवृताष्टकम् ।। ६४ ।।

दशमूल के क्वाथ, जांगल मांसरस, द्राक्षा (मुनक्का) के क्वाथ, दीपनीय जल अथवा गोमूत्र के साथ त्रिवृत्, द्राक्षा और हरड़ का प्रयोग करना चाहिये। अथवा द्राक्षा और त्रिवृत् या त्रिवृताष्टक चूर्ण का सेवन करें ॥६३-६४॥

पथ्या त्रिजातकं व्यूषं विडङ्गामलकं घनम् । समानि, षड्गुणा त्वत्र शर्कराऽष्टगुणा त्रिवृत् ।। ६५ ।।
चूर्णं ज्वरश्रमश्वासकासपाण्ड्वामयक्षयान् । हन्यात् क्रिमिविषार्शांसि मूत्रकृच्छ्रं च देहिनाम् ।। ६६ ।।

त्रिवृताष्टक चूर्ण—हरड़, त्रिजातक (दालचीनी, छोटी इलायची तथा तेजपत्र), त्रिकटु, विडङ्ग, आंवला तथा नागरमोथा—सब द्रव्य समभाग लेवें। इसमें ६ गुना शर्करा तथा ८ गुना त्रिवृत् डालकर सबका चूर्ण करें। यह चूर्ण प्राणियों के ज्वर, श्रम, श्वास, कास, पाण्डुरोग, क्षय, कृमि, विष, अर्श तथा मूत्रकृच्छ्र को नष्ट करता है ॥६५-६६॥

दशावरे, पञ्चदश मध्यमे, त्रिंशदुत्तमे । वेगा द्वित्रिचतुष्प्रस्थप्रमाणाः स्युर्विरेचने ।। ६७ ।।

विरेचन के वेग—अवर (हीन) विरेचन में दस, मध्यम विरेचन में १५ तथा उत्तम विरेचन में ३० वेग होते हैं। तथा मान के अनुसार दोषों का प्रमाण हीन विरेचन में दो प्रस्थ, मध्यम विरेचन में तीन प्रस्थ तथा उत्तम विरेचन में चार प्रस्थ होना चाहिये। चरक सि. अ. १ में विरेचन के मध्यम योग में १५ के स्थान पर २० वेग दिये हैं ॥६७॥

विट्पित्तकफसंमिश्राः सवाताः स्युर्यथाक्रमम् । पित्तावसाना वमने कषायकफमूर्च्छिताः ।। ६८ ।।
सम्यग्योगेऽतियोगेऽतिप्रवृत्तिः शोणितोत्तरा ।
अयोगे त्वप्रवृत्तिः स्याद्विपरीताऽल्पशोऽपि वा ।। ६९ ।।
विभ्रंशः कर्मणो भ्रंशः केवलौषधनिर्गमः ।

४१८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७]

विरेचन में दोषों के निकलने का क्रम—विरेचन के सम्यक् योग में सबसे पहले मल फिर क्रमशः पित्त, कफ तथा वायु निकलते हैं। तथा वमन में पहले कषाय औषध फिर कफ तथा अन्त में पित्त निकलता है। आमाशय के खाली हो जाने पर अन्त में केवल वायु ही निकलती हैं। विरेचन का अतियोग—इसमें उपर्युक्त दोष अत्यधिक मात्रा में निकलते हैं तथा अन्त में मल के साथ रक्त आने लगता है। विरेचन के अयोग के लक्षण—विरेचन का सर्वथा प्रवृत्त न होना, विपरीत मार्ग में प्रवृत्त होना (अर्थात् विरेचन न होना तथा स्वयं औषध का भी वापिस न निकलना अपि तु ऊर्ध्वगति होकर आध्मान, वमन आदि उपद्रवों का करना), विरेचन का अल्प मात्रा में होना, विभ्रंश (कोष्ठस्थित अङ्गों का स्वस्थान से च्युत हो जाना अथवा गुदभ्रंश–कांच निकलना), विरेचन कार्य का बिलकुल न होना अथवा विरेचन के लिये पीई हुई केवल औषध का ही निकल जाना—ये अयोग के लक्षण होते हैं ॥६८-६९॥

सर्पिष्यानं विकारे स्यादातियोगानुबन्धजे ॥७०॥
मधुकादिविपक्वं वा तैलं तत्रानुवासनम् ।

विरेचन के अतियोग से होने वाले विकारों में घृतपान कराना चाहिये अथवा मुलहठी के द्वारा सिद्ध तैल से अनुवासन बस्ति देनी चाहिये ॥७०॥

दुर्वान्तं दुर्विरिक्तं वा स्निग्धदेहं बलान्वितम् ॥७१॥
बहुदोषं दृढाग्निं च पाययेदपरेऽहनि । दुर्बलं क्रमशो भूयः स्निग्धस्विन्नं विशोधयेत् ॥७२॥
(इति ताडपत्रपुस्तके २१६ तमं पत्रम्)

दुर्वान्त तथा दुर्विरिक्त पुरुष (जिसे वमन तथा विरेचन ठीक प्रकार न हुआ हो—अयोग हो) का शरीर यदि स्निग्ध तथा बलवान् हो, दोष अधिक मात्रा में विद्यमान हों तथा जाठराग्नि प्रदीप्त हो तो उसे अगले दिन वमन या विरेचन औषध पुनः पिलानी चाहिये। यदि रोगी दुर्बल है तो उसे नये सिरे से स्नेहन तथा स्वेदन देने के बाद ही पुनः वमन तथा विरेचन ओषधि पिलानी चाहिये। अर्थात् यदि रोगी को वमन तथा विरेचन औषध पिलाने के बाद ठीक प्रकार से वमन तथा विरेचन न हुआ हो परन्तु रोगी का शरीर स्निग्ध तथा बलवान् हो, शरीर में दोषों की मात्रा अधिक हो तथा जाठराग्नि तेज हो तो उसे अगले ही दिन पुनः वमन या विरेचन ओषधि पिलानी चाहिये। परन्तु यदि रोगी दुर्बल है तो अगले दिन ओषधि नहीं देनी चाहिये अपितु नये सिरे से दोबारा शरीर का स्नेहन तथा स्वेदन करने के बाद ही पुनः वमन तथा विरेचन ओषधि पिलाये। वमन या विरेचन के अयोग में पुनः ओषधि देने से पहले यह देख लेना आवश्यक है कि पूर्व प्रदत्त ओषधि जीर्ण हो चुकी है या नहीं। पूर्व औषधि के जीर्ण होने पर ही पुनः ओषधि देनी चाहिये अन्यथा अतियोग का भय रहता है। इसके अतिरिक्त रोगी के कोष्ठ तथा शारीरिक बल का ध्यान रखना भी आवश्यक है। यदि रोगी बलवान् है तो तीक्ष्ण ओषधि देनी चाहिये और यदि रोगी निर्बल है तो मृदु संशोधन देना चाहिये ॥

न तु दुश्छर्दनं जातु क्रूरकोष्ठमथापि वा । तयोः संशमनैर्दोषान् बस्तिभिर्वा शमं नयेत् ॥७३॥
अहृद्यमतिदुर्गन्धमजीर्णे चाति वा बहु । यस्यानुलोमिकं पीतमूर्ध्वं याति कफावृतम् ॥७४॥
तं वामितं लङ्घितं वा परिस्निग्धं विरेचयेत् ।

दुर्वम्य (जिसे वमन कठिनता से होता हो) अथवा क्रूरकोष्ठ (जिसे विरेचन अत्यन्त कठिनता से होता हो) पुरुष को कभी भी वमन या विरेचन ओषध दोबारा नहीं देनी चाहिये। उनके दोषों को संशमन उपायों अथवा बस्ति के द्वारा शान्त करना चाहिये। चरक सि. अ. ६ में कहा है कि उन्हें साधारणतया पुनः वामक या विरेचक ओषधि नहीं देनी चाहिये और यदि देनी ही पड़े तो अधिक मात्रा में नहीं देनी चाहिये ॥

संशुद्धिविशेषणीयाध्यायः ७] खिलस्थानम् ४१९

जिस रोगी को पिलाई गई विरेचक औषध हृदय को अच्छी न लगने, अत्यन्त दुर्गन्ध युक्त होने, अजीर्ण में ओषधि का प्रयोग करने अथवा मात्रा में अत्यन्त अधिक होने के कारण कफ से आवृत्त हुई ओषधि ऊपर की ओर चली जाती है अर्थात् विरेचन न होकर वमन हो जाता है उसे वमन, लङ्घन तथा स्नेहन कराकर विरेचन कराये ।।७३-७४।।

अत्यर्थस्निग्धदेहस्य विशुद्धामाशयस्य वा ।।७५।। मारुतस्यानुलोम्यस्य यस्याधो वमनं व्रजेत् । तस्य संसर्गमात्रेण परिशुद्धिर्विधीयते ।।७६।। दुर्बलस्याल्पदोषस्य मृदु संशोधनं हितम्।

जिस व्यक्ति का शरीर अत्यन्त स्निग्ध होने से, आमाशय शुद्ध होने से अर्थात् आमाशय में कफ का संचय न होने से तथा वायु के अनुलोम होने से वमन औषध नीचे की ओर चली जाये अर्थात् वमन न होकर विरेचन हो जाये उस व्यक्ति की संसर्जन मात्र से शुद्धि हो जाती है । दुर्बल तथा अल्प दोष वाले व्यक्ति के लिये मृदु संशोधन देना चाहिये ।।७५-७६।।

विगृहीताचिराद्दोषैः स्तोकं स्तोकं व्रजत्यधः ।।७७।। उष्णाम्बुपानं तत्र स्यादानुलोम्यकरं परम्।

ओषधि के द्वारा दोषों के शीघ्र ही ग्रहण न किये जाने के कारण दोष धीरे २ नीचे आता है । उस अवस्था में उष्णजल पिलाना चाहिये । वह मल तथा दोषों की गति का अनुलोमन करता है अर्थात् जब बार २ थोड़ा २ मल आता हो तब उष्ण जल पिलाना चाहिये जिससे दोषों तथा मलों की गति अनुलोम हो जाती है ।।७७।।

दोषो भवेद्वा सोद्गारो नोर्ध्वं नाधश्च गच्छति ।।७८।। सशूले भेषजे जन्तोः स्वेदं तत्रावचारयेत्।

औषध का सेवन करने पर रोगी को उद्गार (उबकाई) आने लगे तथा दोष न ऊपर की ओर जाये और न नीचे की ओर जाये । अर्थात् दोष न वमन के द्वारा निकले और न विरेचन के द्वारा निकले तथा रोगी के पेट में शूल हो तो उस अवस्था में स्वेदन देना चाहिये ।।७८।।

मात्राविरिक्ते सोद्गारमौषध क्षिप्रमुद्धरेत् ।।७९।। अतिप्रवृत्तौ जीर्णेऽस्मिन् स्तम्भनीयैरुपक्रमेत्।

योग्य मात्रा में विरेचन हो जाने के बाद भी यदि ओषधि के डकार आते हों तो शीघ्र ही वमन द्वारा उस ओषधि को बाहर निकाल देना चाहिये । अन्यथा विरेचन का अतियोग हो जायेगा । तथा वेग की अति प्रवृत्ति (अतियोग) में औषध के जीर्ण होने पर स्तम्भक द्रव्यों के द्वारा इसका स्तम्भन करे ।।

दीप्ताग्नेः क्रूरकोष्ठस्य बहुदोषस्य देहिनः ।।८०।। सोदावर्तस्य निर्हृत्य पुरीषं फलवर्तिभिः । सुस्निग्धस्विन्नगात्रस्य भिषग्दद्याद्विरेचनम् ।।८१।।

जिस व्यक्ति की अग्नि दीप्त हो, कोष्ठ क्रूर हो (अर्थात् विरेचन अत्यन्त कठिनता से हो) तथा शरीर में दोष बहुत अधिक विद्यमान हों—उसे यदि उदावर्त हो जाय तो वैद्य फलवर्तियों के द्वारा उसके मल को निकाल कर शरीर का स्नेहन एवं स्वेदन करके उसे विरेचन देवे ।।८०-८१।।

यदसक्तं महावेगैः सुखेनाशु प्रवर्तते । अनाबाधकरं नातिग्लपनं दोषशोधनम् ।।८२।। अव्यापन्नगुणोदर्कं मात्रायुक्तं सुसंस्कृतम् । पीतमेकाग्रमनसा सम्यक्च्छुद्धिकृदावहेत् ।।८३।।

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४२० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

सम्यक् शुद्धि करनेवाली ओषधि के लक्षण—जो ओषधि शरीर के अन्दर लगी हुई न रहे, अत्यन्त वेग के साथ सुखपूर्वक प्रवृत्त हो जाय, जो शरीर में कोई कष्ट न पहुँचाये, अत्यन्त ग्लानि उत्पन्न न करे, दोषों का शोधन करे, जिसके शुभ गुण नष्ट न हों, जो योग्य मात्रा में सेवन की जाय, जिसका अच्छी प्रकार संस्कार किया गया हो तथा जो एकाग्र मन से पीई गई हो—वह ओषधि सम्यक् प्रकार से शुद्धि करनेवाली कही गई है ॥८२-८३॥

दीप्ताग्नयः कर्मनित्या ये नरा रूक्षभोजिनः । शश्वद्दोषाः क्षयं यान्ति तेषां वाय्वग्निकर्मभिः ॥८४॥
विरुद्धाध्यशनाजीर्णदोषानपि सहन्ति ते । स्वस्थवृत्तौ न ते शोध्या रक्ष्या वातविकारात: ॥८५¹॥
विज्ञायैवंविधं वैद्यः संशुद्धिं कर्म(र्तु)मर्हति ।।

जिन व्यक्तियों की अग्नि प्रदीप्त है, जो नित्य परिश्रम आदि करते हैं, जो रूक्ष भोजन करते हैं—उनके दोष वायु, अग्नि तथा व्यायाम आदि कर्मों के द्वारा ही शान्त हो जाते हैं। वे व्यक्ति विरुद्ध भोजन, अध्यशन तथा अजीर्ण आदि दोषों को भी सह लेते हैं अर्थात् इन उपद्रवों से भी उनमें कोई विकार उत्पन्न नहीं होता है। उनका स्वास्थ्यावस्था में शोधन नहीं करना चाहिये तथा वायु के विकारों से उनकी रक्षा करनी चाहिये—अर्थात् यदि उन्हें कोई रोग न हो तो उनका वमनविरेचन आदि के द्वारा संशोधन करने की आवश्यकता नहीं है। रोग होने पर तो संशोधन करना ही पड़ता है। अन्य व्यक्तियों को जिस प्रकार रोग न होने पर भी ऋतु के अनुसार संशोधन कराया जाता है वैसा इनमें नहीं करना चाहिये केवल रोग की अवस्था में ही शोधन कराया जा सकता है। वैद्य को इन सब उपर्युक्त बातों को देखकर संशोधन करना चाहिये ॥८४-८५॥

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।
(इति) खिलेषु संशुद्धिविशेषणीयो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७॥


ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
(इति) खिलेषु संशुद्धिविशेषणीयो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७॥


अथ बस्तिविशेषणीयो नामाष्टमोऽध्यायः ।

अथातो बस्तिविशेषणीयं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।

अब हम बस्तिविशेषणीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। अर्थात् इस अध्याय में बस्ति के विशेष गुण तथा प्रयोगों का वर्णन किया जायगा ।।

बस्तिदानात् परं नास्ति चिकित्साऽङ्गेसुखावहा ।
शाखाकोष्ठगता रोगाः सर्वार्धाङ्गगताश्च ये ।।३।।
तेषां समुद्भवे हेतुर्वातादन्यो न विद्यते ।


१. अनयोः ८४-८५ श्लोकयोः प्रायः संवादिनी चरककल्पस्थाने १२ अध्याये ७८-७१ श्लोकौ ।

बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८] खिलस्थानम् ४२१

बस्ति से बढ़कर कोई भी चिकित्सा शरीर के अङ्गों को सुखक देनेवाली नहीं है। शाखागत, कोष्ठगत, सम्पूर्ण शरीरगत अथवा अर्धशरीरगत जितने भी रोग हैं उनकी उत्पत्ति में वायु के अतिरिक्त अन्य कोई कारण नहीं है।

वक्तव्य—चरक में तीन रोगों के मार्ग गिनाये गये हैं—१. शाखा २. मर्मास्थिसन्धि ३. कोष्ठ। शाखा से अभिप्राय रक्त आदि धातु तथा त्वचा है—यह रोग का बाह्य मार्ग है। बस्ति, हृदय, मूर्धादि मर्म तथा अस्थियों की सन्धियां—रोगों का मध्यम मार्ग है। कोष्ठ से अभिप्राय शरीर के आन्तरिक अवयवों—विशेषकर आमाशय, पक्वाशय आदि से है। यह रोगों का आभ्यन्तर मार्ग कहा गया है। यहां शाखा तथा कोष्ठ का स्पष्ट रूप से ग्रहण किया गया है परन्तु रोग के मध्यममार्ग (मर्मास्थिसन्धि) का उल्लेख स्पष्ट नहीं है। सर्वगत तथा अर्धाङ्गगत रोगों से इसका ग्रहण किया जा सकता है। इन सब रोगों का कारण वायु को माना गया है॥३॥

तथा कफस्य पित्तस्य मलानां च रसस्य च॥४॥
विक्षेपणे संहरणे वायुरेवात्र कारणम्।

इसी प्रकार कफ, पित्त, मल और रस के विक्षेप और संघात (वियोग तथा संयोग) में भी वायु ही कारण है। अर्थात् वास्तव में रोगों का कारण वायु ही है तथा कफ, पित्त आदि के वियोग और संयोग के कारण जो नाना प्रकार के रोग होते हैं-उनका भी वायु ही कारण है।

वक्तव्य—यद्यपि पित्त और कफ भी रोगों की उत्पत्ति में कारण होते हैं तथापि वायु प्रधान कारण है। पित्त तथा कफ चेष्टाहिन माने गये हैं। वायु ही उन्हें इधर उधर विक्षिप्त करके रोगोत्पत्ति कराता है॥४॥

जेता चास्य प्रवृद्धस्य बस्तितुल्यों न कश्चन॥५॥
तदुपार्धं¹ चिकित्सायाः सर्वं वातचिकित्सितम्।

इस प्रकार इस प्रवृद्ध हुए वायु को जीतने के लिये बस्ति के समान अन्य कोई उपाय नहीं है। इस प्रकार बस्तिक्रिया सम्पूर्ण वातरोगों की प्रायः आधी चिकित्सा मानी गई है। अर्थात् वातरोगों की सम्पूर्ण चिकित्सा में अकेली बस्ति ही लगभग आधी चिकित्सा है-वातरोगों की आधी चिकित्सा केवल बस्ति के द्वारा हो सकती है॥५॥

कर्म कालश्च योगश्च तिस्रः संज्ञा यथाक्रमम्॥६॥
वक्ष्ये निरुक्तनिर्देशसंख्यादोषविकल्पतः।

निरुक्ति, निर्देश, संख्या तथा दोष के भेद के अनुसार यथाक्रम कर्मबस्ति, कालबस्ति तथा योगबस्ति का मैं वर्णन करूंगा। अर्थात् बस्ति समूह तीन प्रकार का होता है। १. कर्म २. काल ३. योग॥६॥

बाहु ............ तेः कर्मसंज्ञितम्॥७॥
अत्युदीर्णबले जाते प्रयोज्यं तद्यथाविधि।

कर्मबस्ति—इनमें से कर्मसंज्ञक बस्ति का शरीर में बल के अधिक होने पर यथाविधि प्रयोग करना चाहिये॥७॥

तदर्धकलनात् कालः स हि मध्यबलान्वये॥८॥
पवने पित्तसंसृष्टे विधातव्यो विजानता।


१. तदुपार्धं बस्तिक्रियाऽर्धप्रायमित्यर्थः। यावन्ति वातचिकित्सितानि तेषु बस्तिकर्म अर्धप्रायं भवतीति भावः। चरकसिद्धिस्थानेऽपि बस्तिकर्मणो वातचिकित्सार्धत्वं निदर्शितम्।

४२२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८]

कालबस्ति—कर्मबस्ति की अपेक्षा संख्या में आधी होने के कारण इसे कालबस्ति कहते हैं। शरीर में बल मध्यम होने पर तथा वायु के साथ पित्त का संसर्ग होने पर बुद्धिमान व्यक्ति को इसका प्रयोग करना चाहिये ॥८॥

अल्पत्वात् स्नेहबस्तीनां युक्तेर्योगः स लाघवात् ।।९।।
प्रयोज्यः कफसंसृष्टे नातितीव्रबलेऽनिले ।

योगबस्ति—इसमें स्नेहबस्तियों के योग के कम होने से तथा इसी लिये लघु होने से इसे योगबस्ति कहा है। यदि कफ का संसर्ग हो तथा इसमें वायु का बल अधिक तीव्र न हो तो इसका प्रयोग करना चाहिये ॥९॥

अन्वासनाश्चतुर्विंशतिर्निरूहाः षट् च कर्मणि ।।१०।।
(द्वादशाऽन्वासनाः काले) निरूहाश्चात्र वै त्रयः ।।११।।
त्रय एव निरूहाः स्युर्योगे पञ्चानुवासनाः । कर्मादीनां त्रिपञ्चाशद्वस्तिसंख्या निदर्शिता ।।१२।।

कर्मबस्ति समुदाय में अनुवासन बस्ति २४ तथा निरूह बस्तियां ६ होती हैं। कालबस्तियों में १२ अनुवासन तथा ३ निरूह बस्तियां होती हैं। तथा योगबस्ति में ५ अनुवासन तथा ३ निरूह बस्तियां होती हैं। इस प्रकार कर्म, काल तथा योग में कुल बस्तिसंख्या ५३ होती हैं। कर्मबस्तियां कुल ३०, कालबस्तियां १५ तथा योगबस्तियां ८ होती हैं। इस प्रकार कुल ३०+१५+८=५३ बस्तियां होती हैं। चरक सि. अ. १ में कहा है--त्रिंशत्स्मृताः कर्मसु बस्तयो हि कालस्ततोऽर्धेन ततश्च योगः। अर्थात् कर्म ३० बस्तियों के समुदाय को कहते हैं। कालसंज्ञक बस्ति समुदाय में कर्म की अपेक्षा आधी अर्थात् १५ या १६ बस्ति होती हैं। और योग संज्ञक बस्ति समुदाय में इसमें भी आधी अर्थात् ८ बस्तियां होती हैं। यहां कुल संख्या ३०+१६+८=५४ दी है। क्योंकि १५ का आधा करने पर ७-१/२ होता है जो कि बस्ति की अवस्था में संभव नहीं। आधी बस्ति नहीं दी जा सकती। इस लिये इसे १६ मान लिया गया है। जिससे उसका आधा करने पर योगबस्तियां ८ होती हैं ॥१०-१२॥

पञ्चादौ कर्मणि स्नेहाश्चत्वारोऽन्ते तथाऽनयोः । मध्ये षण्णां निरूहाणामन्तरेषु त्रयस्त्रयः ।।१३।।
आदावन्तेऽन्तरे चैव काले स्नेहास्त्रयस्त्रयः । योगे निरूहान्तरितास्त्रयोऽन्ते द्वाविति क्रमात् ।।१४।।
प्रोक्तो विभागनिर्देशस्तद्विकल्पमतः शृणु ।

कर्मबस्ति में प्रारम्भ में ५ तथा अन्त में ४ स्नेहबस्तियां होती हैं तथा इनके मध्य में भी ६ निरूहों के बीच में तीन स्नेहबस्तियां होती हैं कालबस्ति में प्रारंभ, अन्त तथा बीच में भी तीन २ स्नेहबस्तियां होती हैं। अर्थात् इसमें स्नेह-बस्तियां ३ प्रारंभ में, तीन अन्त में तथा एक २ निरूह के व्यवधान से तीन निरूहों के बीच में तीन २ (अर्थात् ६) मध्य में होती हैं। इसमें निरूह बस्ति ३ होती हैं। योग बस्ति में स्नेहबस्तियां निरूह के व्यवधान से बीच २ में तीन तथा दो अन्त में होती हैं। अर्थात् तीन मध्य में, दो अन्त में एवं एक प्रारंभ में होती है। तथा बीच २ में तीन निरूह होती हैं। इन्हें हम निम्नरूप में रख सकते हैं-कर्मबस्ति-५ स्नेह+१ निरूह+३ स्नेह+१ निरूह+३ स्नेह+१ निरूह+३ स्नेह+१ निरूह+३ स्नेह+१ निरूह+३ स्नेह+१ निरूह+४ स्नेह=३०, कालबस्ति-३ स्नेह+१ निरूह+३ स्नेह+१ निरूह+३ स्नेह+१ निरूह+३ स्नेह=१५, योगबस्ति-१ स्नेह+१ निरूह+१ स्नेह+१ निरूह+१ स्नेह+१ निरूह+२ स्नेह+८। चरक सि. अ. १ में यह बस्ति समुदाय कुछ भिन्न रूप में मिलता है। तद्यथा-कर्मबस्ति में १ स्नेहबस्ति आदि में+५ अन्त में+मध्य में १२ अनुवासन+१२ निरूह=३० बस्तियां काल बस्ति में अन्त में ३ स्नेहबस्तियां+प्रारंभ में १ स्नेहबस्ति+निरूह के व्यवधान से ६ स्नेहबस्तियां=१६ बस्तियां। योगबस्ति में ३ निरूह+आदि, अन्त और मध्य की मिलाकर ५ स्नेहबस्तियां=८ बस्तियां। इस प्रकार यह कर्म, काल तथा योग के अनुसार बस्तियों के विभाग का निर्देश किया गया है। अब इसके विस्तार को सुनो। यहां यह जिज्ञासा हो सकती है कि इस प्रकार निरूह एवं अनुवासन के

बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८] खिलस्थानम् ४२३

परस्पर व्यवधान का क्या प्रयोजन है ? इसका उत्तर यह है कि अनुवासन तथा निरूह बस्ति को परस्पर एक दूसरे के व्यवधान के बिना सेवन करना उपयुक्त नहीं है क्योंकि अकेली स्नेहबस्ति (अनुवासन) के प्रयोग से कफ तथा पित्त का उत्क्लेश हो जाता है जिससे जाठराग्नि नष्ट हो जाती है। इसी प्रकार अकेले निरूह के निरन्तर सेवन से वायु का प्रकोप हो जाता है। इसलिये अनुवासन के बाद निरूह बस्ति तथा निरूह के बाद अनुवासन द्वारा स्नेह देना चाहिये। इस प्रकार व्यवधान से ही बस्तियों की योजना करना चाहिये। इसी प्रकार चरक सि. अ. ४ तथा सुश्रुत चि. अ. ३७ में भी कहा है ॥१३-१४॥

सप्त पञ्च त्रयो वाऽऽदौ वाते (स्नेहास्त्व)गर्हिताः । । १५ । । जघन्यौ पित्तकफयोरेतावेव कदाचन ।

वायु के प्रकोप में प्रारम्भ में सात, पांच या तीन स्नेह-बस्तियां निन्दित नहीं हैं। परन्तु ये ही संख्याएँ अर्थात् सात, पांच या तीन स्नेहबस्तियां पित्त तथा कफ के प्रकोप में यदि प्रारम्भ में दी जांय तो कभी २ निन्दित मानी जाती हैं ॥१५॥

तां तामतवस्थामन्वीक्ष्य दोषकालबलाश्रयाम् । । १६ । । उत्कर्षेच्चावकषैच्च बस्तीन् द्रव्याणि वा भिषक् । कुर्याद्योगे तथोत्कर्षमपकर्षं तु कर्मणि । । १७ । । काले तदुभयं चैव वीक्ष्य दोषबलाबलम् ।

इसलिये दोष (वात, पित्त, कफ), काल तथा रोगी के बल पर आश्रित उस २ अवस्था को देखकर चिकित्सक को चाहिये कि वह बस्ति अथवा उसके द्रव्यों में घटाबढ़ी कर ले। योगबस्ति में उत्कर्ष (वृद्धि) कर्मबस्ति में अपकर्ष (ह्रासकमी) तथा कालबस्ति में दोषों के बलाबल को देखकर दोनों अर्थात् अवस्थामनुसार वृद्धि एवं ह्रास दोनों किये जा सकते हैं ॥१६-१७॥

वाते समांशः स्निग्धोष्णो निरूहः पानतैलिकः । । १८ । । षड्भागस्नैहिकौ पित्ते सक्षीरौ स्वादुशीतलौ । त्रयः समूत्रास्तीक्ष्णोष्णाः श्लेष्मण्यष्टाङ्गतैलिकाः । । १९ । । सकृत् प्रणिहितो वातमाशयस्थं निरस्यति । सपित्तं सकफं द्वित्रिरत ऊर्ध्वं न शस्यते । । २० । ।

वायु के रोगों में निरूह बस्ति में समान मात्रा में तेल डालकर उसे स्निग्ध तथा उष्ण करके एक बस्ति देनी चाहिये । पित्त के रोगों में ६ भाग तेल तथा दूध के द्वारा स्वादु तथा शीतल करके दो बस्तियां देनी चाहिये। तथा श्लेष्मा (कफ) के रोगों में आठ भाग तेल तथा गोमूत्र डालकर तैयार की हुई तीक्ष्ण तथा उष्ण तीन बस्तियां देनी चाहिये। वायु के रोगों में दी हुई एक बस्ति आशयों में से वातदोष को निकाल देती है। पित्त के रोगों में दो तथा कफ के रोगों में तीन बस्तियां देनी चाहिये। इससे अधिक बस्तियां नहीं देनी चाहिये। यह निरूह बस्तियों के विषय का विचार किया गया है। इसी प्रकार चरक सि. अ. ३ में भी कहा है। सुश्रुत चि. अ. ३२ में कहा है कि यदि उपर्युक्त संख्या में दी गई बस्तियों से दोष ठीक प्रकार से न निकल पायें तो इससे अधिक बस्तियां भी दी जा सकती हैं ॥१८-२०॥

शस्यतेऽत्र रसक्षीरयूषाशनविधिः क्रमात् । अथवा बलकालाग्निदेशप्रकृतिसात्म्यतः । । २१ । ।

बस्ति देने के बाद क्रमशः रस (मांसरस), क्षीर (दूध) तथा यूष का भोजन करना चाहिये। अर्थात् वातरोग में बस्ति देने के बाद मांसरस, पित्तरोग में दूध तथा कफरोग में यूष का भोजन कराना चाहिये। अथवा रोगी के बल, काल, अग्नि, देश, प्रकृति तथा सात्म्य के अनुसार जो उचित हो वह भोजन देना चाहिये। इसी प्रकार चरक सि. अ. ३ में भी कहा है ॥२१॥

एता दोषविकल्पान्ता निर्दिष्टा बस्तियुक्तयः । एष चाप्यपरः कल्पश्चतुर्भद्र इति स्मृतः । । २२ । ।

४२४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८]

इस प्रकार दोष भेद से यह बस्तियों की योजना की गई है। इसके अतिरिक्त बस्तियों के सम्बन्ध में निम्न चतुर्भद्र नाम का एक कल्प दिया गया है ॥२२॥

चत्वारो बस्तयः पूर्वमन्ते चत्वार एव च । तयोरास्थापनं मध्ये कल्पः सोऽयं निरत्ययः ॥२३॥ द्विस्त्रिर्वाऽर्थवशादेष क्रियमाणः सुखावहः ।

चतुर्भद्र कल्प—चार स्नेहबस्तियां प्रारम्भ में+चार अन्त में तथा+इनके बीच में चार आस्थापन (निरूह या रूक्ष बस्तियां) बस्तियां देनी चाहिये । बस्तियों का यह कल्प उपद्रवशून्य होता है अर्थात् इस कल्प का प्रयोग करने पर किसी उपद्रव की संभावना नहीं होती है । इस कल्प का आवश्यकतानुसार दो या तीन बार प्रयोग करने पर वह सुखकारक होता है । अर्थात् आवश्यकतानुसार इस कल्प का दोबारा या तिबारा भी प्रयोग किया जा सकता है ॥२३॥

ज्वरादिभिः परिक्लिष्टे हीनवर्णबलौजसि ॥२४॥ जातानुवासनावस्थे बलपुंस्त्वाग्निवर्धनाः ।

जो रोगी ज्वर आदि के कारण क्लान्त हुआ है तथा इसी कारण से जिसका वर्ण, बल तथा ओज कम हो गया है—ऐसी अवस्था में यदि अनुवासन (स्नेहबस्ति) किया जाता है तो वह उसके बल, पुंस्त्वशक्ति तथा जाठराग्नि को बढ़ाता है ॥२४॥

अयुग्मा बस्तयो देया न तु युग्माः कथञ्चन ॥२५॥ विषमा विषमैरेव हन्यन्ते बस्तिभिर्गदाः । एकस्त्रयो वा कफजे, पैत्तिके पञ्च सप्त वा ॥२६॥ वाते नवैकादश वा यो यदाप्नोति वा समम् ।

(इति ताडपत्रपुस्तके २१७ तमं पत्रम्)

रोगी को सदा अयुग्म (विषम संख्या में) ही बस्तियां देनी चाहिये । युग्म (सम संख्या में) बस्तियां कभी नहीं देनी चाहिये । विषम हुए रोग अथवा दोषों के विषम होने के कारण उत्पन्न हुए रोग विषम बस्तियों के द्वारा ही नष्ट होते हैं । जिस रोगी को कफज रोग में एक या तीन, पित्तज रोग में पांच या सात तथा वातिक रोग में नौ या ग्यारह बस्तियां दी जाती हैं उसके दोष या धातुएँ समावस्था में रहती हैं अर्थात् वह स्वस्थ रहता है । इसी प्रकार चरक सि. अ. १ में भी कहा है । विषम संख्या में बस्ति देने का नियम साधारणतया प्रधानरूप से कराये जाने वाले अनुवासन के लिये ही है । निरूहबस्ति के अङ्गरूप में कराये जाने वाले अनुवासन में यह नियम लागू नहीं होता है । उस अवस्था में सम (युग्म) बस्तियां भी दी जा सकती हैं ॥२५-२६॥

इति सूक्ष्मविचित्रार्थमुक्तं व्याससमासतः ॥२७॥ विज्ञायैतत् प्रयोक्तव्यं यथा वक्ष्याम्यतः परम् ।

इस प्रकार सूक्ष्म तथा अनेक प्रकार के विषयों को मैंने विस्तार एवं संक्षेप से कहा है । इस सबको जानकर इन बस्तियों का प्रयोग करना चाहिये-जैसा कि मैं आगे कहूँगा ॥२७॥

गम्भीरानुगता यस्य क्रमेणोपचिता मलाः ॥२८॥ कुपिता वातभूयिष्ठा बस्तिसाध्या विशेषतः । संपन्नस्य सहिष्णोश्च कर्म तस्य परायणम् ॥२९॥

जिस व्यक्ति के क्रमशः उपचित (वृद्धि को प्राप्त) हुए तथा गम्भीर धातुओं में प्रविष्ट हुए मल कुपित हुए हों, उनमें वात की प्रधानता हो, वे दोष विशेषरूप से बस्तिसाध्य हों तथा यदि रोगी सम्पन्न (सम्पूर्ण साधनों से युक्त) तथा सहिष्णु हो तो उस रोगी के लिये कर्मबस्ति श्रेष्ठ उपाय है ॥

बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८] खिलस्थानम् ४२५

अतो मध्यस्य कालः स्यादव(र)स्यावरस्तथा। स्नेहस्वेदोपपन्नस्य वामितस्य यथाक्रमम् ।।३०।। स्निग्धस्विन्नस्य तु पुनर्विरिक्तस्य क्रमे गते। दत्तानुवासनस्यास्य यथायोगं ततस्त्र्याहात् ।।३१।। क्षणिकस्य प्रशान्तस्य निरूहमुपलक्षयेत्।

मध्यबल, मध्यदोष तथा मध्य साधन सम्पन्न व्यक्ति को कालबस्ति देनी चाहिये। तथा अवर (निकृष्ट) बल, अवर दोष तथा और अवर साधन युक्त व्यक्ति को क्रमशः पहले स्नेहन, स्वेदन तथा वमन कराकर फिर दोबारा क्रमशः स्नेहन, स्वेदन तथा विरेचन के बाद अनुवासन (स्नेह बस्ति) देकर तीन दिन के बाद थोड़ी देर के लिये शान्त होने पर निरूहबस्ति देनी चाहिये। अर्थात् निरूहबस्ति तीन दिन के बाद देनी चाहिये। इसी प्रकार चरक सि. अ. १ में भी कहा है ।।३०-३१।।

त्रिभिरन्वासितस्यातः सप्ताहः कर्मकालयोः ।।३२।। पुनरास्थापनं कार्यं योगः स्यात् पञ्चमेऽहनि। स्वभ्यक्तस्विन्नगात्रस्य काल्यमप्रातराशिनः ।।३३।। कोष्ठानु साऽऽमं शाखाभ्यः सम्यक्संवाहितस्य च।

तीन दिन के बाद जिसे अनुवासन दिया गया है उसे सप्ताह भर बाद कर्म तथा कालबस्ति देनी चाहिये। फिर आस्थापन (निरूहबस्ति) देकर शरीर का स्नेहन तथा स्वेदन करके प्रातःकाल खाली पेट यदि कोष्ठ में आम प्रकोप हो तो शाखाओं पर संवाहन करके पांचवे दिन योगबस्ति देनी चाहिये ।।३२-३३।।

निरूहं योजयेत् प्राज्ञः सर्वोपकरणान्वितः ।।३४।। हैमे रौप्येऽथवा कांस्ये सुमृष्टे भाजने समे। प्रक्षिप्यैकैकशो द्रव्यं यत् क्रमेणोपदिश्यते ।।३५।।

बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि सब उपकरणों (साधनों) से युक्त होकर सोने, चांदी अथवा कांसी के साफ सुथरे तथा सम बर्तन में क्रमशः एक २ द्रव्य डालकर—जैसा कि आगे वर्णन किया जायेगा—निरूह बस्ति की योजना करे ।।३४-३५।।

भिषङ्निरूहं गृह्णीयात् प्राङ्मुखः सुसमाहितः। पूर्वमेवात्र निक्षेप्यं मधुनः प्रसृतद्वयम् ।।३६।। सैन्धवस्यार्धकर्षं च तैलं च मधुनः समम्। ततश्च कल्कप्रसृतं क्वाथं कल्कचतुर्गुणम् ।।३७।। प्रसृतौ मांसनिर्यूहान्मूत्रप्रसृतमेव च। द्वादशप्रसृतो बस्तिरित्येवं खजमूच्छितः ।।३८।। यथार्थं च यथावच्च प्रणिधेयो विजानता।

बस्ति के उपादान द्रव्यों को मिलाने का प्रकार—चिकित्सक को चाहिये कि पूर्व दिशा की ओर मुख करके तथा समाहित (दत्तचित) होकर हाथ से मलकर निरूह तैयार करे। सबसे पहले दो प्रसृत मधु डालना चाहिये। उसमें आधा कर्ष (आधा तोला) सैन्धवनमक तथा मधु के समान अर्थात् दो प्रसृत तैल डालना चाहिये। उसमें एक प्रसृत कल्क तथा कल्क से चौगुना अर्थात् चार प्रसृत क्वाथ द्रव्य मिलाये। इसमें दो प्रसृत मांस निर्यूह (मांसरस) तथा एक प्रसृत गोमूत्र डाले। इसप्रकार कुल १२ प्रसृत बस्तिद्रव्य होता है। बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि इन सबको खींचे के द्वारा खूब मथकर यथार्थरूप में तथा यथाविधि बस्ति तैयार करे। इसी प्रकार चरक सि. अ. ३ में तथा सुश्रुत चि. अ. ३८ में भी कहा है ।।३६-३८।।

स्याच्चेद्विवक्षा द्रव्याणां प्रक्षेपं प्रति कस्यचित् ।।३९।। तत्र वाच्यमिदं व्यस्तक्रमसंयोगकारणम्।

यदि किसी व्यक्ति को द्रव्यों के प्रक्षेप के विषय में जिज्ञासा हो तो उन द्रव्यों के मिलाने के क्रम के विषय में निम्न वक्तव्य है। अर्थात् बस्ति में द्रव्यों के मिलाने के उपर्युक्त क्रम के विषय में किसी को ज्ञातव्य हो कि उपर्युक्त द्रव्य इसी क्रम से ही क्यों मिलाये जाते हैं तो उसका उत्तर निम्न है ।।३९।।

४२६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८]

मङ्गल्यं मङ्गलार्थाय मधु पूर्वं निषिच्यते ॥४०॥ पैच्छिल्यं बहुलत्वं च कषायत्वं च माक्षिके। भिनत्ति लवणं तैक्ष्ण्यात् सङ्घातं च नियच्छति ॥४१॥ मधुनोऽनन्तरं तस्माल्लवणांशो निषिच्यते। ततस्तैलं विनिक्षिप्तमेकीभावाय कल्पते ॥४२॥ कल्कः संसृज्यते चाशु क्वाथश्च समतां व्रजेत्। स्नेहकल्ककषायाणामेवं संमूर्च्छने कृते ॥४३॥ मूत्रं पटुत्वं कुरुते वीर्यं चोद्भावयत्यपि। सम्यगेवं विमृदितः स्रोतोभ्यः कफमारुतौ ॥४४॥ विष्यन्दयति पित्तं च क्षिप्रं चैव हरत्यपि। अतोऽन्यथा मृद्यमानो न श्लेषमधिगच्छति ॥४५॥

मधु मङ्गलकारी (शुभ) द्रव्य माना गया है इसलिये मङ्गल (शुभ) की दृष्टि से मधु सबसे पहले डाला जाता है। मधु की पिच्छिलता बहुलता तथा कषायपने को तीक्ष्ण गुण के कारण लवण नष्ट कर देता है तथा उसका संघात बना देता है-इसलिये मधु के बाद उसमें लवण डाला जाता है। इसके बाद उसमें जो तैल डाला जाता है वह सम्पूर्णद्रव्यों में एकी भाव-एकात्मता उत्पन्न कर देता है अर्थात् तैल के कारण सब द्रव्यों में एकात्मता उत्पन्न हो जाती है (वे सब परस्पर अच्छी प्रकार मिल जाते हैं)। कल्क का शीघ्र ही संसर्जन हो जाता है तथा क्वाथ समरूप में हो जाता है। इसीलिये स्नेह (तैल), कल्क तथा कषाय (क्वाथ) को इसमें डाला जाता है। इसमें डाला हुआ मूत्र इसकी पटुता (गुणवृद्धि) को करता है तथा इसके वीर्य (शक्ति) को बढ़ाता है। इस प्रकार ठीक ढङ्ग से मथ कर तैयार की हुई बस्ति स्रोतों से कफ, वायु तथा पित्त को शीघ्र ही निकाल देती है। तथा इससे विपरीत मथकर तैयार की हुई बस्ति ठीक प्रकार से मिल नहीं पाती है ॥४०-४५॥

असम्यङ्मथितः श्लिष्टो बस्तिर्नार्थाय कल्पते। तत एष क्रमो दृष्टो निरूहस्योपयोजने ॥४६॥

ठीक प्रकार से न मथी हुई तथा परस्पर ठीक प्रकार से न मिली हुई बस्ति अपने प्रयोजन को सिद्ध नहीं करती है अर्थात् सम्यक् कार्य नहीं करती है। इसीलिये निरूह बस्ति की योजना में उपर्युक्त क्रम दिया गया है ॥४६॥

प्रमाणं च प्रकृष्टस्य प्रसूतेर्युदुदाहृतम्। तस्मात् प्रमाणादुत्कर्षो (वयोबलव) दिष्यते ॥४७॥ अपकर्षस्तु कर्तव्यः संप्रधार्य वयोबलम्। गुणतस्तूभयत्वेन दृष्ट्वा व्याधिबलाबलम् ॥४८॥

यह ऊपर प्रकृष्ट प्रसूति का प्रमाण दिया गया है। इस प्रमाण में रोगी की अवस्था तथा बल के अनुसार वृद्धि की जा सकती है। मात्रा में कभी भी रोगी की अवस्था तथा बल के अनुसार ही करनी चाहिये। इस प्रकार रोग के बलाबल को भी देखकर मात्रा में वृद्धि अथवा कमी करनी चाहिये। इसी प्रकार सुश्रुत चि. अ. ३८ में भी कहा है ॥४७-४८॥

उत्कर्षं यदङ्गेन तदङ्गेनापकर्षयेत्¹। शीतोष्णस्निग्धरूक्षाणां द्रव्याणामुपकल्पयेत् ॥४९॥

शीत, उष्ण, स्निग्ध तथा रूक्ष द्रव्यों में जिस क्रम से मात्रा में वृद्धि की जाती है उसी क्रम से उनमें ह्रास (कमी) भी करनी चाहिये ॥४९॥

स्वाद्वम्ललवणोष्णानामुत्कर्षं नातिमात्रशः। वातव्याधौ भिषक्कुर्यात् स्नेहस्य तु विधापयेत् ॥५०॥ रूक्षाणां शीतवीर्याणामपकर्षं च युक्तितः।

चिकित्सक को वातव्याधि में स्वादु (मधुर), अम्ल, लवण तथा उष्ण द्रव्यों की अधिक मात्रा में वृद्धि नहीं करनी चाहिये। स्नेह को समावस्था में रखना चाहिये तथा रूक्ष एवं शीतवीर्य द्रव्यों में युक्तिपूर्वक कमी कर देनी चाहिये ॥५०॥


१. येन क्रमेण मात्रोत्कर्षः क्रियते तेनैव क्रमेण मात्राह्रासं कुर्यादित्यर्थः।

बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८] खिलस्थानम् ४२७

स्वादुतिक्तकषायाणां व्याधौ पित्तोत्तरे भिषक् ।।५१।।
उत्कर्षमपकर्षं तु कुर्यात्तीक्ष्णोष्णयोरतथा ।

पित्त प्रधान व्याधि में चिकित्सक को स्वादु, तिक्त एवं कषाय द्रव्यों में वृद्धि तथा तीक्ष्ण और उष्ण द्रव्यों कमी कर देनी चाहिये ।।५१।।

तीक्ष्णोष्णरूक्षद्रव्याणामुत्कर्षं च कफोत्तरे ।।५२।।

कफप्रधान व्याधि में तीष्ण, उष्ण तथा रूक्ष द्रव्यों की वृद्धि कर देनी चाहिये ।।५२।।

विपर्ययं विपर्यये गुणानां च प्रकल्पयेत् । संसृष्टदोषे संसृष्टगुणद्रव्याणि योजयेत् ।।५३।।

विपरीत अवस्था में विपरीत गुणों की वृद्धि करनी चाहिये तथा संसृष्ट (मिले हुए) दोषों में संसृष्ट (मिश्रित) गुणोंवाले द्रव्यों की योजना करनी चाहिये। अर्थात् जिस रोग में जिन दोषों की वृद्धि हुई हो उनमें उससे विपरीत गुणवाले द्रव्यों की वृद्धि करनी चाहिये। भगवान् आत्रेय के 'वृद्धिः समानैः सर्वेषां विपरीत्तैर्विपर्ययः' के अनुसार समान गुण के द्वारा उस दोष की वृद्धि एवं विपरीत गुण के द्वारा उसकी शान्ति होती है इसलिये जिस दोष को शान्त करना हो उसके लिये उससे विपरीत गुण वाले द्रव्यों की योजना करनी चाहिये। इसीलिये चरक सू. अ. में तीनों दोषों के पृथक् २ गुणों का निर्देश करके उन्हें शान्त करने के लिये उनसे विपरीत गुणयुक्त द्रव्यों का प्रयोग दिया गया है। इसी प्रकार यदि दो दोषों का मिश्रित प्रकोप है तो उन्हें शान्त करने के लिये ऐसे द्रव्य देने चाहिये जो मिश्रित रूप से उन दोषों के विपरीत गुणवाले हों। अर्थात् यदि वात और पित्त दोनों सम्मिलित रूप से बढ़े हुए हों तो उनकी शान्ति के लिये ऐसे द्रव्यों का प्रयोग करना चाहिये जो सम्मिलित रूप से वात और पित्त के गुणों से विपरीत हों ।।५३।।

आस्थापनं दुष्प्रयुक्तं भवत्याशीविषोपमम् । सुप्रयुक्तं तदेवेह प्राणिनाममृतोपमम् ।।५४।।

यदि आस्थापन (निरूह) बस्ति का ठीक प्रकार से प्रयोग न किया जाये तो वह सर्पविष के समान है। ठीक प्रकार से प्रयुक्त होने पर वही प्राणियों के लिये अमृत के समान गुणकारी होती है। अर्थात् यदि आस्थापन बस्ति का ठीक प्रकार से प्रयोग नहीं किया जायेगा तो वह लाभ के स्थान पर उलटा सर्पविष के समान भयंकर (घातक) होती है। यदि उसका ठीक प्रकार से विवेचना करके प्रयोग किया जायेगा तो वह अमृत के समान गुणकारी होती है ।।५४।।

प्रायो यत्र गुणाधिक्यं सम्यग्योगेन लक्ष्यते । तदप्रमादं कुर्वीत बस्तिकर्मणि बुद्धिमान् ।।५५।।

बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिये कि सम्यक् योग के द्वारा प्रायः जो २ वस्तु अधिक गुणकारी दिखाई दे, उस २ का प्रमादरहित होकर बस्तिकर्म में प्रयोग करे ।।५५।।

न हि तादृग्विधं किञ्चित् कर्म्मान्यदुपपद्यते । क्षिप्रं रोगाभिघाताय रोगाणां चोपपत्तये ।।५६।।

रोगों को शीघ्र ही नष्ट करने के लिये तथा नये उत्पन्न करने के लिये आस्थापन बस्ति के सदृश अन्य कोई कर्म नहीं है। यदि इसका ठीक प्रकार से प्रयोग किया जाय तो यह शीघ्र ही रोगों को नष्ट कर देती है तथा यदि विपरीत प्रयोग किया जायगा तो यह शीघ्र ही रोगों को उत्पन्न कर देती है। अर्थात् यह सम्यक् प्रयोग के द्वारा जहां शीघ्र ही रोगों को नष्ट करती है वहां विपरीत प्रयोग के द्वारा रोगों को भी उतना ही शीघ्र उत्पन्न करती है ।।५६।।

व्याध्यातुराग्निभैषज्यबलं प्रकृतिमेव च । वयः शरीरमौचित्यं सौकुमार्यं सहिष्णुताम् ।।५७।।
प्रधार्य बुद्ध्या मतिमाँस्तत्तत्कर्मविचारणम् । अवस्थायामवस्थायां कुर्यात् सम्यगतन्द्रितः ।।५८।।

बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिये कि रोग, रोगी की जाठराग्नि, औषध, बल, प्रकृति, अवस्था, शरीर, औचित्य, सुकुमारता, तथा सहिष्णुता का बुद्धिपूर्वक विचार करके प्रमादरहित होकर सम्यक् प्रकार से उस २ अवस्था में उस २

४२८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८]

कर्म को करे। अर्थात् रोगी के रोग तथा उसकी जाठराग्नि, बल, औषध, प्रकृति, शरीर, सुकुमारता तथा सहिष्णुता आदि को देखकर जिस २ अवस्था में जो २ कर्म (चिकित्सा आदि) आवश्यक हो वह करना चाहिये ॥५७-५८॥

नातिशीतं न चात्युष्णं नातितीक्ष्णं नचेतरम्(त्) ।
नातिरूक्षमतिस्निग्धं नातिसान्द्रं न च द्रवम् ॥५९॥
नातिमात्रं न चात्यल्पं निरूहमुपकल्पयेत् ।

निरूहबस्ति का प्रयोग—अत्यन्त शीत, अत्यन्त उष्ण, अत्यन्त तीक्ष्ण, अत्यन्त मृदु, अत्यन्त रूक्ष, अत्यन्त स्निग्ध, अत्यन्त सान्द्र, अत्यन्त द्रव, अत्यन्त अधिक मात्रा में तथा अत्यन्त थोड़ी मात्रा में निरूह बस्ति का प्रयोग नहीं करना चाहिये ॥५९॥

अतिशीतोऽतिशैत्येन स्कन्नो वातबलावृतः ॥६०॥
भृशं स्तम्भयते गात्रं कृच्छ्रेण च निवर्तते ।
अत्युष्णः कुरुते दाहं मूर्च्छां चाशु निरेति च ॥६१॥

प्रत्येक का पृथक् २ हेतु—अत्यन्त शीतल बस्ति अधिक शीतलता (ठण्ड) के कारण जमकर वायु के बल से आवृत हो जाती है जिससे शरीर और भी जकड़ जाता है तथा वह शरीर से वापिस भी कठिनता से लौटती है तथा अत्यन्त उष्ण बस्ति दाह पैदा करती है तथा शीघ्र ही शरीर में मूर्च्छा पैदा कर देती है ॥

अतितीक्ष्णस्तथैवास्य जीवादानं करोति वा । मन्दो न दोषान् हरति दूषयत्येव केवलम् ॥६२॥

अत्यन्त तीक्ष्ण बस्ति शरीर से जीवरक्त (शुद्ध रक्त) को प्रवाहित कर देती है तथा अत्यन्त मन्द बस्ति शरीर से दोषों को नष्ट नहीं करती है अपितु शरीर को और भी दूषित कर देती है। इसी प्रकार चरक सि. अ. ६ में भी कहा है। जीवरक्त का रक्तपित्त में आनेवाले रक्त से भ्रम हो सकता है। उनकी भेदक पहचान चरक सि. अ. ६ में लिखा है। अर्थात् उसके दो भेद दिये हैं। १. उस रक्त से अन्न को मिश्रित करके कौये या कुत्ते को दिया जाय। यदि वे उसे खा जायें तो जीवरक्त (शुद्ध रक्त) जाने अन्यथा रक्तपित्त जानें। २. इस रक्त से एक श्वेत वस्त्र को गीला करके सुखा देवें। सूख जाने पर पर उसे ईषदुष्ण जल से धो डालें। यदि विवर्ण हो जाये तो रक्तपित्त तथा शुद्ध हो जाये तो जीवरक्त जानें ॥६२॥

कर्षयत्यतिरूक्षश्च मारुतं च प्रकोपयेत् । स्निग्धोऽतिजाड्यं कुरुते व्यापादयति चानलम् ॥६३॥

अत्यन्त रूक्ष बस्ति शरीर का अत्यन्त कर्षण करती है तथा वायु को प्रकुपित कर देती है। और अत्यन्त स्निग्ध बस्ति शरीर में जड़ता उत्पन्न कर देती है तथा वह शरीर की जाठराग्नि को नष्ट कर देती है ॥६३॥

क्षपयत्यतिसान्द्रस्तु न वा नेत्रा^१द्विनिष्क्रमेत् । अतिद्रवोऽल्पवीर्यत्वादयोगायोपपद्यते ॥६४॥

अत्यन्त सान्द्र (Concentrated) बस्ति शरीर में जम जाती है अथवा वह गाढ़ी होने से बस्तिनेत्र (Nozzle) से ही बाहर नहीं निकल सकती है। अत्यन्त द्रव (Dilute) बस्ति अल्पवीर्य होने के कारण शरीर में अयोग के लक्षण उत्पन्न कर देती है अर्थात् उस ओषधि का पूरा प्रभाव ही नहीं होता है। अयोग से अभिप्राय यह है कि ओषधि का या तो बिलकुल प्रभाव न हो या थोड़ा प्रभाव हो अथवा उसका विपरीत प्रभाव हो अर्थात् बस्ति द्वारा दी हुई ओषधि ऊपर की ओर गति करे तथा वमन आदि ले आये ॥६४॥


१. बस्तिनेत्रादित्यर्थः ।

बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८] खिलस्थानम् ४२९

अल्पमात्रो न(चा)प्येति कृच्छ्राद्वाऽपि निवर्तते । अतिमात्रोऽतियोगाय तस्मादेते विगर्हिताः ।।६५।।

अल्प मात्रा में दी हुई बस्ति वापिस लौटकर नहीं आती है अथवा कठिनता से वापिस लौटती है । अधिक मात्रा में दी गई बस्ति अतियोग के लक्षण को उत्पन्न कर देती है । इसलिये उपर्युक्त अतिशीत, अत्युष्ण आदि बस्ति के सब दोष निन्दित माने गये हैं । चरक सि. अ. ३ में तथा सुश्रुत में भी उपर्युक्त दोषों का वर्णन किया गया है ।।६५।।

यथावन्मूर्च्छितो मृ^१त्स्नो भोज्योष्णालवणः समः ।
(इति ताडपत्रपुस्तके २१८ तमं पत्रम्)
बालकाष्ठौष्ठजिह्वानां योनिदाहप्रवर्तकः ।।६६।।

सम्यक् प्रकार से मसलकर चिकनी की हुई बस्ति को उष्ण करके तथा समभाग मात्रा में लवण डालकर सेवन करने से वह बल कोष्ठ, ओष्ठ, जिह्वा तथा योनि में दाह उत्पन्न नहीं करती है ।

वक्तव्य—यहां 'बालकाष्ठौष्ठजिह्वानां योनिदाहप्रवर्तकः' के स्थान पर यदि 'बलकोष्ठौष्ठजिह्वानां योनिदाहाप्रवर्तकः' यह पाठ होता तो अधिक ठीक अर्थ हो सकता है । उसी पाठ के अनुसार उपर्युक्त अर्थ किया है ।।६६।।

श्रोणिबस्तिकटीपार्श्वनाभिमूलोदराश्रितः । सम्यक्समुच्छ्रयं कृत्स्नं वीर्यतः प्रतिपद्यते ।।६७।।

यह बस्ति—श्रोणि, बस्ति (Bladder), कटी, पार्श्व, नाभिमूल तथा उदर में सम्यक् प्रकार से आश्रित हुई अपने वीर्य के द्वारा पूर्णरूप से ऊपर तक पहुंच जाती है अर्थात् कोष्ठ के द्वारा शरीर के ऊर्ध्वभाग में पहुंच जाती है ।।६७।।

ऊर्ध्वभागैर्बलात् क्षिप्तो मारुतैरिव पावकः । पित्तस्थानमतिक्रम्य स्वल्पमाक्षिप्रते कफम् ।।६८।।

शरीर के ऊर्ध्वभागों में स्थित वायु के द्वारा मानों बलपूर्वक फेंकी गई अग्नि पित्त स्थान का अतिक्रमण करके थोड़ा कफ को व्याप्त कर लेती है ।।६८।।

तीक्ष्णो मात्राशतादूर्ध्वं नातितीक्ष्णः (प्रयुज्यते) ।
न तिष्ठति, मृदुस्तिष्ठत्यधिकं वाऽपि यापनः ।।६९।।

तीक्ष्ण बस्ति १०० मात्रा से अधिक शरीर में नहीं ठहरती है इसलिये अत्यन्त तीक्ष्ण बस्ति प्रयुक्त नहीं करनी चाहिये । इसके विपरीत मृदु या यापन बस्ति शरीर में बहुत देर तक स्थिर रहती है ।।६९।।

आनुलोम्यादपानस्य गुदस्यारोपणाद् भृशम् । तद्द्वितीयस्तृतीयो वा कालमल्पतरं तथा ।।७०।।
दोषान् स्थूलांश्च सूक्ष्मांश्च गम्भीरानुगतानपि ।
विष्यन्दयति विषण्णान् (छृब्धान्) सपुरीषान् प्रकर्षति ।।७१।।

अपान वायु के अनुलोम होने से तथा गुदा के अत्यन्त समीप होने के कारण थोड़ी देर के बाद दी हुई दूसरी या तीसरी बस्ति शरीर में विष्टब्ध हुए स्थूल, सूक्ष्म तथा गम्भीर धातुओं में प्रविष्ट हुए दोषों को भी मलसहित निकाल कर बाहर कर देती है ।।७०-७१।।

न कुर्याद्व्यापदः काश्चित् सुखेन च निवर्तते । युक्तो युक्तेन भिषजा स बस्तिः संप्रशस्यते ।।७२।।

श्रेष्ठ बस्ति—जो बस्ति शरीर में कोई उपद्रव उत्पन्न न करे, सुखपूर्वक शरीर से बाहर वापिस आ जाये तथा जो योग्य चिकित्सक के द्वारा प्रयुक्त की गई हो वह प्रशस्त मानी गई है । चरक सि. अ. १ में प्रशस्त बस्ति के लक्षण दिये हैं ।।७२।।


१. मसृण इत्यर्थः ।

४३० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८]

वयसः स्थापनो वृष्यः स्वरवर्णबलाग्निकृत् । वातपित्तकफानां च मलानां चापकर्षणः ॥७३॥
बालवृद्धवयस्थानां क्षिप्रमूर्जस्करः परम् । सर्वेन्द्रियाणां वैशद्यं कुरुते चाङ्गमार्दवम् ॥७४॥
एवमेते समाख्याता निरूहस्य गुणागुणाः ।

बस्ति वयःस्थापक (आयु को स्थिर करने वाली) एवं वृष्य है, स्वर, वर्ण, बल और अग्नि को बढ़ाने वाली है, वात, पित्त तथा कफ रूप दोषों और मलों का अपकर्षण करती (शरीर से बाहर निकालती) है, बाल, वृद्ध तथा युवा व्यक्तियों में शीघ्र ही बल को बढ़ाने वाली है, सब इन्द्रियों को विशद (निर्मल) करती है तथा शरीर के अङ्गों को मृदु कर देती है। इस प्रकार ऊपर निरूह बस्ति के गुण तथा दोष कहे गये हैं ॥७३-७४॥

पुरीषं मारुतः पित्तं कफश्च क्रमशो यदा ॥७५॥
प्रवर्तन्ते च फेनं च शङ्खस्फटिकसन्निभम् । सम्यङ्निरूढगात्राणां मार्दवं जनयेत् परम् ॥७६॥
अन्नाभिलाषो वैशद्यं लघुता वाऽथ मार्दवम् । सृष्टविण्मूत्रवातत्वमिन्द्रियाणां प्रसन्नता ॥७७॥

निरूह के सम्यक् योग के लक्षण—यदि निरूह का सम्यक् योग हुआ हो तो क्रमशः पुरीष (मल), वायु, पित्त तथा कफ निकलते हैं तथा उनके बाद शङ्ख तथा स्फटिक के समान (सफेद) झाग निकलते हैं अर्थात् सम्यक् प्रकार से प्रयुक्त निरूह बस्ति में सर्वप्रथम मल निकलना चाहिये तथा उसके बाद क्रमशः आंतों में से वायु फिर पक्वाशय में से पित्त तथा आमाशय में से कफ का निःसरण होता है तथा अन्त में सफेद झाग निकलते हैं। तथा सम्यक् निरूह हो जाने पर शरीर अत्यन्त मृदु हो जाता है, अन्न में रुचि उत्पन्न होती है, शरीर विशद, लघु तथा मृदु हो जाता है, मल-मूत्र तथा वायु ठीक प्रकार से सरते हैं (निकल जाते हैं) तथा सम्पूर्ण इन्द्रियां प्रसन्न हो जाती हैं ॥७५-७७॥

अयोगे विपरीतं स्यादतियोगेऽतिवर्तनम् । कफपित्तासृजां मांसप्रक्षालननिभस्य वा ॥७८॥
हिक्का कम्पस्तृषा ग्लानिर्गात्रभेदस्तमः क्लमः । निद्रानाशः प्रलापश्च यत्र चाप्युपजायते ॥७९॥

अयोग के लक्षण—निरूह के अयोग में इससे विपरीत लक्षण होते हैं अर्थात् उसमें पुरीष, वायु आदि के निकलने का क्रम उपर्युक्त नहीं रहता है, शरीर मृदु नहीं होता, अन्न में रुचि उत्पन्न नहीं होती, शरीर विशद तथा मृदु नहीं होता है उसके मल-मूत्र तथा वायु ठीक तरह से नहीं सरते हैं तथा इन्द्रियां प्रसन्न नहीं होती हैं। इसी प्रकार चरक सि. अ. १ में भी कहा है।

अतियोग के लक्षण—यदि निरूह का अतियोग हो जाये तो शरीर से कफ, पित्त तथा रक्त अथवा मांस के धोवन के समान जल अधिक मात्रा में निकलता है तथा हिक्का, कम्पन, प्यास, ग्लानि, अङ्गभेद, तम (तमोगुण की प्रधानता), क्लम (थकावट) निद्रानाश तथा प्रलाप आदि लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। चरक सि. अ. १ में कहा है कि-निरूह के अतियोग के वे ही लक्षण होते हैं जो विरेचन के अतियोग के होते हैं। विरेचन के अतियोग के लक्षण पहले कहे जा चुके हैं ॥७८-७९॥

सम्यङ्निरूढमाश्वस्तं परिषिक्तं सुखाम्बुना ।
तनु वा(ना) भोजयेन्मात्रां जाङ्गलानां रसेन वा ॥८०॥

सम्यक् प्रकार से निरूह हो जाने पर रोगी को आश्वासन देकर तथा ईषदुष्ण जल से उसका परिषेचन करके उचित मात्रा में पतले जांगल मांसरस के द्वारा भोजन कराये। निरूहबस्ति में विरेचन के समान अग्नि मन्द नहीं होती है इसलिये इसमें पेयादि संसर्जन क्रम की विशेष आवश्यकता नहीं होती है। इसमें प्रारम्भ से ही जांगल मांसरस दिया जा सकता है। वमन, विरेचन के बाद पेयादि क्रम की आवश्यकता होती है क्योंकि उसमें रोगी की अग्नि मन्द हो जाती है ॥८०॥

'बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८] खिलस्थानम् ४३१

भुक्तवन्तं च तैलस्य प्रसृतेनानुवासयेत् । वायुः प्रशाम्यते तेन निरूहेण प्रचालितः ॥८१॥

जांगल मांसरस का भोजन करने के बाद उस व्यक्ति को एक प्रसृत तैल के द्वारा अनुवासन (स्नेहबस्ति) देनी चाहिये। इससे शरीर में निरूहबस्ति के द्वारा विचलित हुआ वायु शान्त हो जाता है। अर्थात् निरूह बस्ति के द्वारा शरीर में वायु विक्षुभित हो जाता है उसकी शान्ति के लिये अनुवासन (स्नेह) बस्ति का प्रयोग करना चाहिये ॥८१॥

आस्थापनो बस्तिरयं गुदनिर्वापणं नरः । एकान्तरं ततश्चोर्ध्वं यथोक्तमनुवासनम् ॥८२॥

आस्थापन (निरूह) बस्ति देकर एक अथवा एक से अधिक दिन के बाद रोगी की गुदा का निर्वापण करने वाला अनुवासन (स्नेह बस्ति) देना चाहिये। चरक सि. अ. १ में भी कहा है कि-निरूह के बाद यदि वायु अत्यन्त प्रबल हो तो तीसरे दिन अन्यथा पांचवें दिन अनुवासन देना चाहिये। यदि रोगी की अग्नि मन्द न हो तो उसी दिन भी अनुवासन कराया जा सकता है ॥८२॥

दीप्ताग्नेर्दृढदेहस्य सोदावर्ते विमार्गगे । श्रोणिवङ्क्षणसंस्थे च वाते शस्तं दिने दिने ॥८३॥

प्रतिदिन अनुवासन किसे देना चाहिये ?—जिस व्यक्ति की जाठराग्नि प्रदीप्त हो, शरीर दृढ हो, उदावर्त्त हुआ हो, वायु विपरीत मार्ग में गया हुआ हो अथवा श्रोणि तथा वंक्षण (groin) में स्थित हो तो उसे प्रतिदिन अनुवासन दिया जा सकता है। अष्टाङ्गसंग्रह सू. अ. २८ में कहा है कि-जिनकी अग्नि प्रदीप्त हो, जो रूक्ष हों, वायु की प्रधानता हो तथा नित्य व्यायाम करते हों उन्हें प्रतिदिन अनुवासन कराया जा सकता है। अन्यथा तीसरे या पांचवें दिन कराना चाहिये ॥

तस्य पक्वाशयगतः स्नेहमात्रां प्रभञ्जनः । बलवान् बलवत्यग्नौ वारिवत् स विशोधयेत् ॥८४॥

उस रोगी के पक्वाशय में स्थित वायु यदि बलवान् हो तथा उसकी जाठराग्नि भी बलवान् हो तो उसे मात्रा में स्नेह देना चाहिये। वह स्नेह उस वायु का पानी की तरह शोधन कर देता है अर्थात् जिस प्रकार पानी वायु का शोधन कर देता है उसी प्रकार स्नेह (तैल) भी वायु का शोधन कर देता है। पानी के अन्दर से यदि वायु छनकर गुजरे तो उसकी सब अशुद्धियां पानी अपने में जज्ब (Absorb) कर लेता है उसी प्रकार तैल में भी यही गुण विद्यमान है ॥८४॥

न च तैलात् परं किञ्चिद्द्रव्यमस्त्यनिलापहम् ।
स्नेहाद्रौक्ष्यं गुरुत्वाच्च लघुत्वं मारुतस्य तु ॥८५॥
औष्ण्याच्छैत्यं निहन्त्याशु तैलं पुष्टिं करोति च ।
मनःप्रसादः(दं) स्नेहं च बलवर्णमथापि च ॥८६॥

अनुवासन के गुण—तैल से बढ़कर वायु (वातप्रकोप अथवा वायु के रोग) को नष्ट करने वाला कोई द्रव्य नहीं है। इसी प्रकार चरक सि. अ. १ में कहा है। तैल के गुण—तैल स्नेह होने से वायु की रूक्षता, गुरु होने से वायु की लघुता तथा उष्ण होने से वायु की शीतलता का शीघ्र ही नाश करके शरीर की पुष्टि, मन की प्रसन्नता तथा बल और वर्ण की वृद्धि करता है। इसी प्रकार चरक सि. अ. १ में कहा है ॥८५-८६॥

स्यात् स्निग्धविटपस्कन्धः कोमलाङ्कुरपल्लवः । मूले सिक्तो यथा वृक्षः काले पुष्पफलप्रदः ॥८७॥
स्नेहबस्तेर्नरस्तद्वद् दृढकायो दृढप्रजः । वातात्मकैर्विकारैश्च पूर्वोक्तैर्नाभिभूयते ॥८८॥

जिस प्रकार जड़ को सींचने से वृक्ष की शाखायें तथा तना स्निग्ध (गीला-हरा) रहता है, उसमें कोमल अङ्कुर तथा नवीन पत्ते आने लगते हैं और उचित समय पर वह फूलों तथा फलों से युक्त हो जाता है। उसी प्रकार स्नेहबस्ति (अनुवासन बस्ति) के द्वारा मनुष्य दृढ शरीर तथा हृष्ट-पुष्ट सन्तान वाला हो जाता है तथा पूर्वोक्त वातविकारों के द्वारा वह आक्रान्त नहीं होता है। इसी प्रकार चरक सि. अ. १ में भी कहा है ॥८७-८८॥

५० का.सं.

४३२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८]

पञ्चमूलाढकेऽध्यर्धं फलानामाढकं भवेत् । यवकोलकुलत्थानां कुडवः स्युस्त्रयः पृथक् ॥८९॥
चतुर्भागावशिष्टं तु पश्चादष्टगुणे जले । मस्तुनेश्राढकेनैतत्तैलप्रस्थं विपाचयेत् ॥९०॥
कुष्ठस्य शतपुष्पाया वचाया मधुकस्य च ।
कुटजस्य च बीजानां बीजानां मदनस्य च ॥९१॥
यवान्याः पिप्पलीनां च हरेण्वा देवदारुणः ।
बिल्वस्य देवपुष्पस्य रास्नाया मुस्तकस्य च ॥९२॥
सूक्ष्मैलायाः प्रियङ्गवाश्च भागैरक्षसमैः पृथक् ।
सिद्धं सुलवणं पूतं निदध्याद्भाजने शुचौ ॥९३॥
एतन्मन्दनिरूढानां बस्तिव्यापत्सु चोत्तमम् । फलतैलमिति ख्यातमुदावर्तनिवर्तनम् ॥९४॥
तथैवोदरिणां सिद्धं गुल्मिनां क्रिमिकोष्ठिनाम् । पृष्ठश्रोण्यरुजङ्घासु वातेष्वप्रगुणेषु च ॥८५॥
निरूहसाध्या ये केचिद्विकाराः समुदाहृताः । ताञ्जयेद्बस्तिनाऽनेन मूत्राघातांश्च नाशयेत् ॥९६॥

फल तैल का निर्माण तथा उपयोग— लघुपञ्चमूल १ आढक (२५६ तोले), मदनफल १-१/२ आढक (३८४ तोले), यव, कोल (बेर) तथा कुलत्थ—पृथक् २ तीन कुडव (१६×३=४८ तोले)—इन्हें अष्टगुण जल में पकाकर चतुर्थांश शेष रखें। इसमें १ आढक दधिमस्तु (दही के ऊपर का पानी) तथा एक प्रस्थ (६४ तोले) तिल तैल डालें। इसमें कुष्ठ, सौंफ, वच, मुलहठी, कुटज के बीज (इन्द्रजौ), मैनफल के बीज, अजवायन, पिप्पली, हरेणु, देवदारु, बिल्व, लौंग, रास्ना, नागरमोथा, छोटी इलायची तथा प्रियङ्गु—सब पृथक् २ एक २ अक्ष (एक २ तोला) डालकर तैल सिद्ध करके इसमें बारीक पीसकर छना हुआ नमक डालकर साफ बर्तन में रख दें। यह फल तैल कहलाता है। यह तैल जिन्हें ठीक प्रकार से निरूह बस्ति नहीं दी गई हो, जिन्हें बस्ति के कारण उपद्रव हो गये हों तथा उदावर्त रोगों को नष्ट करने में उत्तम मानी गई है। इसी प्रकार उदररोगी, गुल्मरोगी, जिनके पेट में कृमिरोग हो, पृष्ठ, श्रोणि, ऊरु तथा जङ्घाओं में यदि वायु प्रकुपित हुआ हो, निरूहसाध्य (निरूह के द्वारा अच्छे होने वाले विकार तथा मूत्राघात आदि रोगों का उपर्युक्त बस्ति (स्नेहबस्ति) के द्वारा शमन करे ॥८९-९६॥

एरण्डमूलत्रिफलाबलारास्नापुनर्नवाः । गुडूच्यारग्वधो दारु पलाशो मदनं फलम् ॥९७॥
मूलं तुरङ्गगन्धायाः पञ्चमूलं कनीयसम् । पलप्रमाणान्येतानि जलद्रोणे विपाचयेत् ॥९८॥
अष्टभागावशेषं तं परिपूतं समाहरेत् । कर्षप्रमाणान्येतानि श्लक्ष्णपेष्याणि कारयेत् ॥९९॥
शताह्वा मधुकं मुस्ता प्रियङ्गुर्हपुषा वचा । रसाञ्जनं तार्क्ष्यशैलं पिप्पल्यः कौटजं फलम् ॥१००॥
खजेन मथितः कोष्णः सतैलमधुसैन्धवः । समुद्रमांसरसन्यूहो निरूहः साधुयोजितः ॥१०१॥
लेखनो दीपनो बल्यो ग्रहण्यर्शोविकारनुत् । पार्श्वपृष्ठकटीशूलं पार्श्वजङ्घोरुजा रुजः ॥१०२॥
एरण्डबस्तिः शमयेन्मारुतं च कफावृतम् । युक्तमात्रोष्णलवणः स्नेहबस्तिर्विधीयते ॥१०३॥

एरण्डबस्ति का निर्माण तथा प्रयोग— एरण्डमूल, त्रिफला, बला, रास्ना, पुनर्नवा, गिलोय, अमलतास, देवदारु, ढाक, मैनफल, अश्वगन्धा की जड़, लघु पञ्चमूल सब १ पल (४ तो.)। इन्हें १ द्रोण जल में पकाये। अष्टमांश शेष रहने पर उतार कर छान लें। इसमें—सौंफ, मुलहठी, नागरमोथा, प्रियङ्गु, हाऊबेर, बच, तार्क्ष्य पर्वत पर उत्पन्न होने वाला रसाञ्जन (रसौंत), पिप्पली, कुटजबीज (इन्द्रजौ) सब द्रव्य एक कर्ष प्रमाण में लेकर उनका सूक्ष्म चूर्ण करके इसमें डालकर खोंचे से मथ दें। इसमें गर्म में ही तिलतैल, मधु, सैन्धवनमक, गोमूत्र तथा मांसरस अच्छी प्रकार मिलाकर निर्यूह तैयार करे। यह एरण्डबस्ति शरीर का लेखन करती है, अग्निदीपक तथा बल्य है और ग्रहणी, अर्शरोग, पार्श्वशूल, पृष्ठशूल,