भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 789

बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८] खिलस्थानम् ४२९

अल्पमात्रो न(चा)प्येति कृच्छ्राद्वाऽपि निवर्तते । अतिमात्रोऽतियोगाय तस्मादेते विगर्हिताः ।।६५।।

अल्प मात्रा में दी हुई बस्ति वापिस लौटकर नहीं आती है अथवा कठिनता से वापिस लौटती है । अधिक मात्रा में दी गई बस्ति अतियोग के लक्षण को उत्पन्न कर देती है । इसलिये उपर्युक्त अतिशीत, अत्युष्ण आदि बस्ति के सब दोष निन्दित माने गये हैं । चरक सि. अ. ३ में तथा सुश्रुत में भी उपर्युक्त दोषों का वर्णन किया गया है ।।६५।।

यथावन्मूर्च्छितो मृ^१त्स्नो भोज्योष्णालवणः समः ।
(इति ताडपत्रपुस्तके २१८ तमं पत्रम्)
बालकाष्ठौष्ठजिह्वानां योनिदाहप्रवर्तकः ।।६६।।

सम्यक् प्रकार से मसलकर चिकनी की हुई बस्ति को उष्ण करके तथा समभाग मात्रा में लवण डालकर सेवन करने से वह बल कोष्ठ, ओष्ठ, जिह्वा तथा योनि में दाह उत्पन्न नहीं करती है ।

वक्तव्य—यहां 'बालकाष्ठौष्ठजिह्वानां योनिदाहप्रवर्तकः' के स्थान पर यदि 'बलकोष्ठौष्ठजिह्वानां योनिदाहाप्रवर्तकः' यह पाठ होता तो अधिक ठीक अर्थ हो सकता है । उसी पाठ के अनुसार उपर्युक्त अर्थ किया है ।।६६।।

श्रोणिबस्तिकटीपार्श्वनाभिमूलोदराश्रितः । सम्यक्समुच्छ्रयं कृत्स्नं वीर्यतः प्रतिपद्यते ।।६७।।

यह बस्ति—श्रोणि, बस्ति (Bladder), कटी, पार्श्व, नाभिमूल तथा उदर में सम्यक् प्रकार से आश्रित हुई अपने वीर्य के द्वारा पूर्णरूप से ऊपर तक पहुंच जाती है अर्थात् कोष्ठ के द्वारा शरीर के ऊर्ध्वभाग में पहुंच जाती है ।।६७।।

ऊर्ध्वभागैर्बलात् क्षिप्तो मारुतैरिव पावकः । पित्तस्थानमतिक्रम्य स्वल्पमाक्षिप्रते कफम् ।।६८।।

शरीर के ऊर्ध्वभागों में स्थित वायु के द्वारा मानों बलपूर्वक फेंकी गई अग्नि पित्त स्थान का अतिक्रमण करके थोड़ा कफ को व्याप्त कर लेती है ।।६८।।

तीक्ष्णो मात्राशतादूर्ध्वं नातितीक्ष्णः (प्रयुज्यते) ।
न तिष्ठति, मृदुस्तिष्ठत्यधिकं वाऽपि यापनः ।।६९।।

तीक्ष्ण बस्ति १०० मात्रा से अधिक शरीर में नहीं ठहरती है इसलिये अत्यन्त तीक्ष्ण बस्ति प्रयुक्त नहीं करनी चाहिये । इसके विपरीत मृदु या यापन बस्ति शरीर में बहुत देर तक स्थिर रहती है ।।६९।।

आनुलोम्यादपानस्य गुदस्यारोपणाद् भृशम् । तद्द्वितीयस्तृतीयो वा कालमल्पतरं तथा ।।७०।।
दोषान् स्थूलांश्च सूक्ष्मांश्च गम्भीरानुगतानपि ।
विष्यन्दयति विषण्णान् (छृब्धान्) सपुरीषान् प्रकर्षति ।।७१।।

अपान वायु के अनुलोम होने से तथा गुदा के अत्यन्त समीप होने के कारण थोड़ी देर के बाद दी हुई दूसरी या तीसरी बस्ति शरीर में विष्टब्ध हुए स्थूल, सूक्ष्म तथा गम्भीर धातुओं में प्रविष्ट हुए दोषों को भी मलसहित निकाल कर बाहर कर देती है ।।७०-७१।।

न कुर्याद्व्यापदः काश्चित् सुखेन च निवर्तते । युक्तो युक्तेन भिषजा स बस्तिः संप्रशस्यते ।।७२।।

श्रेष्ठ बस्ति—जो बस्ति शरीर में कोई उपद्रव उत्पन्न न करे, सुखपूर्वक शरीर से बाहर वापिस आ जाये तथा जो योग्य चिकित्सक के द्वारा प्रयुक्त की गई हो वह प्रशस्त मानी गई है । चरक सि. अ. १ में प्रशस्त बस्ति के लक्षण दिये हैं ।।७२।।


१. मसृण इत्यर्थः ।