काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 788, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें४२८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८]
कर्म को करे। अर्थात् रोगी के रोग तथा उसकी जाठराग्नि, बल, औषध, प्रकृति, शरीर, सुकुमारता तथा सहिष्णुता आदि को देखकर जिस २ अवस्था में जो २ कर्म (चिकित्सा आदि) आवश्यक हो वह करना चाहिये ॥५७-५८॥
नातिशीतं न चात्युष्णं नातितीक्ष्णं नचेतरम्(त्) ।
नातिरूक्षमतिस्निग्धं नातिसान्द्रं न च द्रवम् ॥५९॥
नातिमात्रं न चात्यल्पं निरूहमुपकल्पयेत् ।
निरूहबस्ति का प्रयोग—अत्यन्त शीत, अत्यन्त उष्ण, अत्यन्त तीक्ष्ण, अत्यन्त मृदु, अत्यन्त रूक्ष, अत्यन्त स्निग्ध, अत्यन्त सान्द्र, अत्यन्त द्रव, अत्यन्त अधिक मात्रा में तथा अत्यन्त थोड़ी मात्रा में निरूह बस्ति का प्रयोग नहीं करना चाहिये ॥५९॥
अतिशीतोऽतिशैत्येन स्कन्नो वातबलावृतः ॥६०॥
भृशं स्तम्भयते गात्रं कृच्छ्रेण च निवर्तते ।
अत्युष्णः कुरुते दाहं मूर्च्छां चाशु निरेति च ॥६१॥
प्रत्येक का पृथक् २ हेतु—अत्यन्त शीतल बस्ति अधिक शीतलता (ठण्ड) के कारण जमकर वायु के बल से आवृत हो जाती है जिससे शरीर और भी जकड़ जाता है तथा वह शरीर से वापिस भी कठिनता से लौटती है तथा अत्यन्त उष्ण बस्ति दाह पैदा करती है तथा शीघ्र ही शरीर में मूर्च्छा पैदा कर देती है ॥
अतितीक्ष्णस्तथैवास्य जीवादानं करोति वा । मन्दो न दोषान् हरति दूषयत्येव केवलम् ॥६२॥
अत्यन्त तीक्ष्ण बस्ति शरीर से जीवरक्त (शुद्ध रक्त) को प्रवाहित कर देती है तथा अत्यन्त मन्द बस्ति शरीर से दोषों को नष्ट नहीं करती है अपितु शरीर को और भी दूषित कर देती है। इसी प्रकार चरक सि. अ. ६ में भी कहा है। जीवरक्त का रक्तपित्त में आनेवाले रक्त से भ्रम हो सकता है। उनकी भेदक पहचान चरक सि. अ. ६ में लिखा है। अर्थात् उसके दो भेद दिये हैं। १. उस रक्त से अन्न को मिश्रित करके कौये या कुत्ते को दिया जाय। यदि वे उसे खा जायें तो जीवरक्त (शुद्ध रक्त) जाने अन्यथा रक्तपित्त जानें। २. इस रक्त से एक श्वेत वस्त्र को गीला करके सुखा देवें। सूख जाने पर पर उसे ईषदुष्ण जल से धो डालें। यदि विवर्ण हो जाये तो रक्तपित्त तथा शुद्ध हो जाये तो जीवरक्त जानें ॥६२॥
कर्षयत्यतिरूक्षश्च मारुतं च प्रकोपयेत् । स्निग्धोऽतिजाड्यं कुरुते व्यापादयति चानलम् ॥६३॥
अत्यन्त रूक्ष बस्ति शरीर का अत्यन्त कर्षण करती है तथा वायु को प्रकुपित कर देती है। और अत्यन्त स्निग्ध बस्ति शरीर में जड़ता उत्पन्न कर देती है तथा वह शरीर की जाठराग्नि को नष्ट कर देती है ॥६३॥
क्षपयत्यतिसान्द्रस्तु न वा नेत्रा^१द्विनिष्क्रमेत् । अतिद्रवोऽल्पवीर्यत्वादयोगायोपपद्यते ॥६४॥
अत्यन्त सान्द्र (Concentrated) बस्ति शरीर में जम जाती है अथवा वह गाढ़ी होने से बस्तिनेत्र (Nozzle) से ही बाहर नहीं निकल सकती है। अत्यन्त द्रव (Dilute) बस्ति अल्पवीर्य होने के कारण शरीर में अयोग के लक्षण उत्पन्न कर देती है अर्थात् उस ओषधि का पूरा प्रभाव ही नहीं होता है। अयोग से अभिप्राय यह है कि ओषधि का या तो बिलकुल प्रभाव न हो या थोड़ा प्रभाव हो अथवा उसका विपरीत प्रभाव हो अर्थात् बस्ति द्वारा दी हुई ओषधि ऊपर की ओर गति करे तथा वमन आदि ले आये ॥६४॥
१. बस्तिनेत्रादित्यर्थः ।