काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबस्तिविशेषणीयाध्यायः ८] खिलस्थानम् ४२७
स्वादुतिक्तकषायाणां व्याधौ पित्तोत्तरे भिषक् ।।५१।।
उत्कर्षमपकर्षं तु कुर्यात्तीक्ष्णोष्णयोरतथा ।
पित्त प्रधान व्याधि में चिकित्सक को स्वादु, तिक्त एवं कषाय द्रव्यों में वृद्धि तथा तीक्ष्ण और उष्ण द्रव्यों कमी कर देनी चाहिये ।।५१।।
तीक्ष्णोष्णरूक्षद्रव्याणामुत्कर्षं च कफोत्तरे ।।५२।।
कफप्रधान व्याधि में तीष्ण, उष्ण तथा रूक्ष द्रव्यों की वृद्धि कर देनी चाहिये ।।५२।।
विपर्ययं विपर्यये गुणानां च प्रकल्पयेत् । संसृष्टदोषे संसृष्टगुणद्रव्याणि योजयेत् ।।५३।।
विपरीत अवस्था में विपरीत गुणों की वृद्धि करनी चाहिये तथा संसृष्ट (मिले हुए) दोषों में संसृष्ट (मिश्रित) गुणोंवाले द्रव्यों की योजना करनी चाहिये। अर्थात् जिस रोग में जिन दोषों की वृद्धि हुई हो उनमें उससे विपरीत गुणवाले द्रव्यों की वृद्धि करनी चाहिये। भगवान् आत्रेय के 'वृद्धिः समानैः सर्वेषां विपरीत्तैर्विपर्ययः' के अनुसार समान गुण के द्वारा उस दोष की वृद्धि एवं विपरीत गुण के द्वारा उसकी शान्ति होती है इसलिये जिस दोष को शान्त करना हो उसके लिये उससे विपरीत गुण वाले द्रव्यों की योजना करनी चाहिये। इसीलिये चरक सू. अ. में तीनों दोषों के पृथक् २ गुणों का निर्देश करके उन्हें शान्त करने के लिये उनसे विपरीत गुणयुक्त द्रव्यों का प्रयोग दिया गया है। इसी प्रकार यदि दो दोषों का मिश्रित प्रकोप है तो उन्हें शान्त करने के लिये ऐसे द्रव्य देने चाहिये जो मिश्रित रूप से उन दोषों के विपरीत गुणवाले हों। अर्थात् यदि वात और पित्त दोनों सम्मिलित रूप से बढ़े हुए हों तो उनकी शान्ति के लिये ऐसे द्रव्यों का प्रयोग करना चाहिये जो सम्मिलित रूप से वात और पित्त के गुणों से विपरीत हों ।।५३।।
आस्थापनं दुष्प्रयुक्तं भवत्याशीविषोपमम् । सुप्रयुक्तं तदेवेह प्राणिनाममृतोपमम् ।।५४।।
यदि आस्थापन (निरूह) बस्ति का ठीक प्रकार से प्रयोग न किया जाये तो वह सर्पविष के समान है। ठीक प्रकार से प्रयुक्त होने पर वही प्राणियों के लिये अमृत के समान गुणकारी होती है। अर्थात् यदि आस्थापन बस्ति का ठीक प्रकार से प्रयोग नहीं किया जायेगा तो वह लाभ के स्थान पर उलटा सर्पविष के समान भयंकर (घातक) होती है। यदि उसका ठीक प्रकार से विवेचना करके प्रयोग किया जायेगा तो वह अमृत के समान गुणकारी होती है ।।५४।।
प्रायो यत्र गुणाधिक्यं सम्यग्योगेन लक्ष्यते । तदप्रमादं कुर्वीत बस्तिकर्मणि बुद्धिमान् ।।५५।।
बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिये कि सम्यक् योग के द्वारा प्रायः जो २ वस्तु अधिक गुणकारी दिखाई दे, उस २ का प्रमादरहित होकर बस्तिकर्म में प्रयोग करे ।।५५।।
न हि तादृग्विधं किञ्चित् कर्म्मान्यदुपपद्यते । क्षिप्रं रोगाभिघाताय रोगाणां चोपपत्तये ।।५६।।
रोगों को शीघ्र ही नष्ट करने के लिये तथा नये उत्पन्न करने के लिये आस्थापन बस्ति के सदृश अन्य कोई कर्म नहीं है। यदि इसका ठीक प्रकार से प्रयोग किया जाय तो यह शीघ्र ही रोगों को नष्ट कर देती है तथा यदि विपरीत प्रयोग किया जायगा तो यह शीघ्र ही रोगों को उत्पन्न कर देती है। अर्थात् यह सम्यक् प्रयोग के द्वारा जहां शीघ्र ही रोगों को नष्ट करती है वहां विपरीत प्रयोग के द्वारा रोगों को भी उतना ही शीघ्र उत्पन्न करती है ।।५६।।
व्याध्यातुराग्निभैषज्यबलं प्रकृतिमेव च । वयः शरीरमौचित्यं सौकुमार्यं सहिष्णुताम् ।।५७।।
प्रधार्य बुद्ध्या मतिमाँस्तत्तत्कर्मविचारणम् । अवस्थायामवस्थायां कुर्यात् सम्यगतन्द्रितः ।।५८।।
बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिये कि रोग, रोगी की जाठराग्नि, औषध, बल, प्रकृति, अवस्था, शरीर, औचित्य, सुकुमारता, तथा सहिष्णुता का बुद्धिपूर्वक विचार करके प्रमादरहित होकर सम्यक् प्रकार से उस २ अवस्था में उस २