काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 786, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४२६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८] |
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मङ्गल्यं मङ्गलार्थाय मधु पूर्वं निषिच्यते ॥४०॥ पैच्छिल्यं बहुलत्वं च कषायत्वं च माक्षिके। भिनत्ति लवणं तैक्ष्ण्यात् सङ्घातं च नियच्छति ॥४१॥ मधुनोऽनन्तरं तस्माल्लवणांशो निषिच्यते। ततस्तैलं विनिक्षिप्तमेकीभावाय कल्पते ॥४२॥ कल्कः संसृज्यते चाशु क्वाथश्च समतां व्रजेत्। स्नेहकल्ककषायाणामेवं संमूर्च्छने कृते ॥४३॥ मूत्रं पटुत्वं कुरुते वीर्यं चोद्भावयत्यपि। सम्यगेवं विमृदितः स्रोतोभ्यः कफमारुतौ ॥४४॥ विष्यन्दयति पित्तं च क्षिप्रं चैव हरत्यपि। अतोऽन्यथा मृद्यमानो न श्लेषमधिगच्छति ॥४५॥
मधु मङ्गलकारी (शुभ) द्रव्य माना गया है इसलिये मङ्गल (शुभ) की दृष्टि से मधु सबसे पहले डाला जाता है। मधु की पिच्छिलता बहुलता तथा कषायपने को तीक्ष्ण गुण के कारण लवण नष्ट कर देता है तथा उसका संघात बना देता है-इसलिये मधु के बाद उसमें लवण डाला जाता है। इसके बाद उसमें जो तैल डाला जाता है वह सम्पूर्णद्रव्यों में एकी भाव-एकात्मता उत्पन्न कर देता है अर्थात् तैल के कारण सब द्रव्यों में एकात्मता उत्पन्न हो जाती है (वे सब परस्पर अच्छी प्रकार मिल जाते हैं)। कल्क का शीघ्र ही संसर्जन हो जाता है तथा क्वाथ समरूप में हो जाता है। इसीलिये स्नेह (तैल), कल्क तथा कषाय (क्वाथ) को इसमें डाला जाता है। इसमें डाला हुआ मूत्र इसकी पटुता (गुणवृद्धि) को करता है तथा इसके वीर्य (शक्ति) को बढ़ाता है। इस प्रकार ठीक ढङ्ग से मथ कर तैयार की हुई बस्ति स्रोतों से कफ, वायु तथा पित्त को शीघ्र ही निकाल देती है। तथा इससे विपरीत मथकर तैयार की हुई बस्ति ठीक प्रकार से मिल नहीं पाती है ॥४०-४५॥
असम्यङ्मथितः श्लिष्टो बस्तिर्नार्थाय कल्पते। तत एष क्रमो दृष्टो निरूहस्योपयोजने ॥४६॥
ठीक प्रकार से न मथी हुई तथा परस्पर ठीक प्रकार से न मिली हुई बस्ति अपने प्रयोजन को सिद्ध नहीं करती है अर्थात् सम्यक् कार्य नहीं करती है। इसीलिये निरूह बस्ति की योजना में उपर्युक्त क्रम दिया गया है ॥४६॥
प्रमाणं च प्रकृष्टस्य प्रसूतेर्युदुदाहृतम्। तस्मात् प्रमाणादुत्कर्षो (वयोबलव) दिष्यते ॥४७॥ अपकर्षस्तु कर्तव्यः संप्रधार्य वयोबलम्। गुणतस्तूभयत्वेन दृष्ट्वा व्याधिबलाबलम् ॥४८॥
यह ऊपर प्रकृष्ट प्रसूति का प्रमाण दिया गया है। इस प्रमाण में रोगी की अवस्था तथा बल के अनुसार वृद्धि की जा सकती है। मात्रा में कभी भी रोगी की अवस्था तथा बल के अनुसार ही करनी चाहिये। इस प्रकार रोग के बलाबल को भी देखकर मात्रा में वृद्धि अथवा कमी करनी चाहिये। इसी प्रकार सुश्रुत चि. अ. ३८ में भी कहा है ॥४७-४८॥
उत्कर्षं यदङ्गेन तदङ्गेनापकर्षयेत्¹। शीतोष्णस्निग्धरूक्षाणां द्रव्याणामुपकल्पयेत् ॥४९॥
शीत, उष्ण, स्निग्ध तथा रूक्ष द्रव्यों में जिस क्रम से मात्रा में वृद्धि की जाती है उसी क्रम से उनमें ह्रास (कमी) भी करनी चाहिये ॥४९॥
स्वाद्वम्ललवणोष्णानामुत्कर्षं नातिमात्रशः। वातव्याधौ भिषक्कुर्यात् स्नेहस्य तु विधापयेत् ॥५०॥ रूक्षाणां शीतवीर्याणामपकर्षं च युक्तितः।
चिकित्सक को वातव्याधि में स्वादु (मधुर), अम्ल, लवण तथा उष्ण द्रव्यों की अधिक मात्रा में वृद्धि नहीं करनी चाहिये। स्नेह को समावस्था में रखना चाहिये तथा रूक्ष एवं शीतवीर्य द्रव्यों में युक्तिपूर्वक कमी कर देनी चाहिये ॥५०॥
१. येन क्रमेण मात्रोत्कर्षः क्रियते तेनैव क्रमेण मात्राह्रासं कुर्यादित्यर्थः।