भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 785

बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८] खिलस्थानम् ४२५

अतो मध्यस्य कालः स्यादव(र)स्यावरस्तथा। स्नेहस्वेदोपपन्नस्य वामितस्य यथाक्रमम् ।।३०।। स्निग्धस्विन्नस्य तु पुनर्विरिक्तस्य क्रमे गते। दत्तानुवासनस्यास्य यथायोगं ततस्त्र्याहात् ।।३१।। क्षणिकस्य प्रशान्तस्य निरूहमुपलक्षयेत्।

मध्यबल, मध्यदोष तथा मध्य साधन सम्पन्न व्यक्ति को कालबस्ति देनी चाहिये। तथा अवर (निकृष्ट) बल, अवर दोष तथा और अवर साधन युक्त व्यक्ति को क्रमशः पहले स्नेहन, स्वेदन तथा वमन कराकर फिर दोबारा क्रमशः स्नेहन, स्वेदन तथा विरेचन के बाद अनुवासन (स्नेह बस्ति) देकर तीन दिन के बाद थोड़ी देर के लिये शान्त होने पर निरूहबस्ति देनी चाहिये। अर्थात् निरूहबस्ति तीन दिन के बाद देनी चाहिये। इसी प्रकार चरक सि. अ. १ में भी कहा है ।।३०-३१।।

त्रिभिरन्वासितस्यातः सप्ताहः कर्मकालयोः ।।३२।। पुनरास्थापनं कार्यं योगः स्यात् पञ्चमेऽहनि। स्वभ्यक्तस्विन्नगात्रस्य काल्यमप्रातराशिनः ।।३३।। कोष्ठानु साऽऽमं शाखाभ्यः सम्यक्संवाहितस्य च।

तीन दिन के बाद जिसे अनुवासन दिया गया है उसे सप्ताह भर बाद कर्म तथा कालबस्ति देनी चाहिये। फिर आस्थापन (निरूहबस्ति) देकर शरीर का स्नेहन तथा स्वेदन करके प्रातःकाल खाली पेट यदि कोष्ठ में आम प्रकोप हो तो शाखाओं पर संवाहन करके पांचवे दिन योगबस्ति देनी चाहिये ।।३२-३३।।

निरूहं योजयेत् प्राज्ञः सर्वोपकरणान्वितः ।।३४।। हैमे रौप्येऽथवा कांस्ये सुमृष्टे भाजने समे। प्रक्षिप्यैकैकशो द्रव्यं यत् क्रमेणोपदिश्यते ।।३५।।

बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि सब उपकरणों (साधनों) से युक्त होकर सोने, चांदी अथवा कांसी के साफ सुथरे तथा सम बर्तन में क्रमशः एक २ द्रव्य डालकर—जैसा कि आगे वर्णन किया जायेगा—निरूह बस्ति की योजना करे ।।३४-३५।।

भिषङ्निरूहं गृह्णीयात् प्राङ्मुखः सुसमाहितः। पूर्वमेवात्र निक्षेप्यं मधुनः प्रसृतद्वयम् ।।३६।। सैन्धवस्यार्धकर्षं च तैलं च मधुनः समम्। ततश्च कल्कप्रसृतं क्वाथं कल्कचतुर्गुणम् ।।३७।। प्रसृतौ मांसनिर्यूहान्मूत्रप्रसृतमेव च। द्वादशप्रसृतो बस्तिरित्येवं खजमूच्छितः ।।३८।। यथार्थं च यथावच्च प्रणिधेयो विजानता।

बस्ति के उपादान द्रव्यों को मिलाने का प्रकार—चिकित्सक को चाहिये कि पूर्व दिशा की ओर मुख करके तथा समाहित (दत्तचित) होकर हाथ से मलकर निरूह तैयार करे। सबसे पहले दो प्रसृत मधु डालना चाहिये। उसमें आधा कर्ष (आधा तोला) सैन्धवनमक तथा मधु के समान अर्थात् दो प्रसृत तैल डालना चाहिये। उसमें एक प्रसृत कल्क तथा कल्क से चौगुना अर्थात् चार प्रसृत क्वाथ द्रव्य मिलाये। इसमें दो प्रसृत मांस निर्यूह (मांसरस) तथा एक प्रसृत गोमूत्र डाले। इसप्रकार कुल १२ प्रसृत बस्तिद्रव्य होता है। बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि इन सबको खींचे के द्वारा खूब मथकर यथार्थरूप में तथा यथाविधि बस्ति तैयार करे। इसी प्रकार चरक सि. अ. ३ में तथा सुश्रुत चि. अ. ३८ में भी कहा है ।।३६-३८।।

स्याच्चेद्विवक्षा द्रव्याणां प्रक्षेपं प्रति कस्यचित् ।।३९।। तत्र वाच्यमिदं व्यस्तक्रमसंयोगकारणम्।

यदि किसी व्यक्ति को द्रव्यों के प्रक्षेप के विषय में जिज्ञासा हो तो उन द्रव्यों के मिलाने के क्रम के विषय में निम्न वक्तव्य है। अर्थात् बस्ति में द्रव्यों के मिलाने के उपर्युक्त क्रम के विषय में किसी को ज्ञातव्य हो कि उपर्युक्त द्रव्य इसी क्रम से ही क्यों मिलाये जाते हैं तो उसका उत्तर निम्न है ।।३९।।