भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 784

४२४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८]

इस प्रकार दोष भेद से यह बस्तियों की योजना की गई है। इसके अतिरिक्त बस्तियों के सम्बन्ध में निम्न चतुर्भद्र नाम का एक कल्प दिया गया है ॥२२॥

चत्वारो बस्तयः पूर्वमन्ते चत्वार एव च । तयोरास्थापनं मध्ये कल्पः सोऽयं निरत्ययः ॥२३॥ द्विस्त्रिर्वाऽर्थवशादेष क्रियमाणः सुखावहः ।

चतुर्भद्र कल्प—चार स्नेहबस्तियां प्रारम्भ में+चार अन्त में तथा+इनके बीच में चार आस्थापन (निरूह या रूक्ष बस्तियां) बस्तियां देनी चाहिये । बस्तियों का यह कल्प उपद्रवशून्य होता है अर्थात् इस कल्प का प्रयोग करने पर किसी उपद्रव की संभावना नहीं होती है । इस कल्प का आवश्यकतानुसार दो या तीन बार प्रयोग करने पर वह सुखकारक होता है । अर्थात् आवश्यकतानुसार इस कल्प का दोबारा या तिबारा भी प्रयोग किया जा सकता है ॥२३॥

ज्वरादिभिः परिक्लिष्टे हीनवर्णबलौजसि ॥२४॥ जातानुवासनावस्थे बलपुंस्त्वाग्निवर्धनाः ।

जो रोगी ज्वर आदि के कारण क्लान्त हुआ है तथा इसी कारण से जिसका वर्ण, बल तथा ओज कम हो गया है—ऐसी अवस्था में यदि अनुवासन (स्नेहबस्ति) किया जाता है तो वह उसके बल, पुंस्त्वशक्ति तथा जाठराग्नि को बढ़ाता है ॥२४॥

अयुग्मा बस्तयो देया न तु युग्माः कथञ्चन ॥२५॥ विषमा विषमैरेव हन्यन्ते बस्तिभिर्गदाः । एकस्त्रयो वा कफजे, पैत्तिके पञ्च सप्त वा ॥२६॥ वाते नवैकादश वा यो यदाप्नोति वा समम् ।

(इति ताडपत्रपुस्तके २१७ तमं पत्रम्)

रोगी को सदा अयुग्म (विषम संख्या में) ही बस्तियां देनी चाहिये । युग्म (सम संख्या में) बस्तियां कभी नहीं देनी चाहिये । विषम हुए रोग अथवा दोषों के विषम होने के कारण उत्पन्न हुए रोग विषम बस्तियों के द्वारा ही नष्ट होते हैं । जिस रोगी को कफज रोग में एक या तीन, पित्तज रोग में पांच या सात तथा वातिक रोग में नौ या ग्यारह बस्तियां दी जाती हैं उसके दोष या धातुएँ समावस्था में रहती हैं अर्थात् वह स्वस्थ रहता है । इसी प्रकार चरक सि. अ. १ में भी कहा है । विषम संख्या में बस्ति देने का नियम साधारणतया प्रधानरूप से कराये जाने वाले अनुवासन के लिये ही है । निरूहबस्ति के अङ्गरूप में कराये जाने वाले अनुवासन में यह नियम लागू नहीं होता है । उस अवस्था में सम (युग्म) बस्तियां भी दी जा सकती हैं ॥२५-२६॥

इति सूक्ष्मविचित्रार्थमुक्तं व्याससमासतः ॥२७॥ विज्ञायैतत् प्रयोक्तव्यं यथा वक्ष्याम्यतः परम् ।

इस प्रकार सूक्ष्म तथा अनेक प्रकार के विषयों को मैंने विस्तार एवं संक्षेप से कहा है । इस सबको जानकर इन बस्तियों का प्रयोग करना चाहिये-जैसा कि मैं आगे कहूँगा ॥२७॥

गम्भीरानुगता यस्य क्रमेणोपचिता मलाः ॥२८॥ कुपिता वातभूयिष्ठा बस्तिसाध्या विशेषतः । संपन्नस्य सहिष्णोश्च कर्म तस्य परायणम् ॥२९॥

जिस व्यक्ति के क्रमशः उपचित (वृद्धि को प्राप्त) हुए तथा गम्भीर धातुओं में प्रविष्ट हुए मल कुपित हुए हों, उनमें वात की प्रधानता हो, वे दोष विशेषरूप से बस्तिसाध्य हों तथा यदि रोगी सम्पन्न (सम्पूर्ण साधनों से युक्त) तथा सहिष्णु हो तो उस रोगी के लिये कर्मबस्ति श्रेष्ठ उपाय है ॥