भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 783

बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८] खिलस्थानम् ४२३

परस्पर व्यवधान का क्या प्रयोजन है ? इसका उत्तर यह है कि अनुवासन तथा निरूह बस्ति को परस्पर एक दूसरे के व्यवधान के बिना सेवन करना उपयुक्त नहीं है क्योंकि अकेली स्नेहबस्ति (अनुवासन) के प्रयोग से कफ तथा पित्त का उत्क्लेश हो जाता है जिससे जाठराग्नि नष्ट हो जाती है। इसी प्रकार अकेले निरूह के निरन्तर सेवन से वायु का प्रकोप हो जाता है। इसलिये अनुवासन के बाद निरूह बस्ति तथा निरूह के बाद अनुवासन द्वारा स्नेह देना चाहिये। इस प्रकार व्यवधान से ही बस्तियों की योजना करना चाहिये। इसी प्रकार चरक सि. अ. ४ तथा सुश्रुत चि. अ. ३७ में भी कहा है ॥१३-१४॥

सप्त पञ्च त्रयो वाऽऽदौ वाते (स्नेहास्त्व)गर्हिताः । । १५ । । जघन्यौ पित्तकफयोरेतावेव कदाचन ।

वायु के प्रकोप में प्रारम्भ में सात, पांच या तीन स्नेह-बस्तियां निन्दित नहीं हैं। परन्तु ये ही संख्याएँ अर्थात् सात, पांच या तीन स्नेहबस्तियां पित्त तथा कफ के प्रकोप में यदि प्रारम्भ में दी जांय तो कभी २ निन्दित मानी जाती हैं ॥१५॥

तां तामतवस्थामन्वीक्ष्य दोषकालबलाश्रयाम् । । १६ । । उत्कर्षेच्चावकषैच्च बस्तीन् द्रव्याणि वा भिषक् । कुर्याद्योगे तथोत्कर्षमपकर्षं तु कर्मणि । । १७ । । काले तदुभयं चैव वीक्ष्य दोषबलाबलम् ।

इसलिये दोष (वात, पित्त, कफ), काल तथा रोगी के बल पर आश्रित उस २ अवस्था को देखकर चिकित्सक को चाहिये कि वह बस्ति अथवा उसके द्रव्यों में घटाबढ़ी कर ले। योगबस्ति में उत्कर्ष (वृद्धि) कर्मबस्ति में अपकर्ष (ह्रासकमी) तथा कालबस्ति में दोषों के बलाबल को देखकर दोनों अर्थात् अवस्थामनुसार वृद्धि एवं ह्रास दोनों किये जा सकते हैं ॥१६-१७॥

वाते समांशः स्निग्धोष्णो निरूहः पानतैलिकः । । १८ । । षड्भागस्नैहिकौ पित्ते सक्षीरौ स्वादुशीतलौ । त्रयः समूत्रास्तीक्ष्णोष्णाः श्लेष्मण्यष्टाङ्गतैलिकाः । । १९ । । सकृत् प्रणिहितो वातमाशयस्थं निरस्यति । सपित्तं सकफं द्वित्रिरत ऊर्ध्वं न शस्यते । । २० । ।

वायु के रोगों में निरूह बस्ति में समान मात्रा में तेल डालकर उसे स्निग्ध तथा उष्ण करके एक बस्ति देनी चाहिये । पित्त के रोगों में ६ भाग तेल तथा दूध के द्वारा स्वादु तथा शीतल करके दो बस्तियां देनी चाहिये। तथा श्लेष्मा (कफ) के रोगों में आठ भाग तेल तथा गोमूत्र डालकर तैयार की हुई तीक्ष्ण तथा उष्ण तीन बस्तियां देनी चाहिये। वायु के रोगों में दी हुई एक बस्ति आशयों में से वातदोष को निकाल देती है। पित्त के रोगों में दो तथा कफ के रोगों में तीन बस्तियां देनी चाहिये। इससे अधिक बस्तियां नहीं देनी चाहिये। यह निरूह बस्तियों के विषय का विचार किया गया है। इसी प्रकार चरक सि. अ. ३ में भी कहा है। सुश्रुत चि. अ. ३२ में कहा है कि यदि उपर्युक्त संख्या में दी गई बस्तियों से दोष ठीक प्रकार से न निकल पायें तो इससे अधिक बस्तियां भी दी जा सकती हैं ॥१८-२०॥

शस्यतेऽत्र रसक्षीरयूषाशनविधिः क्रमात् । अथवा बलकालाग्निदेशप्रकृतिसात्म्यतः । । २१ । ।

बस्ति देने के बाद क्रमशः रस (मांसरस), क्षीर (दूध) तथा यूष का भोजन करना चाहिये। अर्थात् वातरोग में बस्ति देने के बाद मांसरस, पित्तरोग में दूध तथा कफरोग में यूष का भोजन कराना चाहिये। अथवा रोगी के बल, काल, अग्नि, देश, प्रकृति तथा सात्म्य के अनुसार जो उचित हो वह भोजन देना चाहिये। इसी प्रकार चरक सि. अ. ३ में भी कहा है ॥२१॥

एता दोषविकल्पान्ता निर्दिष्टा बस्तियुक्तयः । एष चाप्यपरः कल्पश्चतुर्भद्र इति स्मृतः । । २२ । ।