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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८] खिलस्थानम् ४२७

स्वादुतिक्तकषायाणां व्याधौ पित्तोत्तरे भिषक् ।।५१।।
उत्कर्षमपकर्षं तु कुर्यात्तीक्ष्णोष्णयोरतथा ।

पित्त प्रधान व्याधि में चिकित्सक को स्वादु, तिक्त एवं कषाय द्रव्यों में वृद्धि तथा तीक्ष्ण और उष्ण द्रव्यों कमी कर देनी चाहिये ।।५१।।

तीक्ष्णोष्णरूक्षद्रव्याणामुत्कर्षं च कफोत्तरे ।।५२।।

कफप्रधान व्याधि में तीष्ण, उष्ण तथा रूक्ष द्रव्यों की वृद्धि कर देनी चाहिये ।।५२।।

विपर्ययं विपर्यये गुणानां च प्रकल्पयेत् । संसृष्टदोषे संसृष्टगुणद्रव्याणि योजयेत् ।।५३।।

विपरीत अवस्था में विपरीत गुणों की वृद्धि करनी चाहिये तथा संसृष्ट (मिले हुए) दोषों में संसृष्ट (मिश्रित) गुणोंवाले द्रव्यों की योजना करनी चाहिये। अर्थात् जिस रोग में जिन दोषों की वृद्धि हुई हो उनमें उससे विपरीत गुणवाले द्रव्यों की वृद्धि करनी चाहिये। भगवान् आत्रेय के 'वृद्धिः समानैः सर्वेषां विपरीत्तैर्विपर्ययः' के अनुसार समान गुण के द्वारा उस दोष की वृद्धि एवं विपरीत गुण के द्वारा उसकी शान्ति होती है इसलिये जिस दोष को शान्त करना हो उसके लिये उससे विपरीत गुण वाले द्रव्यों की योजना करनी चाहिये। इसीलिये चरक सू. अ. में तीनों दोषों के पृथक् २ गुणों का निर्देश करके उन्हें शान्त करने के लिये उनसे विपरीत गुणयुक्त द्रव्यों का प्रयोग दिया गया है। इसी प्रकार यदि दो दोषों का मिश्रित प्रकोप है तो उन्हें शान्त करने के लिये ऐसे द्रव्य देने चाहिये जो मिश्रित रूप से उन दोषों के विपरीत गुणवाले हों। अर्थात् यदि वात और पित्त दोनों सम्मिलित रूप से बढ़े हुए हों तो उनकी शान्ति के लिये ऐसे द्रव्यों का प्रयोग करना चाहिये जो सम्मिलित रूप से वात और पित्त के गुणों से विपरीत हों ।।५३।।

आस्थापनं दुष्प्रयुक्तं भवत्याशीविषोपमम् । सुप्रयुक्तं तदेवेह प्राणिनाममृतोपमम् ।।५४।।

यदि आस्थापन (निरूह) बस्ति का ठीक प्रकार से प्रयोग न किया जाये तो वह सर्पविष के समान है। ठीक प्रकार से प्रयुक्त होने पर वही प्राणियों के लिये अमृत के समान गुणकारी होती है। अर्थात् यदि आस्थापन बस्ति का ठीक प्रकार से प्रयोग नहीं किया जायेगा तो वह लाभ के स्थान पर उलटा सर्पविष के समान भयंकर (घातक) होती है। यदि उसका ठीक प्रकार से विवेचना करके प्रयोग किया जायेगा तो वह अमृत के समान गुणकारी होती है ।।५४।।

प्रायो यत्र गुणाधिक्यं सम्यग्योगेन लक्ष्यते । तदप्रमादं कुर्वीत बस्तिकर्मणि बुद्धिमान् ।।५५।।

बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिये कि सम्यक् योग के द्वारा प्रायः जो २ वस्तु अधिक गुणकारी दिखाई दे, उस २ का प्रमादरहित होकर बस्तिकर्म में प्रयोग करे ।।५५।।

न हि तादृग्विधं किञ्चित् कर्म्मान्यदुपपद्यते । क्षिप्रं रोगाभिघाताय रोगाणां चोपपत्तये ।।५६।।

रोगों को शीघ्र ही नष्ट करने के लिये तथा नये उत्पन्न करने के लिये आस्थापन बस्ति के सदृश अन्य कोई कर्म नहीं है। यदि इसका ठीक प्रकार से प्रयोग किया जाय तो यह शीघ्र ही रोगों को नष्ट कर देती है तथा यदि विपरीत प्रयोग किया जायगा तो यह शीघ्र ही रोगों को उत्पन्न कर देती है। अर्थात् यह सम्यक् प्रयोग के द्वारा जहां शीघ्र ही रोगों को नष्ट करती है वहां विपरीत प्रयोग के द्वारा रोगों को भी उतना ही शीघ्र उत्पन्न करती है ।।५६।।

व्याध्यातुराग्निभैषज्यबलं प्रकृतिमेव च । वयः शरीरमौचित्यं सौकुमार्यं सहिष्णुताम् ।।५७।।
प्रधार्य बुद्ध्या मतिमाँस्तत्तत्कर्मविचारणम् । अवस्थायामवस्थायां कुर्यात् सम्यगतन्द्रितः ।।५८।।

बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिये कि रोग, रोगी की जाठराग्नि, औषध, बल, प्रकृति, अवस्था, शरीर, औचित्य, सुकुमारता, तथा सहिष्णुता का बुद्धिपूर्वक विचार करके प्रमादरहित होकर सम्यक् प्रकार से उस २ अवस्था में उस २

४२८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८]

कर्म को करे। अर्थात् रोगी के रोग तथा उसकी जाठराग्नि, बल, औषध, प्रकृति, शरीर, सुकुमारता तथा सहिष्णुता आदि को देखकर जिस २ अवस्था में जो २ कर्म (चिकित्सा आदि) आवश्यक हो वह करना चाहिये ॥५७-५८॥

नातिशीतं न चात्युष्णं नातितीक्ष्णं नचेतरम्(त्) ।
नातिरूक्षमतिस्निग्धं नातिसान्द्रं न च द्रवम् ॥५९॥
नातिमात्रं न चात्यल्पं निरूहमुपकल्पयेत् ।

निरूहबस्ति का प्रयोग—अत्यन्त शीत, अत्यन्त उष्ण, अत्यन्त तीक्ष्ण, अत्यन्त मृदु, अत्यन्त रूक्ष, अत्यन्त स्निग्ध, अत्यन्त सान्द्र, अत्यन्त द्रव, अत्यन्त अधिक मात्रा में तथा अत्यन्त थोड़ी मात्रा में निरूह बस्ति का प्रयोग नहीं करना चाहिये ॥५९॥

अतिशीतोऽतिशैत्येन स्कन्नो वातबलावृतः ॥६०॥
भृशं स्तम्भयते गात्रं कृच्छ्रेण च निवर्तते ।
अत्युष्णः कुरुते दाहं मूर्च्छां चाशु निरेति च ॥६१॥

प्रत्येक का पृथक् २ हेतु—अत्यन्त शीतल बस्ति अधिक शीतलता (ठण्ड) के कारण जमकर वायु के बल से आवृत हो जाती है जिससे शरीर और भी जकड़ जाता है तथा वह शरीर से वापिस भी कठिनता से लौटती है तथा अत्यन्त उष्ण बस्ति दाह पैदा करती है तथा शीघ्र ही शरीर में मूर्च्छा पैदा कर देती है ॥

अतितीक्ष्णस्तथैवास्य जीवादानं करोति वा । मन्दो न दोषान् हरति दूषयत्येव केवलम् ॥६२॥

अत्यन्त तीक्ष्ण बस्ति शरीर से जीवरक्त (शुद्ध रक्त) को प्रवाहित कर देती है तथा अत्यन्त मन्द बस्ति शरीर से दोषों को नष्ट नहीं करती है अपितु शरीर को और भी दूषित कर देती है। इसी प्रकार चरक सि. अ. ६ में भी कहा है। जीवरक्त का रक्तपित्त में आनेवाले रक्त से भ्रम हो सकता है। उनकी भेदक पहचान चरक सि. अ. ६ में लिखा है। अर्थात् उसके दो भेद दिये हैं। १. उस रक्त से अन्न को मिश्रित करके कौये या कुत्ते को दिया जाय। यदि वे उसे खा जायें तो जीवरक्त (शुद्ध रक्त) जाने अन्यथा रक्तपित्त जानें। २. इस रक्त से एक श्वेत वस्त्र को गीला करके सुखा देवें। सूख जाने पर पर उसे ईषदुष्ण जल से धो डालें। यदि विवर्ण हो जाये तो रक्तपित्त तथा शुद्ध हो जाये तो जीवरक्त जानें ॥६२॥

कर्षयत्यतिरूक्षश्च मारुतं च प्रकोपयेत् । स्निग्धोऽतिजाड्यं कुरुते व्यापादयति चानलम् ॥६३॥

अत्यन्त रूक्ष बस्ति शरीर का अत्यन्त कर्षण करती है तथा वायु को प्रकुपित कर देती है। और अत्यन्त स्निग्ध बस्ति शरीर में जड़ता उत्पन्न कर देती है तथा वह शरीर की जाठराग्नि को नष्ट कर देती है ॥६३॥

क्षपयत्यतिसान्द्रस्तु न वा नेत्रा^१द्विनिष्क्रमेत् । अतिद्रवोऽल्पवीर्यत्वादयोगायोपपद्यते ॥६४॥

अत्यन्त सान्द्र (Concentrated) बस्ति शरीर में जम जाती है अथवा वह गाढ़ी होने से बस्तिनेत्र (Nozzle) से ही बाहर नहीं निकल सकती है। अत्यन्त द्रव (Dilute) बस्ति अल्पवीर्य होने के कारण शरीर में अयोग के लक्षण उत्पन्न कर देती है अर्थात् उस ओषधि का पूरा प्रभाव ही नहीं होता है। अयोग से अभिप्राय यह है कि ओषधि का या तो बिलकुल प्रभाव न हो या थोड़ा प्रभाव हो अथवा उसका विपरीत प्रभाव हो अर्थात् बस्ति द्वारा दी हुई ओषधि ऊपर की ओर गति करे तथा वमन आदि ले आये ॥६४॥


१. बस्तिनेत्रादित्यर्थः ।

बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८] खिलस्थानम् ४२९

अल्पमात्रो न(चा)प्येति कृच्छ्राद्वाऽपि निवर्तते । अतिमात्रोऽतियोगाय तस्मादेते विगर्हिताः ।।६५।।

अल्प मात्रा में दी हुई बस्ति वापिस लौटकर नहीं आती है अथवा कठिनता से वापिस लौटती है । अधिक मात्रा में दी गई बस्ति अतियोग के लक्षण को उत्पन्न कर देती है । इसलिये उपर्युक्त अतिशीत, अत्युष्ण आदि बस्ति के सब दोष निन्दित माने गये हैं । चरक सि. अ. ३ में तथा सुश्रुत में भी उपर्युक्त दोषों का वर्णन किया गया है ।।६५।।

यथावन्मूर्च्छितो मृ^१त्स्नो भोज्योष्णालवणः समः ।
(इति ताडपत्रपुस्तके २१८ तमं पत्रम्)
बालकाष्ठौष्ठजिह्वानां योनिदाहप्रवर्तकः ।।६६।।

सम्यक् प्रकार से मसलकर चिकनी की हुई बस्ति को उष्ण करके तथा समभाग मात्रा में लवण डालकर सेवन करने से वह बल कोष्ठ, ओष्ठ, जिह्वा तथा योनि में दाह उत्पन्न नहीं करती है ।

वक्तव्य—यहां 'बालकाष्ठौष्ठजिह्वानां योनिदाहप्रवर्तकः' के स्थान पर यदि 'बलकोष्ठौष्ठजिह्वानां योनिदाहाप्रवर्तकः' यह पाठ होता तो अधिक ठीक अर्थ हो सकता है । उसी पाठ के अनुसार उपर्युक्त अर्थ किया है ।।६६।।

श्रोणिबस्तिकटीपार्श्वनाभिमूलोदराश्रितः । सम्यक्समुच्छ्रयं कृत्स्नं वीर्यतः प्रतिपद्यते ।।६७।।

यह बस्ति—श्रोणि, बस्ति (Bladder), कटी, पार्श्व, नाभिमूल तथा उदर में सम्यक् प्रकार से आश्रित हुई अपने वीर्य के द्वारा पूर्णरूप से ऊपर तक पहुंच जाती है अर्थात् कोष्ठ के द्वारा शरीर के ऊर्ध्वभाग में पहुंच जाती है ।।६७।।

ऊर्ध्वभागैर्बलात् क्षिप्तो मारुतैरिव पावकः । पित्तस्थानमतिक्रम्य स्वल्पमाक्षिप्रते कफम् ।।६८।।

शरीर के ऊर्ध्वभागों में स्थित वायु के द्वारा मानों बलपूर्वक फेंकी गई अग्नि पित्त स्थान का अतिक्रमण करके थोड़ा कफ को व्याप्त कर लेती है ।।६८।।

तीक्ष्णो मात्राशतादूर्ध्वं नातितीक्ष्णः (प्रयुज्यते) ।
न तिष्ठति, मृदुस्तिष्ठत्यधिकं वाऽपि यापनः ।।६९।।

तीक्ष्ण बस्ति १०० मात्रा से अधिक शरीर में नहीं ठहरती है इसलिये अत्यन्त तीक्ष्ण बस्ति प्रयुक्त नहीं करनी चाहिये । इसके विपरीत मृदु या यापन बस्ति शरीर में बहुत देर तक स्थिर रहती है ।।६९।।

आनुलोम्यादपानस्य गुदस्यारोपणाद् भृशम् । तद्द्वितीयस्तृतीयो वा कालमल्पतरं तथा ।।७०।।
दोषान् स्थूलांश्च सूक्ष्मांश्च गम्भीरानुगतानपि ।
विष्यन्दयति विषण्णान् (छृब्धान्) सपुरीषान् प्रकर्षति ।।७१।।

अपान वायु के अनुलोम होने से तथा गुदा के अत्यन्त समीप होने के कारण थोड़ी देर के बाद दी हुई दूसरी या तीसरी बस्ति शरीर में विष्टब्ध हुए स्थूल, सूक्ष्म तथा गम्भीर धातुओं में प्रविष्ट हुए दोषों को भी मलसहित निकाल कर बाहर कर देती है ।।७०-७१।।

न कुर्याद्व्यापदः काश्चित् सुखेन च निवर्तते । युक्तो युक्तेन भिषजा स बस्तिः संप्रशस्यते ।।७२।।

श्रेष्ठ बस्ति—जो बस्ति शरीर में कोई उपद्रव उत्पन्न न करे, सुखपूर्वक शरीर से बाहर वापिस आ जाये तथा जो योग्य चिकित्सक के द्वारा प्रयुक्त की गई हो वह प्रशस्त मानी गई है । चरक सि. अ. १ में प्रशस्त बस्ति के लक्षण दिये हैं ।।७२।।


१. मसृण इत्यर्थः ।

४३० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८]

वयसः स्थापनो वृष्यः स्वरवर्णबलाग्निकृत् । वातपित्तकफानां च मलानां चापकर्षणः ॥७३॥
बालवृद्धवयस्थानां क्षिप्रमूर्जस्करः परम् । सर्वेन्द्रियाणां वैशद्यं कुरुते चाङ्गमार्दवम् ॥७४॥
एवमेते समाख्याता निरूहस्य गुणागुणाः ।

बस्ति वयःस्थापक (आयु को स्थिर करने वाली) एवं वृष्य है, स्वर, वर्ण, बल और अग्नि को बढ़ाने वाली है, वात, पित्त तथा कफ रूप दोषों और मलों का अपकर्षण करती (शरीर से बाहर निकालती) है, बाल, वृद्ध तथा युवा व्यक्तियों में शीघ्र ही बल को बढ़ाने वाली है, सब इन्द्रियों को विशद (निर्मल) करती है तथा शरीर के अङ्गों को मृदु कर देती है। इस प्रकार ऊपर निरूह बस्ति के गुण तथा दोष कहे गये हैं ॥७३-७४॥

पुरीषं मारुतः पित्तं कफश्च क्रमशो यदा ॥७५॥
प्रवर्तन्ते च फेनं च शङ्खस्फटिकसन्निभम् । सम्यङ्निरूढगात्राणां मार्दवं जनयेत् परम् ॥७६॥
अन्नाभिलाषो वैशद्यं लघुता वाऽथ मार्दवम् । सृष्टविण्मूत्रवातत्वमिन्द्रियाणां प्रसन्नता ॥७७॥

निरूह के सम्यक् योग के लक्षण—यदि निरूह का सम्यक् योग हुआ हो तो क्रमशः पुरीष (मल), वायु, पित्त तथा कफ निकलते हैं तथा उनके बाद शङ्ख तथा स्फटिक के समान (सफेद) झाग निकलते हैं अर्थात् सम्यक् प्रकार से प्रयुक्त निरूह बस्ति में सर्वप्रथम मल निकलना चाहिये तथा उसके बाद क्रमशः आंतों में से वायु फिर पक्वाशय में से पित्त तथा आमाशय में से कफ का निःसरण होता है तथा अन्त में सफेद झाग निकलते हैं। तथा सम्यक् निरूह हो जाने पर शरीर अत्यन्त मृदु हो जाता है, अन्न में रुचि उत्पन्न होती है, शरीर विशद, लघु तथा मृदु हो जाता है, मल-मूत्र तथा वायु ठीक प्रकार से सरते हैं (निकल जाते हैं) तथा सम्पूर्ण इन्द्रियां प्रसन्न हो जाती हैं ॥७५-७७॥

अयोगे विपरीतं स्यादतियोगेऽतिवर्तनम् । कफपित्तासृजां मांसप्रक्षालननिभस्य वा ॥७८॥
हिक्का कम्पस्तृषा ग्लानिर्गात्रभेदस्तमः क्लमः । निद्रानाशः प्रलापश्च यत्र चाप्युपजायते ॥७९॥

अयोग के लक्षण—निरूह के अयोग में इससे विपरीत लक्षण होते हैं अर्थात् उसमें पुरीष, वायु आदि के निकलने का क्रम उपर्युक्त नहीं रहता है, शरीर मृदु नहीं होता, अन्न में रुचि उत्पन्न नहीं होती, शरीर विशद तथा मृदु नहीं होता है उसके मल-मूत्र तथा वायु ठीक तरह से नहीं सरते हैं तथा इन्द्रियां प्रसन्न नहीं होती हैं। इसी प्रकार चरक सि. अ. १ में भी कहा है।

अतियोग के लक्षण—यदि निरूह का अतियोग हो जाये तो शरीर से कफ, पित्त तथा रक्त अथवा मांस के धोवन के समान जल अधिक मात्रा में निकलता है तथा हिक्का, कम्पन, प्यास, ग्लानि, अङ्गभेद, तम (तमोगुण की प्रधानता), क्लम (थकावट) निद्रानाश तथा प्रलाप आदि लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। चरक सि. अ. १ में कहा है कि-निरूह के अतियोग के वे ही लक्षण होते हैं जो विरेचन के अतियोग के होते हैं। विरेचन के अतियोग के लक्षण पहले कहे जा चुके हैं ॥७८-७९॥

सम्यङ्निरूढमाश्वस्तं परिषिक्तं सुखाम्बुना ।
तनु वा(ना) भोजयेन्मात्रां जाङ्गलानां रसेन वा ॥८०॥

सम्यक् प्रकार से निरूह हो जाने पर रोगी को आश्वासन देकर तथा ईषदुष्ण जल से उसका परिषेचन करके उचित मात्रा में पतले जांगल मांसरस के द्वारा भोजन कराये। निरूहबस्ति में विरेचन के समान अग्नि मन्द नहीं होती है इसलिये इसमें पेयादि संसर्जन क्रम की विशेष आवश्यकता नहीं होती है। इसमें प्रारम्भ से ही जांगल मांसरस दिया जा सकता है। वमन, विरेचन के बाद पेयादि क्रम की आवश्यकता होती है क्योंकि उसमें रोगी की अग्नि मन्द हो जाती है ॥८०॥

'बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८] खिलस्थानम् ४३१

भुक्तवन्तं च तैलस्य प्रसृतेनानुवासयेत् । वायुः प्रशाम्यते तेन निरूहेण प्रचालितः ॥८१॥

जांगल मांसरस का भोजन करने के बाद उस व्यक्ति को एक प्रसृत तैल के द्वारा अनुवासन (स्नेहबस्ति) देनी चाहिये। इससे शरीर में निरूहबस्ति के द्वारा विचलित हुआ वायु शान्त हो जाता है। अर्थात् निरूह बस्ति के द्वारा शरीर में वायु विक्षुभित हो जाता है उसकी शान्ति के लिये अनुवासन (स्नेह) बस्ति का प्रयोग करना चाहिये ॥८१॥

आस्थापनो बस्तिरयं गुदनिर्वापणं नरः । एकान्तरं ततश्चोर्ध्वं यथोक्तमनुवासनम् ॥८२॥

आस्थापन (निरूह) बस्ति देकर एक अथवा एक से अधिक दिन के बाद रोगी की गुदा का निर्वापण करने वाला अनुवासन (स्नेह बस्ति) देना चाहिये। चरक सि. अ. १ में भी कहा है कि-निरूह के बाद यदि वायु अत्यन्त प्रबल हो तो तीसरे दिन अन्यथा पांचवें दिन अनुवासन देना चाहिये। यदि रोगी की अग्नि मन्द न हो तो उसी दिन भी अनुवासन कराया जा सकता है ॥८२॥

दीप्ताग्नेर्दृढदेहस्य सोदावर्ते विमार्गगे । श्रोणिवङ्क्षणसंस्थे च वाते शस्तं दिने दिने ॥८३॥

प्रतिदिन अनुवासन किसे देना चाहिये ?—जिस व्यक्ति की जाठराग्नि प्रदीप्त हो, शरीर दृढ हो, उदावर्त्त हुआ हो, वायु विपरीत मार्ग में गया हुआ हो अथवा श्रोणि तथा वंक्षण (groin) में स्थित हो तो उसे प्रतिदिन अनुवासन दिया जा सकता है। अष्टाङ्गसंग्रह सू. अ. २८ में कहा है कि-जिनकी अग्नि प्रदीप्त हो, जो रूक्ष हों, वायु की प्रधानता हो तथा नित्य व्यायाम करते हों उन्हें प्रतिदिन अनुवासन कराया जा सकता है। अन्यथा तीसरे या पांचवें दिन कराना चाहिये ॥

तस्य पक्वाशयगतः स्नेहमात्रां प्रभञ्जनः । बलवान् बलवत्यग्नौ वारिवत् स विशोधयेत् ॥८४॥

उस रोगी के पक्वाशय में स्थित वायु यदि बलवान् हो तथा उसकी जाठराग्नि भी बलवान् हो तो उसे मात्रा में स्नेह देना चाहिये। वह स्नेह उस वायु का पानी की तरह शोधन कर देता है अर्थात् जिस प्रकार पानी वायु का शोधन कर देता है उसी प्रकार स्नेह (तैल) भी वायु का शोधन कर देता है। पानी के अन्दर से यदि वायु छनकर गुजरे तो उसकी सब अशुद्धियां पानी अपने में जज्ब (Absorb) कर लेता है उसी प्रकार तैल में भी यही गुण विद्यमान है ॥८४॥

न च तैलात् परं किञ्चिद्द्रव्यमस्त्यनिलापहम् ।
स्नेहाद्रौक्ष्यं गुरुत्वाच्च लघुत्वं मारुतस्य तु ॥८५॥
औष्ण्याच्छैत्यं निहन्त्याशु तैलं पुष्टिं करोति च ।
मनःप्रसादः(दं) स्नेहं च बलवर्णमथापि च ॥८६॥

अनुवासन के गुण—तैल से बढ़कर वायु (वातप्रकोप अथवा वायु के रोग) को नष्ट करने वाला कोई द्रव्य नहीं है। इसी प्रकार चरक सि. अ. १ में कहा है। तैल के गुण—तैल स्नेह होने से वायु की रूक्षता, गुरु होने से वायु की लघुता तथा उष्ण होने से वायु की शीतलता का शीघ्र ही नाश करके शरीर की पुष्टि, मन की प्रसन्नता तथा बल और वर्ण की वृद्धि करता है। इसी प्रकार चरक सि. अ. १ में कहा है ॥८५-८६॥

स्यात् स्निग्धविटपस्कन्धः कोमलाङ्कुरपल्लवः । मूले सिक्तो यथा वृक्षः काले पुष्पफलप्रदः ॥८७॥
स्नेहबस्तेर्नरस्तद्वद् दृढकायो दृढप्रजः । वातात्मकैर्विकारैश्च पूर्वोक्तैर्नाभिभूयते ॥८८॥

जिस प्रकार जड़ को सींचने से वृक्ष की शाखायें तथा तना स्निग्ध (गीला-हरा) रहता है, उसमें कोमल अङ्कुर तथा नवीन पत्ते आने लगते हैं और उचित समय पर वह फूलों तथा फलों से युक्त हो जाता है। उसी प्रकार स्नेहबस्ति (अनुवासन बस्ति) के द्वारा मनुष्य दृढ शरीर तथा हृष्ट-पुष्ट सन्तान वाला हो जाता है तथा पूर्वोक्त वातविकारों के द्वारा वह आक्रान्त नहीं होता है। इसी प्रकार चरक सि. अ. १ में भी कहा है ॥८७-८८॥

५० का.सं.

४३२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८]

पञ्चमूलाढकेऽध्यर्धं फलानामाढकं भवेत् । यवकोलकुलत्थानां कुडवः स्युस्त्रयः पृथक् ॥८९॥
चतुर्भागावशिष्टं तु पश्चादष्टगुणे जले । मस्तुनेश्राढकेनैतत्तैलप्रस्थं विपाचयेत् ॥९०॥
कुष्ठस्य शतपुष्पाया वचाया मधुकस्य च ।
कुटजस्य च बीजानां बीजानां मदनस्य च ॥९१॥
यवान्याः पिप्पलीनां च हरेण्वा देवदारुणः ।
बिल्वस्य देवपुष्पस्य रास्नाया मुस्तकस्य च ॥९२॥
सूक्ष्मैलायाः प्रियङ्गवाश्च भागैरक्षसमैः पृथक् ।
सिद्धं सुलवणं पूतं निदध्याद्भाजने शुचौ ॥९३॥
एतन्मन्दनिरूढानां बस्तिव्यापत्सु चोत्तमम् । फलतैलमिति ख्यातमुदावर्तनिवर्तनम् ॥९४॥
तथैवोदरिणां सिद्धं गुल्मिनां क्रिमिकोष्ठिनाम् । पृष्ठश्रोण्यरुजङ्घासु वातेष्वप्रगुणेषु च ॥८५॥
निरूहसाध्या ये केचिद्विकाराः समुदाहृताः । ताञ्जयेद्बस्तिनाऽनेन मूत्राघातांश्च नाशयेत् ॥९६॥

फल तैल का निर्माण तथा उपयोग— लघुपञ्चमूल १ आढक (२५६ तोले), मदनफल १-१/२ आढक (३८४ तोले), यव, कोल (बेर) तथा कुलत्थ—पृथक् २ तीन कुडव (१६×३=४८ तोले)—इन्हें अष्टगुण जल में पकाकर चतुर्थांश शेष रखें। इसमें १ आढक दधिमस्तु (दही के ऊपर का पानी) तथा एक प्रस्थ (६४ तोले) तिल तैल डालें। इसमें कुष्ठ, सौंफ, वच, मुलहठी, कुटज के बीज (इन्द्रजौ), मैनफल के बीज, अजवायन, पिप्पली, हरेणु, देवदारु, बिल्व, लौंग, रास्ना, नागरमोथा, छोटी इलायची तथा प्रियङ्गु—सब पृथक् २ एक २ अक्ष (एक २ तोला) डालकर तैल सिद्ध करके इसमें बारीक पीसकर छना हुआ नमक डालकर साफ बर्तन में रख दें। यह फल तैल कहलाता है। यह तैल जिन्हें ठीक प्रकार से निरूह बस्ति नहीं दी गई हो, जिन्हें बस्ति के कारण उपद्रव हो गये हों तथा उदावर्त रोगों को नष्ट करने में उत्तम मानी गई है। इसी प्रकार उदररोगी, गुल्मरोगी, जिनके पेट में कृमिरोग हो, पृष्ठ, श्रोणि, ऊरु तथा जङ्घाओं में यदि वायु प्रकुपित हुआ हो, निरूहसाध्य (निरूह के द्वारा अच्छे होने वाले विकार तथा मूत्राघात आदि रोगों का उपर्युक्त बस्ति (स्नेहबस्ति) के द्वारा शमन करे ॥८९-९६॥

एरण्डमूलत्रिफलाबलारास्नापुनर्नवाः । गुडूच्यारग्वधो दारु पलाशो मदनं फलम् ॥९७॥
मूलं तुरङ्गगन्धायाः पञ्चमूलं कनीयसम् । पलप्रमाणान्येतानि जलद्रोणे विपाचयेत् ॥९८॥
अष्टभागावशेषं तं परिपूतं समाहरेत् । कर्षप्रमाणान्येतानि श्लक्ष्णपेष्याणि कारयेत् ॥९९॥
शताह्वा मधुकं मुस्ता प्रियङ्गुर्हपुषा वचा । रसाञ्जनं तार्क्ष्यशैलं पिप्पल्यः कौटजं फलम् ॥१००॥
खजेन मथितः कोष्णः सतैलमधुसैन्धवः । समुद्रमांसरसन्यूहो निरूहः साधुयोजितः ॥१०१॥
लेखनो दीपनो बल्यो ग्रहण्यर्शोविकारनुत् । पार्श्वपृष्ठकटीशूलं पार्श्वजङ्घोरुजा रुजः ॥१०२॥
एरण्डबस्तिः शमयेन्मारुतं च कफावृतम् । युक्तमात्रोष्णलवणः स्नेहबस्तिर्विधीयते ॥१०३॥

एरण्डबस्ति का निर्माण तथा प्रयोग— एरण्डमूल, त्रिफला, बला, रास्ना, पुनर्नवा, गिलोय, अमलतास, देवदारु, ढाक, मैनफल, अश्वगन्धा की जड़, लघु पञ्चमूल सब १ पल (४ तो.)। इन्हें १ द्रोण जल में पकाये। अष्टमांश शेष रहने पर उतार कर छान लें। इसमें—सौंफ, मुलहठी, नागरमोथा, प्रियङ्गु, हाऊबेर, बच, तार्क्ष्य पर्वत पर उत्पन्न होने वाला रसाञ्जन (रसौंत), पिप्पली, कुटजबीज (इन्द्रजौ) सब द्रव्य एक कर्ष प्रमाण में लेकर उनका सूक्ष्म चूर्ण करके इसमें डालकर खोंचे से मथ दें। इसमें गर्म में ही तिलतैल, मधु, सैन्धवनमक, गोमूत्र तथा मांसरस अच्छी प्रकार मिलाकर निर्यूह तैयार करे। यह एरण्डबस्ति शरीर का लेखन करती है, अग्निदीपक तथा बल्य है और ग्रहणी, अर्शरोग, पार्श्वशूल, पृष्ठशूल,

बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८]खिलस्थानम्४३३

कटीशूल एवं पार्श्व, जङ्घा और ऊरु में वेदना को नष्ट करती है। इसी स्नेहबस्ति को यदि योग्य मात्रा में उष्ण कर लिया जाय तथा उसमें नमक मिला दिया जाय तो यह कफावृत वायुरोग को नष्ट करती है॥९७-१०३॥

समासतः स द्विविधस्तस्य मात्रा प्रचक्ष्यते । प्रकुञ्चः कन्यसी मात्रा, ततोऽध्यर्धा तु मध्यमा ॥१०४॥
(इति ताडपत्रपुस्तके २१९ तमं पत्रम्)।

उत्तमा द्विपला मात्रा मात्राबस्तौ तु भार्गव ! । अपस्त¹नस्यार्धपलं (लाऽ) परिहार्या निरत्यया ॥१०५॥

संक्षेप से यह स्नेहबस्ति दो प्रकार की होती है। उसकी माता का वर्णन किया जाता है। हे भार्गव (भृगुकुलोत्पन्न जीवक) ! मात्राबस्ति में ह्रस्व मात्रा एक प्रकुञ्च, मध्यम मात्रा डेढ़ प्रकुञ्च तथा उत्तम मात्रा दो पल होती है। दूध न पीने वाले बालक के लिये यह आधा पल होती है। इसका निःशंक होकर सब अवस्थाओं में प्रयोग किया जा सकता है। इसमें किसी प्रकार के उपद्रव की आशंका नहीं होती है। चरक सि. अ. ४ में स्नेह की सबसे ह्रस्व मात्रा के समान मात्राबस्ति बताई है। चरक में ६ घण्टे में जीर्ण होने वाली मात्रा को स्नेह की सबसे छोटी मात्रा बताई है। इसके अतिरिक्त कहीं २ डेढ़ पल को स्नेह की ह्रस्व मात्रा बताया है। सुश्रुत चि. अ. ३५ में कहा है—‘तस्यापि विकल्पोऽधर्धमात्रावकृष्टोऽपरिहार्यो मात्राबस्तिः’। यहां ६ पल स्नेह की मात्रा वाली बस्ति को स्नेहबस्ति, ३ पल की मात्रा वाली स्नेहबस्ति को अनुवासन तथा डेढ़ पल की मात्रा वाली स्नेहबस्ति को मात्राबस्ति कहते हैं। इसी मात्राबस्ति की ओर यहां संकेत किया गया है। मात्राबस्ति का प्रयोग चरक सि. अ. ४ में निम्न अवस्थाओं में दिया है—कर्मव्यायामभाराध्वयानस्त्रीकर्षितेषु च। दुर्बले वातभग्ने च मात्राबस्तिः सदा मतः ॥१०४-१०५॥

कर्षत्रयं त्रिवर्षस्य, चतुर्वर्षस्य वै पलम् । षड्वर्षस्य तु बालस्य स्व एव प्रसृतः स्मृतः ॥१०६॥
द्वौ द्वौ द्वादशवर्षाणां चत्वारः प्रसृतास्तथा । देयाः षोडशकादीनां पूर्वाह्ने वाऽन्तरेषु च ॥१०७॥
यावन्मध्यं वयो, वार्धे त्वपकर्षेद्यथाक्रमम् । समीक्ष्य देहदोषाग्निबलं प्रकृतिमेव च ॥१०८॥

स्नेहबस्ति तथा निरूहबस्ति की मात्रा—तीन वर्ष तक के बालक के लिये स्नेहबस्ति की मात्रा ३ कर्ष (३ तोला) होती है। चार वर्ष के बालक के लिये एक पल (४ तोला), छै वर्ष के बालक के लिये १ प्रसृत (८ तोला), बारह वर्ष के बालकों के लिये दो २ प्रसृत (१६ तोला) तथा सोलह वर्ष से लेकर मध्य अवस्था तक पूर्वाह्न तथा उसके बीच २ में ४ प्रसृत (३२ तोला) मात्रा देनी चाहिये। वृद्धावस्था में फिर रोगी के शरीर, दोष, अग्निबल तथा प्रकृति को देखकर इस मात्रा को यथाक्रम कम करे। अर्थात् जिस क्रम से वृद्धि की गई है उसी क्रम से मात्रा में कमी करनी चाहिये। बस्ति में जो स्नेह की मात्रा कही गई है, निरूह की मात्रा उससे तिगुनी होती है। चरक वि. अ. ८ में वय (अवस्था–उम्र) को निम्न तीन विभागों में विभक्त किया गया है—१. बाल्यावस्था २. मध्यमावस्था ३. वृद्धावस्था। तीस वर्ष तक बाल्यावस्था मानी गई है। ६० वर्ष तक मध्यम अवस्था तथा उसके बाद १० वर्ष तक (आयु पर्यन्त) वृद्धावस्था मानी गई है। अवस्था के अनुसार चरक सि. अ. ३ में निरूह की मात्रा इस प्रकार से दी है—प्रथम वर्ष में निरूह की मात्रा आधा प्रसृत (१ पल) होती है तदनन्तर १२ वर्ष तक प्रतिवर्ष आधा प्रसृत बढ़ती जाती है जिससे १२ वर्ष बालक के लिये ६ प्रसृत (१२ पल) मात्रा हो जाती है। इसके बाद प्रतिवर्ष १ प्रसृत मात्रा बढ़ाई जाती है जिससे १८ वर्ष की अवस्था में १२ प्रसृत (२४ पल) मात्रा हो जाती है। ७० वर्ष तक की आयु में यही मात्रा (१२ प्रसृत या २४ पल) अभीष्ट है अर्थात् इससे अधिक मात्रा नहीं दी जाती है। इसके बाद अर्थात् वृद्धावस्था १६ वर्ष के बालक के समान अर्थात् १० प्रसृत मात्रा निरूह की होती है ॥१०६-१०८॥


१. अस्तनन्यस्य बालस्येत्यर्थः ।

४३४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्रक्तगुल्मविनिश्चयाध्यायः ९]

स्नेहप्रमाणं यद्बस्तौ निरूहस्त्रिगुणस्ततः । अतिव्यवायव्यायामपानयानाध्वसङ्गिनः ।। १०९ ।।
वयस्थाः स्नेहसात्म्याश्च येषां चाग्निबलं दृढम् ।
येषां चाधः प्रकुपितो वायुर्वातात्मकाश्च ये ।। ११० ।।
तेषूत्तमां प्रणिदधेत् स्नेहमात्रां विचक्षणः । य एभ्यो मध्यमावस्थाः पुरुषास्तेषु मध्यमाम् ।। १११ ।।
वयोव्याधिबलावेक्षामितरामितरेषु च । इति कर्मादिबस्तीनां त्रितयं समुदाहृतम् ।। ११२ ।।

स्नेह की उत्तम मात्रा किन्हें देनी चाहिये ? —जो अत्यन्त मैथुन, व्यायाम, मद्यपान, यान (सवारी) तथा मार्गगमन करते हों, जिनकी आयु स्थिर हो, जिन्हें स्नेह सात्म्य हुआ हो, जिनकी जाठराग्नि दृढ़ हो, जिनके शरीर के अधोभाग में वायु का प्रकोप हो, जिनकी वातिक प्रकृति हो अथवा जिन्हें वायु के विकार हों—उनमें बुद्धिमान व्यक्ति को स्नेह की उत्तम मात्रा देनी चाहिये । जो पुरुष उपर्युक्त सब दृष्टियों से मध्यम अवस्था वाले हैं—उन्हें स्नेह की मध्यम मात्रा देनी चाहिये । जो व्यक्ति अवस्था, रोग तथा बल की दृष्टि से निकृष्ट (हीन) हैं—उनमें स्नेह की हीन मात्रा देनी चाहिये ।

इस प्रकार कर्म आदि (कर्म, काल, योग) तीनों बस्तियों का वर्णन किया गया है ।। १०९-११२ ।।

निर्देशश्च विकल्पश्च प्रविभागश्च कात्स्न्र्यतः ।
यच्च यस्मिन् विधातव्यं या मात्रा येषु युज्यते ।। ११३ ।।
निरूहयुक्तिः स्नेहश्च निरूहश्च प्रकीर्तितः । इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। ११४ ।। अड(१११)
इति खिलेषु बस्तिविशेषणीयो (नामाष्टमोऽध्यायः ।। ८ ।।) उ (८)


इन सम्पूर्ण बस्तियों का पूर्णरूप से निर्देश, विकल्प (भेद) तथा विभाग कहे गये हैं । जिस बस्ति का जिस रोग तथा जिस मात्रा में व्यवहार करना चाहिये वह भी कह दिया गया है । निरूहबस्ति की योजना, स्नेह तथा निरूह इन सबका वर्णन कर दिया गया है । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।। ११३-११४ ।।

अड (१११)
इति खिलेषु बस्तिविशेषणीयो (नामाष्टमोऽध्यायः ।। ८ ।।) उ (८)


अथ रक्तगुल्मविनिश्चयाध्यायो नवमः ।

अथातो रक्तगुल्मविनिश्चयमध्यायं व्याख्यास्यामः ।। १ ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। २ ।।

अब हम रक्तगुल्म विनिश्चय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।। १-२ ।।

भगवन्तमृषिश्रेष्ठं सर्वशास्त्रविदां वरम् । कश्यपं भार्गवो धीमान् पर्यपृच्छत् प्रजापतिम् ।। ३ ।।

ऐश्वर्ययुक्त, सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञाता तथा ऋषियों में श्रेष्ठ प्रजापति कश्यप से बुद्धिमान भार्गव (भृगुकुलोत्पन्न जीवक) ने प्रश्न किया ।। ३ ।।

रक्तगुल्मविनिश्चयाध्यायः ९] खिलस्थानम् ४३५

रक्तगुल्मः कथं स्त्रीणां जायते दुरुपद्रवः ।
अथ कस्मात् कुमाराणां कन्यानां च न जायते ॥४॥
रक्तगुल्मः कथं चासौ रक्तगुल्म इति स्मृतः । कस्मान्निश्चेतनत्वेऽपि गर्भचेष्टा विचेष्टते ॥५॥
दूरान्तरं न त्वनयोश्चेतनाचेतनावतोः । विप्रकृष्टान्तरेऽप्यस्मिन् गर्भशोणितगुल्मयोः ॥६॥
केचिद्विशेषं नेच्छन्ति केचिदिच्छन्ति लिङ्गतः । तयोर्विशेषो यद्यस्ति किमर्थं स उपेक्ष्यते ॥७॥
युक्तो गर्भे दोहदस्य क्षीरस्य च समुद्भवः । आपाण्डुगण्डतादीनां लिङ्गानां च समुद्भवः ॥८॥
न युक्तमिव पश्यामि तस्मिन्नेषां समुद्भवम् ।
रक्तगुल्मेऽथ दृश्यन्ते लिङ्गान्येतानि तत् कथम् ॥९॥
कस्मादादशमान्मासात् परिपाकं नियच्छति । एकद्वित्रिचतुष्पञ्च षट्सप्ताष्टनवादिषु ॥१०॥
मासेषु भेदं नाप्नोति प्रायो गर्भउदास्थितः । नारीणां सुकुमारीणां स कष्ट इति मे मतिः ॥११॥
उपक्रम्यः कथमयं कश्चास्योपक्रमः स्मृतः । कस्यां कस्यामवस्थायां का का वाऽस्यावचारणा ॥१२॥
कस्मिन् काले च निर्भेद्यो भेदनीयं च किं भवेत् ।
विनिर्भिन्ने च किं कार्यमेतदाचक्ष्व मे विभो ! ॥१३॥

स्त्रियों को भयंकर उपद्रवों वाला रक्तगुल्म किस प्रकार हो जाता है तथा वह बालकों और बालिकाओं को क्यों नहीं होता है ? रक्तगुल्म को इस (रक्तगुल्म) नाम से क्यों कहा जाता है ? तथा अचेतन होने पर भी इसमें गर्भ (के समान) चेष्टाएँ क्यों होती हैं ? इन चेतन तथा अचेतन गर्भ और रक्तगुल्म में थोड़ा भेद होने पर भी अधिक भेद नहीं होता है । कुछ लोग इन दोनों में अन्तर (भेद) नहीं करते हैं । कुछ लोग इनमें लक्षणों के द्वारा भेद करते हैं । यदि उन दोनों में भेद है तो उसकी उपेक्षा क्यों की जाती है ? इसमें गर्भ में होनेवाले दोहद (गर्भावस्था में उत्पन्न होनेवाली विशेष इच्छायें), स्तनों में दुग्ध की उत्पत्ति तथा गाल आदि का पाण्डु (रक्तहीनता-(Anarmia) आदि लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं । रक्तगुल्म में जब ये लक्षण उत्पन्न नहीं होने चाहिये तब ये उसमें दिखाई क्यों देते हैं ? यह दसवें महीने तक परिपाक को क्यों प्राप्त होता चला जाता है ? पहले, दूसरे, तीसरे, चौथे, पांचवें, छठे, सातवें, आठवें तथा नौवें महीनों में इसका भेदन क्यों नहीं होता है ? तथा यह प्रायः गर्भ की तरह स्थित क्यों रहता है ? सुकुमार स्त्रियों में यह अधिक कष्टदायक होता है । इसकी किस प्रकार चिकित्सा करनी चाहिये तथा वह चिकित्सा कौन सी है ? किस २ अवस्था में इसकी कौन २ सी अवचारणा प्रयुक्त होती है ? किस समय इसका भेदन करना चाहिये तथा भेदनीय द्रव्य क्या होता है ? तथा भेदन करने के बाद क्या करना चाहिये ? हे सर्वव्यापक भगवन् ! मुझे इन सब बातों का उत्तर दीजिये ॥४-१३॥

इति पृष्टः स शिष्येण प्रोवाच वदतां वरः । रक्तगुल्मस्तु नारीणां जायते येन हेतुना ॥१४॥
येन चैव कुमाराणां कन्यानां च न जायते ।
तत् सर्वमभिधास्यामि विस्तरेण निबोध मे ॥१५॥

इस प्रकार शिष्य द्वारा प्रश्न किये जाने पर ज्ञानी कश्यप ने कहा है कि जिस प्रकार से स्त्रियों को रक्तगुल्म होता है, तथा जिस कारण से यह बालकों तथा.कन्याओं को नहीं होता है—उन सबका मैं विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा वह तू मेरे से सुन ॥

विण्मूत्रकृमिपक्ववामकफवाताशयाः पृथक् । सप्तैते देहिनां कोष्ठे स्त्रीणां गर्भाशयोऽष्टमः ॥१६॥

सब प्राणियों के कोष्ठ में मल, मूत्र, कृमि, पक्व, आम, कफ तथा वायु के पृथक् २ सात आशय होते हैं । इनके अतिरिक्त स्त्रियों में एक आठवां गर्भाशय होता है । जिसमें रजोवहा सिराएँ रज को लाकर डालती हैं । अर्थात् उपर्युक्त

४३६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रक्तगुल्मविनिश्चयाध्यायः ९]

मल-मूत्र के सात आशय तो सभी प्राणियों में (चाहे वह स्त्री हो या पुरुष) सामान्य रूप से होते हैं। इनके अतिरिक्त स्त्रियों में आठवां गर्भाशय होता है जो केवल स्त्रियों में ही होता है, पुरुषों में नहीं। आशय का अर्थ अधिष्ठान है। सुश्रुत शा. अ. ५ में आशयों का परिगणन निम्न प्रकार से किया गया है—आशायास्तु—वाताशयः पित्ताशयः श्लेष्माश्यो रक्ताशय आमाशयः पक्वाशयो मूत्राशयः, स्त्रीणां गर्भाशयोऽष्टम इति' । गर्भाशय की शरीर में स्थिति के विषय में वाग्भट में कहा है—'गर्भाशयोऽष्टमः स्त्रीणां पित्तपक्वाशयान्तरा' । अर्थात् पित्ताशय और पक्वाशय के बीच में गर्भाशय होता है ।।१६।।

रजोवहाः सिरा यस्मिन् रजः प्रविसृजन्त्यतः । पुष्पभूतं हि तद्वैवान्मासि मासि प्रवर्त्तते विपर्ययात्तदेवैह तत्रैव तु निचीयते ।।१७।।

वही रज पुष्प (आर्तव-Monthly discharge) के रूप में दैववश प्रत्येक मास में प्रवृत्त होता है-निकलता रहता है। तथा यदि रोग या किसी अन्य कारण से प्रवृत्त न हो सके तो वह रज वहीं गर्भाशय में ही संचित होता रहता है ।।१७।।

अनेन हेतुना स्त्रीणां रक्तगुल्मो हि जायते । तदाशयस्य चाभावात् पुरुषाणां च जायते ।।१८।।

इस उपर्युक्त कारण से स्त्रियों को रक्तगुल्म होता है। इसके विपरीत आशय (गर्भाशय) के अभाव के कारण यह रक्तगुल्म पुरुषों में नहीं होता है ।।१८।।

हीनयोन्यास्तु बालायाः कायं गच्छति शोणितम् । अथ पूर्णस्वभावायाः कायं योनि च गच्छति ।।१९।।

छोटी लड़कियों की योनि स्वल्प होने के कारण उनका सारा रक्त शरीर में चला जाता है। तथा जिस स्त्री के शारीरिक अवयव पूर्ण हो चुके हैं—उनका रक्त शरीर तथा योनि दोनों में जाता है अर्थात् कुछ रक्त जहाँ शरीर के पोषण में व्यय होता है वहां कुछ योनि में भी जाता है ।।१९।।

गर्भमङ्गे भावयति, किञ्चित् स्तन्याय कल्पते । पक्तये शोणिताद्य(दे)स्तु शेषः कायं समिन्ध्यति ।।२०।।

स्त्री के शरीर के रक्त का कुछ भाग गर्भ को पुष्ट करता है, कुछ स्तन्य (दूध) का निर्माण करता है तथा कुछ रक्त से शरीर में पाचन होता है। शेष—इन सबसे बचा हुआ रक्त शरीर में ईंधन का कार्य करता है। अर्थात् स्त्री के शरीर के रक्त के कुछ भाग के गर्भ का पोषण होता है, कुछ से उसके स्तनों में दूध का निर्माण होता है, कुछ शरीर के अन्दर पाचन का कार्य करता है तथा इन कार्यों के बाद बचा हुआ रक्त शरीर का पोषण करता है। इस संहिता के सूत्रस्थान के उपलब्ध प्रथम अध्याय में भी कहा है—मातृपुष्ट्यर्थमेकांशो द्वितीयो गर्भपुष्टये। तृतीयः स्तनपुष्ट्यर्थं नार्या गर्भस्तु पुष्यति ।।२०।।

तथैव गर्भः सूतायाः सद्यः स्तन्याय कल्पते । शेषं तु रुधिरीभूतं कायं योनिं च सर्पति ।।२१।।

इसीप्रकार गर्भ का कुछ अंश प्रसव के बाद शीघ्र ही दुग्ध का निर्माण करने लगता है। तथा शेष रक्त के रूप में शरीर तथा योनि में फैल जाता है ।।२१।।

धातुषु प्रतिपूर्णेषु शरीरे समवस्थिते । संचितं रुधिरं योनिः पुनः कालेन मुञ्चति ।।२२।।

तब धातुओं के रक्त से पूर्ण हो जाने तथा शरीर के समावस्था में स्थित होने पर संचित हुआ रक्त पुनः उचित काल में योनि को छोड़ देता है अर्थात् योनि से प्रवृत्त होने लगता है।

यदा रक्तवहा रक्तं प्रदोषात्रानुपद्यते । विमार्गाद्योनिमन्वेति(विकृति) स्तेन जायते ।।२३।। तथैव रक्तगुल्मोऽपि हेतुनाऽनेन जायते ।

रक्तगुल्मविनिश्चयाध्यायः ९] खिलस्थानम् ४३७

जब दोषों के कारण वह रक्त रक्तवहा सिराओं में नहीं पहुंचता है तब वह विपरीत मार्ग में जाने से पुनः योनि में पहुंच जाता है जिससे विकार उत्पन्न हो जाते हैं। इसी प्रकार उपर्युक्त कारण से रक्तगुल्म भी हो जाता है॥२३॥

यदा ऋतुमती नारी प्राप्तान् वेगान् विधारयेत् ॥२४॥
ह्रिया त्रासाद्द्यवायाद्वा वर्तमानानधोगतान् । एवमादिभिरप्यन्यैरुदावृत्तः प्रकोपितः ॥२५॥
वायुः शोणितमादाय प्रतिस्रोतः प्रपद्यते । गर्भाशयमुदावृत्तस्तस्या वहति शोणितम् ॥२६॥
मारुतश्च्युतगर्भाया यदा मिथ्योपचर्यते । तस्याः स वायुरुद्धतः प्रतिघातात् सशोणितः ॥२७॥
गत्वा गर्भाशयं रुद्धः स्थिरत्वमुपपद्यते । संवृत्तं शोणितं तत्र मारुतो विषमं गतः ॥२८॥
रजोवहाः समावृत्तः संस्तम्भयति गर्भवत् ।

जब ऋतुकाल में स्त्री लज्जा, भय अथवा मैथुन के कारण शरीर के अधो भाग में प्राप्त हुए वेगों को रोकती है। उपर्युक्त अथवा उदीर्ण हुए अन्य कारणों से प्रकुपित हुआ वायु उस रक्त को लेकर स्रोतों में पहुंचता है। गर्भाशय में पहुंचने पर वह रक्त बढ़ने लगता है अथवा जिसकां सद्यः गर्भपात हुआ हो उस स्त्री का वायु मिथ्योपचार के कारण प्रकुपित हो जाता है। उसका वह प्रकुपित हुआ वायु रक्तरहित गर्भाशय में पहुंच कर रुककर वहां स्थिर हो जाता है। वह रुका हुआ रक्त तथा विषम (प्रकुपित) हुआ वायु रजोवहा सिराओं को घेरकर गर्भ के समान स्थित हो जाता है। अर्थात् जिस प्रकार गर्भ स्थित होता है उसी प्रकार यह स्थित हो जाता है। इसी संहिता के चिकित्सा स्थान (गुल्मचिकित्साध्याय) में रक्तगुल्म की सम्प्राप्ति तथा निदान निम्न रूप से दिया है—रक्तगुल्मः स्त्रिया योनौ जायते न नृणां क्वचित् । .....गर्भिण्यस्मीति मन्यते ॥ (पृ. ११२ देखें) इसी प्रकार चरक नि. अ. ३ में भी कहा है॥२४-२८॥

स गुल्मः स्पन्दतेऽभीक्ष्णं मारुतेन समीरितः ॥२९॥
दर्शयन् यानि रूपाणि तानि वक्ष्यामि सर्वशः ।

वायु के द्वारा प्रेरित हुआ वह गुल्म निरन्तर स्पन्दन करता रहता है। उसके जो स्वरूप (लक्षण) दिखाई देते हैं उन्हें मैं विस्तारपूर्वक कहूंगा॥२९॥

कासते शूल्यते चैव ज्वर्यतेऽथातिसार्यते ॥३०॥
मन्यते सर्वगात्राणि मूर्च्छितानि गुरूणि च । तमोऽस्या जायतेऽभीक्ष्णं कार्श्यं चैव निगच्छति ॥३१॥
वमत्यभीक्ष्णशो भुक्तमन्नं चास्यै न रोचते । जायन्ते चोदरे गण्डा नीलं चास्याः प्रदृश्यते ॥३२॥
स्तनान्तरं च नाभिश्च लोमराजी च मूर्च्छिता । ओष्ठौ च कृष्णौ भवतस्तथैव स्तनचूचुकौ ॥३३॥
पयोधरौ प्रसिच्येते दोहदं च निगच्छति ।
(इति ताडपत्रपुस्तके २२० तमं पत्रम्) ।

नानारसान् प्रार्थयते निष्ठीवति मुहुर्मुहुः ॥३४॥
शुभादुद्विजते गन्धाद्वर्णश्चास्याः प्रसीदति ।
गर्भिण्या यानि रूपाणि तानि संदृश्य तत्त्वतः ॥३५॥
वर्षाणि हरति व्याधिं गर्भोऽयमिति दुःखिता ।

रक्तगुल्म के लक्षण—उस स्त्री को कास, शूल, ज्वर तथा अतिसार हो जाता है। उसे अपना सम्पूर्ण शरीर मूर्च्छित तथा भारी प्रतीत होता है। उसे अपने सामने निरन्तर अन्धकार दिखाई देता है अथवा उसमें तमोगुण की वृद्धि हो जाती है, शरीर कृश हो जाता है, उसे निरन्तर वमन होता है (गर्भिणी स्त्री को प्रातः काल वमन—Morning sickness-

४३८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रक्तगुल्मविनिश्चयाध्यायः ९]

Hyperemesis grauidarum होती है, उसी के समान इसमें भी वमन होने लगती है), उसे खाया हुआ अन्न रुचिकर नहीं होता है, पेट में उसके गांठें हो जाती हैं तथा उसका शरीर नीला हो जाता है। उसके स्तनों का मध्यभाग, नाभि तथा लोमराजि मूर्च्छित सी दिखाई देती है। उसके होंठ तथा स्तनों के चूचक (Nipplies) काले पड़ जाते हैं, स्तनों से दूध बहने लगता है तथा उसे दोहद (विशेष प्रकार की इच्छाएँ जैसी गर्भावस्था में गर्भिणी को होती हैं) उत्पन्न होने लगती हैं, वह नानाप्रकार के अम्ल आदि रसों की इच्छा करती है, बार २ थूकती है, अच्छी गन्ध को वह पसन्द नहीं करती है, उसका वर्ण निखर आता है (निर्मल हो जाता है)-इत्यादि गर्भिणी के जो लक्षण होते हैं उन्हें देखकर इस व्याधि को अनेक वर्षों तक गर्भ समझ कर लोग दुःखी होते हैं। इसी संहिता के 'गुल्मचिकित्साध्याय' में इसके निम्न लक्षण दिये हैं—'स्तनमण्डलकृष्णत्वं ...... प्रचक्षते' (मूल पृ. ११३ देखें) चरक नि. अ. ३ में भी रक्तगुल्म में होने वाले गर्भ के लक्षणों को कहा है तथा सुश्रुत शा. अ. ३ में गर्भिणी के उन लक्षणों को कहा है जो कि रक्तगुल्म में होते हैं॥३०-३५॥

केनचित्त्वथ कालेन निर्भेदं यदि गच्छति ।। ३६ ।।

यदि किसी कारण से उस गुल्म का भेदन हो जाता है तो लोग उसे गुल्म से मुक्त हुई समझते हैं। अर्थात् यदि गुल्म किसी कारण से पककर फटजाये तो उसका स्राव बह जाता है जिससे लोग यह समझने लगते हैं कि उसका गुल्म नष्ट हो गया है। साधारणतया गुल्म पकता नहीं है इसीलिये फटता भी नहीं है। विद्रधि (Abscess) पककर फट जाती है। गुल्म तथा विद्रधि का भेद ही यह है कि गुल्म पकता नहीं है तथा विद्रधि पक जाती है ॥३६॥

ततो गुल्मप्रमुक्ता सा ज्ञातिमध्ये प्रभाषते । गर्भिण्यहं चिरं भूत्वा प्रच्युते गर्भशोणिते ।। ३७ ।।

जब वह स्त्री इसप्रकार चिरकाल तक गर्भिणी (गर्भिणी के लक्षणों से युक्त होने के कारण अपने आप को गर्भिणी समझने वाली) रहती है और उसके बाद गर्भस्थित शोणित (रक्तगुल्म का रक्त) निकल जाता है तब गर्भ के लक्षण दिखाई नहीं देते हैं। उस समय उसे बड़ा भारी सन्देह होने लगता है ॥३७॥

गर्भरूपं न पश्यामि तत्र मे संशयो महान् । तामिदं प्रतिभाषन्ते सर्वग्रामकुतूहलाम् ।। ३८ ।।
दिव्यो गर्भो व्यतिक्रान्तो नैगमेषेण ते हृतः । इत्येनामबुधाः प्राहुर्हृतं सर्वमशोभनम् ।। ३९ ।।

इस आश्चर्यजनक बात को देखकर अज्ञानी लोग उसे कहते हैं कि तेरे जो दिव्य गर्भ उत्पन्न हुआ था—नैगमेष ने उसका हरण करलिया है। जितनी अशुभ बातें थी उन सबका हरण हो गया है। तथा जो कुशल एवं ज्ञानी लोग हैं वे उसे परिप्लुत कहते हैं ॥३८-३९॥

परिप्लुत इति प्राहुः कुशला ये मनीषिणः । गुल्मश्चय इति प्रोक्तो रक्तं रुधिरमुच्यते ।। ४० ।।
रक्तस्य संचयस्तेन रक्तगुल्म इति स्मृतः । गर्भक्वच्चेष्टते नायं किन्तु सादृश्यदर्शनात् ।। ४१ ।।

गुल्म-चय या इकट्ठे होने को कहते हैं तथा रक्त का अर्थ रुधिर है। इसप्रकार रक्त का संचय होने से इसे रक्तगुल्म कहते हैं। यह गर्भ की तरह चेष्टा अवश्य करता है परन्तु केवल सादृश्य के कारण यह वास्तव में गर्भ नहीं होता है। चरक चि. अ. ३ में गर्भ से इसका निम्न भेद दिया है—"केवलश्चास्यागुल्मः पिण्डित एव स्पन्दते, तामगर्भा गर्भिणीमित्याहुर्मूढाः।" अर्थात् यदि रक्तगुल्म है तो वह सारा का सारा पिण्डाकृति गुल्म ही स्पन्दन करता है अर्थात् यह गर्भ की तरह ही स्पन्दन तो अवश्य करता है परन्तु यदि सम्यक् प्रकार से परीक्षा की जाये तो ज्ञात होगा कि यह केवल एक पिण्डाकृति वस्तु ही है। गर्भ के समान उसके अङ्गों का हम पृथक् २ स्पर्श या अनुभव नहीं कर सकते हैं। इसीलिये चरक चि. अ. ५ में बिलकुल स्पष्ट कहा है—यः स्पन्दते पिण्डित एव नाङ्गैश्चिरात्सशूलः सभगर्भलिङ्गः। अर्थात् गुल्म

रक्तगुल्मविनिश्चयाध्यायः ९] खिलस्थानम् ४३९

में स्पन्दन देर से भी होते हैं जब कि गर्भ के स्पन्दन तृतीय मास में होने लगते हैं तथा माता को चौथे-पांचवें मास में अनुभव होने लगते हैं ॥४०-४१॥

गर्भोऽयमिति मन्वाना मनसा तद्विभाविनी । नारी विचेष्टते तास्ता गर्भचेष्टाः पृथग्विधाः ॥४२॥

उक्त रक्तगुल्म को गर्भ समझती हुई तथा उसी का मन में ध्यान करती हुई वह स्त्री नाना प्रकार की गर्भ की चेष्टाओं को करती है ॥४२॥

दोहदं यत् करोतीति शृणु तत्रापि कारणम् । य एव हि रसाः प्रायो धातूनां वृद्धिहेतवः ॥४३॥ तेषामेवाभिलाषः स्याद्योनिसाधर्म्यतत्त्वतः । वातपित्तान्वितं रक्तं चीयमानं विकारवत् ॥४४॥ कट्वम्ललवणादीनां रसानां गृ¹द्धिमावहेत् ।

रक्तगुल्म में दोहद का कारण—उस समय स्त्री के जो दोहद (गर्भावस्था में उत्पन्न होने वाली विशेष इच्छाएं) के लक्षण उत्पन्न होते हैं—उसका कारण भी तू मेरे से सुन-जो रस धातुओं की वृद्धि करने वाले होते हैं, उत्पत्ति धर्म की समानता के कारण प्रायः उन्हीं रसों की ही स्त्री को उस समय इच्छा होती है । उदाहरण के लिये गुल्म में एकत्रित हुए विकार युक्त रक्त में यदि वायु तथा पित्त की प्रधानता हो तो उस स्त्री को कटु, अम्ल एवं लवण रस की इच्छा उत्पन्न होती है ॥४३-४४॥

गर्भिण्यस्मीति तत्प्रीतिप्रेमसंकल्पसंभूतः ॥४५॥ प्रस्रुतो जायते नार्यास्तेन स्तन्यं प्रवर्तते ।

रक्तगुल्म में स्तनों में दुग्ध उत्पत्ति का कारण—स्त्री अपने आपको गर्भिणी समझती है । इसलिये उस (कल्पित) गर्भ के प्रति प्रीति एवं प्रेम के संकल्प के कारण नारी में स्रावों की उत्पत्ति होती है इसीलिये स्त्री के स्तनों में दुग्ध का स्राव प्रारम्भ हो जाता है । दुग्ध उत्पत्ति का कारण शिशु के प्रति माता का प्रेम ही मुख्य कारण होता है । इसीलिये सुश्रुत में कहा भी है—“स्नेहो निरन्तरस्तस्य स्रवणे हेतुरुच्यते” । अर्थात् यदि माता में प्रेम (स्नेह) अथवा ममता की भावना न हो तो स्तनों में दुग्ध उत्पन्न ही नहीं होता अथवा बहुत कम होता है ॥४५॥

सर्वा रसवहा नाड्यः समन्तान्नाभिमाश्रिताः ॥४६॥ गर्भो विवर्धमानश्च संपीडयति ताः स्त्रियाः । तद्वच्च रक्तगुल्मोऽपि पीडयन्नुपचीयते ॥४७॥ ताभिश्च पीड्यमानाभिर्न सम्यग्वर्तते रसः । आपाण्डुगण्डतादीनि लक्षणानि भवन्त्यतः ॥४८॥

रक्तगुल्म में पाण्डुता आदि का कारण—सम्पूर्ण रसवहा नाडियां चारों ओर से आकर नाभि में आश्रित होती हैं, स्त्री में वृद्धि को प्राप्त होता हुआ गर्भ उन रसवहा नाडियों का पीडन करता है । उसीप्रकार रक्तगुल्म भी रसवहा नाडियों का पीडन करता हुआ वृद्धि को प्राप्त होता रहता है—बढ़ता रहता है । उन रसवहा सिराओं का पीडन होने से शरीर में रस ठीक प्रकार से नहीं पहुंचता है । इसीलिये सारे शरीर में पाण्डुता तथा गण्डता आदि के लक्षण हो जाते हैं ॥४६-४८॥

कथं प्रकर्षते कालमिति तत्रापि मे शृणु । विवृद्धेरिह सारूप्याद्गर्भोऽयमिति निश्चिता ॥४९॥ संरक्षेतेऽभिघातेभ्यः कुक्कुट्यण्डमिवाङ्गना । तदपायकरान् हेतून्न कथंचन सेवते ॥५०॥ श्रमोपवासतीक्ष्णोष्णाक्षारादीनि च सर्वशः । स एवं याप्यमानस्तु यथाकालं प्रकर्षते ॥५१॥ व्यापत्तिहेतुमासाद्य कालेनाल्पेन वा पुनः । भेदं गच्छत्यधस्ताद्धि जलकुम्भ इव क्षतः ॥५२॥


१. गृद्धिं गर्धामभिलाषमित्यर्थः ।

४४० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रक्तगुल्मविनिश्चयाध्यायः ९]

रक्तगुल्म की वृद्धि का कारण—समय के साथ २ वह रक्तगुल्म किस प्रकार बढ़ता जाता है। इसका भी तू मेरे से कारण सुन। वृद्धि की समानता के कारण उसे गर्भ समझकर वह स्त्री उसकी अभिघात आदि से इसप्रकार रक्षा करती है जैसे मुर्गी अभिघात आदि से अपने अण्डे की रक्षा करती है। वह उसे (रक्तगुल्म को जिसे वह गर्भ समझे हुए हैं) हानि पहुंचाने वाले कारणों, श्रम, उपवास, तीक्ष्ण, उष्ण एवं क्षारीय पदार्थों का कभी सेवन नहीं करती है। इसप्रकार रक्षा किया जाता हुआ वह (रक्तगुल्म) समय के अनुसार धीरे २ बढ़ता जाता है। तथा उपघातकर (हानि पहुंचाने वाले) कारणों के द्वारा कुछ काल के बाद नीचे से टूटे हुए जलकुम्भ (घड़े) के समान कभी २ उसका भेदन हो जाता है ॥४९-५२॥

केचिदिच्छन्ति गुल्मस्य मासादादशमात् परम्। परिपाकं फलस्येव स्वकालपरिणामतः ॥५३॥ तस्मिंश्च काले स व्याधिः स्यान्नातिदुरुपक्रमः। तत्रोपक्रममिच्छन्ति तस्य कर्तुमतो बुधाः ॥५४॥

कुछ लोग फल के समान गुल्म का अपने काल के परिणाम के अनुसार दसवें मास के बाद परिपाक मानते हैं। अर्थात् जिस प्रकार अपने समय के अनुसार फल का पाक होता है उसीप्रकार गुल्म का भी अपने काल के अनुसार दसवें मास के बाद परिपाक होता है। उससे पूर्व गुल्म का सम्यक् परिपाक नहीं हो पाता है। उस समय वह रोग (रक्तगुल्म) अधिक कष्टसाध्य नहीं होता है इसलिये विद्वान् लोग कहते हैं कि उस समय (अर्थात् दसवें मास के बाद) इस (रक्तगुल्म) की चिकित्सा करनी चाहिये। चरक चि. अ. ५ में भी कहा है—स रौधिरः स्त्रीभव एव गुल्मो मासि व्यतीते दशमे चिकित्स्यः। क्योंकि दसवें मास के बाद ही वह सुखसाध्य माना गया है। उस समय तक उसका पूर्णरूप से परिपाक हो जाता है। कहा भी है—रक्तगुल्मे पुराणत्वं सुखसाध्यस्य लक्षणम्। यह सुख साध्यता उसके परिपाक के काल के अनुसार ही कही गई है॥

अप्राप्तकालो याप्यः स्याद्गर्भद्व्यक्तिकौविदैः। नापक्वो भिद्यते व्याधिरिति मत्वा यथाभवम् ॥५५॥

रक्तगुल्म की चिकित्सा का जब तक काल उपस्थित न हो अर्थात् १० वें मास से पूर्व वह विद्वानों द्वारा गर्भ के समान याप्य माना गया है तथा पकने पर अर्थात् उसका सम्यक् परिपाक होने पर (दसवें मास के बाद) उसका भेदन हो जाता है—इत्यादि बातों को ध्यान में रखते हुए दसवें मास तक इसका यापन करना चाहिये। याप्य से अभिप्राय उस रोग या अवस्था से है जिसे चिकित्सा संभाले रखती है अर्थात् जब तक चिकित्सा होती रहती है रोगी ठीक रहता है तथा ज्यों ही चिकित्सा बन्द की जाती है रोगी की अवस्था खराब हो जाती है अथवा उसकी मृत्यु हो जाती है। रक्तगुल्म का ऊपर जो दसवें मास के बाद चिकित्सा करने का निर्देश किया गया है उसे देखकर कुछ लोग कहते हैं कि प्राचीन आचार्यों को गुल्म तथा गर्भ के भेद का ज्ञान नहीं था इसीलिये गर्भकाल (दसवां मास) व्यतीत होने पर चिकित्सा करने का विधान दिया है। परन्तु यह ठीक नहीं है। दसवें मास के बाद चिकित्सा का विधान केवल इसलिये दिया गया है कि तब वह सुख साध्य होता है—उस समय तक उसका सम्यक् परिपाक हो जाता है तथा इसी अध्याय में ५४ वें श्लोक में कहा है—'तस्मिंश्च काले सव्याधिः स्यान्नातिदुरुपक्रमः''। इसलिये यह कहना कि प्राचीन आचार्यों को इनके भेद का ज्ञान नहीं था—ठीक नहीं है। इसीलिये अगले श्लोकों में आचार्य स्वयं विस्तार से इनकी विभदक पहचान लिखते हैं ॥५५॥

विशेषं रक्तगुल्मस्य गर्भस्य च निबोध मे। अङ्गप्रत्यङ्गवान् गर्भस्तैरेव च विचेष्टते ॥५६॥ रक्तगुल्मस्तु वृत्तः स्याल्लोंष्टवच्च विचेष्टते। स्थानात् स्थानं व्रजन् गर्भो व्याविद्धं परिवर्तते ॥५७॥ नाभेरधस्ताद्गुल्मोऽयमव्याविद्धं विवर्तते। आनुपूर्व्येण गर्भश्च अह्न्यहनि वर्धते ॥५८॥ विपरीतं हि गुल्मस्तु मन्दं मन्दं विवर्धते। तां तामवस्थां गर्भस्तु मासि मासि प्रपद्यते ॥५९॥

रक्तगुल्मविनिश्चयाध्यायः ९] | खिलस्थानम् | ४४१

गर्भिणी नानिमित्तं च ज्वर्यते दह्यतेऽपि वा।
गुल्मिनी ह्यनिमित्तं तु ज्वर्यते दह्यतेऽपि वा।।६०।।

अब तू मेरे से रक्तगुल्म तथा गर्भ का भेद (Differential diagnosis) सुन-गर्भ तथा रक्तगुल्म में भेद-१. गर्भ अङ्गप्रत्यङ्गों से युक्त हुआ उन्हीं के द्वारा चेष्टा करता है तथा रक्तगुल्म एक गोल ढेले या मांस की लोथ के समान चेष्टा करता है। अर्थात् गर्भ के तीसरे या चौथे मास में हाथ-पैर आदि की पिण्डिकायें प्रकट हो जाती हैं अतः यदि उसके बाद के महीनों में अर्थात् चतुर्थ या पंचम आदि मासों में हम माता के पेट की स्पर्श आदि के द्वारा परीक्षा करें तो हमें गर्भ के हाथ-पैर आदि की पिण्डिकाओं तथा समयानुसार अन्य भी अङ्गप्रत्यङ्गों का अनुभव हो सकता है। जब कि रक्तगुल्म में भी गुल्म के इधर-उधर हिलने से चेष्टाएं तो अवश्य ही होती हैं परन्तु उसमें हाथ-पैर आदि के पृथक् अनुभव नहीं होते हैं अपितु अङ्ग-प्रत्यङ्गों से रहित केवल एक मांस के लोथड़े मात्र का ही अनुभव होता है। इसीलिये चरक चि. अ. ५ में कहा है—'यः स्पन्दते पिण्डित एव नाङ्गैः'। इसी प्रकार चरक नि. अ. ३ में भी कहा है। २. गर्भ एक स्थान से दूसरे स्थान पर गति करता हुआ व्याविद्ध दिखाई देता है। जब कि गुल्म नाभि के नीचे अव्याविद्ध होकर स्थित होता है। ३. गर्भ प्रतिदिन क्रमशः वृद्धि को प्राप्त होता है। इसके विपरीत गुल्म धीरे-धीरे बढ़ता है। ४. गर्भ प्रत्येक मास में अपनी भिन्न २ अवस्था को प्राप्त करता है अर्थात् प्रत्येक मास में गर्भ की अवस्था थोड़ी बहुत अवश्य बदलती रहती है तथा गर्भिणी को बिना किसी कारण के ज्वर तथा दाह नहीं होता है परन्तु गुल्मिनी (जिस स्त्री को रक्तगुल्म हो) को बिना किसी कारण के ही ज्वर तथा दाह हो जाता है।।५६-६०।।

अस्मिन् विशेषेऽपि सति संदेहो जायते महान्। नानागर्भविकाराणां सङ्कराद्भिषजे मतः।।६१।।

इन सब उपर्युक्त भेदों के होने पर भी अनेक गर्भसम्बन्धी विकारों के मिल जाने से चिकित्सक को बड़ा भारी सन्देह हो जाता है। अर्थात् यद्यपि रक्तगुल्म तथा गर्भ की उपरिलिखित अनेक विभेदक पहिचान हैं तथापि कई बार गर्भ के अनेक लक्षणों के मिल जाने से रक्तगुल्म तथा गर्भ में भेद करना अत्यन्त कठिन हो जाता है।।६१।।

संभूय सह संमन्त्र्य भिषग्भिः शास्त्रकोविदैः।
काले चिकित्सां कुर्वीत यथा वक्ष्याम्यतः परम्।।६२।।
अल्पान्तरावुभावेतौ गर्भो गुल्मश्च रक्तजः। तद्यथावद्विदित्वाऽऽदौ क्रियां कुर्याद्भिषग्वरः।।६३।।

इसलिये'एकत्रित होकर तथा शास्त्रों के पारंगत वैद्यों के साथ परस्पर सलाह (Consultation) करके उचित काल में (दसवें मास के बाद) रक्तगुल्म की चिकित्सा करनी चाहिये। जैसा कि मैं आगे वर्णन करूँगा। क्योंकि गर्भ तथा रक्तगुल्म में बहुत कम भेद होता है इसलिये इस बात को पहले अच्छी प्रकार जानकर चिकित्सक को चिकित्सा करनी चाहिये। अर्थात् यदि गर्भ के लक्षणों के कारण ठीक प्रकार से निदान न हो रहा हो तो अन्य भी चिकित्सकों से सलाह की जा सकती है। क्योंकि संभव है कि कोई बात अकेले व्यक्ति को समझ न पड़ती हो वह अन्य चिकित्सकों की सहायता से समझ में आ सकती है। आजकल भी हम देखते हैं कि यदि एक चिकित्सक को किसी रोगी के निदान में सन्देह हो तो वह निःसंकोच दूसरे योग्य चिकित्सक को बुलाकर दिखा देता है तथा उसके विषय में अपने सन्देह को दूर कर लेता है। यदि कोई रोगी (Case) अधिक (Complicated) हो तो कई चिकित्सकों की समिति (Medical counsil) बैठकर भी विचार करती है। कई व्यक्ति मिलकर जब विचार करते हैं तब वे अन्त में अवश्य ही किसी न किसी निश्चित परिणाम पर पहुँच जाते हैं।,क्योंकि एक चिकित्सक को कोई एक बात ध्यान में आती है तो दूसरे को

४४२काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्रक्तगुल्मविनिश्चयाध्यायः ९]

कोई दूसरी बात । इस प्रकार उस (Gase) के विषय में कोई भी ज्ञातव्य बात (Important point) छूटने नहीं पाता है। उसपर पूर्णरूप से (Thoroughly) विचार विनिमय किया जा सकता है ।।६२-६३।।

यो हि गुल्मे गर्भ इति गर्भे वा गुल्म इत्यपि ।
क्रियां कुर्यादयशसा एनसा चैव युज्यते ।।६४।।
अतस्तु संशये जाते कुर्यात् साधारणीः क्रियाः । नोपक्रमेदविदितं रोगं कश्चिच्चिकित्सकः ।।६५।।

जो गुल्म में गर्भ की अथवा गर्भ में गुल्म की चिकित्सा करता है वह अपकीर्ति (बदनामी) तथा पाप से युक्त होता है। इसलिये यदि गुल्म या गर्भ का परस्पर संशय हो तो साधारण चिकित्सा करनी चाहिये । चिकित्सक को किसी भी अज्ञात रोग की चिकित्सा नहीं करनी चाहिये । अर्थात् यदि चिकित्सक को गर्भ या गुल्म में परस्पर संशय हो तो उसे गर्भ या गुल्म की कोई भी विशेष चिकित्सा नहीं करनी चाहिये । अपितु ऐसी चिकित्सा करनी चाहिये जो साधारणतया दोनों में प्रयुक्त हो सके ।।६४-६५।।

अथ काले त्वसंपूर्णे संदिग्ध चे चापि दर्शने । हेतुना केनचिद्रक्तं स्रवेत्तं चाशु वारयेत् ।।६६।।
पूर्णे प्रसवकाले तु न रक्तं प्रतिवारयेत् । तत्रानुवासनं दद्याद् द्रवं स्निग्धं च भोजनम् ।।६७।।

यदि पूर्ण या उचित समय (दसवें मास) से पूर्व ही किसी कारण से रक्त आने लग जाय तथा साथ ही गर्भ और गुल्म में परस्पर संदेह भी हो तो उस निकलते हुए रक्त को रोक देना चाहिये अर्थात् उस रक्त का स्तम्भन कर देना चाहिये । तथा यदि प्रसव का समय (दस मास) पूरा हो चुका हो (उस समय यदि रक्त आता हो) तो उस रक्त का स्तम्भन नहीं करना चाहिये—उसे नहीं रोकना चाहिये । उस अवस्था में अर्थात् दसवें मास के बाद यदि रक्तस्राव हो रहा हो तो उस स्त्री को अनुवासन बस्ति तथा द्रव और स्निग्ध भोजन कराना चाहिये । अर्थात् दसवें मास से पूर्व होनेवाले रक्तस्राव को अवश्य रोक देना चाहिये क्योंकि उस अवस्था में यदि वह गर्भ है तो रक्तस्राव को न रोकने से गर्भपात (Abortion) होने का भय रहता है ।।६६-६७।।

विधिनाऽनेन गर्भश्चेत् सुखेन प्रसविष्यति । अथवा रक्तगुल्मः स्यात् सोऽप्यकृत्स्नेन भेत्स्यते ।।६८।।
एतस्मात् कारणाद्रक्तं प्रवृत्तं न निवार्यते ।

उपर्युक्त विधि (अनुवासन और स्निग्ध एवं द्रव भोजन) के द्वारा चिकित्सा करने से यदि वह गर्भ है तो सुखपूर्वक प्रसव हो जायगा । और यदि वह रक्तगुल्म है तो उसका भी पूर्णरूप से भेदन हो जायगा । इस कारण से दसवें मास के बाद प्रवृत्त हुए रक्त को रोकना नहीं चाहिये ।।६८।।

रक्तगुल्मे प्रथमो युक्त्या स्नेहोपपादनम् ।।६९।।

शस्तं बाहुसिरायाश्च वेधनं पाकवारणम् । तथा संशमनीयं च दोषशेषावकर्षणम् ।।७०।।

रक्तगुल्म में प्रारम्भ में रोगी को युक्तिपूर्वक स्नेहन कराना चाहिये । तथा गुल्म में पाक को रोकने के लिये हाथ की सिरा का वेधन करना चाहिये अर्थात् फस्त खोलनी चाहिये । तथा उसके बाद बचे हुए दोषों को निकालने के लिये संशमन चिकित्सा का प्रयोग करना चाहिये ।।६९-७०।।

कल्याणकं पञ्चगव्यं षट्पलं तिक्तमेव वा । सरुजां पाययेन्नारीं दोषवित् कर्मकोविदः ।।७१।।
तीक्ष्णैरास्थापयेदेनां युक्तितश्चानुवासयेत् । पथ्यानि भोजयेच्चैव क्षीरयूषरसादिभिः ।।७२।।

दोषों तथा चिकित्सा के कर्म को जानने वाले व्यक्ति को चाहिये कि वह उस रुग्णा स्त्री को कल्याणक, पञ्चगव्य, षट्पल अथवा तिक्तक घृत का पान कराये । तीक्ष्ण द्रव्यों के द्वारा उसे आस्थापन बस्ति देकर फिर युक्तिपूर्वक अनुवासन कराये । तथा दूध, यूष, एवं मांसरस आदि के द्वारा उसे पथ्य भोजन कराये ।।७१-७२।।

रक्तगुल्मविनिश्चयाध्यायः ९] खिलस्थानम् ४४३

अन्नपानानि रूक्षाणि विदाहीनि गुरूणि च। व्यायामं मैथुनं चिन्तां गुल्मिनी तु विवर्जयेत् ।।७३।। (इति ताडपत्रपुस्तके २२१ तमं पत्रम्)।

रक्तगुल्म में अपथ्य—रक्तगुल्म की रोगिणी को चाहिये कि वह रूक्ष, विदाही एवं गुरु अन्नपान, व्यायाम, मैथुन तथा चिन्ता का त्याग करे अर्थात् इनका सेवन न करे ।।७३।।

ज्वरारुचिश्वासकासशोषकार्श्यारतिव्यथाः । शोफश्चोपद्रवा गुल्मे तांश्चिकित्सेत् स्वभेषजैः ।।७४।।

गुल्म के उपद्रव—गुल्म में ज्वर, अरुचि, श्वास, कास, शोष, कृशता, अरति (ग्लानि), पीड़ा तथा शोक आदि उपद्रव होते हैं। वैद्य को चाहिये कि अपनी २ ओषधियों के द्वारा उनकी चिकित्सा करे ।।७४।।

बिल्वश्योनाकनिर्यूहे साधितैर्जाङ्गलै रसैः । शैथिल्यकरणार्थं च रक्तगुल्मस्य भोजयेत् ।।७५।।

रक्तगुल्म में पथ्य—रक्तगुल्म के रोगी को गुल्म के शिथिल करने के लिये जांगल मांसरसों के द्वारा सिद्ध किये हुए बिल्व और श्योनाक (पाठा) के क्वाथ पिलाने चाहिये ।।७५!

यूषेण वा कुलत्थानां लावसंसारिकेण वा। चालनार्थं विरेकं च त्रिवृत्त्रिफलया पिबेत् ।।७६।।

अथवा गुल्म में गति उत्पन्न करने के लिये कुलत्थ के यूष अथवा लाव (बटेर) के द्वारा संस्कारयुक्त त्रिवृत् और त्रिफला से विरेचन देना चाहिये ।।७६।।

वायोरुपशमार्थं च फलतैलानुवासिताम् । आस्थापयेत् सकृद् द्विर्वा शूलाटोपनिवृत्तये ।।७७।।

वायु की शान्ति के लिये उसे फल तैल के द्वारा अनुवासन देकर शूल तथा आटोप (अफारे) को दूर करने के लिये एक या दो बार आस्थापन बस्ति देवे। फल तैल का प्रयोग इसी ग्रन्थ के पिछले अध्याय (बस्तिविशेषणीयाध्याय) में ८९ से ९४ श्लोकों में दिया गया है ।।७७।।

तुल्यं मधु च तैलं च ताभ्यामुष्णोदकं समम् । द्वौ कर्षौ शतपुष्पायाः कर्षार्धं सैन्धवस्य च ।।७८।। एतेनास्थापयेन्नारीं दशमूलादिकेन वा । बलं चाप्याययेत्तस्या रसैः क्षीरैश्च संस्कृतैः ।।७९।।

आस्थापन योग—मधु और तैल समान मात्रा तथा इन दोनों के समान उष्ण जल लेवे। इसमें दो कर्ष सौंफ तथा आधा कर्ष सैन्धव नमक डालकर उसके द्वारा अथवा दशमूल क्वाथ के द्वारा उसे आस्थापन बस्ति देवे। फिर संस्कारयुक्त मांसरस तथा दूध के प्रयोग द्वारा उसके बल की वृद्धि करे ।।७८-७९।।

उपक्रमेत्ततश्चूर्णैरेतैः शोधनपातनैः । हरीतकी वचा हिङ्गु सैन्धवं साम्लवेतसम् ।।८०।। यवानी यावशूकं च चूर्णमुष्णाम्बुना पिबेत् ।

इसके बाद शोधन कराने वाले तथा गुल्म को नीचे गिराने वाले निम्न चूर्णों के द्वारा उसकी चिकित्सा करे—हरड, बच, हींग, सैन्धवनमक, अम्लवेतस, अजवायन तथा यवक्षार के चूर्ण को उष्ण जल के साथ सेवन करे ।।८०।।

हरीतकीयवक्षारसौवर्चलमिति त्रयम् ।।८१।। घृतयुक्तं पिबेद्युक्त्या रक्तगुल्मस्य भेदनम् ।

रक्तगुल्म के भेदन करने के लिये हरड़, यवक्षार तथा सौवर्चल नमक—इन तीनों का युक्तिपूर्वक घृत के साथ सेवन करे ।।८१।।

४४४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रक्तगुल्मविनिश्चयाध्यायः ९]

पत्रैलापिप्पलीशुण्ठीचूर्णं वा विडसंयुतम् ।।८२।।
नागरं शुक्तिचूर्णं वा पिबेद्गोमूत्रसंप्लुतम् ।

तेजपत्र, पिप्पली तथा सोंठ के चूर्ण में विडलवण मिलाकर अथवा सोंठ या मुक्ताशुक्ति (अथवा नखी) के चूर्ण को गोमूत्र में मिलाकर सेवन करना चाहिये ।।८२।।

सूक्ष्मैलाकुञ्चिकाचव्यपिप्पलीचित्रकस्य वा ।।८३।।
कल्कं बल्वजयूषाढ्यैः पिबेन्मण्डोदकेन वा ।

छोटी इलायची, कलौंजी, चव्य, पिप्पली तथा चित्रक के कल्क को बल्वज के यूष अथवा चावलों के मण्ड के साथ सेवन करना चाहिये ।।८३।।

अपरापातनोट्दिष्टैरोषधैश्चापि भेदयेत् ।।८४।।

अथवा अपरा (Placenta) पातन के लिये प्रयुक्त होने वाली (सु. शा. अ. १० में कथित) ओषधियों के द्वारा इसका भेदन करना चाहिये ।।८४।।

अतिप्रवृत्तं रुधिरं ग्लानिं जनयते यदि । विनिहृते गुल्मदोषे सावशेषेऽपि वा भिषक् ।।८५।।
पुनरास्थापनोक्तेन तत्र कुर्याद्द्विषग्जितम् । अनुबन्धभयाच्चैव शनैस्तदनुशोधयेत् ।।८६।।

यदि गुल्म के दोष के निकल जाने पर अथवा कुछ शेष रहने पर भी अत्यन्त प्रवृत्त होता हुआ रक्त शरीर में बहुत ग्लानि उत्पन्न करे तो पुनः आस्थापनोक्त विधि से उसकी (च. चि. अ. ५ में कथित) चिकित्सा करनी चाहिये । तथा अनुबन्ध के भय से उसके बाद उसका शनैः २ शोधन करना चाहिये ।।८५-८६।।

पद्मादीनि समूलानि दग्ध्वा तद्भस्म संहरेत् । गाढयित्वा च तत्क्वाथं चूर्णैरेतैर्विपाचयेत् ।।८७।।
शुण्ठीपिप्पलिकुष्ठैश्च चव्यचित्रकदारुभिः । दर्विप्रलेपितं सिद्धमभ्यस्येत्तेन शुद्ध्यति ।।८८।।
शिलाजत्वभयारिष्टं कल्पेनाभ्यस्य मुच्यते ।

मूल सहित पद्म आदि को जलाकर उसकी भस्म बनाले तथा उसके क्वाथ को गाढ़ा करके उसमें सोंठ, पिप्पली, कुष्ठ, चव्य, चित्रक, देवदारु आदि का चूर्ण डालकर पकायें । जब वह कलछी में लिप्त होने योग्य हो जाय तब उसका प्रयोग करे । उससे रोगी का शोधन होता है । और शिलाजीत तथा अभयारिष्ट के कल्प के सेवन से भी रक्तगुल्म नष्ट होता है ।।

यच्चापि पञ्चगुल्मीये चिकित्सितमुदाहृतम् ।।८९।।
तदिहापि प्रयोक्तव्यं प्रसमीक्ष्य बलाबलम् । इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।९०।।
(इति) खिलेषु रक्तगुल्मविनिश्चयो (नाम नवमोऽध्यायः) ।।९।।


इसके अतिरिक्त पञ्चगुल्मीय अध्याय में जो चिकित्सा कही गई है—रोगी के बलाबल को देखकर उस सबका भी यहां प्रयोग करना चाहिये ।
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।।८९-९०।।
(इति) खिलेषु रक्तगुल्मविनिश्चयो (नाम नवमोऽध्यायः)

अन्तर्वलीचिकित्सिताध्यायः १०] खिलस्थानम् ४४५

अथ अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायो दशमः ।

अथातोऽन्तर्वत्नीचिकित्सितमध्यायं वक्ष्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् कश्यपः ॥२॥

अब हम अन्तर्वत्नी चिकित्सित अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। अर्थात् इस अध्याय में गर्भिणी स्त्रियों की चिकित्सा का वर्णन किया जायेगा ॥

सूक्ष्मां चिकित्सां वक्ष्यामि गर्भिणीनां विभागशः ।
तथा गर्भश्च नारी च वर्धते रक्ष्यतेऽपि च ॥३॥

अब मैं गर्भिणी स्त्रियों की सूक्ष्म चिकित्सा का विभागपूर्वक वर्णन करूंगा जिससे गर्भ और नारी (गर्भवती स्त्री) दोनों की वृद्धि होती है तथा उनकी रक्षा भी होती है ॥३॥

गर्भिणीनां ज्वरः कष्टः सर्वव्याधिषु पार्थिव ! । ज्वरोष्मणाऽभितप्तस्तु गर्भो यात्येव विक्रियाम् ॥४॥
तस्माज्ज्वरचिकित्सां तु पूर्वमेव निबोध मे ।

हे पार्थिव ! गर्भिणी स्त्रियों के सम्पूर्ण रोगों में ज्वर सबसे अधिक कष्टदायी रोग होता है। ज्वर की ऊष्मा (गर्मी) से सन्तप्त हुए गर्भ में विकृति उत्पन्न हो जाती है। इसलिये सबसे पहले तू मेरे से ज्वर की चिकित्सा सुन ॥४॥

क्षुच्छ्रमाभ्यञ्जनाद्रौक्ष्यादौष्ण्यापक्वविधारणात् ॥५॥
स्नेहस्वेदौषधानां च विभ्रमात्तेजसोऽपि च । सन्तापान्मनसश्चापि पर्वता¹नां तथैव च ॥६॥
गन्धाच्च तृणपुष्पाणां गर्भिण्या जायते ज्वरः ।

क्षुधा, श्रम, अभ्यञ्जन, रूक्षता, उष्णता, अपक्व के धारण स्नेहन, स्वेदन तथा ओषधियों और तेज के विभ्रम, मन के सन्ताप तथा पहाड़ों पर चढ़ने और तृण एवं पुष्पों की गन्ध इत्यादि से गर्भिणी स्त्री को ज्वर हो जाता है ॥५-६॥

गर्भिणीं ज्वरितां नारीमेकाहमुपवासयेत् ॥७॥
ततो दद्यादलवणां पेयां स्नेहविवर्जिताम् ।

ज्वरयुक्त गर्भिणी स्त्री को पहले एक दिन उपवास कराके फिर लवण एवं स्नेह से रहित पेया देनी चाहिये ॥७॥

तीक्ष्णानि त्वन्नपानानि स्वेदमायासमॆव च ॥८॥
वर्जयेज्ज्वरिता नारी यवागूं केवलां पिबेत् ।

गर्भिणी स्त्री को ज्वर हो जाने पर तीक्ष्ण अन्नपान, स्वेदन और आयास (परिश्रम वाले कार्य) का त्याग कर देना चाहिये। तथा केवल यवागू का सेवन करना चाहिये ॥८॥

यवाग्वा ह्रसिते दोषे यूषैरन्नानि दापयेत् ॥९॥
यूषैस्तु ह्रसिते दोषे रसं वा क्षीरमेव वा । दापयेन्मतिमान् प्राज्ञो न त्वौषधविधिर्हितः ॥१०॥
अनुबन्धे तु दोषस्य गर्भकालमपेक्ष्य च । मासाच्चतुर्थात् प्रभृति भिषग्भेषजमाचरेत् ॥११॥


¹ आरोहणादिति पूरणीयम् । किं वा 'पर्वतारोहणात्तथा' इति वा पाठः स्यात् ? ।

४४६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायः १०]

बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिये कि यवागू के द्वारा दोषों के कुछ कम हो जाने पर यूषों के साथ अन्न का सेवन कराये। तथा फिर यूषों के द्वारा दोषों के और कम हो जाने पर मांंसरस अथवा दूध देवे। इस अवस्था में ओषधियों का प्रयोग अच्छा नहीं है। इसके बाद भी यदि कुछ दोष का अनुबन्ध शेष रहे अर्थात् दोष बचा रह जाय तो गर्भ के समय को देखकर चतुर्थ मास से लेकर चिकित्सक ओषधि का प्रयोग कर सकता है। अर्थात् गर्भ के चतुर्थ मास के बाद ओषधि का प्रयोग किया जा सकता है। उससे पूर्व ओषधि का प्रयोग बिलकुल नहीं करना चाहिये। चतुर्थ मास से पूर्व गर्भ स्थिर नहीं होता इस लिये ओषधियों का प्रयोग नहीं कराना चाहिये। चतुर्थ मास में गर्भ स्थिर हो जाता है। गर्भ के स्थिर हो जाने के बाद फिर विशेष डर नहीं रहता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—'चतुर्थे मासि स्थिरत्वमापद्यते गर्भः'। चरक में तो गर्भावस्था में आठवें मास से पूर्व तक ओषधि का निषेध किया गया है उसके बाद भी जो केवल वमन आदि से साध्य रोग हैं अर्थात् जिनमें वमन, विरेचन आदि देना आवश्यक है उनमें मृदु वमन-विरेचन आदि अथवा तदर्थकारी (विरेचन ओषधि के स्थान पर गुदा में फलवर्ति आदियों का रखना तदर्थकारी कहलाता है अर्थात् जो उस प्रयोजन को सिद्ध करे) ओषधियों के प्रयोग का विधान दिया गया है ॥९-११॥

शारीरं तु ज्वरं ज्ञात्वा वातपित्तकफात्मकम् । मध्यां क्रियां प्रयुञ्जीत संचिन्त्य गुरुलाघवम् ॥१२॥
उपद्रवबलं ज्ञात्वा सत्त्वं चापि समीक्ष्य तु । गर्भावस्थां तु विज्ञाय लेखनानि प्रदापयेत् ॥१३॥

यदि गर्भिणी स्त्री को वातिक, पैत्तिक अथवा श्लैष्मिक आदि शारीरिक ज्वर हो तो गुरुता एवं लघुता का विचार करके मध्य क्रिया (चिकित्सा) का प्रयोग करना चाहिये। अर्थात् उस समय ऐसी चिकित्सा होनी चाहिये जो साधारणतया तीनों दोषों के प्रकोप में व्यवहृत हो सके। तथा रोग के उपद्रव एवं रोगी के बल और गर्भावस्था को ध्यान में रखते हुए लेखन ओषधियां देनी चाहिये ॥१२-१३॥

उत्पन्नायां तु तृष्णायां नात्युष्णं प्रपिबेज्जलम् । वातश्लेष्मसमुत्थे तु ज्वरे नीरं¹ विषायते ॥१४॥
अथ पित्तकृते चापि शृतशीतं प्रशस्यते । कुप्यपाषाणनिष्पक्वं शीतं तृष्णानिबर्हणम् ॥१५॥

ज्वर में तृष्णा (प्यास) लगने पर हल्का, उष्ण (सुखोष्ण) जल पीना चाहिये। विशेषकर वातिक और श्लैष्मिक ज्वर में तो शीतल जल बिलकुल ही विष के तुल्य है। पैत्तिक ज्वर में भी गरम करके ठण्डा किया हुआ पानी ही प्रशस्त माना गया है। कूपी तथा पत्थर के बर्तन में पकाकर ठण्डा किया गया जल प्यास को बुझाता है। अर्थात् वैसे तो साधारणतया सभी प्रकार के ज्वरों में उष्ण जल ही देना चाहिये। पैत्तिक ज्वर में चाहें तो थोड़ा बहुत शीतल जल दिया जा सकता है परन्तु वातिक और श्लैष्मिक ज्वर में तो शीतल जल का बिलकुल ही निषेध किया गया है तथा पैत्तिक में भी गर्म करके ठण्डा किया हुआ जल देना चाहिये। ज्वर में साधारणतया उष्ण जल ही क्यों देना चाहिये इस विषय में चरक वि. अ. ३ में कहा है। यहां भी पित्त के प्रयोग में जो शीतल जल का विधान दिया गया है, वह गरम करके ठण्डा किया हुआ जल ही समझना चाहिये ॥१४-१५॥

ज्वरे तु तरुणे दृष्टो विधिरेष विशेषतः । भग्नवेगे तु कर्तव्यं तृष्णाप्रशमनैः शृतम् ॥१६॥
ज्वरं ज्वरं समासाद्य शीतं वा यदि वेतरम्(त्) ।

यह उपर्युक्त विधान विशेषकर तरुण ज्वरों के लिये दिया गया है। अर्थात् साधारणतया सभी प्रकार के ज्वरों में इस विधान का पालन करना चाहिये परन्तु तरुण ज्वरों में तो इसका अवश्य ही पालन करना चाहिये। अन्य ज्वरों में


१. नीरं शीतलजलमित्यर्थः स्यात्।