भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 792

४३२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८]

पञ्चमूलाढकेऽध्यर्धं फलानामाढकं भवेत् । यवकोलकुलत्थानां कुडवः स्युस्त्रयः पृथक् ॥८९॥
चतुर्भागावशिष्टं तु पश्चादष्टगुणे जले । मस्तुनेश्राढकेनैतत्तैलप्रस्थं विपाचयेत् ॥९०॥
कुष्ठस्य शतपुष्पाया वचाया मधुकस्य च ।
कुटजस्य च बीजानां बीजानां मदनस्य च ॥९१॥
यवान्याः पिप्पलीनां च हरेण्वा देवदारुणः ।
बिल्वस्य देवपुष्पस्य रास्नाया मुस्तकस्य च ॥९२॥
सूक्ष्मैलायाः प्रियङ्गवाश्च भागैरक्षसमैः पृथक् ।
सिद्धं सुलवणं पूतं निदध्याद्भाजने शुचौ ॥९३॥
एतन्मन्दनिरूढानां बस्तिव्यापत्सु चोत्तमम् । फलतैलमिति ख्यातमुदावर्तनिवर्तनम् ॥९४॥
तथैवोदरिणां सिद्धं गुल्मिनां क्रिमिकोष्ठिनाम् । पृष्ठश्रोण्यरुजङ्घासु वातेष्वप्रगुणेषु च ॥८५॥
निरूहसाध्या ये केचिद्विकाराः समुदाहृताः । ताञ्जयेद्बस्तिनाऽनेन मूत्राघातांश्च नाशयेत् ॥९६॥

फल तैल का निर्माण तथा उपयोग— लघुपञ्चमूल १ आढक (२५६ तोले), मदनफल १-१/२ आढक (३८४ तोले), यव, कोल (बेर) तथा कुलत्थ—पृथक् २ तीन कुडव (१६×३=४८ तोले)—इन्हें अष्टगुण जल में पकाकर चतुर्थांश शेष रखें। इसमें १ आढक दधिमस्तु (दही के ऊपर का पानी) तथा एक प्रस्थ (६४ तोले) तिल तैल डालें। इसमें कुष्ठ, सौंफ, वच, मुलहठी, कुटज के बीज (इन्द्रजौ), मैनफल के बीज, अजवायन, पिप्पली, हरेणु, देवदारु, बिल्व, लौंग, रास्ना, नागरमोथा, छोटी इलायची तथा प्रियङ्गु—सब पृथक् २ एक २ अक्ष (एक २ तोला) डालकर तैल सिद्ध करके इसमें बारीक पीसकर छना हुआ नमक डालकर साफ बर्तन में रख दें। यह फल तैल कहलाता है। यह तैल जिन्हें ठीक प्रकार से निरूह बस्ति नहीं दी गई हो, जिन्हें बस्ति के कारण उपद्रव हो गये हों तथा उदावर्त रोगों को नष्ट करने में उत्तम मानी गई है। इसी प्रकार उदररोगी, गुल्मरोगी, जिनके पेट में कृमिरोग हो, पृष्ठ, श्रोणि, ऊरु तथा जङ्घाओं में यदि वायु प्रकुपित हुआ हो, निरूहसाध्य (निरूह के द्वारा अच्छे होने वाले विकार तथा मूत्राघात आदि रोगों का उपर्युक्त बस्ति (स्नेहबस्ति) के द्वारा शमन करे ॥८९-९६॥

एरण्डमूलत्रिफलाबलारास्नापुनर्नवाः । गुडूच्यारग्वधो दारु पलाशो मदनं फलम् ॥९७॥
मूलं तुरङ्गगन्धायाः पञ्चमूलं कनीयसम् । पलप्रमाणान्येतानि जलद्रोणे विपाचयेत् ॥९८॥
अष्टभागावशेषं तं परिपूतं समाहरेत् । कर्षप्रमाणान्येतानि श्लक्ष्णपेष्याणि कारयेत् ॥९९॥
शताह्वा मधुकं मुस्ता प्रियङ्गुर्हपुषा वचा । रसाञ्जनं तार्क्ष्यशैलं पिप्पल्यः कौटजं फलम् ॥१००॥
खजेन मथितः कोष्णः सतैलमधुसैन्धवः । समुद्रमांसरसन्यूहो निरूहः साधुयोजितः ॥१०१॥
लेखनो दीपनो बल्यो ग्रहण्यर्शोविकारनुत् । पार्श्वपृष्ठकटीशूलं पार्श्वजङ्घोरुजा रुजः ॥१०२॥
एरण्डबस्तिः शमयेन्मारुतं च कफावृतम् । युक्तमात्रोष्णलवणः स्नेहबस्तिर्विधीयते ॥१०३॥

एरण्डबस्ति का निर्माण तथा प्रयोग— एरण्डमूल, त्रिफला, बला, रास्ना, पुनर्नवा, गिलोय, अमलतास, देवदारु, ढाक, मैनफल, अश्वगन्धा की जड़, लघु पञ्चमूल सब १ पल (४ तो.)। इन्हें १ द्रोण जल में पकाये। अष्टमांश शेष रहने पर उतार कर छान लें। इसमें—सौंफ, मुलहठी, नागरमोथा, प्रियङ्गु, हाऊबेर, बच, तार्क्ष्य पर्वत पर उत्पन्न होने वाला रसाञ्जन (रसौंत), पिप्पली, कुटजबीज (इन्द्रजौ) सब द्रव्य एक कर्ष प्रमाण में लेकर उनका सूक्ष्म चूर्ण करके इसमें डालकर खोंचे से मथ दें। इसमें गर्म में ही तिलतैल, मधु, सैन्धवनमक, गोमूत्र तथा मांसरस अच्छी प्रकार मिलाकर निर्यूह तैयार करे। यह एरण्डबस्ति शरीर का लेखन करती है, अग्निदीपक तथा बल्य है और ग्रहणी, अर्शरोग, पार्श्वशूल, पृष्ठशूल,

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