काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८] | खिलस्थानम् | ४३३ |
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कटीशूल एवं पार्श्व, जङ्घा और ऊरु में वेदना को नष्ट करती है। इसी स्नेहबस्ति को यदि योग्य मात्रा में उष्ण कर लिया जाय तथा उसमें नमक मिला दिया जाय तो यह कफावृत वायुरोग को नष्ट करती है॥९७-१०३॥
समासतः स द्विविधस्तस्य मात्रा प्रचक्ष्यते । प्रकुञ्चः कन्यसी मात्रा, ततोऽध्यर्धा तु मध्यमा ॥१०४॥
(इति ताडपत्रपुस्तके २१९ तमं पत्रम्)।
उत्तमा द्विपला मात्रा मात्राबस्तौ तु भार्गव ! । अपस्त¹नस्यार्धपलं (लाऽ) परिहार्या निरत्यया ॥१०५॥
संक्षेप से यह स्नेहबस्ति दो प्रकार की होती है। उसकी माता का वर्णन किया जाता है। हे भार्गव (भृगुकुलोत्पन्न जीवक) ! मात्राबस्ति में ह्रस्व मात्रा एक प्रकुञ्च, मध्यम मात्रा डेढ़ प्रकुञ्च तथा उत्तम मात्रा दो पल होती है। दूध न पीने वाले बालक के लिये यह आधा पल होती है। इसका निःशंक होकर सब अवस्थाओं में प्रयोग किया जा सकता है। इसमें किसी प्रकार के उपद्रव की आशंका नहीं होती है। चरक सि. अ. ४ में स्नेह की सबसे ह्रस्व मात्रा के समान मात्राबस्ति बताई है। चरक में ६ घण्टे में जीर्ण होने वाली मात्रा को स्नेह की सबसे छोटी मात्रा बताई है। इसके अतिरिक्त कहीं २ डेढ़ पल को स्नेह की ह्रस्व मात्रा बताया है। सुश्रुत चि. अ. ३५ में कहा है—‘तस्यापि विकल्पोऽधर्धमात्रावकृष्टोऽपरिहार्यो मात्राबस्तिः’। यहां ६ पल स्नेह की मात्रा वाली बस्ति को स्नेहबस्ति, ३ पल की मात्रा वाली स्नेहबस्ति को अनुवासन तथा डेढ़ पल की मात्रा वाली स्नेहबस्ति को मात्राबस्ति कहते हैं। इसी मात्राबस्ति की ओर यहां संकेत किया गया है। मात्राबस्ति का प्रयोग चरक सि. अ. ४ में निम्न अवस्थाओं में दिया है—कर्मव्यायामभाराध्वयानस्त्रीकर्षितेषु च। दुर्बले वातभग्ने च मात्राबस्तिः सदा मतः ॥१०४-१०५॥
कर्षत्रयं त्रिवर्षस्य, चतुर्वर्षस्य वै पलम् । षड्वर्षस्य तु बालस्य स्व एव प्रसृतः स्मृतः ॥१०६॥
द्वौ द्वौ द्वादशवर्षाणां चत्वारः प्रसृतास्तथा । देयाः षोडशकादीनां पूर्वाह्ने वाऽन्तरेषु च ॥१०७॥
यावन्मध्यं वयो, वार्धे त्वपकर्षेद्यथाक्रमम् । समीक्ष्य देहदोषाग्निबलं प्रकृतिमेव च ॥१०८॥
स्नेहबस्ति तथा निरूहबस्ति की मात्रा—तीन वर्ष तक के बालक के लिये स्नेहबस्ति की मात्रा ३ कर्ष (३ तोला) होती है। चार वर्ष के बालक के लिये एक पल (४ तोला), छै वर्ष के बालक के लिये १ प्रसृत (८ तोला), बारह वर्ष के बालकों के लिये दो २ प्रसृत (१६ तोला) तथा सोलह वर्ष से लेकर मध्य अवस्था तक पूर्वाह्न तथा उसके बीच २ में ४ प्रसृत (३२ तोला) मात्रा देनी चाहिये। वृद्धावस्था में फिर रोगी के शरीर, दोष, अग्निबल तथा प्रकृति को देखकर इस मात्रा को यथाक्रम कम करे। अर्थात् जिस क्रम से वृद्धि की गई है उसी क्रम से मात्रा में कमी करनी चाहिये। बस्ति में जो स्नेह की मात्रा कही गई है, निरूह की मात्रा उससे तिगुनी होती है। चरक वि. अ. ८ में वय (अवस्था–उम्र) को निम्न तीन विभागों में विभक्त किया गया है—१. बाल्यावस्था २. मध्यमावस्था ३. वृद्धावस्था। तीस वर्ष तक बाल्यावस्था मानी गई है। ६० वर्ष तक मध्यम अवस्था तथा उसके बाद १० वर्ष तक (आयु पर्यन्त) वृद्धावस्था मानी गई है। अवस्था के अनुसार चरक सि. अ. ३ में निरूह की मात्रा इस प्रकार से दी है—प्रथम वर्ष में निरूह की मात्रा आधा प्रसृत (१ पल) होती है तदनन्तर १२ वर्ष तक प्रतिवर्ष आधा प्रसृत बढ़ती जाती है जिससे १२ वर्ष बालक के लिये ६ प्रसृत (१२ पल) मात्रा हो जाती है। इसके बाद प्रतिवर्ष १ प्रसृत मात्रा बढ़ाई जाती है जिससे १८ वर्ष की अवस्था में १२ प्रसृत (२४ पल) मात्रा हो जाती है। ७० वर्ष तक की आयु में यही मात्रा (१२ प्रसृत या २४ पल) अभीष्ट है अर्थात् इससे अधिक मात्रा नहीं दी जाती है। इसके बाद अर्थात् वृद्धावस्था १६ वर्ष के बालक के समान अर्थात् १० प्रसृत मात्रा निरूह की होती है ॥१०६-१०८॥
१. अस्तनन्यस्य बालस्येत्यर्थः ।